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प्राची - मई 2016 - संपादकीय

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संपादकीय

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आखिर हम हैं क्या!

बसे बड़े लोकतांत्रिक देश का नागरिक होने का ढिंढोरा हम अक्सर पीटते दिखाई देते हैं. पूजा-पाठ भी हम किसी अन्य धर्म के लोगों से ज्यादा करते हैं. क्यों नहीं करेंगे? हमारे पुरखों ने तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं की विरासत जो हमें सौंपी है. उसे संभालने में समय तो लगता है. इसीलिए पूरा साल अदेखे-अनजाने देवी-देवताओं की पूजा-पाठ में ही बीत जाता है. पत्थर की मूर्तियों को पूजकर और मंदिरों में रुपये-पैसे, सोने-चांदी का चढ़ावा देकर हम समझ लेते हैं कि हमारे पाप का घड़ा खाली हो गया है और पुण्य का घड़ा लबालब भर गया है. उसमें अब और पुण्य भरने की गुंजाइश नहीं है. फिर भी अगर कोई संदेह होता है, तो हम शहर के चौराहों के बीचों-बीच पंछियों को दाना-चुगाकर और पानी पिलाकर अतिरिक्त पुण्य कमा लेते हैं; ताकि मृत्यु के बाद स्वर्ग में आरक्षित स्थान प्राप्त करने में कोई कमी शेष न रहे.

पूजा-पाठ, भक्ति, व्रत-उपवास और धार्मिक अनुष्ठानों से हम अपनी धार्मिक आस्था का सबूत देते ही रहते हैं. इसके अतिरिक्त अपनी बातों से या धर्म के तथाकथित बाबाओं और भगवानों द्वारा प्रतिदिन टी.वी. पर या किसी स्थान विशेष पर हजारों भक्तों के सामने प्रवचनों के माध्यम से 'सभी जीवों पर दया करनी चाहिए', 'मानव सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है', 'परोपकार से पुण्य प्राप्त होता है', 'नेकी कर दरिया में डाल देना चाहिए', 'अहिंसा परमोधर्मः', 'वसुधैव कुटुम्बकम्' जैसे उपदेश भी सुनते रहते हैं. परंतु हम कितने बड़े मानवतावादी हैं, और जीवों पर कितनी दया करते हैं, यही अभी आगे स्पष्ट हो जायेगा.

हमारे देश की जनसंख्या बेहिसाब बढ़ रही है. उससे दुगनी अनुपात में वाहनों की संख्या बढ़ रही है. मनुष्य न अपनी बुद्धि से जनसंख्या को रोकने का कोई उपाय कर रहा है, न सरकार सड़क पर वाहनों की वृद्धि पर रोक लगा रही है. बैंकों ने आसानी से प्राप्त होनेवाले फाइनेन्स की सुविधा प्रदान करके वाहनों की खरीददारी को महामारी के स्तर तक ला दिया है. लोग चाहे अपने घर में ढंग का खाना न खाएं और बाहर जाते समय अच्छे कपड़े न पहनें, परंतु सामाजिक स्तर ऊंचा करने के लिए फाइनेन्स द्वारा गाड़ी अवश्य खरीद लेते हैं. दिल्ली की स्थिति यह है कि यहां संसार के किसी भी बड़े महानगर से ज्यादा वाहन हैं. यातायात जाम यहां की सबसे बड़ी समस्या है. प्रदूषण हद से ज्यादा बढ़ गया है, खतरनाक स्तर तक; फिर भी कोई सोचने-समझने और कुछ करने के लिए तैयार नहीं है, न सरकार, न कोई व्यक्ति, न संस्था. गैर-सरकारी संस्थायें सामाजिक कार्यों के लिए विदेश से ढेर सारा अनुदान प्राप्त करती हैं, और उसे इतनी आसानी से बिना कोई कार्य किए डकार जाती हैं, कि भारत सरकार की एजेन्सियों को भनक तक नहीं लगती.

बात मुद्दे से भटक न जाए, इसलिए मैं वापस अपनी बात पर आता हूं. सड़क पर अत्यधिक वाहन होने के कारण सड़क दुर्घटनाओं में भी वृद्धि हुई है. इसका एक अन्य कारण है, धनाढ्य वर्ग के युवा लड़के-लड़कियां, जिनके हाथों में उनके मां-बाप ने महंगी कारों के स्टीयरिंग बालिग होने के पहले ही थमा दिये हैं. जवानी की सीढ़ी पर कदम रखते ये युवा शराब, ड्रग्स आदि का सेवन करके अपने दोस्तों के साथ रोमांच प्राप्त करने के लिए तूफान की गति से गाड़ियां चलाते हैं और सड़क पर चलने वाले व्यक्तियों को घास की तरह कुचलकर भाग खड़े होते हैं. यह तो खैर, धनान्ध लोगों की बात हुई. हम बात कर रहे थे, मानवतावादी, परोपकारी, धार्मिक और पुण्य कमाने वाले लोगों की...यह ऐसे व्यक्ति हैं, जो मंदिरों में पूजा-पाठ करने के लिए घंटों बर्बाद कर देते हैं. साल में एक बार शिरडी, वैष्णों देवी, पुट्टापुर्थी, शबरीमाला आदि के चक्कर लगाते हैं और पूरी भक्ति और निष्ठा के साथ ने केवल भगवानों के दर्शन करके आते हैं, बल्कि उनके ऊपर करोड़ों का सोना भी चढ़ाकर आते हैं. अपने घर के पास सुबह शाम पंछियों को दाना चुगाते हैं और आवारा कुत्तों को खाना खिलाते हैं.

परंतु ये धार्मिक, धर्मभीरु और परोपकारी व्यक्ति किसी सड़क दुर्घटना में घायल, बुरी तरह तड़प रहे व्यक्ति को एक बूंद पानी नहीं पिलाते. यह लोग जीवन की भीख मांग रहे उस व्यक्ति को उठाकर अस्पताल पहुंचाना तो दूर, उठाकर सड़क के किनारे तक नहीं करते, बल्कि उसके इर्द-गीर्द मजमा लगाकर जुमलेबाजी करते रहते हैं, ''अरे, कोई इसे अस्पताल ले जाओ'', ''पुलिस को खबर करो'', ''पता नहीं कौन था?'', ''बहुत चोट लगी है'', ''बचेगा नहीं'', ''चलो, हमें क्या? देर हो रही है.'', ''हम क्यों पुलिस-अस्पताल के झंझट में पड़ें'', ''साला दारू पीकर गाड़ी चला रहा होगा'' ''मरने दो'' ''ये तो रोज होता रहता है'' आदि-आदि. जुमले बहुत हैं, सभी को न तो याद करना आसान है, न यहां लिखना संभव है. आशय यह कि इसी तरह की तमाम हम करते हैं, परंतु मनुष्य होकर भी मनुष्य की सहायता के लिए हमारे हाथ आगे नहीं बढ़ते.

ऐसे मौकों पर हमारे पुण्य कर्म करने वाले, पत्थरों को पूजने वाले, स्वर्ग में अग्रिम सीट आरक्षित कराने वाले, गांठ से पूरे, पर आंख के अंधे लोगों के मन में मानवता और दया की एक चिंगारी भी नहीं सुलगती. कुछ लोग ऊपरी तौर पर ''इस्स, ची...ची...'' की आवाज निकालकर दुःख अवश्य प्रकट कर देते हैं, परंतु सहायता के लिए अपने हाथ नहीं बढ़ाते, जैसे उनके हाथ जन्म से ही टूटे हुए हैं और पांव लकड़ी के बने हों. ऐसी हालत में बेचारे कैसे किसी घायल व्यक्ति की सहायता कर सकते हैं? कैसे उसे उठाकर ले जांय और अस्पताल में भर्ती करें.

अपवादों को छोड़ दें, तो हमारे देश के अधिकांश व्यक्ति मुसीबत में पड़े व्यक्ति की मदद नहीं करते. 'परोपकार' और 'नेकी कर दरिया में डाल' जैसे शब्द और मुहावरे केवल धर्म के ठेकेदारों के लिए बने हैं, जो वह अपने मीठे-मीठे प्रवचनों के

माध्यम से मूढ़ व्यक्तियों के कानों में ठूंसते रहते हैं, परंतु उसका रंचमात्र असर भी उनके भक्तों के हृदय में नहीं होता. वह अपने जीवन में ऐसे प्रवचनों का अनुपालन कभी नहीं करते. इसमें वक्त की बरबादी होती है, और पुण्य कुछ भी नहीं मिलता. 'अहिंसा परमोधर्मः' भी अब इतिहास की बात हो गयी है. अब हम केवल हिंसा में बात करते हैं. तभी तो छोटी-छोटी बात पर लोग हिंसक होकर तोड़-फोड़, आगजनी और हत्या करने पर उतारू हो जाते हैं. पास-पड़ोस में, घर के सामने वाहन खड़ा करने, सड़क पर चलते समय हल्का धक्का लगने, वाहन टकरा जाने, कूड़ा-करकट फेंकनें, जैसी बातों को लेकर जिस प्रकार हिंसात्मक घटनाएं उग्र रूप ले लेती हैं, यह समाज के लिए बहुत ही शोचनीय विषय है. कई बार तो युवा वर्ग के व्यक्तियों को उनकी गल्ती के लिए सीख देना भी हमें भारी पड़ जाता है. उग्र स्वभाव के ये युवा बिना सोचे-समझे उपदेश देनेवाले व्यक्ति पर आक्रमण करके उसकी हत्या तक कर देते हैं.

लोगों के बीच बढ़ रही हिंसात्मक घटनाओं और विलुप्त हो रही मानवतावादी सोच और अपरोपकार की भावना से एक बात समझ में आती है कि भौतिकवाद की अंधी भाग-दौड़ ने हमें मनुष्य से जानवर बना दिया है. जानवर के अंदर फिर भी दया ममता जीवित है, परंतु मनुष्य बाहर से मनुष्य जैसा होते हुए भी अंदर से वह स्वयं पत्थर और मिट्टी का बनकर रह गया है. जिस प्रकार वह मूर्तियों पर सोने-चांदी के गहने चढ़ाकर खुश होता है, उसी प्रकार वह स्वयं को पैसों की ढेरी पर स्थापित करके खुश है. परोपकार और नेकी जैसे कर्म उसके जीवन दर्शन से गायब हो चुके हैं. आधुनिक शिक्षा और डॉलरवादी सोच से हमारी नई पीढ़ी को यह बात अच्छी तरह से समझ में आ गयी है कि परोपकार और नकी से कोई पुण्य प्राप्त नहीं होता. पुण्य केवल निर्जीव भगवानों के ऊपर धन चढ़ाकर और पण्डे-पुजारियों को दक्षिणा देकर ही प्राप्त होता है.

हम यह भी अच्छी तरह समझ गये हैं कि किसी का शोषण करने, अत्याचार करने, लूट-खसोट से धन अर्जित करने आदि से कोई पाप नहीं लगता. पाप तो तब लगता है, जब हम यह सब नहीं करते हैं. इसीलिए हम बिना संकोच और भय के अपने जीवन में हर प्रकार के अनाचार और दुराचार करते हैं, और जिस प्रकार कोई व्यक्ति सरकारी कर्मचारी/अधिकारी को घूस देकर गलत-सही कार्म त्वरित गति से कहवा लेता है, उसी प्रकार जीवन में गलत काम करने वाला व्यक्ति भगवान को चढ़ावे के रूप में घूस देकर अपने पापों को पुण्य के खाते में डलवा देता है.

अंत में प्रश्न उठता है, वास्तविक रूप में हम क्या हैं? हम मनुष्य हैं या कुछ और? हमारे जीवन दर्शन और कर्म में इतना विरोधाभास क्यों है? हम कहते कुछ हैं, करते कुछ और हैं. हम दूसरों के लिए जिस कर्म या चीज को गलत और खराब मानते हैं, उसी को अपने लिए अच्छा और नैतिक कैसे मान लेते हैं? जीवन में हम जिसे आदर्श मानते हैं, उसी के विरोध में कार्य करते हैं. दूसरों को उपदेश देना हमें बहुत अच्छा लगता है, परंतु जब हमें स्वयं उसका अनुपालन करने का अवसर प्राप्त होता है, तो बिना झिझक के पीछे हट जाते हैं. तब यह ध्यान भी नहीं आता कि हम पाप-कर्म कर रहे हैं. भगवान के कोप का हमें कोई भय नहीं सताता.

मेरा तो यही मानना है कि अब हमारे मन से पाप की

अवधारणा ही खत्म हो गयी है. हर बुरे कर्म में हमें पुण्य दिखाई देता है, इसीलिए हम अच्छे कर्म की तरफ प्रवृत्त ही नहीं होते.

प्रश्न फिर भी विचारणीय है कि हम वास्तव में मनुष्य हैं या कुछ और? आखिर हम हैं क्या?

- राकेश भ्रमर

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