विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

चिकित्सा समर्पण और त्याग का पेशा / डा. सूर्यकांत मिश्रा

1 जून डॉक्टर्स डे पर विशेष

चिकित्सा समर्पण और त्याग का पेशा

आजीविका चलाने के लिए मनुष्य अनेक प्रकार के सेवा के क्षेत्रों को अपना कर्म बनाता रहा है, ऐसे ही सेवा के क्षेत्र में शामिल चिकित्सकीय पेशा सबसे अलग और सबसे महत्वपूर्ण माना जा सकता है। आजीविका के साधनों में शामिल अनेक साधनों को मानवीय दृष्टिकोण से बड़ा ही संवेदनशील कहा जा सकता है। डाक्टर का पेशा भी ऐसा ही संवेदनशील पेशा है, जिसका प्रत्यक्ष संबंध मनुष्य की भावनाओं के साथ ही उसकी सांसों से जुड़ा होता है। हम चिकित्सकीय पेशे ही पवित्र मानवीय संवेदनाओं से युक्त, प्राण दान और जीवनरक्षा की दृष्टि से ईश्वर के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण कार्य मान सकते है। यह भी सत्य है कि अनेक बार डाक्टर की सेवा या उसका कार्य ईश्वर की तरह ही दिखाई पड़ता है। कारण यह कि ईश्वर द्वारा हमें जीवन देकर इस धरती पर भेज तो दिया जाता है, किंतु उसके बाद हमारे जीवन की बागडोर उम्र के हर पायदान पर डाक्टर के कंधों पर ही निर्भर होती है। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि एक डाक्टर का व्यवसाय बड़ा ही पवित्र होता है। पूर्व में इसे एक सेवा के रूप में लिया जाता था। कमाई के लिए इसे चुनना तो अब की नई सोच की कही जा सकती है।

सुबह, शाम और रात एक सामान

दुनिया भर में रोजी रोटी कमाने के अनगिनत साधन उपलब्ध है। हर साधन धन ऊपार्जन का छोटा बड़ा हिस्सा माना जा सकता है। एक बात सभी धनोपार्जन के साधन में सामान रूप से पाई जाती है और वह है काम के घंटे। फिर वह चाहे एक उद्योगपति से संबंधित हो या एक सामान्य रूप से दुकान चलाने वाले की बात हो। नौकरशाही का क्षेत्र हो, अथवा प्रशासनिक रूप से अपने-अपने कर्तव्यों की इतिश्री करने वालों का ओहदा हो। सभी एक निश्चित समय के बाद आराम तथा परिवार का साथ जरूर चाहते है। एक डाक्टर का ही पेशा ऐसा है जो ईश्वर के बनाये चौबीस घंटों में हमेशा सेवा के लिए उपलब्ध होता है। यह अलग बात है कि अब बदली परिस्थितियों में चिकित्सकों ने भी अपनी समय सारणी तय कर ली है। बावजूद इसके शासकीय अस्पतालों से लेकर निजी नर्सिंग होम में चौबीस घंटे जरूरत मंद मरीजों को अपनी सेवा देने चिकित्सक बिरादरी उपस्थित रहती ही है। रात 9-10 बजे के बाद हमें आवश्यक वस्तुओं की जरूरत पडऩे पर हमें दूसरे दिन के सबेरे का इंतजार करना पड़ता है, जबकि रात के किसी भी पहर में हमारी अथवा परिजनों अथवा आसपास पड़ोस में किसी का स्वास्थ्य खराब होने पर तुरंत चिकित्सक की सेवा प्राप्त होती है। इसे इस रूप में भी कहा जा सकता है कि एक चिकित्सक के लिए सुबह कब होती है और कब दोपहर ढलते हुए शाम तक पहुंच जाती है, फिर धीरे धीरे रात का अंधेरा कब छा जाता है, यह चिकित्सक के जीवन में कोई मायने नहीं रखता।

सुरक्षा की जरूरत महसूस की जा रही

अपने सेवा क्षेत्र के साथ सदैव मानवीय सेवा को लक्ष्य बनाने वाले चिकित्सकों को वर्तमान समय में सुरक्षा की गारंटी दी जानी चाहिए। देखा जाए तो गांव के देश भारत वर्ष में ग्रामीण क्षेत्र आज भी चिकित्सा सुविधा से वंचित ही है। ऐसी परिस्थिति में ग्रामीणों द्वारा बीमारी की दशा में अपने गांव में ही ऐसे लोगों से इलाज कराने की विवशता झेलनी पड़ रही है, जो चिकित्सा शास्त्र की प्रारंभिक शिक्षा से भी अछूते है। सर्दी, खांसी, बुखार में सामान्य रूप से इलाज कराने वाले ऐसे ही लोग खुद को चिकित्सक बताते हुए ग्रामीणों का इलाज तब तक करते है, जब तक कि वे मरणासनन न हो जाए। स्थिति दयनीय होने के बाद उन्हें शहरों अथवा जिला मुख्यालय के अस्पताल में भेज दिया जाता है। मर्ज बढ़ जाने के कारण इलाज के दौरान मौत हो जाने से बड़े अस्पतालों में सेवारत या निजी नर्सिंग होम के काबिल डाक्टरों को ग्रामीणों और अन्य लोगों के आक्रोश का शिकार होना पड़ता है। यहां तक की उन्हें जान तक की खतरा उत्पन्न हो जाता है, जबकि उनके हाथ में कुछ भी नहीं होता है, कि वे मरीज को बचाने कुछ कर सके। ऐसी स्थिति से चिकित्सकों को बचाने प्रशासनिक स्तर पर पहल अब जरूरी लगने लगी है, ताकि चिकित्सक बिना किसी भय के अपने कर्तव्य का पालन कर सकें।

मानवीय संवेदना और हमदर्दी जरूरी

हम जहां चिकित्सकों को भगवान के रूप में पाते है, वहीं कुछ ऐसे भी चिकित्सकों की कमी नहीं, जो धनोपार्जन की भूख को कम नहीं कर पा रहे है। ऐसे ही लोगों से यह सेवा बदनाम होने लगी है। मरीजों को भय दिखाकर अवैध रूप से मोटी रकम वसूलना और संवेदनाओं को कोई महत्व न देने वाले ऐसे चिकित्सकों के वर्ग से ही समर्पण भाव वाले चिकित्सक आहत होते रहे हैं। अब बड़े शहरों से लेकर छोटे छोटे शहरों में ऐसे मामले सामने आने लगे है, जिनमें डाक्टर अथवा अस्पताल का शुल्क न देने पर शव को ही रोक लिया जाता है। यह एक ऐसा बर्ताव है, जो मानवीय संवेदना और हमदर्दी का गला ही घोंट कर रख देता है। चिकित्सक के व्यवसाय में मानवीय संवेदनाओं का अलग स्थान है। रोगी को दवा के साथ साथ दुलार एवं स्नेह ही भी जरूरत होती है। हमदर्दी का संबंध मन और हृदय से होता है। जब हृदय को उचित खुराक मिलती है, तो शरीर जल्द ही स्वस्थता की ओर बढऩे लगता है। धन के साथ धर्म का अनुसरण करते हुए एक चिकित्सक अपने रोगी की बेहतर सेवा कर सकता है। यह पूरे विश्वास से कहा जा सकता है कि जिस दिन से चिकित्सक मानवीय संवेदना को अपने पेशे में शामिल कर लेंगे उनका मान सम्मान ईश्वर से भी अधिक होने लगेगा।

पेशे को लेकर बढ़ रही चिंता

पश्चिम बंगाल के द्वितीय मुख्यमंत्री डा. बिधान चंद्र राय जिनके पुण्य स्मरण में डाक्टर्स दिवस मनाया जाता है, उनकी डाक्टर छवि को धूमिल करने वाले कुछ चिकित्सकों की कार्यप्रणाली से आज के वरिष्ठ और समर्पित चिकित्सकों की चिंताएं बढऩे लगी है। एक चिकित्सक का कहना है कि डाक्टर होना सिर्फ एक काम नहीं बल्कि चुनौतीपूर्ण वचनबद्धता है। उनका यह भी कहना है कि युवा डाक्टर्स को डाक्टर बिधानचंद्र राय की तरह जवाबदारी पूरी करते हुए डाक्टर होने पर गर्व का अनुभव करना चाहिए। एक अन्य चिकित्सक का यह भी मानना है कि डाक्टर्स दिवस एक आयेाजन मात्र नहीं, यह विचार करने का दिन है, कि हम अन्य सामान्य लोगों के जीवन में क्या महत्व रखते हैं। वर्तमान में चिकित्सक पुराने सम्मान को प्राप्त करने संघर्ष करते दिख रहे हैं। कारण यह कि दूषित समय में समर्पण भावना कहीं न कहीं कम हुई है। चिकित्सकीय पेशे में ईमानदारी का वहन चिकित्सकों का एक वर्ग विशेष ही कर पा रहा है। इस बात को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है कि चिकित्सक की एक छोटी सी भूल भी रोगी की जान ले सकती है। इस बात को युवा चिकित्सकों को नहीं भूलना चाहिए कि जब वे अपने चिकित्सकीय जीवन की शुरूआत करते है, तो उनके मन में नैतिकता और जरूरतमंदों की मदद का जज्बा होता है, जिसकी वे प्रतिज्ञा लेते है। बावजूद इसके कुछ लोग पथ भ्रमित होकर अनैतिकता की राह पर चलते हुए पूरे चिकित्सा जगत को बदनामी की राह में झोंक देते है। डाक्टर्स डे चिकित्सकों के लिए एक मौका लेकर आता है कि वे अपने अंतर्मन में झांके, अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को पहचाने, और इतना महान सेवा कार्य को भगवान के प्रतिनिधि रूप में वह स्थान दिलाए जो ईश्वर का होता है। मैं अपने इस लेख के माध्यम से चिकित्सकों को कोई नसीहत देने का मंसूबा न रखते हुए पूरे आदर सम्मान के साथ सभी चिकित्सकों को हार्दिक शुभकामनाएं देना चाहता हूं।

प्रस्तुतकर्ता

(डा. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

मो. नंबर 94255-59291

रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget