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शरद कोकास जी की कहानी 'काऊंटर के पीछे मुस्कुराता चेहरा" की समीक्षा

आज दिनांक 21-06-2016 को साहित्यिक बगिया में शरद कोकास जी की "काऊंटर के पीछे मुस्कुराता चेहरा" नामक चर्चित कहानी लगायी गयी।
कहानी पर गीतांजलि शुक्ला, आकांक्षा मिश्रा जी,भावना सिंह, डा मोहन कुमार नागर जी, आरती तिवारी दीदी, माहिम श्रीवास्तव जी, स्पर्श चौहान जी, कुंवर इन्द्रसेन भाई, प्रेरणा गुप्ता, सुशीला जोशी जी, मनोज चौहान जी, प्रहलाद श्रीमाली सर,प्रियंका शर्मा ,अभिषेक द्विवेदी व विमल चन्द्राकर ने अपने विचार और प्रतिक्रियायें व्यक्त कीं।
कहानी पर सबसे पहले गीतांजलि जी ने विचार रखते हुये कहा कि- "कहानी बेहद अच्छी व सत्यता में डूबी हुई है। "

आकांक्षा जी ने कहानी को बेहतरीन बताते हुये इसे मानवता को दर्शाती हुई बताया। भावना सिंह ने कहानी के विषय को आज के परिवेश में बहुत प्रभावी माना।
ख्यात लेखिका व कवयित्री आरती तिवारी दीदी ने कहा कि- "शरद सर की कहानी को पढ़ना जैसे खुद को समृध्द करना है। "
माहिम श्रीवास्तव ने कहानी को स्तरीय मानकर खुले दिल से तारीफ की।


डा मोहन कुमार नागर ने कहा कि-" दरअसल कथानक , पात्रों के चरित्र चित्रण और ड्राफ्ट इतने ज्यादा फ्लो में हैं .. इतने सधे हुए और कहानी इतने स्पष्ट शब्दों में आगे बढ़ती है कि बिना भटकाव के इसके अंत तक सीधे पहुंच पाना हो जाता है। एकक श्रेष्ठ कहानी जिसे कहानी लेखन में रिफरेंस के तौर पर लिया जा सकता है। हालांकि कहानी खुद में बहुत से मोड़ समेटे थी पर बिना लफ्फाजी के एक स्पष्ट अंत पर खत्म होती है जो सर्वथा उचित है। "


स्पर्श चौहान जी ने कहानी आगे विचार रखते हुये कहानी कि- "शरद जी की कहानी देहाती छात्रों को शहर जाने पर आने वाली कठिनाईयों को इंगित करती है। सरल भाषा एवं सटीकता इस कहानी की शोभा बढ़ाते हैं। "


कुंवर इन्द्रसेन जी कहा कि "शरद कोकस जी की कहानी में एक लय है, निरंतरता है। कहानी पूरी कसी हुई है जो अंत तक बांधे रहती है। कहानी का अंत पुर्वानुमानित होने के बावजूद पाठकों को गंतव्य तक ले जाने के लिये प्रेरित करती है,रोचकता कहीं भी बाधित नहीं होती। एक ऐसी कहानी जो अपने अंत को सफलता से प्रक्षेपित करने में पूरी तरह से सफल रही है। "
प्रेरणा गुप्ता जी ने कहानी कि शरद जी कहानी छात्र जीवन की याद दिलाता है। सुशीला जोशी जी ने कहा कि कहानी सही मायनों में यथार्थ से रूबरू कराती है और कथोपकथन के स्थान पर कथ्य के आधार पर आगे बढती है।

मनोज चौहान जी ने कहानी पर प्रतिक्रिया देते हुये कहा कि "काउंटर के पीछे मुस्कुराता चेहरा" कहानी संवेदना जगा देने वाली है। कहानी गरीब परिवार के शहर में पढ़ने गए इंजीनियरिंग छात्र के अभावों एवं उसकी समस्यायों को खूबसूरती से चित्रित करती है और अंत तक पाठक को बांधे रखती है। "


आदरणीय प्रहलाद श्रीमाली सर ने अपने विचार रखते हुये कहा कि- भाई शरद कोकास जी का इस जमाने के लिए बहुत जरूरी कहानी -काउंटर के पीछे मुस्कुराता चेहरा का वर्णन दिल छू लेता है । कहानी का भाव -बीज भरा जो है --मशीन के अलावा मनुष्य भी! --ग्राहक को सिर्फ ग्राहक नहीं समझते थे!


मुस्कुराता चेहरा संवेदनशीलता भरा इंसानियत का चेहरा है, जो इधर आवश्यक तो अधिक है, किंतु है असंभव स्तर तक दुर्लभ।
कहानी पर विस्तृत समीक्षा करते हुये प्रमुख एडमिन प्रियंका शर्मा जी ने लिखा कि- "काऊंटर के पीछे मुसकुराता चेहरा" कहानी का कहन और भाषा बेहद सुगठित है। ऐसा पाठक के रूप में महसूस करती हूं एक बार पढकर कहानी पर लिखना जैसे बेमानी होगा।
कहानी आज के परिवेश में ग्रामीण अंचल में रह रहे युवक के इर्द गिर्द घूमती है और साथ ही वर्तमान में शहराती जीवन, तेज तर्रार दौडती भागती जिन्दगी, बडे - बडे शापिंग माल, खरीद फरोख्त और नकदीकरण के लिये बैंक एटीएम जैसे मूलभूत सुख सुविधाओं के साथ तुलनात्मक समीकरण भी बिठाती है। गांव से आये युवक के साथ किस कदर पहले तो बैंक फिर कालेज में दिखला लेने के जद्दोजहद करनी पडती है, यह साफ देखा जा सकता है।


युवक की गरीबी उसका संघर्ष कहानी में अंत तक देखा जा सकता है।
युवक का निश्छल आचरण व व्यवहार कैसे उस बैंक की महिला कर्मी की सोच बदलता है और वह आत्मीय होकर युवक से संवाद स्थापित करती है, जो बेहद प्रभावी दिखता है। कहानी का अंत रौंगटे खडे कर देता है।


मोहन कुमार नागर जी ने कहानी के फलक को अपनी समीक्षा से और विस्तारित करते हुये लिखा कि -" ये पात्र इस स्थिति में है जो हजार रुपये की मदद अब कर सकती थी इसलिए की .. और वो भी आपके कथन के अनुसार। .. तीसरी बार उस लड़के को परेशान देखने के बाद .. मैंने बहुत सोचकर लिखा था कि ये कहानी बिना लफ्फाजी के लिखी गई है .. मनोविज्ञानक द्रष्टि से देखा जाए तो उसने अपनी कमजोरियों से उबरकर किसी की मदद करने में समय भी लिया  .. अतिरेकता होती तो पहली बार में ही पैसे दे देती।


मंच के संचालक विमल चन्द्राकर ने "काऊंटर के पीछे मुस्कुराता चेहरा" की समीक्षा करते हुये कहा कि- "शरद भइया की कहानी "काऊंटर के पीछे मुस्कुराता चेहरा" उस समय के समय को लेकर लिखी गयी जब प्रायः गांव से लोग शहर की ओर पढने को जाते थे। और धन के प्रेषण हेतु मनीआर्डर या मेल ट्रांसफर होता था। आज के समय की बैंकिग, सोशल नेटवर्किग, के सापेक्ष उस समय की सुविधा का आभाव,कालेज की पढाई लिखाई के लिये नियमित पैसा मिलना, व संसाधनों काल सीमित उपयोग कहानी की मुख्य समस्या के रूप में उभर कर सामने आता है।


कहानी काल नायक एक ग्रामीण युवक है जो तकनीकि पढाई करने गांव से शहर आता है। महानगर की चकाचौंध, मंहगी वस्तुओं, आलीशान कांच के बने शो रूम, फर्राटा दौडती मोटरगाडियां, शहर के
रेलमपेल, भव्य बैंक की इमारत के कांच के बने काऊंटर मे तैनात कर्मी और उनके मुस्कुराते चेहरे।


वास्तव में कहानी अपने मूल विषय पर यहीं से केन्द्रित हो जाती है और कैसे इस चमक धमक, रोजी रोटी की तलाश में और उच्च अध्ययन हेतु आज भी युवक गांव से शहर की ओर आते है और आर्थिक धन अभाव के चलते हर महंगी वस्तुओं का त्याग करके, कम गुजर बसर करते हैं। इंजीनियरिंग कालेज की मंहगी फीस, महंगा मकान का किराया और होटल का खाना सब एक साथ आर्थिक धनाभाव के कारण संभव ना था।
कहानी का शिल्प सुगठित व शिल्प बेजोड़ है। बैंक में फीस के लिये ग्रामीण का आना, मुडी तुडी पासबुक देकर नसीहतें आज भी सुनी देखी जा सकती हैं। प्रतीत होता है कि लेखक द्वारा कहानी में एक भी स्थान पर लय भंग नही होता। महिला कर्मी द्वारा ग्रामीण के बाबत यथापेक्षित सहायता और फिर एक उचित संवाद कहानी में ठहराव लाता है और साथ ही एक पाठकीय संवेदना भी मानस पटल पर छोड़ता है।
एक स्तर पर सहमति भी होती है कि महिला कर्मी ने मदद से पूर्व क्यूं इतना समय लिया। कहानी के पात्र व चरित्र बेहद सशक्त दीखते हैं।


अन्त में भूखे होना, जिन्दा लाश की चलना, बेचारा गरीब देहाती जैसे प्रसंग मन को कचोटता है। एक अध्ययनरत छात्र का संघर्ष नायक के प्रति सहानुभूति जगाता है। कहानी में महिला बैंक कर्मी की अनायास मदद मानवीय संवेदना व सहानुभूति को उभारती है।


शरद भइया एक स्तरीय कहानी लेखन हेतु हृदय से बधाई व शुभकामनायें।
साहित्यिक बगिया के सभी सदस्यों द्वारा श्रेष्ठ कहानी पर विचार व प्रतिक्रियायें देने हेतु कोटिशः आभार।
प्रस्तुति : विमल चन्द्राकर

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