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विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक की कहानी मनुष्यता का दण्ड

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मास्को से लगभग २०० मील पश्चिम की ओर वियाज्मा के निकट -जंगल में घने वृक्षों के मध्य एक बड़ी-सी झोपड़ी बनी थी । इस झोपड़ी में एक छोटा-सा रूसी पर...

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मास्को से लगभग २०० मील पश्चिम की ओर वियाज्मा के निकट -जंगल में घने वृक्षों के मध्य एक बड़ी-सी झोपड़ी बनी थी । इस झोपड़ी में एक छोटा-सा रूसी परिवार रहता था । इस परिवार में केवल तीन प्राणी थे । एक प्रौढ़ वयस्क पुरुष, जिसकी वयस ४५ वर्ष के लगभग थी । शरीर का हृष्ट-पुष्ट तथा बलिष्ठ, उसकी पत्नी जो लगभग उसकी समवयस्क ही थी और इनकी एक कन्या जिसकी वयस २० वर्ष के लगभग होगी । ये दोनों स्त्रियां भी खूब तन्दुरुस्त थीं । पुरुष का नाम पाल लारेंज्की, स्त्री का नाम स्टेला तथा कन्या का नाम पोला था ।

दिसम्बर की संध्या थी । अस्तासन्न सूर्य की सुनहरी किरणें आकाश में फैले हुए कुहरे को भेदन करने का विफल प्रयत्न कर रही थीं । झोपड़ी में केवल ३ कमरे थे । एक बैठने-उठने के काम आता था । एक स्त्रियों के सोने के लिये, दूसरे में पाल का बिस्तर था । झोंपड़ी के पिछवाड़े एक 'शेड' था जो भोजन पकाने तथा खाद्य-सामग्री रखने के काम आता था ।

पाल अपनी पत्नी तथा कन्या सहित अंगीठी के सामने बैठा हुआ था । झोपड़ी में अंधेरा हो गया था । अत: स्टेला अपनी कन्या से बोली- ‘पोला, चिराग जला ले, उफ आज बड़ी सर्दी है- बाहर बर्फ गिरने लगी होगी । ''

पोला ने चर्बी का दीपक जलाया और झोंपड़ी का द्वार खोलकर बाहर की ओर झांका तत्पश्चात् द्वार बन्द करके कहा-लड़ा कुहरा है.. कुछ दिखाई नहीं पड़ता ''

यह कह कर वह पुन: अपनी कुर्सी पर आ बैठी ।

स्टेला जम्हुआई लेते हुए बोली-न जाने इस प्रलयकारी युद्ध से कब छुटकारा मिलेगा ।''

पाल अपना पाइप मुंह से निकालकर बोला-''इतने ही दिनों में घबरा गई? अभी तो असली युद्ध आरम्भ भी नहीं हुआ ।''

''एक तो हम लोग ऐसी जगह हैं जहां हफ्तों कुछ समाचार ही नहीं. मिलता-इससे जी और ऊबता है ।''

लेकिन साथ ही हम लोग सुरक्षित भी हैं ।''

पोला बोल उठी-''मेरा चित्त तो चाहता है कि मैं मास्को चली. जाऊँ । वहां युद्ध के काम में कुछ सहायता करूं ।''

''तो क्या तू समझती है कि यहां हम लोग बेकार ही पड़े हैं? हम लोग यहाँ रहकर जो कर रहे हैं वह भी युद्ध की सहायता ही है ।''

''हां, परन्तु जीवन बड़ा निरुत्तेजक है । कोई हलचल नहीं, कोई:. गरमा-गरमी नहीं । मौसम भी ठंडा और हमारा जीवन भी ठंडा ।''

''कुछ भी हो-हमें अपना कर्त्तव्य-पालन करना चाहिए ।''

पाल ने गम्भीरता-पूर्वक कहा और पाइप मुंह में लगा कर विचार- मग्न' हो गया । तीनों मौन बैठे हुए थे । तीनों की विचार-धारा अलग-अलग थी । पोला मास्को का कल्पित चित्र खींच कर उसमें विचरण कर रही थी:. और पाल सोच रहा था रूस और उसके भविष्य की बाबत ।

सहसा द्वार-खटखटाने का शब्द हुआ । पाल चौंक पड़ा । उसने पाइप मुंह से निकाल कर द्वार की ओर कान लगाया । कुछ क्षण पश्चात् फिर' वही शब्द!

स्टेला बोली- ' 'इस समय कौन आया? ''

पोला उठती हुई बोली-देखूं ''

परन्तु पाल ने हाथ उठाकर कहा-' 'ठहरो!''

पोला खड़ी रही । फिर वही शब्द, परन्तु इस बार कुछ जोर से!

प। ल उठ खड़ा हुआ । उसने खूंटी पर लटकी हुई पेटी में से अपने पिस्तौल को निकालकर हाथ में ले लिया । तत्पश्चात् द्वार के निकट पहुँचा । द्वार के पास ही एक छोटी खिड़की थी । खिड़की को खोलकर बाहर झांकते हुए पूछा बम--

' 'कौन? ''

' 'एक आपद्ग्रस्त मनुष्य! कृपा करके जल्दी द्वार खोल दो! ''

'' पर तुम हो कौन? ''

''इस समय मैं केवल एक मनुष्य हूं और मनुष्यता के नाते आपसे प्रार्थना करता हूँ कि मुझे शरण दीजिए; मुझे, मौत के मुख से बचा लीजिए । ''

'तुम तो जर्मन मालूम होते हो । ''

''इसके पहले मैं कुछ भी था, परन्तु इस समय केवल एक मनुष्य हूँ और आपका दयापात्र, आपका शरणागत । ''

''तुम्हारे पास कोई अस्त्र है? ''

. हां, परन्तु मैं- उन्हें फेंक देता हूँ । यह लीजिए-यह बन्दूक गई ओर यह पिस्तौल । बस, अब मेरे पास कुछ नहीं है । ''

पाल ने बन्दूक और पिस्तौल फेंके जाने का शब्द सुना ।

स्टेला बोल उठी-' 'यदि जर्मन है तो मरने दो द्वार मत खोलना ।'' पाल ने पत्नी को कोई उत्तर न दिया । वह द्वार खोलने लगा ।

स्टेला चिल्लाई-''पाल क्या करते हो? जर्मन दगाबाज पर विश्वास करते हो ।''

''वह इस समय जर्मन नहीं है-केवल एक मनुष्य है ।''

यह कहते हुए पाल ने द्वार खोला-आगन्तुक झटपट भीतर आ गया । पाल ने द्वार बन्द कर लिया । जर्मन सर्दी के मारे कांप रहा था । पाल न अंगीठी के निकट कुर्सी रख दी और जर्मन से कहा-आओ बैठो! ''

' जर्मन लड़खड़ाता हुआ कुर्सी पर आ बैठा । पोला घृणा से मुंह बना कर अपनी कुर्सी छोड़ कर उठ खड़ी हुई और पोला को संकेत करके साथ लिये दूसरे कमरे में चली गई 1

जर्मन स्थिर दृष्टि से अंगीठी की अग्नि को देख रहा था । दस मिनट तक दोनों मौन बैठे रहे । पाल अपना पाइप मुंह में दाबे, जर्मन के मुख को ध्यानपूर्वक देख रहा था' ।

उफ किस बला की सर्दी है । लोग कहते हैं कि नरक में आग ही आग है । यदि नरक में इतनी सर्दी हो तो भी मुझे आश्चर्य न होगा । यह सर्दी आग से कम जान-लेवा नहीं है ।''

''इस समय कहां से आ रहे हो? '' पाल ने पूछा ।

मैं? मैं मौत के मुंह से बचकर आ रहा हूँ । दोपहर की लड़ाई में हमारी बटालियन के प्राय: सब आदमी या तो मारे गये या पकड़ लिये गये । मैं किसी प्रकार भाग निकला । सोचा था अपने पिछले मोरचे पर चला जाऊंगा । पर आज इस कदर कुहरा रहा कि मैं रास्ता न देख सका और भटककर इधर आ गया । उफ यदि आप न मिलते तो रात में यहीं कहीं सर्दी से ऐंठ जाता ।''

कुछ गर्मी आ जाने पर जर्मन ने पहले अपने चमड़े के दस्ताने उतार डाले तत्पश्चात् रोंयेदार चमड़े का बड़ा कोट भी उतार दिया । कोट उतार वह इधर-उधर देखने लगा । पाल ने उसका तात्पर्य समझकर एक ओर संकेत किया । वहां दीवार पर किसी पशु का सिर लगा हुआ था-जिसके। दो बडे बड़े सींग थे । जर्मन ने उठ कर एक सींग पर अपना कोट टांगा और पुन: अपने स्थान पर आकर कहा-

''क्या मैं अपने आश्रय-दाता का नाम पूछ सकता हूं? ''

''पाल लारेंज्की ।'' पाल ने गम्भीरता-पूर्वक उत्तर दिया । जर्मन ने अपने कोट की जेब से पाइप निकाला और एक रबड़ की थैली । रबड़ की' थैली में से तम्बाकू निकाल कर पाइप में भरते हुए वह बोला-' 'मेरा नाम' फ्रेडरिक है । ''

अंगीठी की आग से एक पतली लकड़ी के द्वारा पाइप सुलगाकर उसने पूछा-' 'आप क्या यहाँ अकेले ही रहते हैं?''

''हां, हर फ्रेडरिक । ''

''क्यों? क्षमा कीजियेगा--मुझे ऐसा प्रश्न नहीं करना चाहिए, परंतु उत्सुकतावश... ।''

''यह युद्ध-काल है हर फ्रेडरिक । '' पाल ने गम्भीरता-पूर्वक उत्तर दिया । फ्रेडरिक बच्चों की भांति हँसता हुआ बोला-

ठीक बात है । '' फिर मुंह बनाकर बोला-''युद्ध बड़ी बुरी चीज है । युद्ध में मनुष्य मनुष्य नहीं रहता । ''

पाल ने कोई उत्तर नहीं दिया । कुछ क्षण तक दोनों मौन रहे । पाल ने अपने पाइप की राख झाड़ते हुए कहा-' 'हम लोगों के भोजन का समय हो गया; आप भी खा लीजिये । ''

''वाह वाह! मुझे भूख भी जोर की लगी है । बिस्कुट और सूखी रोटी खाते-खाते नाक में दम आ गया । ''

पाल ने पुकारा-' स्टेला ''

स्टेला कमरे के द्वार पर आकर बोली-' 'क्या है?''

''खाना लाओ, यह हमारे मेहमान भी खायेंगे ।''

फ्रेडरिक हंसता हुआ बोला-''मैं बहुत भूखा हूं बहन, इसका ध्यान रखना ।''

स्टेला फ्रेडरिक को सशंक नेत्रों से देखती हुई चली गई ।

( २)

भोजन से निवृत्त होकर उठते हुए फ्रेडरिक बोला-ओफ ओह! बाद मुद्दत के स्वादिष्ट भोजन मिला । आप विश्वास कीजिए' कामरेड पाल, युद्ध-क्षेत्र में केवल पेट भरा जाता है । जिसे भोजन कहते हैं उसकी तो वहां गंध भी नहीं होती । अब तो युद्ध बन्द हो जाता तो अच्छा था ।''

दोनों पुन: अंगीठी के पास बैठे और दोनों ने अपने-अपने पाइप सुलगाए।

पाल बोला – बिना रूस पर विजय प्राप्त किए आप लोग यह युद्ध कैसे समाप्त कर देंगे? ''

''कामरेड पाल, मुझे तो आशा नहीं है कि हम लोग कभी रूस पर विजय प्राप्त कर सकेंगे । रूसियों के हृदय में देश-प्रेम है, देश के लिए प्राण देने की भावना है और सबसे बड़ी बात यह है कि रूसी युद्ध-कला जानते हैं ।'' ' फ्रेडरिक ने यह बात इतने भोलेपन के साथ कही कि पाल को उसमें खुशामद नहीं वरन् शुद्ध हृदयता दिखाई पड़ी ।

पाल बोला-''परन्तु क्या तुम्हारा भगवान् हिटलर भी ऐसा ही सोचता है ?''

''क्या जाने! परन्तु यदि अभी नहीं सोचता तो उसे आगे चलकर सोचना पड़ेगा । भाई मेरा विचार तो ऐसा ही है-परन्तु होगा क्या, यह कौन जाने । क्यों कामरेड, भविष्य की बात कौन बता सकता है ?''

- ''आप लोगों से क्या कहा जाता है?

''बस यही कि लडे जाओ, विजय निकट है । हर हिटलर के तो हमें 'कभी-कभी दूर से ही दर्शन हो जाते हैं । हमें तो अपने निकट के अफसर से ही काम रहता है । केवल उसकी आज्ञा-पालन करना ही हमारा धर्म है-जैसा कि प्रत्येक सैनिक का हुआ करता है ।''

''हर हिटलर के लिए जर्मनी का. बच्चा-बच्चा अपने प्राण देने के लिए सदैव तैयार रहता है-क्यों न ?

''हां, यह बात ठीक है । हम लोगों के अन्दर यही भावना भरी जाती है कि हिटलर की आज्ञा-पालन करने में ही हमारे लिए सब कुछ है । परन्तु कामरेड पाल! मनुष्य तो मनुष्य ही रहेगा-पशु नहीं हो सकता । मनुष्य के पास मस्तिष्क है, बुद्धि है, हृदय है, इनसे तो यह कुछ न कुछ काम अवश्य ही लेगा-नहीं लेगा ?

''लेना तो चाहिए, परन्तु जहां तक मैंने सुना है और देखा है जर्मन .सैनिक पशुवत् व्यवहार करते हैं ।''

''देखिये कामरेड पाल, युद्ध में जो कुछ होता है उसका उत्तरदायित्व सैनिक पर नहीं वरन् सैनिकों का संचालन करने वाले अफसरों पर होता है । इस पर आप यह प्रश्न कर सकते हैं कि क्या तुम लोगों के अफसर पशु हैं? मैं कहूंगा नहीं । वे पशु नहीं हैं । केवल युद्धांध हो गये हैं । मैं आपसे इस समय ऐसी बातें कर रहा हूं वह केवल इसलिए कि मैं इस समय युद्ध-भावना- शून्य हो गया हूं । अन्यथा जब मैं युद्ध-भावना से पूर्ण होता हूं तो मेरा हृदय भी दया-शून्य. हो जाता है । युद्ध चीज ही ऐसी है?

भोजन के साथ ली हुई शराब ने पाल की गम्भीरता को कम कर दिया था । वह बोला-''बेशक! हर फ्रेडरिक! युद्ध बहुत बुरी बला है, 'परन्तु इस युद्ध का सारा उत्तरदायित्व तुम्हारे विधाता हिटलर पर है ।''

''मैं राजनीति की पहेलियां नहीं हल कर सकता; इसलिए मैं यह नहीं कह सकता कि इसका उत्तरदायित्व किस पर है-हाँ, इतना जानता हूँ 'कि रूस पर पहल हम लोगों ने ही की है और शायद युद्ध बन्द करने में भी पहल हमारी ही ओर से होगी ।''

अन्तिम वाक्य फ्रेडरिक ने दांत निकाल कर ऐसे मसखरेपन के साथ कहा कि पाल भी मुसकराने लगा । पाल बोला-''जर्मन होने के नाते आपके, विचार बड़े स्वतंत्र हैं ।''

'सो तो इस बात को मेरे साथी सैनिक भी जानते हैं । मैं बात साफ ही कहता हूँ । बड़ी हंसी होती रहती है । कुछ लोग बुरा भी मानते हैं पर- मुझे इसकी परवा नहीं । हां, अफसरों के सामने तो मैं अपने विचार प्रकट नहीं करता । हमारे अफसर बड़े बेढब होते हैं । अपने प्रतिकूल वे एक शब्द भी नहीं सुनना चाहते ।''

पाल फ्रेडरिक के कोट की बांह पर का चिन्ह देखकर बोला-''श्राप तो सार्जेण्ट मालूम होते हैं ।''

''हां, मैं सार्जेण्ट हूं कामरेड ।''

सहसा फ्रेडरिक की आंखें निद्रा-भार से बन्द होने लगीं । यह देख कर पाल बोला-''आपको नींद आ रही है-सोना चाहिए ।''

''मैं बहुत थका हुआ हूं कामरेड! '' फ्रेडरिक ने औखें खोल कर कहा ।

पाल उठकर भीतर वाले कमरे में चला गया । स्टेला लेटी हुई थी, पोला अपने बिस्तर पर बैठी हुई विचार-मग्न थी ।

-स्टेला पाल को देखते ही बोली-''क्या यह भेडिया रात में यही रहेगा? ''

''और नहीं तो कहां जायगा

''भेडिये को घर में रखोगे ?''

''इस समय वह भेड़िया नहीं रहा, इस समय वह केवल एक, मनुष्य है ।''

''जर्मन और मनुष्य? ''

''क्या तुम मुझे इतना बेवकूफ समझती हो स्टेला कि मैं, आदमी और भेड़िये की पहिचान भी नहीं कर सकता? ''

स्टेला मौन हो गई । पाल ने कहा- ''मैं यह कहने' आया हूं कि इस कमरे का द्वार भीतर से बन्द कर लेना । और यह पिस्तौल धरा है । अब तो तुम्हें इतमीनान रहेगा ।''

''और बाहर कमरे में जो हमारी बन्दूकें, पिस्तौल और कारतूस की' पेटी हैं-वे सब क्या वहीं रहेंगे ?''

पोला बोल उठी-''खाली एक पिस्तौल से क्या होगा-सब अस्त्र तो बाहर वाले कमरे में हैं और उसी कमरे के पास वह सोवेगा । ''

''मैं भी तो वहीं रहूंगा ।''

''तो क्या तुम रात भर पहरा दोगे ?''

'' इतनी दूर तक सोचने की आवश्यकता नहीं है । अच्छा मैं जाता हूं । '' यह कहकर पाल शीघ्रतापूर्वक बाहर आ गया । उसने देखा, फ्रेडरिक' बैठा ऊंध रहा था । उसने जाकर अपने बिस्तर के बगल मैं ही फ्रेडरिक का बिस्तर लगा दिया और तत्पश्चात् फ्रेडरिक से कहा-''आपका बिस्तर तैयार है, फ्रेडरिक!''

फ्रेडरिक चौंककर उठ खड़ा हुआ ।'

प्रातःकाल सबसे पहले पाल जागा । उसने देखा कि फ्रेडरिक गहरी निद्रा में है । उसने उठकर अंगीठी की आग को और तेज किया और स्त्रियों के कमरे के द्वार पर जाकर उसे खटखटाया । पोला ने द्वार खोला । पाल अन्दर गया । स्टेला अपने बिस्तर पर बैठी हुई थी । पाल उससे बोला-- स्टेला, कॉफी बना लो, शायद हमारा मेहमान नाश्ता करके जाना चाहे ।'' तो क्या उसे जाने दोगे? ''

''हां क्यों? यहीं रखने का विचार है? कल तो उसको रात में ही निकालने के लिए तैयार थी 1'

''मेरा मतलब यह है कि उसे गिरफ्तार करके अपने फौजी अधिकारियों को सौंप दो । यहां से जाकर कहीं वह हमारे स्थान का पता... ।''

. ''फिर वही अविश्वास! विश्वास करना सीखो -खेला, जर्मन भी आखिर मनुष्य ही है । ''

''इसी मनुष्यता का परिचय दे रहे हैं ।''

''अरे तो सभी एक से थोड़े ही हैं । इतने में से कुछ तो ऐसे निकलेंगे जिनमें अब भी कुछ मनुष्यता बाकी होगी । और मेरे ख्याल से उन्हीं थोड़े आदमियों में से यह भी एक है । खैर! उस पर नहीं तो मुझ पर विश्वास करो । मैंने धूप में बाल सफेद नहीं किये हैं । जल्दी नाश्ता तैयार करो ।''

पाल पुन: बाहर आ गया और अपना पाइप सुलगाकर अंगीठी के पास बैठ गया ।

थोड़ी देर में फ्रेडरिक ने करवट ली । पाल ने पुकारा-

''हर फ्रेडरिक! सवेरा हो गया । '' फ्रेडरिक ने मुंह पर से कम्बल हटाकर पहले इधर-उधर देखा तत्पश्चात् 'ओ' कह उठ बैठा । आखें मलता हुआ वह बोला-ओह खूब सोया । ''

' 'थके हुए जो थे । '' पाल ने मुस्कराकर कहा ।

' फ्रेडरिक अपने जूते चढ़ाते हुए बोला-''बहुत थका था ।'' फ्रेडरिक भी पाल के पास आ बैठा 1 थोड़ी देर में नाश्ता तैयार हो गया । दोनों ने ? नाश्ता किया । इसके पश्चात दोनों पुन: अंगीठी के पास बैठ कर बातें करने -लगे

( ३)

एक घंटा और व्यतीत हो जाने पर पाल ने फ्रेडरिक से पूछा-अब आपके क्या इरादे हैं ?''

'' जैसी तुम्हारी आज्ञा हो । ''

' 'क्या मतलब ?' '

' 'इस समय कायदे से मैं तुम्हारा कैदी हूँ । ''

''खैर, उस बात को छोड़ो! मैंने कैदी की हैसियत से तुम्हें यहां नहीं बल्कि एक मनुष्य की हैसियत से एक मनुष्य को आश्रय दिया है । ''

' 'तो यदि आप आज्ञा दे तो मैं अपने पिछले मोरचे पर चला जाऊं । '' ' 'जैसी तुम्हारी इच्छा । ''

'' यदि यह बात है तो मैं आपका बहुत ही कृतज्ञ हूं । आपने एक सच्चे मनुष्य जैसा व्यवहार किया है ।''

''और मुझे आशा है तुम भी वैसा ही करोगे ।'' पाल ने कहा ।

''निस्सन्देह! प्राण भी चले जाएँ तब भी' उसके विपरीत नहीं करूंगा ।''

''तो आप जा सकते हैं । परन्तु आपके अस्त्र जो आपने बाहर फेंक दिये थे अब बर्फ में दब गये होंगे ।''

''कोई चिन्ता नहीं, ऐसे ही चला जाऊंगा । यदि केवल एक पिस्तौल होता तो काफी था ।''

''एक पिस्तौल! खैर एक पिस्तौल मैं आपको दे दूंगा ।''

''बस काफी है और थोड़ी दूर तक रास्ता... ?''

''यह भी बता दूंगा । और कुछ ?''

''बस! ''

कुछ देर में फ्रेडरिक चलने केलिए तैयार हो गया । पाल ने उसे भरा हुआ पिस्तौल दिया और थोड़ा खाने को । फ्रेडरिक बोला-यह ?'

''कुछ खाने को हैं-शाम तक वहां पहुंच पाओगे ।''

''धन्यवाद! आप बडे दयालु हैं । अच्छा! ''

''चलो मैं तुम्हें रास्ता बता दूं ।''

पाल ने अपनी बन्दूक ले ली और जाने के लिये तैयार हो गया । चलते' समय फ्रेडरिक स्टेला से बोला-''बहन, क्षमा करना! मेरे कारण तुम्हें कुछ असुविधा हुईं ।''

स्टेला मुस्कराकर बोली-''नहीं, असुविधा की क्या बात थी ।''

पाल और फ्रेडरिक दोनों चले । लगभग डेढ़ घंटा चलने के बाद मुख्य सड़क दिखाई पड़ी । फेडरिक बोला-बस, अब आप लौट जाइये, मैं चला जाऊंगा ।'' ये दोनों थोड़ी दूर आगे बड़े होंगे कि सामने से जर्मन मोटर-फौज का एक दस्ता आता दिखाई पड़ा । फ्रेडरिक जल्दी से बोला-''कामरेड पाल', आप जल्दी निकल जाइये-छिपते हुए जाइयेगा ।'

पाल शीघ्रता-पूर्वक वृक्षों की आड लेकर लौट पड़ा । फ्रेडरिक आगे बढ़ा । दस मिनट में फौज का दस्ता उसके करीब आकर रुक गया । उसमें से आठ-दस सैनिक बन्दूकें लिये हुए उतरे । उनके साथ में एक अफसर भी था । अफसर के हाथ में दूरबीन थी । अफसर ने पूछा-''तुम्हारा क्या नाम है '?

''फ्रेडरिक! ''

''किस बटालियन के हो ?''

फ्रेडरिक ने नाम बताया । अफसर ने उसका नम्बर पूछा; वह भी ' फ्रेडरिक ने बता दिया ।

''तुम्हारे साथ दूसरा कौन आदमी था ?''

('कौतुक' का फिर तीव्रता से प्रवेश ।)

''कोई तो नहीं ।''

''था कैसे नहीं, मैंने स्वयं दूरबीन से देखा । एक रूसी बन्दूक लिए हुए था ।''

फ्रेडरिक मौन रहा ।

अफसर साथ के सैनिकों से बोला-' 'देखो, उसे तलाश करो, अभी दूर न गया होगा ।''

दस सैनिकों की एक टुकड़ी अपनी बंदूकें संभालकर दौड़ पड़ी । अफसर फेडरिक से बोला- ' 'तुम्हें गिरफ्तार किया जाता है .।...... ।' '

यह कहकर उसने पास खड़े हुए सैनिकों से संकेत किया । उन्होंने आगे बढ्‌कर उसे हिरासत में कर लिया । एक ने उसका पिस्तौल ले लिया देखकर .सैनिक बोला-यह तो रूसी पिस्तौल है । ''

अफसर चौंककर बोला-' देखूं

पिस्तौल हाथ में लेकर अफसर बोला-' 'यह तो निस्सन्देह रूसी है । तुमने इसे कहाँ पाया? ''

फ्रेडरिक बोला-एक रूसी लाश से ले लिया था । ''

अफसर ने पिस्तौल की मेगजीन खोलकर देखी । तत्पश्चात् कहा- ' 'बिल्कुल भरा हुआ । एक, भी फायर नहीं किया गया । हूँ! मेरा खयाल -ठीक निकला । उसका यह प्रमाण है । ठीक बताओ, तुम्हारे साथ कौन था ?'' फ्रेडरिक बोला-''यदि आप ठीक जानना चाहते हैं तो वह वह था, जिसने मुझे मृत्यु के मुख से बचाया-जिसने मुझ पर विश्वास करके मुझे अपने घर में आश्रय दिया । वह एक मनुष्य था और उसने मुझे मनुष्य समझ कर मेरे साथ मनुष्यता का व्यवहार किया ।'

' 'ओह! मैं व्याख्यान नहीं सुनना चाहता । वह कौन है उसका धर कहाँ है ?'' अफसर ने कड़ककर कहा ।

फ्रेडरिक मौन रहा ।

' 'जल्दी बोलो!''

फेडरिक निरुत्तर था ।

' 'नहीं बताओगे?''

''कदापि नहीं ।'' फ्रेडरिक ने दृढ़तापूर्वक कहा ।

''तब तो यह खुली बगावत है ।''

इसी समय सैनिकों की टुकड़ी लौट आई । उसमें से एक ने अफसर' को सेल्यूट करके कहा-'वह तो नहीं मिला । आगे घना जंगल है, उसमें- छिप गया होगा ।''

''और वह हम लोगों को देख गया है । '' अफसर ने पैर पटककर क्रोध से दांत पीसते हुए कहा । ''फ्रेडरिक! तुम्हें दो मिनट का समय दिया जाता- है । उसके बाद.. .एक सैनिक होने के नाते तुम स्वयं जानते हो ।''

दो मिनट व्यतीत हो गये । अफसर ' सैनिकों से कड़ककर बोला-, ''फायरिंग स्क्वाड-पांच आदमी! ''

पांच सैनिक अलग निकलकर एक कतार में खड़े हो गये । अफसर फ्रेडरिक से बोला-' 'फ्रेडरिक! तुम्हें फ्युहरर तथा नात्सी सरकार के विरुद्ध बगावत करने के अपराध में मृत्युदण्ड दिया जाता है । तुम्हें कुछ कहना है? '' फ्रेडरिक दृढ़तापूर्वक बोला-' 'मुझे कुछ नहीं कहना है ।'' अफसर ने. सैनिकों को संकेत किया । दो सैनिकों ने आगे बढ्‌कर फ्रेडरिक का ऊपरी कोट:. उतार लिया । पत्पश्चात् उसके दोनों हाथ पीछे बांध दिये । असफर ने आ फेडरिक से पूछा '' किसी को कोई संदेश देना है?''

फ्रेडरिक कुछ क्षण तक सोचकर बोला--हां, मेरी माता से कह देना,'. ? फेडरिक को उसकी मनुष्यता के लिए मृत्युदण्ड दिया गया ।''

अफसर दांत पीसकर बोला-''इसकी आखों पर पट्टी बांधो ।'' एक सैनिक ने रूमाल फ्रेडरिक की आँखों पर बाँध दिया ।

अफसर ने कहा-ले जाओ! ५० कदम...''

दो सैनिक फ्रेडरिक को ५० कदम की दूरी पर ले गये और उसे फायरिंग स्क्वाड की ओर मुंह करके खड़ा कर दिया और स्वयं उससे कुछ हटकर खड़े हो गए। अफसर बोला – ‘तैयार!’

पांचो सैनिकों नें अपनी-अपनी बन्दूकें सीधी करके फ्रेडरिक की ओर निशाना साधा । अफसर बोला-''एक-दो-तीन '' पाँचों बन्दूकें एक साथ छूटी और फ्रेडरिक की लाश भूमि पर लोटने लगी । ''इसे यहीं सड़क से थोड़ा हटकर दफन कर दो ।'' कहकर अफसर अपने हाथों को झाड़ता हुआ मोटर की ओर बढ़ा!

चार सैनिकों ने फ्रेडरिक को उठाया । दो सैनिक एक पीछे वाली मोटर से दो फावड़े निकाल लाये और सड़क से हटकर वृक्षों के एक झुरमुट के नीचे फ्रेडरिक दफन कर दिया गया ।

पाल पास ही छिपा हुआ था । उसने यह सब अपनी आंखों से देखा । जब फौज की टुकड़ी वहां से चली गई तब वह फ्रेडरिक की कब्र की तरफ आया । कुछ क्षण तक मौन रहा । इसके उपरान्त उसने एक मुट्ठी बर्फ उठा कर कब्र पर छोड़ते हुए कहा-''कामरेड फ्रेडरिक, तुमने साबित कर दिया कि तुम मनुष्य थे ।''

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साभार - डिजिटल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया

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 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3864,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,337,ईबुक,192,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2811,कहानी,2136,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,489,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,862,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,24,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,326,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1932,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,659,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,703,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,15,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,61,साहित्यम्,2,साहित्यिक गतिविधियाँ,186,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,69,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक की कहानी मनुष्यता का दण्ड
विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक की कहानी मनुष्यता का दण्ड
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