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कबूतरी आंटी -- संजीव ठाकुर

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कबूतरी ने फिर अंडे दिए थे। बेडरूम की खिड़की से नीचे छज्जे पर देखकर सुबू खुश हो रही थी—''वाह! कितना मजा आएगा! इससे कबूतर के छोटे-छोटे बच्चे निकलेंगे। मैं उन्हें पकड़ लूँगी, घर ले आऊँगी। उनके साथ खेलूँगी। बड़ा मजा आएगा।‘’ वह कबूतरी को उड़ाकर देखती कि कितने अंडे हैं, वे कितने बड़े हैं? कभी-कभी वह कबूतरी से बातें भी करती—''हटो तो कबूतरी आंटी, मैं देखूँ ज़रा....?’’

एक दिन सुबू ने देखा कि एक अंडा फूट गया है और उससे छोटा-सा, पीला-सा कबूतर झाँकने लगा है। थोड़ी ही देर में उसने दूसरे अंडे को भी फूटा हुआ देखा और उसी तरह का बच्चा-कबूतर बाहर निकलते हुए भी देखा। मगर यह क्या? एक बच्चा घिसटता हुआ कहाँ जा रहा है?....वह पापा को बुला लाई। पापा ने देखा तो दु:खी हो गए—''अरे! इतनी गर्मी में यह चल रहा है? यह नहीं बचेगा।‘’

सचमुच थोड़ी देर में बच्चा मरा पाया गया। 'दूसरे का क्या होगा, पता नहीं?’ कहकर पापा दु:खी हो गए। मम्मी ने जाना तो वह भी दु:खी हुई।

अगले दिन सबने देखा कि कबूतरी एक चूजे को अपने पंखों में छुपाए हुए है। ''इसे शायद यह बचा लेगी,’’ मम्मी ने कहा। ''दोनों को बचा पाना मुश्किल होगा इसलिए एक को ही इसने बचाया।‘’ पापा ने कहा। सुबु भी खुश हो गई—''एक बच्चा तो है?’’ अब उसका खेल शुरू हो गया। जब भी उसे मौका मिलता, अपने खिलौनों में से कुछ न कुछ छज्जे पर फेंक देती—''यह बरतन है, इसमें कबूतर का बच्चा पानी पिएगा।‘’....''ये कंघी है, बाल झाड़ऩे के लिए।‘’

एक दिन उसने सुन लिया कि चूजे को आँखें खोलने में दिक्कत होती है। बस, उसने झट नानी की आँख वाली दवाई छज्जे पर गिरा दी—''आँखों में डालेगा तो आँखें जल्दी खुल जाएँगी।‘’

फिर उसे खयाल आया कि चूजे को मीठी दवाई की जरूरत भी होगी, तो उसने पापा की शीशी से होमियोपैथी की कुछ गोलियाँ निकालकर गिरा दीं।

कबूतर का बच्चा अब बढ़ऩे लगा था। कबूतरी आंटी से सुबू का बतियाना भी बढ़ता जा रहा था। मम्मी-पापा घर से बाहर होते या अपने-अपने काम में लगे होते, सुबू अपनी कबूतरी आंटी से बातें करती रहती—''कबूतरी आंटी! आपका बेटा स्कूल भी जाएगा न? यह लीजिए मेरा पेंसिल-बॉक्स।‘’ कहकर उसने अपना पेंसिल-बॉक्स छज्जे पर गिरा दिया। उसी दिन पापा के आने पर उसने कहा—''पापा, आज कबूतरी आंटी और उसके हसबैंड नहीं हैं। लगता है बच्चे के लिए स्कूल ढूँढने गए हैं।‘’

पापा को उत्सुकता हुई और उन्होंने झाँककर छज्जे पर देखा। तब तक कबूतर के बच्चे के लिए काफी सामान छज्जे पर जमा कर दिया गया था। न तो उसे पानी पीने में दिक्कत होती, न ही दवाइयों की दिक्कत। खेलने के लिए उसे खिलौनों की भी कोई कमी नहीं रह गई थी!

पापा ने हल्की नाराजगी दिखाई और मम्मी को बुलाकर सारा सामान दिखा दिया।

सुबू का नीचे झाँकना होता ही रहता था। थोड़ा-बहुत सामान का फेंकना भी। एक दिन उसने देखा कि कबूतर के पंख उग आए हैं और वह असली कबूतर जैसा लगने लगा है—भले ही छोटा। चुपचाप कोने में दुबके कबूतर को देखकर उसे दया आई और उसने किचन से चावल और दाल के दाने लाकर छज्जे पर गिरा दिए। पर यह क्या? वह तो खा ही नहीं रहा था। तब उसने मम्मी का सहारा लिया। कबूतर के बच्चे के न खाने का कारण पूछा।

मम्मी ने समझाया—''यह अपनी माँ से ही खाता है जैसे तुम अपनी मम्मी से खाती हो!’’

कबूतर थोड़ा और बड़ा हो गया, छज्जे पर इधर-उधर चलने भी लगा। फिर पंख फड़फ़ड़ाने और उड़ऩे भी लगा। अब वह दिनभर छज्जे के कोने में चुपचाप बैठा नहीं रहता था। यहाँ-वहाँ उड़ता था, देर से छज्जे पर आता था। सुबू ने अंदाजा लगा लिया कि अब कबूतर उसी की तरह स्कूल, बाजार, पार्क वगैरह जाने लगा है!

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