एक ही योग संभव है परिव्राजक या कूपमण्डूक - डॉ. दीपक आचार्य

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9413306077 www.drdeepakacharya.com परिपूर्ण क्षमताओं से नवाजे होकर धरा पर आए इंसानों के लिए भगवान ने पूरी जिन्दगी दो योग ही निर्मित किए है...

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परिपूर्ण क्षमताओं से नवाजे होकर धरा पर आए इंसानों के लिए भगवान ने पूरी जिन्दगी दो योग ही निर्मित किए हैं। एक है परिव्राजक योग और दूसरा है कूपमण्डूक योग।

क्षमताएं सभी में समान होती हैं लेकिन देश, काल और परिस्थितियों से समझौता करते हुए अपने हक में हर तरह के समीकरण बिठाने में माहिर लोग हर कीमत पर अपने स्थानिक दायरों को सीमित कर डालते हैं और उसी परिधि में विचरण के आदी हो जाते हैं।

इंसान की तरह-तरह की विचित्र और अजीबोगरीब प्रजातियों में यह खासियत देखी जाती है कि वे अपनी क्षमताओं पर भरोसा नहीं कर पाते हैं और इसलिए किसी न किसी स्थान, प्रभाव और विचारधारा या अतिरिक्त कर्म से ऎसे बंध जाते हैं कि उनसे इनका मोह कभी समाप्त नहीं हो पाता।

यह स्थिति चरम स्तर की जड़ता और संकीर्णताओं को जन्म देती है।  इस किस्म के लोग अपार क्षमताओं, हुनर तथा सर्वांगीण प्रतिभाएं होते हुए भी चंद दायरों के दालान में नज़रबंद होकर जीने के आदी हो जाते हैं।

लेकिन जमीनी मोह को थामे हुए इन लोगों के कर्म हमेशा आसमान में फड़फड़ाने के लिए कुलबुलाने लगते हैं और इस वजह से ये लोग न कभी शांत रह पाते हैं, न औरों को शांति से रहने देते हैं।

जो इंसान जितनी कम परिधि में नज़रबंद होता है वह उतना ही अधिक तीव्रता से बाहर की दुनिया को अपने भीतर बसाता रहता है। आत्म मुग्ध अवस्था में स्वर्ण पिंजरे में कैद होकर दिन-रात इसी उधेड़बुन में रहता है कि आखिर बाहर क्या हो रहा है।

इन लोगों को तभी शांति पड़ती है जब उन्हें दुनिया भर की खबर मिलती रहे, नई-नई चटपटी जानकारियां उनके कानों तक पहुंचती रहे और उनके मुखबिरों या दलालों की चौकन्नी निगाहें हमेशा सतर्क रहकर इन लोगों को रोजाना कुछ न कुछ नया-नया परोसते रहें। 

हर नज़रबंद इंसान की यही स्थिति होती है। इन लोगों के लिए जिन्दगी भर कुछ स्थान, व्यक्तियों और संसाधनों का मोह इतना अधिक सर चढ़ा हुआ होता है कि ये अपने-अपने गहरे और अंधे कूओं में बैठकर दुनिया जहान को रोशनी दिखाने की कल्पनाओं और सुझावों के ताने-बाने बुनते रहते हैं।

ये कूए के मेंढ़कों से लेकर सरिसृपों और पाताली असुरों तक के सारे काम कर सकने को ही जिन्दगी का उसूल और ध्येय मानते रहते हैं और इसी में मरते-मरते जीते हुए अर्से तक बने रहते हैं।

इन लोगों की कुण्डली में कूपमण्डूक योग इतना अधिक गहरा होता है कि ये अपने ठिकानों से हिलना तक नहीं चाहते। जब भी कभी भूकंप की आशंका अनुभव होती है, किसी न किसी बड़े पहाड़ को थाम कर साफ बच निकलते हैं और फिर कूए में आ धमकते हैं।

हालात ये हैं कि इन मण्डूकों को पास के कूओं और पोखरों का न्यौता मिलता है तब भी बाहर निकलने में घबराते हैं। बहुत से इंसानों की यही फितरत हो गई है।

इसके ठीक विपरीत भगवान जिन लोगों को वैश्विक मानदण्डों की कसौटियों पर खरा उतारकर भेजता है उनके लिए ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ केवल बोध वाक्य नहीं बल्कि जीवन धारा होता है और इसलिए इनके लिए देश, काल और परिस्थितियों का कोई वजूद नहीं होता।

पूरी दुनिया भगवान ने अपने लिए बनाई है, अपने देखने, आनंदित होने और सुकून पाने के लिए बनाई है। इसलिए इन्हें कभी कूओं-बावड़ियों या पोखरों का ध्यान नहीं आता बल्कि समन्दर से लेकर महानदियों तक के मुहानों की सैर का आनंद पाने को सदैव उत्सुक बने रहते हैं।

आदि शंकराचार्य और महान संत-महात्माओं, ऋषि-मुनियों से लेकर वास्कोडिगामा और कोलम्बस तक के जीवन ध्येय को अपना चुके इन परिव्राजकों के लिए स्थानिक, वैयक्तिक और भौतिकवादी सांसारिक मोह-माया का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

इसलिए ये चाहे जहां रहें, चाहे जहां भेज या भिजवा दिए जाएं, इन पर कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि यायावरी जिन्दगी अपना चुके लोगों को भीतर तक यह अहसास रहता है कि भगवान ने उन्हें वैश्विक चिन्तन से भर कर भेजा है जहाँ परिधियों का कोई अस्तित्व नहीं है।

इसलिए परिव्राजक योग से सम्पन्न लोगों के लिए यायावरी का आनंद दूसरे सभी प्रकार के आनंद और सुख-चैन से सर्वोपरि हो जाता है। परिव्राजक योग का महा आनंद सामान्य और पशुबुद्धि वाले लोगों के समझ में कभी नहीं आ सकता। इसे वे लोग ही अच्छी तरह अनुभव कर सकते हैं जो लोग वैश्विक व्यक्तित्व के धनी होते हैं और जिनके लिए दुनिया में किसी भी कर्म, व्यवहार और स्थान की कोई सीमा रेखा आड़े नहीं आती।

ज्योतिष और सामुद्रिक शास्त्र के रहस्यों के ज्ञाताओं को अच्छी तरह पता होता है कि यायावारी व्यक्तित्व किसी के बांधे नहीं बंध सकते। ये ऊपर से वामन दिखते  हुए भी अपने भीतर विराट को समाए रखने की क्षमता से परिपूर्ण होते हैं। इस विराट स्वरूप का आभास या दर्शन हर किसी के बस में नहीं है। इसे वे ही पा सकते हैं जो बलि की तरह दानी हों या फिर दिव्यता सम्पन्न।

कूपमण्डूक योग जीवन के लिए अभिशाप है इसे त्याग कर परिव्राजक योग में प्रवेश करें, फिर देखें यह दुनिया कितनी हसीन है, दुनिया में करोड़ों लोग हैं जो हमें चाहने वाले हैं और हमारे लिए जीने का माद्दा रखने वाले हैं।  संकीर्णताओं से व्यापकता और सूक्ष्म से विराट की यात्रा को अपनाए, ऊध्र्वगामी व्यक्तित्व को अंगीकार करे, वही वास्तव में मनुष्य है, शेष सारे तो टाईमपास मरणधर्मा ही हैं।

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रचनाकार: एक ही योग संभव है परिव्राजक या कूपमण्डूक - डॉ. दीपक आचार्य
एक ही योग संभव है परिव्राजक या कूपमण्डूक - डॉ. दीपक आचार्य
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