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जंग जिंदगी की / कहानी / राजन कुमार

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“पापा-पापा कोई कहानी सुनाओ न प्लीज” राजन अपने पिता से बार-बार कहता, पर पापा यह कहकर टाल देते कि बेटा मुझे कोई कहानी नहीं आती। वह मायूस होकर इस निश्चय के साथ लौट जाता कि फिर कभी भी पापा को कहानी सुनाने के लिए नहीं कहेगा।

राजन बड़ा हुआ हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी करके वह पापा के पास ही काम करने लगा। काम जमा नहीं तो उसे छोड़कर दूसरी जगह दूसरे काम पर लग गया। उसके पापा को जब भी छुट्टी मिलती तो राजन से मिलने चले आते। पापा जब घर जाते तो रात में राजन के रूम में ही ठहरते। वह खाने-पीने के शौकीन थे। वह कभी-कभार पीते भी थे।

एक दिन राजन के पिताजी ने एक लड़के को पैसे देते हुए कहा कि जाओ दारु की एक बोतल ले आओ। और तुम भी अपने लिए कुछ ले लेना। वह लड़का राजन के साथ रहता था। उसका नाम नागराज था। वह बोला- नहीं आप पैसे रखिए, मैं ला देता हूँ। पापा जबरदस्ती उसे पैसे देने लगे तो वह बोला- “राजन अच्छा लड़का है, मुझे अपना बड़ा भाई मानता है। यदि मैं बिना खाये सो जाता हूँ तो जगाकर खाना खिलाता है। जब आप यहाँ आये हैं तो मेरा भी कुछ फर्ज बनता है।” राजन के पापा अपने बेटे की तारीफ सुनकर खुशी से थोड़ा भावुक हो गए। थोड़ी देर बाद राजन से बोले- “बेटा बचपन में तुम मुझसे कहानी सुनाने के लिए कहा करते थे, पर मैं हमेशा सुनाने से मना कर देता था। आज मैं तुझे एक कहानी सुनाना चाहता हूँ।” राजन भी उत्सुकता से बोला- हाँ-हाँ सुनाइए पापा। फिर वह गंभीर होकर कहानी सुनाना शुरू किए। एक आदमी है जिसका नाम मुनीन्द्र मंडल था। मुनीन्द्र मंडल! बेटे ने अचंभित होकर कहा- यह तो आपका नाम है और कहानी में है नहीं बल्कि था रहता है। बेटे के सवाल पर उसके पापा बोले, बेटा उसका भी नाम मेरे ही नाम पर है और वह अभी जिंदा है। इसलिए ‘मैं’ एक आदमी है। फिर वह आगे सुनाना शुरु किए।

    “मुनीन्द्र बचपन में बहुत शरारतें करता। जितनी ज्यादा वो शरारतें करता, उतना ही अपने पिता काली मंडल से डरता भी। काली मंडल ? राजन ने चौंक कर कहा- काली मंडल तो आपके पिता का यानी मेरे दादा जी का नाम है और सवालिया नजरों से राजन अपने पापा की तरफ देखने लगा। पापा गंभीर होकर बोले- बेटा! जब उस आदमी का नाम मेरा नाम हो सकता है तो उसके पापा का नाम भी मेरे पापा के नाम से मिल सकता है न। अब चुपचापशांत रहकर आगे सुनो। राजन को अब समझ में आ गया कि यह मुनीन्द्र कोई और नहीं बल्कि उसके ही पिता हैं। यह कोई कहानी नहीं बल्कि आत्मकथा सुना रहे हैं। राजन

भी पिता की आत्मकथा सुनने के लिए बेचैन हो उठा। क्योंकि किसी भी बेटे को उसके पिता की आपबीती का एहसास नहीं रहता, बस इतना पता रहता है कि उसके पापा ने बड़े मुश्किल से उसे पाल-पोसकर बड़ा किया। कैसे पाला-पोसा, यह पता नही। फिर भी यह जानने का मौका राजन जाने न दिया। उसने बड़ी उत्सुकता से पूछा कि आगे क्या हुआ?

उसके पापा आगे सुनाने लगे, “मुनीन्द्र मंडल जब स्कूल जाता तो रास्ते में किसी दोस्त के यहाँ झोला और किताबें रख देता और मछली पकड़ने नदी किनारे चला जाता। जब स्कूल के छुटने का समय होता तो जो मछलियाँ हाथ लगतीं, उन्हें लेकर घर चला आता। उसके पापा को ये सब पता चलता तो वह लाठी लेकर बेटे के पीछे दौड़ पढ़ते। अगर वह पकड़ लिया जाता तो ठीक, नहीं तो रात में सोते समय ही लाठियों से उसकी मरम्मत कर देते। फिर भी शैतानी करने से वह बाज नहीं आता था। पर सहन करने की भी एक हद होती है।

उस समय कम उम्र में हीं शादियाँ हो जाती थीं। इसलिए मंडल के पिता ने, दसवीं पास करने के बाद उसकी शादी के लिए लड़की भी ढूँढ ली। रीति-रीवाज के अनुसार दूल्हे को मंडप में कुछ माँगने का अधिकार होता ही है। जब उसकी सासू माँ ने कहा कि दामाद जी, ‘का चाही, बोलीं?’ तो मंडल बेझिझक बोल पड़ा- रेडियो.... उसके पिताजी उसके पीछे ही खड़े थे हाथ में बिहारी लाठी लिए। वह लाठी मंडल की तरफ तानते हुए बोले- रेडियो चाहिए, गाना सुनेगा, फिल्मी हीरो बनेगा? बारात में आये लोगों ने उनको रोकते हुए कहा कि कम से कम आज तो उसे बख्श दो। आज उसकी शादी है, किसी तरह शांत हुए उसके पापा।

राजन ये सब सुनकर हँसने लगा और बोला, “पापा! आपका और आपके पिता का नाम इस आदमी से मिलता है तो उनकी पत्नी का नाम गायत्री देवी ही होगा? पिता बोले, हाँ-हाँ, बेटा गायत्री ही नाम होगा न। सब मेरे ही परिवार के नामों जैसे ही हैं।” फिर आगे क्या हुआ पापा?  “शादी हो जाने के बाद घर का खर्चा बढ़ गया और मंडल पढ़ाई छोड़कर पंजाब चला गया। कुछ ही दिन हुए थे उसे लुधियाना में तभी खबर आई कि उसके पिता काली मंडल नहीं रहे। मंडल फौरन वहाँ से वापस आ गया। घर पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। मंडल के पाँच भाई थे। पिता की मृत्यु के बाद सब अलग-थलग पड़ गये। अगर घर में कोई मेहमान आता तो सब डर जाते कि कौन खातिरदारी करे उनकी।

कुछ दिन बाद मुनीन्द्र मंडल बेंगलूर आ गया। वहाँ पर चार हजार की तनख्वाह पर काम करने लगा। उसी जगह एक आसाम का आदमी काम करता था। उसने कहा- मंडल भईया! चलो दूसरी जगह जहाँ मेरी जान-पहचान है। वहीं काम करेंगे, वहाँ पैसा भी ज्यादा मिलेगा और काम भी ठीक है। मंडल उसके साथ मैसूर चला गया। कुछ दिन काम करने के बाद वह अपने मालिक से बोला- मुझे यहाँ कुछ ठीक नहीं लग रहा है। मुझे पैसे दे दो मैं बेंगलूर चला जाऊँगा। उसने मात्र सौ रुपये दिए और जाने के लिए बोल दिया। मंडल अपना सामान समेटकर फिर बेंगलूर आ गया। उसके पास एक सूटकेश और लोहे का एक बक्सा था। जिसमें कुछ कपड़े और घर की बनाई कुछ खाने की चीजें थीं। मंडल एक गैलरी में काम करने लगा। रहने का कोई ठिकाना नहीं था। इसलिए सारा सामान गैलरी में ही रखकर वह किसी पार्क में सो जाता था। वहाँ का मैनेजर मंडल से बोला कि यह कोई धरमशाला है क्या कि यहाँ बक्सा और पेटी रखते हो? हटाओ यहाँ से ये सब।

“गैलरी के बगल में एक आसामी काम करता था। मंडल की उससे जान-पहचान हुई, उसने अपना सामान उसके पास रखते हुए बोला कुछ दिन आप इसे अपने पास रखिए, मैं कुछ दिन बाद ले जाऊँगा। उस आदमी ने मंडल का सामान रख लिया और कहा कि आप निश्चिंत रहिए, सामान सही जगह पर है। मंडल भी खुशी से मुस्कुराया और मन ही मन बोला- चलो काम और सामान का टेंशन खत्म। अब खाने का क्या? जेब में सिर्फ सौ रुपये ही बचे थे। शाम को सुपरवाइजर बोला कि सौ रुपये मुझे दो, मैं सुबह लौटा दूँगा और तुम्हारे लिए नाश्ता भी ला दूँगा। मंडल ने सोचा पैसे के साथ नाश्ता मुफ्त मिल जाएगा। ऐसा सोच मंडल ने उसे सौ रुपये दे दिये। अगले दिन वह सुपरवाइजर आया ही नहीं। वह पैसे लेकर अपने गाँव भाग गया। इधर वह आसामी आदमी भी सारा सामान लेकर भाग निकला। मंडल ने जिस पर विश्वास किया, वह भी दगा दे गया। अब विचारा मंडल क्या करता? शरीर पर जो कपड़ा था, वही महीनों तक पहनता फिर किसी पार्क में पानी से धोकर सुखाता और पहन लेता। खाना एक ठेलेवाले से उधार ले लेता । बीस रुपये में थोड़ा चावल मिलता। वही एक बार खाता और रात को सिर्फ पानी पीकर सो जाता।”

“उसने इतनी मुसीबतें झेलकर यहाँ अपने परिवार के लिए मेहनत किया, परिवार के किसी सदस्य से भी अपना दुःख-दर्द नहीं बाँटा। वह यह नहीं चाहता था कि उसकी मुश्किल भरी बातें सुकर उसका परिवार दुःखी हो। कहते हैं डूबते को तिनके का सहारा होता है। मंडल जहाँ काम करता था, वहीं कुछ औरतें भी साफ-सफाई का काम करती थीं। जब उन औरतों ने देखा कि उसे खाने की बड़ी समस्या है, तो वे सब उससे बोलीं कि भइया आज से एक टाइम का खाना हम सब आपको खिलाएंगे। उस दिन से सभी औरतें अपने-अपने

खाने में से थोड़ा-थोड़ा एक प्लेट में भरकर मंडल को खिलाने लगीं। कुछ दिन बाद उसे रात में भी काम मिल गया। वह वहीं काम करके सो जाता। लगभग दो साल तक यही सिलसिला चलता रहा। फिर उसके अच्छे दिन आने शुरु हो गये।”

“मंडल ने अपने बेटे को पढ़ाने के साथ-साथ अपनी तीन बेटियों की शादी भी धूम-धाम से कर दी। आज भी मंडल वहीं पर काम करता है, उन्हीं औरतों के हाथों का बना खाना खाता है। क्योंकि उन लोगों से अब भी उसे उतना ही लगाव है जितना पहले था। वे औरतें भी नियमित रूप से मंडल को खाना खिलाने के बाद ही खाती हैं। मंडल ने तय किया है कि वह उन लोगों को जिंदगी भर याद रखेगा, बड़े एहसान हैं उन लोगों के मुझ पर।”

आखिर राजन के पापा ने जब यह कबूल कर ही लिया कि मुनीन्द्र मंडल और कोई नहीं बल्कि वह खुद हैं। यह जानकर राजन की सिसकने लगा। वह सोचने लगा कि कितना दर्द है पापा के सीने में। अगर ये सब वह पहले ही किसी को बता देते तो दिल थोड़ा हल्का हो जाता। माँ-बाप अपने बच्चों के लिए कितनी तकलीफें उठाते हैं, पर बच्चे, क्या वे अपने माँ-बाप की किसी भी तकलीफ को महसूस करते हैं? नहीं, क्योंकि उनको पता ही नहीं होता कि तकलीफ किसे कहते हैं। उनको तब पता चलता है, जब खुद पर बितती है।

मुझे भी पता नहीं था कि तकलीफ क्या होती है। क्योंकि मम्मी-पापा ने कभी यह एहसास ही नहीं होने दिया। पर आज पापा की बातें सुनकर मैं बहुत उदास हुआ और खुश भी । उदास इसलिए कि बिना उफ किये पापा ने कितनी मुसीबतों का सामना किया। खुश इसलिए कि उन्होंने कभी किसी चीज की मुझे कमी नहीं होने दी। दुःख सहकर भी उन्होंने हमें सारे सुख दिए जो हमें चाहिए थे। आज से मैं यह प्रण लेता हूँ कि पापा को कभी भी तकलीफों का सामना नहीं करने दूँगा। अपने माँ-बाप को हमेशा खुश रखूँगा।

राजन कुमार

पत्र व्यवहार का पता-

राजन कुमार

ग्राम : केवटसा

पोस्ट : केवटसा, गायघाट

जिला : मुजफ्फरपुर- 847107 (बिहार)

मो. 8792759778, 9771382290

ईमेल- : rajankumar.lado143@gmail.com

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