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परीदेश की सैर - 4 / रोमांचक बाल उपन्यास / श्रीनाथ सिंह

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(पिछली कड़ी यहाँ पढ़ें) गोपाल इस सोच विचार में इस तरह डूबा हुआ था कि उसे पता ही न चला कि लाल बौना कब चुपके से आकर उसके पास बैठ गया है । जब...

(पिछली कड़ी यहाँ पढ़ें)

गोपाल इस सोच विचार में इस तरह डूबा हुआ था कि उसे पता ही न चला कि लाल बौना कब चुपके से आकर उसके पास बैठ गया है । जब गोपाल का ध्यान टूटा तब लाल बौना ने कहा-तुमने खाना खाया ।

अभी नहीं''

लाल बौना खुशी से हिल गया । बोला.-'-. बहुत अच्छा हुआ कोई मीठा खाना जल्दी मँगाओ । आज मुझसे बड़ी गलती यह हो गई कि खाना मँगाते समय मुझे नमक का -ध्यान हो आया था । सो खाने में तमाम नमक ही नमक आ गया । बड़े- बड़े नमक के डले । बिलकुल नहीं खाया जाता । इसलिए भागा- भागा तुम्हारे पास आया हूँ । खीर, रबड़, रसगुल्ला कोई चीज जल्दी मांगो । मुझसे ऐसी गलती अक्सर हो जाती है ।

गोपाल ने अपनी दाढ़ी सामने की तरफ तान कर कहा-मैं खीर, रबड़ी और रसगुल्ला खाऊंगा ।

तीन कटोरों में लबालब भरी तीनों चीजें हरे बौने यानी गोपाल की दाढ़ी पर दिखाई देने लगीं । ला बौना बहुत भूखा था । फौरन उसने एक रसगुल्ला उठा कर अपने मुंह में डाल लिया ।।।

सी! सी! सी! ई ई ई आह! ''

गोपाल ने पूछा- क्यों यह क्या कर रहे हो ।

''सी सी सी! ई ई ई ऊ ऊ ऊ! '' लाल बौना दोनों हाथों से अपना मुँह पीटने लगा ।

गोपाल बोला-कुछ कहोगे भी! क्या बात है!

लाल बौने ने मुँह का कौर थूकते हुए कहा-सी! ई! सी! मिर्च! तमाम भोजन में मिर्च भरी हुई है । सी.. ई? तुमने मिर्च का खयाल तो नहीं किया था? सी! सी! ई! हाय! मुँह जला जा रहा है ।

गोपाल ने कहा-''हाँ मिर्च का ख्यात जरूर आ गया था । ''बस यही बात है! सी! ई! ई! सी!

''अब क्या किया जाय? ''

''अब दिन भर भूखे मरो और क्या? मैंने नमक का ख्याल किया तुमने मिर्च का । आज दोनों भूखे रहे ।''

उस दिन सचमुच दोनों को भूखा रहना पड़ा । लाल बौने की तो भूख के मारे आँखें निकलने लगीं । गोपाल ने कहा- किसी परी ने अभी खाना न खाया हो तो जाकर उसके साथ खा आओ । मैं तो शाम को खाऊँगा ।

लाल बौने ने कहा-''चुप! चप किसी से इसका जिक्र भी न करना । नहीं तो परी देश में हम लोगों की बड़ी हँसी होगी ।

गोपाल ने पूछा-यह परी देश कितना बड़ा है । कहाँ तक गया है?

लाल बौने ने कहा – भूख के मारे घर में बैठे-बैठे जी न लगेगा. चलो आज तुमको परी देश के ऊपर से उड़ा लावें.

बस दोनों अपनी-अपनी दाढ़ी पर पेट के बल लेट गए और मूंछें फड़फड़ाकर उड़ने लगे।

ऊपर से गोपाल ने देखा कि बहुत दूर तक चारों तरफ झाड़ियां ही झाड़ियां दिखाई पड़ती हैं । झाड़ियों के बीच में खूब घास उगी है । उत्तर से दक्षिण तक और पश्चित से पूर्व तक तक चारों तरफ उड़ने के वाद लाल बौने ने कहा-अब तुम परी देश का कुछ अन्दाज लगा सकते हो ।

गोपाल बोला-बस यही परी देश है! जिसकी किस्से कहानियों में इतनी तारीफ सुनता था ।

लाल बौना ने कहा-इस झाड़ियों के देश को तुम क्या जानो । हर एक झाडी के भीतर एक सुन्दर फूलों से सजा मकान है ।

गोपाल ने कहा-एक झाड़ी से दूसरी झाडी में जानें के लिए कहीं कोई रास्ता भी तो नहीं दिखाई पड़ता ।

लाल बौना बोला-रास्ते की यहाँ क्या जरूरत यहां का हर एक रहने वाला उड़ता हुआ चलता है । जमीन पर किसी के पाँव भी पड़ते हैं?

गोपाल ने पूछा-और परी देश के बीच में घास की ढकी छोटी पहाडी सी यह क्या चीज है?

बौना ने कहा-वह परियों की रानी का महल है । उसके अन्दर बहुत से तरह-तरह की फूल पत्तियों से सजे कमरे हैं।

''उसके अन्दर हम चल सकते हैं?

नहीं, हर सोमवार' को परीदेश बाहर से सजता है । तब परियाँ बाहर निकलती हैं । उस दिन तुम वहां जा सकते हो!

गोपाल ने पूछा-और किसी दिन परिया नहीं निकलतीं?

परियाँ रात में निकलती हैं और खासकर चाँदनी रात में।

अब कुछ-कुछ रात हो गई थी और दोनों बात करते-करते उस जगह पर आ गये थे जहां पहले दिन गोपाल और लाल बौने से भेंट हुई थी ।

गोपाल ने पूछा- पहाड़ के उस तरफ मनुष्यों का देश है?

''हाँ ।' '

मनुष्यों के देश से कोई यहां आ सकता है? ''

''जिसकी तुम इच्छा करो वह आ सकता है । ''

गोपाल को चमेली का ध्यान हो आया । थोड़ी ही देर में दोनों चन्द्रमा की रोशनी में देखा कि पहाड़ पर सें एक ऊंट उड़ता हुआ उनकी तरफ आ रहा है । इस कहानी के पिछले हिस्से में हम यह बता चुके हैं 'कि ऊँट पर चमेली, किसान, मोर और चूहा आ रहे थे वह उड़ने लगा था । उनके उड़ने का यही कारण था । जब ऊँट बिलकुल करीब आ गया तब गोपाल ने देखा कि मोर के पीछे एक चूहा लिये हुये चमेली बैठी है ।

गोपाल के मुँह से निकला-चमेली दीदी!

चमेली ने गोपाल की आवाज पहचानी । पर उसे गोपाल कहीं दिखाई न पड़ा । उसने कुछ चिन्ता और' खुशी के साथ कहा-भैया गोपाल तू कहाँ है?

गोपाल बोला-इधर, मैं यहां हरा बौना खड़ा हूं ।

घर में चमेली गोपाल को इस शक्ल में देखती तो शायद हँसती पर यहाँ उसे अफसोस हुआ । उसने कहा-भैया गोपाल तेरी यह दशा कैसे हो गई?

गोपाल ने अपने वहां पहुंचने की सारी कथा कह सुनाई- और कहा-यह परी देश है । जल्दी में यहां बिना सोचे समझे कोई इच्छा मत करना नहीं तो तुम्हारी भी शकल बदल जाएगी।

किसान ने लाल बौने की तरफ देखकर कहा--अरे: बाबा यह कौन है ।

लाल बौने ने अपनी दाढ़ी और मूँछें चढ़ाकर उसे सलाम किया । पर किसान ने समझा किए वह उसे डरा रहा है । वह बोला-खबरदार! दूर खड़ा हो! नहीं तो ऐसा डन्डा मारूँगा कि उलट जायगा ।

किसान बैल बन गया

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परी देश में गोपाल का नाम हरा बौना पड़ गया था । लाल बौने ने गोपाल से पूछा- तुम जानते हो । आज कौन दिन है?

गोपाल ने अपनी आँखें मलते हुए कहा-जानता हूँ आज सोमवार है ।

हाँ रानी के स्वागत के लिये हमें तैयार हो जाना चाहिये ।

अजी अभी सूरज निकलने में बहुत देर है तब तक में सब तैयारी हो जायगी ।''

लाल बौना बोला-परन्तु तुम्हारे यहाँ मनुष्यों के देश से मेहमान बहुत आ गये हैं । इनको छिपाना होगा नहीं तो रानी गुस्सा हो जायेंगी और मुमकिन है सब को घास बना दें । परीदेश में दूर तक तुम जो हरी-भरी घास देखते हो यह असल में घास नहीं है । ये सब मनुष्य देश से आए हुए जीव हैं जो रानी की नाराजगी से घास बन गये हैं ।

चमेली बोली-अरे इतनी बेरहम रानी है । मैं चाहती हूं घासों में जितने जीव छिपे हैं वे सब अपनी असली रूप में आ जायं । लाल बौना हँसने लगा-ही ही! ही! रानी की इच्छा के खिलाफ किसी की इच्छा नहीं चल सकती ।

गोपाल ने कहा-चमेली, सोच-समझकर काम करो । यह पराया देश है यहां से हमें अपने देश वापस चलना है ।

किसान कहने लगा-कितना छोटा लड़का है पर कितनी बुद्धिमानी की बात करता है ।

लाल बौने ने किसान को झिड़क कर कहा-अब गपशप करने के लिए मौका नहीं है । बोलो किस तरह छिपोगे?

किसान बोला-खबरदार मैं तेरी झिड़की नहीं सह सकता हूं । दाढ़ी उखाड़ लूंगा ज्यादा बोलेगा तो!

लाल बौना हंसने लगा-हीं ही ही ही!

चमेली ने कहा-बाबा को चिढ़ाओ मत । इन्हीं की मदद से में यहां तक आ सकी हूँ ।

लाल बौना ने कहा-जो चिढ़ता है उसी को लोग चिढ़ाते हैं ।

गोपाल बोला-अरे! सूरज निकल रहा है जल्दी बोलो क्या करें?

लाल बौना ने ऊँट को अपने सामने झोपड़ी के पास खड़ा कर और किसान को ऊंट की गरदन के नीचे खड़ा कर दिया इसके बाद उसने हरी पत्तियों और लताओं से दोनों को ऐसा सजा दिया कि जान पड़ने लगा मानों फूल-पत्तियों का छै टांग का ऊँट खड़ा हो । फिर उसने चमेली से कहा-- तुम परी बनने की इच्छा करो । इस तरह तुम हम लोगों के साथ उड़ भी सकोगी।

चमेली ने कहा – मैं परी बनना चाहती हूँ।

बस चमेली परी बन गई । उनके हाथ-पाँव बहुत ही मुलायम हो गये ।

चमेली ने कहा - मैं मेहनत से चीज तैयार करना अच्छा समझती हूँ । खाली इच्छा से नहीं ।

लाल बौना बोला-इसमें शक नहीं कि मनुष्यों के देश में यह अच्छी बात है पर इसलिए वहाँ मार काट और लड़ाई-झगड़े भी होते रहते हैं । मान लो एक राजा ने मेहनत से एक शहर बसाया । दूसरा राजा जल्दी ही वैसा शहर बसाना चाहता है । इच्छा करते ही वह शहर नहीं बसा सकता इससे वह पहले राजा के बसाए शहर पर कब्जा करने चलता है । तब दोनों में लडाई होती है । परी देश में ऐसी लड़ाई का मौका नहीं आ सकता ।

किसान ने ऊँट के नीचे से कहा-इस बौने को क्या मालूम' मनुष्य देश में सब आदमी अपने-अपने मतलब की बात सोचते हैं । दूसरों के मतलब की परवाह नहीं करते । यदि वहां के लोग अपने मतलब के साथ-साथ थोड़ा दूसरों के. मतलब की बात भी सोचा करें तो मनुष्यों का देश स्वर्ग बन जाये स्वर्ग!

यहाँ उसने अपनी गर्दन को एक ऐसा झटका दिया कि ऊँट- के ऊपर सारी पत्तियाँ हिल उठीं ।

लाल बौना हंसने लगा-हो ही! ही!

चमेली ने किसान की तरफ मुँह करके कहा-बाबा अभी तुम चुप रहो।

गोपाल बोला-अरे गाने की आवाज आ रही है । शायद रानी बहुत करीब आ गई हैं ।

लाल बौने ने चूहा और मोर को झट पट झाड़ी में छिपा 'दिया और गोपाल चमेली से बोला-जरा ऊपर उडो और परी देश की बहार देखो ।

बात की बात में तीनों उड़ कर पेड़ों से भी ऊपर जा पहुँचे। गोपाल ने नीचे की ओर देखकर कहा-ओह सचमुच परी देश बड़ा सुन्दर है । क्या खूब वाह!

अब सूरज निकल आया था । उसकी सातों किरणें सात रज. में अलग-अलग पड़ रही थीं । कहीं लाली दौड़ा हुई थी .कहीं पियराई और नीलिमा ।

चारों तरफ जो ऊँची-नीची घास उगी हुई थी वह बराबर हो गई थी । जान पड़ता था कोई हरा फर्श बिछ गया है और उसपर रंग-बिरझी धूप पड़ रही है । झाड़ियाँ सब बाहर से खिल उठी थीं । उन पर घेरों में फूल खिले थे । हर एक झोपड़ी मैं सबसे ऊपर सूरजमुखी का एक बड़ा सा फूल खिला था; उसके नीचे चमेली की कलियों का घेरा था । इसी तरह गुलाब, गैंदा, चम्पा, जुही, आदि के फूल खिले थे । लिख कर यहाँ इस फुलवारी का वर्णन नहीं किया जा सकता । अपने दिल में ही सोच- कर तुम इसे समझ सकते हो ।

आज सब परियाँ बाहर निकली हुई थीं । सारा परी देश एक अत्यन्त सुन्दर बाग की तरह दिखाई दे रहा था और वाग में जैसे तितलियाँ उड़ती हैं वैसे ही परियाँ मँडरा रही थीं उनकी गिनती नहीं थी ।

परियों की रानी एक तिनकों के रथ पर सवार थी । रथ बड़ा ही सुन्दर वना था । रानी की पोशाक सफेद थी, बिकुल सफेद । और उस पर सूरज की किरणों का रङ्ग असर नहीं करता था । सारे परी देश में सिर्फ एक गाना हो रहा था ।

तुम्हारी जय हो जय रानी ।

फूलों सी है हंसी तुम्हारी महक सरीखे बोल ।

प्यार भरा है दिल में इतना दुनिया लेलो मोल ।।

खोल दो जग के बन्धन खोल ।.

बोल हो महक सरीखे बोल । ।

बजाकर बढ़ो प्रेम का ढोल मिटा दो सबकी हैरानी ।

तुम्हारी जय हो जय रानी । ।

हर एक मुख से एक साथ यही संगीत निकल रहा था? लाल बौना गोपाल और चमेली ये तीनों भी यही राग अलापने लगे और इसमें वे इस कदर मस्त हो गये कि उन्हें पता ही न चला की रानी कब और कहाँ चली गई ।

अब सूरज बहुत ऊँचे चढ़ आया था और उसकी सातों किरणें मिलकर एक हो गई थी । नीचे आने पर लाल बौना ने किसान' से कहा-बैन की तरह अब खड़े क्या हो? कुछ देखा?

किसान बोला-अगर मैं वाकई बैल होता तो तुम्हें ऐसी लात जमाता कि तुम कुछ दिन याद करते ।

अरे! यह क्या? किसान सचमुच बैल वन गया और लाल बौने पर उसकी एक दुलत्ती भी चल गया । चमेली ने कहा- बाबा तुम बैल वन गये ।

लाल बौना हँसने लगा-ही ही! ही । मेरी चोट अच्छी हो जाय ।

बैल बने हुए किसान ने देखा कि उससे गलती हो गई है । वह चमेली के पास जाकर उसका हाथ चाटने लगा । चमेली भी उसके मस्तक पर प्रेम से हाथ फेरने लगी । उस समय दोनों की आँखों में आँसू आ गये थे ।

इस किताब के पढ़ने वाला छोटे बच्चों! यह तो तुम जान ही गये होंगे कि परी देश में यदि कोई पहुंच जाय तो उसकी हर एक इच्छा पूरी हो सकती है । वह जो चाहेगा वही हो जायगा । हाँ, यह जरूर है कि यदि रानी चाहे तो उसकी इच्छा पूरी नहीं हो सकती।

अच्छा तो अब एक मजे की बात सुनो । किसान बैल बन गया था । बैल बन जाने पर उसे घास खाने की इच्छा हुई । परन्तु परी देश में पहले ही से बहुत सी घास थी । इससे बैल की इच्छा से परी देश को कोई नुकसान नहीं हुआ । चूहे को कोई बिल नहीं मिला । इससे वह पहले उदास हुआ फिर उसके दिल में आया-कोई अच्छा सा बिल होना चाहिये । चूहे के दिल में जैसे ही यह इच्छा पैदा हुई वैसे हो परी देश में चारों तरफ बिल ही बिल हो गये । ऐसा किसी परी का घर न रह गया सौ पचास बिल न हो गये हों । परी देश में ऐसा वात पहले कभी नहीं हुई थी । इससे सब परियाँ घबरा उठी । वे सोचने लगीं हो न हो कोई अजीब जीव इस देश में आ गया है ।

चमेली इस समय हरी घास में बैठी अपने बालों में कंघी कर रही थी । लाल बौना बोला-आज की चाँदनी रात बड़े मजे की होगी । तुमने परी देश में चाँदनी रात न देखी होगी?

गोपाल बोल उठा-हाँ! हाँ! चेमेली दीदी! यह तो में तुम्हें बताना ही भूल गया । यहाँ सोमवार की चाँदनी रात में सारा परी देश दूध के फेन की तरह सफेद दिखाई देता है । पेड़ पौधे झाड़ियों पत्ते सब सफेद दिखाई देते हैं । पेड़ों के तने और डालियाँ भी- सफेद दिखते हैं । तब रात में परियाँ सफेद - सफेद पोशाक पहन कर निकलती हैं । रात होने दो देखना । मैं भी तुम्हें सफेद दिखाई दूँगा और यह लाल बौना भी सफेद दिखाई पड़ेगा ।

चमेली अपने बालों में कंघी करती जाती थी और अपने मां को याद करती जाती थी-हाय बेचारी माँ क्या करती होगी । कौन जाने उसने खाना खाया हो या न खाया हो । उसे यह बात कैसे मालूम हो कि हम लोग यहाँ मजे में हैं । '' चमेली की दोनों आखों से आँसू के दो बड़े-बड़े बूँद निकल कर झूल पड़े । उसने यह सुना भी नहीं कि गोपाल क्या कह गया । वह अपने आप कहने लगी-अगर मैं इतनी ऊँची हो जाती जितना ऊँचा वह पहाड़ खड़ा है-नहीं, थोड़ा उससे भी ऊँची, तो शायद मैं अपनी माँ को देख लेती ।

गोपाल बोला-चमेली दीदी क्या सोच रहो हो?

गोपाल की यह बात पूरी भी न हो पाई था कि लाल बौना चिल्ला उठा-ओहो हो! अरे रे! यह क्या?

चमेली ऊँची उठती चला जा रही थी । लाल बौना और गोपाल दोनों उसकी ओर देखने लगे । दोनों को सिर्फ उसके पैर दिखाई पड़ रहे थे । दोनों हाथों की नोचे झूलती हुई कलाई की चूड़ियाँ भी कमी-कभी चमक जाती थीं । उसके शरीर का

' पता नहीं चलता था ।

गोपाल आश्चर्य से पुकारने लगा-चमेली दीदी! चमेली दीदी!

परन्तु अब कौन जवाब देता है । चमेली का सिर बहुत ऊंचे बादलों से भी ऊँचे उठ चुका था ।

लाल बौना बोला – दाढ़ी बिछाओ, जल्दी उस पर पेट पटको, मूंछें मरोड़ो, उड़ो। चमेली के मुंह तक उड़कर चलो। उससे पूछें कि यह इतनी लम्बी क्यों हुई जा रही है। कोई तारा तो नहीं तोड़ना चाहती।

अब लाल बौना और हरा बौना दोनों चमेली के दोनों हाथ छूते हुये ऊपर उड़े जा रहे थे । थोड़ी देर बाद दोनों चमेली के मुँह के पास पहुँच गए और फड़फड़ करके वहीं उड़ने लगे । चमेली पहले कुछ डर सी गई थी पर लाल बौना और गोपाल को देखते हो उसका डर जाता रहा । वह मुस्कराने लगी।

गोपाल ने कहा-चमेली दीदी बिना सोचे समझे तुमने यह क्या कर डाला । इतनी लम्बी होने से क्या फायदा?

लाल बौना बोला-कैसे बैठोगी, कहाँ लेटोगी इतना बड़ा परीदेश तुम्हारे लिए गुड़ियों का बगीचा होगा ।

चमेली ने जवाब दिया-मैंने सोचा था कि मैं इतनी लम्बी हो जाऊंगी तो शायद मेरी माँ मुझे दिखाई पड़ेगी । पर यह .बात बिल्कुल फिजूल हुई । कहीं कुछ नहीं सूझता ।

लाल बौना बोला-मनुष्य देश से चली आ रही हो और तुम्हें इतना भी पता नहीं कि आदमी की निगाह बहुत दूर तक नहीं जा सकती है।

गोपाल बोला – और इतनी दूर तक तो उड़कर आ सकती थी चमेली दीदी।

चमेलनी ने कहा – अफसोस के कारण मुझे कुछ खयाल ही न रहा। अब मैं चाहती हूँ कि मेरी माँ मेरा घर मुझे दिखाई दे।

लाल बौना बोला-कभी नहीं, एक दिन में किसी की एक से ज्यादा इच्छा पूरी नहीं हो सकती ।

चमेली ने गोपाल से कहा-अच्छा, तुम मां, बाप को देखने की इच्छा करो ।

गोपाल ने यह इच्छा करते ही देखा कि उसकी माँ घर के आंगन में बैठी रो रही है । भूख प्यास से उसका शरीर सूख गया है। गोपाल का बाप उसे धीरज बँधा रहा है । गोपाल ने चमेली से सब हाल कहा ।

चमैली बोली-भैया, मैं मां. बाप से बातचीत करने की इच्छा करूँ तो पूरी हो सकती है ?

लाल बौना बोला-आज अब तुम दोंनो की कोई और इच्छा पूरी नहीं होगी ।

चमेली ने आँखों में आँसू भर कर और लान बौने के हाथ'- जोड़कर क्हा-तो दादा मेरा यह काम कृपा करके तुम्हीं कर दो ।

लाल बौने को चमेली पर दया आ गई । उसने कहा-मैं' चाहता हूँ कि मुझे बहुत दूर तक की आवाज सुनाई पडे । इसके बाद ही बोला-सुनो तुम्हारी माँ कह रही हैं - हाय! गोपाल, हाय चमेली! तुम दोनों कहाँ चले गये? मेरे बच्चों' कहां हो।

चमेली का गला भर आया । गोपाल की आँखों में भी आँसू आ गए। लाल बौने ने चमेली की माँ से कहा .-गोपाल और चमेली की माँ! अफसोस मत करो । तुम्हारे दोनों बच्चे परी' देश में आ गये हैं । बडे मजे में हैं । जल्दी ही तुम्हारे पास आने की कोशिश करेंगे ।

गोपाल यह सुन भी रहा था और अपने घर की तरफ आँखें भी गड़ाये था । उसने कहा-चमेली दीदी! अम्मा आश्चर्य से चारों तरफ आसमान की तरफ देख रही हैं । इसी बीच में लाल बौने ने सुना-'मैं किसकी आवाज सुन रही हूँ ? भगवान क्या

स्वर्गलोक से तुम मुझसे बोल रहे हो ?' इसका लाल बौने ने जवाब दिया-नहीं परी देश का लाल बौना हूँ ।

इस समय गोपाल नीचे परी-देश की ओर देख रहा था ।।

उसने चौंककर कहा-अरे! लाल बौना! यह क्या? परी देश में तो चारों तरफ बालू ही बालू चमक रही है । जितनी झांड़ियां हैं उन सबों में आग सी लगी है । हमारा तुम्हारा घर भी सूखा जा रहा है । परियाँ सब भाग-भाग कर रानी के महल की ओर जा रही हैं 1

लाल बौने ने परी देश पर कान लगाया ।

'हाय! मरे! मरे! पानी! पानी! '

वह बोला-चमेली! तुम्हारे साथ जो ऊँट महाशय आये हैं । यह उनकी करामात जान पड़ती है । उन्होंने इच्छा की होगी कि सारा परीदेश रेगिस्तान हो जाय । हरियाली से उनसे बैर है न?

गोपाल बोला-बिल्कुल यही बात जान पड़ती है । सारा देश उजाड़ हुआ जा रहा है ।

इसी समय पूरब की ओर से बड़ी काली घटा उठी । बड़ी-डरावनी घटा थी । लाल बौना बोला-जरा पूरब की तरफ देखो । यह. तुम्हारे साथ जो मोर महाशय आये है उनकी करतूत जान पड़ती है । उन्होंने इच्छा की होगा कि खूब बादल गरजे

और पानी बरसे । परी देश बह जाय, उनकी बला से?

चमेली और गोपाल ने कोई जवाब नहीं दिया।

लाल बौना फिर कहने लगा – मनुष्यों के देश में कहीं ऊसर, कहीं समुन्दर, कहीं खेत, कहीं दलदल इसीलिए बने हैं कि वहाँ बहुत विचार वाले जीव है । कोई कुछ चाहता है कोई कुछ । ऐसी दशा में वहाँ आपस में लड़ाई मार काट क्यों न हो

कड़ कड़ कड़ कड़ '

बड़े जोर से बादल गरज उठा । सूरज छिप गया । दिन रात में बदल गया । बिजली ने लाल बौने की आंखों को चकाचौंध .कर दिया ।

लाल बौना डर कर नीचे की ओर भागा । गोपाल भी डरा पर चमेली को अकेला छोड्‌कर वह नहीं भाग सकता था । उसने कहा-चमेली दीदी! किसी तरह बैठने की कोशिश करो । जान पड़ता है कोई भारी मुसीबत आने वाली है ।

(क्रमशः अगले अंकों में जारी…)

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आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,66,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: परीदेश की सैर - 4 / रोमांचक बाल उपन्यास / श्रीनाथ सिंह
परीदेश की सैर - 4 / रोमांचक बाल उपन्यास / श्रीनाथ सिंह
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