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परीदेश की सैर - 3 / रोमांचक बाल उपन्यास / श्रीनाथ सिंह

(इससे पहले की कहानी यहाँ पढ़ें)

इसी समय उसका ध्यान पीपल के पेड़ की ओर गया । एक चूहा पेड़ से नीचे जमीन की और तेजी से दौड़ा आ रहा था । चूहे के पीछे एक बड़ा सा काला सांप फन काढ़े चला आ रहा था । वह चूहे को खाना चाहता था । साँप को देखकर चमेली डर गई और चिल्ला पड़ी । किसान नहाकर लौट रहा था । चमेली का चिल्लाना सुनकर वह दौड़ पड़ा ।

इसी बीच में पेड़ की एक डाल पर बैठा हुआ एक मोर सांप पर झपटा और अपने पंजे से उसने साँप के फन पर एक ऐसा थप्पड़ मारा कि साँप उलट गया । फिर उसने चोंच से पकड़कर साँप को तीन-चार बार पटका । साँप मर गया । मोर उसे खाने लगा ।

किसान चमेली के पास आकर खड़ा हो गया । चूहे का दम फूल रहा था. वह दौड़कर किसान के पैरों के पास दुबक रहा ।

थोड़ी देर में किसान ने कहा--जान पड़ता है यह चूहा और मोर दोनों आदमियों से खूब परचे हैं । शायद इस पीपल के पेड़ के नीचे लोग खलियान लगाते हैं जिससे चूहा अनाज की लालच में आता है और मोर को भी किसानों के लड़के कुछ खाना-बाना दे देते हैं । किसान ने कियू! कियू! करके मार को अपने पास बुलाया । मोर उसके पास चला आया । किसान मोर की पीठ पर हाथ फेरने लगा । मानों सांप

मारने के लिए उसे शाबासी देने लगा। मोर ने अपने पंख फुला लिया। चमेली ने मोर की पीठ पर हाथ फेरा और कहा – बाबा, यह बड़ा प्यारा मोर है। इसे साथ लेते चलो और इस चूहे को भी लेते चलो।

''अच्छी बात है ।'' कहकर किसान ने सत्तू और गुड़ निकालकर साना । चमेली को उसने थोड़ा सा सत्तू और खोआ दियाा । खुद ने सिर्फ सत्तू खाया । मोर और चूहे को भी सत्तू दिया।

खा पी चुकने पर किसान ने ऊँट को कसा और सब लोग फिर चल पड़े । चूहे को चमेली ने ले लिया और मोर ऊँट की गरदन पर बैठ गया । रास्ते में किसान ने मोर और साँप की लड़ाई की बहुत सी कहानियाँ कहीं । चमेली ने कहा - यदि ये जानवर बोल सकते तो हमें अपना बहुत सा हाल बतलाते ।

किसान ने जवाब दिया-सामने के पहाड़ के उस पार जो देश है, कहते हैं वहाँ जानवर भी आदमियों की तरह बातें करते हैं । उसे परी देश कहते हैं ।

चमेली बोली- शायद गोपाल वहीं गया हो । बाबा क्या वहाँ तक चलोगे?

किसान ने कहा – नहीं, वहाँ कोई आदमी नहीं जा सकता। फिर सामने की ओर देखकर वह बोला – अरे हम लोग एक घास के मैदान में आ गए। देखो न कहीं कोई पेड़ दिखाई पड़ता है न कहीं कोई गांव। मालूम नहीं यह मैदान कहाँ तक गया हो।

अब बिलकुल शाम हो गई थी और आसमान में चन्द्रमा -की थाली पूरब से उठ रही थी! किसान ने ऊँट ही पर सत्तू सान कर सबको दिया और कहा-चाँदनी रात है, रास्ता भी साफ है । ऐसे मैदान में रात का सफर अच्छा होता है ।

रास्ते में किसान ने रेगिस्तान के यात्रियों की बहुत सी दिलचस्प कहानियाँ कहीं जिससे चमेली को नींद और थकावट कुछ भी नहीं मालूम हुई । इस तरह सूरज निकलने के बाद भी दस बजे दिन तक ये लोग चलते रहे ।

अब किसान चारों तरफ नजर दौड़ाने लगा कि कहीं कोई पेड़ दिखाई पड़े तो उसके नीचे पड़ाव डाला जाय । पर कहीं कोई पेड़ दिखाई न पड़ा । उससे उसकी चिन्ता बढ़ गई । उसने कहा-यदि आज हम किसी रेगिस्तान' में होते तो गरम बालू में भुन कर मर जाते ।

चमेली ने कहा-यह भी तो रेगिस्तान ही है ।

किसान बोला-नहीं, यहाँ कहीं बालू नहीं है । यह सिर्फ पथरीली जमीन है । परन्तु गर्मी यहाँ भी बहुत बढ़ जायगी ।

ऊँट को काठी में बँधे पानी के घड़े में हाथ डाल कर किसान ने कहा-खैर आज कल पानी का काम चल जायगा । इसी बीच मैं चमेली ने पूछा-बाबा, सामने देखो क्या दिखाई पड़ रहा है ।

किसान ने गौर से देखा । एक टूटा-फूटा खंडहर था । किसान बोला-पहले यही -बहुत दूर तक चला गया था । किसान बोला – पहले जरूर कोई शहर रहा होगा । अब उजड़ गया है । मुमकिन है किसी समय यहाँ पानी न बरसने से बड़ा भारी अकाल पड़ा हो और यह शहर और सारा देश उजड़ गया हो ।

अब सब लोग खँडहर के पास पहुंच गये थे । किसान ने कहा - जरूर यही बात है । ऊसर इसी तरह बनते हैं ।

खँडहर में एक दीवाल कुछ बची थी । इसी से मिला हुआ एक गड्‌ढा सा या । मुमकिन है यह गड्‌ढ़ा पहले तालाब रहा हो । ऊँट को बाहर बांध कर किसान उसी गड्ढे में सब को ले गया । और ऊपर से कपड़े की छाया बना कर सत्तू सानने लगा । सबने खाया । रात भर का थका किसान सो गया । चमेली को भी नींद आ नई । चूहा इधर-उधर दौड़ने लगा । वह बिल खोदने के फिराक में था । चूहों की यह आदत होती है कि जहां पहुँचते हैं. वहीं बिल खोदने लगते हैं । मौके बे मौके का ख्याल नहीं करते । मोर भी एक ऊँचे पत्थर पर दबक कर बैठ गया और सोने लगा ।

रात भरके सब- इतने जगे और थके हुए थे कि सब खूब सोये । किसी को पता ही न चला कि दिन कब खतम हो गया ।

जब किसान की नींद खुली तब चन्द्रमा .आसमान में बहुत ' ऊँचा चढ़ चुका था । उसने सबको जगाया और चलने की तैयारी करने लगा । घड़े में सिर्फ एक लोटा पानी बचा था। उसने उससे थोड़ा मुंह धोया। थोड़ा सा मोर और चूहे को

पिलाया बाकी चमेली के लिये रख दिया । आज उसने सत्तू नहीं खाया । क्योंकि सत्तू खा लेने पर उसे प्यास लगती और तब पानी कहाँ पाता ?

उसी तरह चांदनी रात में ऊँट पर सब लोग सवार होकर चले जा रहे थे और किसान पुराने खंडहर की कहानी कह रहा था। एकाएक चमेली ने जमीन की ओर देखकर कहा – बाबा ऊँट कहाँ चल रहा है? जमीन तो बहुत नीचे जान पड़ती है ।' किसान चौंक सा पड़ा । सचमुच ऊंट आसमान में उड़ा जा रहा था जमीन पर उसके पैर नहीं पड़ते थे । किसान ने घबड़ा कर कहा-ऐसी अनहोनी वात मैंने कभी नहीं देखी । यहां अक्ल काम नहीं करती ।

चमेली बोली-हम लग परी देश में तो नहीं आ गये?

परीदेश

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सुरंग से जब परियाँ निकलीं और उन्हें एक लाल बौने की जगह पर दो लाल बौने खड़े दिखाई पड़े तब वे वहाँ जरा रुक गयीं और पूछने लगीं-लाल बौना, क्या रानी ने तुम्हारी बात मान ली?

लाल बौना ने कायदे सें-मोर की दुम की तरह मूँछे तान कर-परियों को सलाम करके कहा-''नहीं, परी रानी ने यह कहा था कि मनुष्यों के देश से कभी कोई लड़का इस तरफ आ निकलेगा और मुझे सबसे पहले देखेगा तो लाल बौना बनने

की इच्छा जरूर करेगा । आज वही हुआ ।

गोपाल ने पूछा-क्या लाल बौना होना बुरा है? अगर ऐसा हो तो मैं लाल बौना बनना नहीं चाहता ।

एक परी ने कहा-पर अब तो अपनी इच्छा से तुम आदमी .नहीं बन सकते ।

''क्यों यहाँ तो यह कायदा है कि जो इच्छा करो वही हो जाता है।

दूसरी परी ने कहा--हां पर यह भी एक बात है कि पहले तुम किसी वात की इच्छा करो और फिर थोड़ी देर बात उसी इच्छा के खिलाफ इच्छा करो तो तुम्हारी दूसरी इच्छा नहीं पूरी होगी ।

गोपाल बोला-मेरी समझ में नहीं आया कि आप क्या कह रही हैं?

तीसरी परी बोली-सुनो, मैं बताती हैं । मान लो तुमने इच्छा की कि तुम तितली वन जाओ । तब क्या होगा बता सकते हो?

''मैं फौरन तितली बन जाऊँगा ।''

''बेशक, पर उसके बाद ही यदि तुम यह इच्छा करो कि तुम मोर वन जाओ तब तुम्हारी यह इच्छा नहीं पूरी होगी ?''

गोपाल कुछ उदास होकर पूछा-किसी तरह भी नहीं?

चौथी परी ने कहा-सिर्फ एक उपाय है । वह यह कि परियों की रानी तुम्हारे लिये वैसा इच्छा करे!

गोपाल ने कहा-मैं परियों को रानी से इसके लिए कह सकता हूँ?

पाँचवीं परी ने कहा-क्यों नहीं । पर जल्दी क्या है? जब लाल बौना बन गये हो तब कुछ दिन तक लाल बौना के साथ रहो । घूमो फिरो, परी देश देखो । उसके बाद जो चाहना बन जाना रानी बड़ी अच्छी और दयावान है । वह फौरन जो चाहोगे बना देगी ।

छठी परी ने कहा-पर एक हैं रंग के दो जानवरों से लोगों को अलग-अलग पुकारने में धोखा हो सकता है । इसलिए - तुम चाहो तो इच्छा करके अपना रंग बदल सकते हो । पहले तुमने लाल दाढ़ी की इच्छा की थी या केवल दाढ़ी की ।

''मेरा ख्याल है मैंने सिर्फ दाढ़ी की इच्छा की थी ।''

''बस तुम अपना रंग बदल सकते हो?

गोपाल ने कहा-पर क्या मैं एक बात पूछ सकता हूँ ।

अभी आपने मुझको जानवर क्यों कहा?

सतवीं परी हँसने लगी । उसने कहा - बेटा तुम अभी मनुष्यों के देश से आये हो । उस देश में आदमी अपने को जानवरों से ऊँचा जीव समझता है । इस देश में वह बात नहीं है । यहाँ सब जीव समान समझे जाते हैं । इसलिए सब को जानवर कहते हैं । जिसके जान हो वही जानवर ।

गोपाल ने कहा । यहाँ तुम्हारा राज्य है । चाहे जो कह लो । पर हमारे देश में यदि किसी आदमी को जानवर कहोगी तो वह तुम्हें जरूर मार बैठेगा ।

परियाँ हँसने लगीं । आठवीं परी ने कहा-पर यहाँ कोई, किसी को नहीं मारता । कभी नहीं मरता । कोई किसी से लड़ता-झगड़ता नहीं । कोई किसी को गाली भी नहीं देता । सब एक दूसरे को प्यार करते हैं।

गोपाल बोला – यह तो बड़ा अच्छा है।

नवीं परी ने बातचीत के विषय को बदलते हुए कहा – तो तुम अपना रंग बदलना चाहते हो?

हाँ मैं चाहता हूँ कि मेरा रंग हरा हो जाए

गोपाल यह कहने भी न पाया था कि उसका रंग हरा हो गया। एकदम हरा। हरी मूंछें, हरी दाढ़ी, हरे कपड़े हरे हाथ पैर और हरी अंगुलियाँ हरे नाखून।

मारे खुशी के परियाँ नाचने लगीं और गाने लगीं -

 

मनुज देश का रहने वाला

परी देश में आया है ।

अपनी सारी इच्छाओं को

अपने संग' में लाया है ।।

 

छिन में बना लाल बौना यह

छिन में बना हरा बौना ।

अभी न जाने क्या-क्या सोचेगा

यह मानव का छौना ।।

 

परी देश में भारी गड़बड़

होने वाली है परियों ।

भागो - भागों निकल रही

सूरज की लाली है परियों । ।

 

लाल हरे बौनों का जोड़ा

हम बहुत हो भाया है ।

मनुज देश का रहने वाला

परी देश में आया है ।।

 

गोपाल ने देखा पूर्व दिशा की सुनहली पहाड़ी पर सूरज का गोला आधा निकल आया। सारा परी देश मोर के रंग-बिरंगे पंखों की तरह लपलपा उठा। परियाँ थिरकती हुई चली जा रही हैं। उनके पाँव रंग बिरंगी घासों पर बिखरी रंगीन ओस के मोतियों पर पड़ते हैं पर ओस की बूंदें टूटती नहीं। उनकी पोशाक भी रंग बिरंगी हैं। गोपाल को वह सबेरा अजीब दिखाई पड़ा। यहाँ लिख कर उसका समझाना कठिन है।

थोड़ी देर में हवा चलने लगी । अजीब सतरंगी हरियाली थी । घास हिल रहा था । पेड़ों कों पत्तियाँ हिल रही थीं और उन पर तरह-तरह के रंग इस तरह बन और बिगड़ रहे थे कि जान पड़ता था चारों तरफ से तरह-तरह के रंग की पिचकारी

छूट रही हो ।

उस रंगीन दुनिया में अलग रंग सिर्फ दो ही थे । लाल बौना-बिलकुल लाल और हरा बौना-बिलकुल हरा । उन पर कोई रंग न बढ़ता था ।

गोपाल ने लाल बौना से कहा-यह तो अजीब रंगीन देश है । ये रंगीन पेड़-पौधे क्या मनुष्यों के देश में नहों हो सकते?

लाल बौने ने कहा-'पेड़-पौधे रङ्गीन नहीं हैं । बिलकुल वैसे ही हैं जैसे तुम्हारे यहाँ होते हैं ।

''फिर ये रंगीन क्यों जान पड़ते हैं ।

लाल बौना बोला – सूरज की रोशनी के कारण। सूरज की रोशनी में कितने रंग होते हैं?

कुछ सोचकर गोपाल बोला – सात रंग।

लाल बौना बोला – हाँ, परी देश में सबेरे शाम ये रंग बिखर जाते हैं और अलग-अलग दिखाई देते हैं. जरा सामने के मैदान को देखो । जान पड़ता है लाल, हरी, पीली, नीली चमकदार चादरें बिछी हों । तुम्हारे देश में ये सातों रंग हमेशा एक में मिले रहते हैं । इसी से सफेद धूप दिखाई पड़ती है ।अरे । देर हो रही है । चलो घर चलें । शाम को फिर यहाँ आयेंगे ।

गोपाल परी देश के बारे में तरह-तरह की बातें सोचता हुआ लाल बौना के साथ अपनी दाढ़ी पर उड़ने लगा । नीचे की दुनिया उसे अजीब दिखाई दे रही थी । एक बड़ी झाडी के पास पहुँचने पर लाल बौना ने कहा-ठहरो, मेरा मकान आया ।

गोपाल बोला-यह झाड़ी है या मकान?

लाल बौना ने लाल हँसी हँस कर कहा-पहले अन्दर तो आओ ।

मनुष्यों के देश में लोग ईंट, पत्थर, चूना, गारा, मिट्टी, लकड़ी आदि से घर बनाते हैं । परन्तु परी देश में यह बात नहीं हे । वहाँ घर उगाए जाते हैं । बड़े-बड़े पेड़ों, छोटे-छोटे पौधों और लताओं को इस तरह उगाते हैं कि वे बाहर से तो झाड़ी जान पड़ते हैं पर अन्दर उनमें बड़े खूबसूरत कमरे कटे होते हैं ।. जाड़े के मौसम में उनमें खूब गरमाहट रहती है और गर्मी के मौसम में खूबठंडक ।

कुछ दिनों बाद लाल बौना ने गोपाल को एक झाड़ी दिखा कर कहा-वह घर तुम्हारे लिए उगाया है ।

गोपाल उस झाड़ी के अंदर घुस गया । वाह! शायद जिस जगह को इंद्रपुरी कहते हैं वह यही है । महमह फूलों की महक आ रही थी । पृथ्वी पर मुलायम घास का फर्श बिछा था । नन्हीं- नन्हीं पत्तियो वाली लताओं से अन्दर की दीवालें इस तरह ढक गई थीं कि जान पड़ता था घर अन्दर से हरे रंग से पुता हो। छत भी इसी तरह हरी पत्तियों से सँवारी गई थी । गोपाल ने मन ही मन में सोचा कि फलों की महक तो इतनी आ रहा है पर फूल एक भी नहीं दिखाई पड़ता । उसने दीवालों को और छत को गौर से देखना शुरू किया । वाह! उसकी तबियत फिर खुश हो गई । चारों तरफ नन्हें-नन्हें हरे- हरे फूल खिले थे ।

गोपाल को अपना घर लाल बौने के घर से बहुत अच्छा जान पड़ा । लाल बौने के घर में हर एक चीज लाल थीं । पेड़ लाल पौधे लाल और फूल लाल । फर्श की घास में भी लाल फल इस कदर फूले हुए थे कि फर्श लाल हो रहा था । अन्दर से वह कमरा गेंदे और गुलाब के लाल फूलों से लिपा हुआ जान पड़ता था । गोपाल ने मन ही मन कहा-यह अच्छा हुआ कि मैंने हरा बौना होना पसन्द कर लिया । हरा रंग आँखों को फायदा पहुँचाता है । हरियाली देखने से तबीयत हरी-भरी ताजी है । लाल बौने के घर में रहना पड़े तो आखें फूट जायँ । इस बेवकूफ ने लाल रंग न जाने क्यों पसन्द किया ।

गोपाल हरी घास के फर्श पर लेट गया । ऊपर हरियाली. थी । नीचे हरियाली थी । चारों तरफ हरियाली थी । मकान की पत्तियों से छन-छन कर सूरज की जो धूप आ रही थी यह भी हरी जान पड़ती थी । गोपाल खुद हरा था । उसने फिर मन ही मन क्हा-आह अगर मेरे मदरसे के साथी मेरे कमरे की यह बहार देख पाते? चाहे जैसे हो मैं घर वापस जाने पर ऐसा एक कमरा जरूर बनाऊंगा । इसी परी देश में' इस तरह घर उगाने की विद्या मैं जरूर सीखूंगा ।

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(अगले अंकों में जारी)

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