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''राजगिरी'' सिखाने की कोचिंग क्लास / व्यंग्य / अशोक जैन पोरवाल

 

स्टुडेंट :- सर 'राजगिरी' किसे कहते हैं ?......इसकी उत्पत्ति कैसे हुई है ?

सर :- स्टुडेंटों, आपने 'राजगिरे' का नाम तो सुना ही होगा ?.....अरे वही अनाज जिसके लड्डू गरीब लोग बड़े ही शान से खाते हैं और अपना पेट भरते हैं। जबकि 'राजगिरी' में अपने निजी स्वाथरें.....अपनी महत्वाकांक्षाओं का पेट भरा जाता है। राजगिरी की उत्पत्ति 'राजनीती' और 'नेतागिरी' इन दोनों के अण्डों रूपी 'अवगुणों' एवं शुक्राणु रूपी 'सत्ता' के मिलन से हुई है।

स्टुडेंट :- सर, राजगिरी में प्रवेश के लिये व्यक्ति में क्या-क्या योग्यताएं (गुण) होनी चाहिये ?

सर :- छात्रों इस में प्रवेश पाने के लिये किसी शैक्षणिक योग्यता की आवश्यकता नहीं पड़ती है। यानिकि अनपढ़ व्यक्ति भी इसमें प्रवेश ले सकता है। जो व्यक्ति जितना 'डफर' समझो, वो 'राजगिरी' में उतना ही 'परफैक्ट'। कहा भी गया है, कि जो व्यक्ति अपने जीवन में कुछ भी नहीं कर सकता है, वो व्यक्ति 'राजगिरी' में पूर्णतः सफल हो सकता है।

स्टुडेंट :- सर, 'राजगिरी' का कोर्स क्या होता है ? इसमें क्या-क्या सिखाया जाता है ?

सर :- प्रिय 'राजगिरीयों, इस का कोर्स करने के लिये छात्रों को प्रतिदिन हमारी कोचिंग-क्लास में 108 उचित-अनुचित सीखों के मोतियों की माला से जाप करवाया जाता है। साथ ही छात्रों को 'राजगिरी' सिखाने के लिये......उन्हें सरल शब्दों में समझाने के लिये हमने कहावतों.....मुहावरों......लोकोक्तियों.....कथनों आदि का भी सहारा लिया है। जिसमें से कुछ प्रमुख सीखें निम्नानुसार हैं :-

-- ''सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली'' वाली स्टाईल में ''मुँह में राम बगल में छुरी लेकर'' चलना सिखाया जाता है।

-- ''गिरगिट की तरह रंग बदलना'' से भी अधिक फूर्ती के साथ अपने चेहरे पर ''मुखौटे पे मुखौटे'' लगाकर अपना शरीर ही नहीं बल्कि अपनी आत्मा तक को बदलने का अभ्यास भी करवाया जाता है।

-- ''खरबूजे को देखकर खरबूजे की तरह रंग बदलना'' वाली स्टाईल में कुर्सी को देखकर कुर्सी (पार्टी) बदलना भी बतलाया जाता है।

-- कभी ''बगुला-भगत'' तो कभी ''रंगा हुआ सियार'' बनना भी सिखाया जाता है।

-- ''चोर-चोर मौसेरे भाई'' की तरह आपस में मिल-जुल कर रहते हुए 'कभी चोर तो कभी सिपाही' बनने का खेल भी खिलाया जाता है।

-- कभी ''थूक कर चाटना'' पड़ता है।तो कभी ''कुत्ते की तरह दुम हिलाना'' भी पड़ती है। कभी-कभी ''भीगी-बिल्ली'' भी बनना पड़ता है।

-- वक्त आने पर जनता के बीच से कभी ''नौ-दो ग्यारह'' भी होना पड़ता है। तो कभी अपनी पार्टी में अपना शक्ति प्रदर्शन करते हुए ''दो और दो पाँच'' भी होना पड़ता है।

-- 'राजगिरी करना' प्रत्येक व्यक्ति के बस की बात नहीं होती है, क्योंकि यह एक ''टेढ़ी-खीर'' होती है। इसमें कभी-कभी ''लौहे के चने'' भी चबाना पड़ सकता है। तो कभी ''पापड़ पे पापड़ बैलना'' भी पड़ सकता है।

-- वक्त आने पर ''गधे को भी अपना बाप बनाना'' पड़ता है। तो कभी स्वयं बन्दर बनकर ''बन्दर-बाट'' भी करनी पड़ती है। कई बार गाँधी जी के तीनों बन्दरों की तरह भी रहना पड़ सकता है।

-- मतदाताओं के सामने कभी 'नौटंकी'.....तो कभी 'कॉमेडी' करते हुए जितनी साँसें लेते हैं उससे कहीं अधिक वादे भी करने पड़ सकते हैं। अतः राजगिरी करने वालों को हमेशा ''सफेद झूठ'' बोलना भी आना चाहिये। उनके द्वारा कही गई कोई भी बात यदि लोगों को पसंद नहीं आये तो उसे तुरंत ही खण्डन करने की कला भी आनी चाहिये। अगर आपका मन किसी व्यक्ति की बुराई करना चाहें तो उसकी तारीफ करना पड़ती है।....अगर मन से किसी व्यक्ति से दुश्मनी है तो उससे दोस्त जैसा व्यवहार करना पड़ता है। यानिकि उल्टा बोलना पड़ता है। अथवा करना पड़ता है।

-- नैतिकता, इंसानियत, शिष्टाचार, ईमानदारी आदि भावनात्मक पाठों को यदि गल्ती से भी आपने पढ़ा हो तो उसे ताक में रख देना पहली शर्त होती है, राजगिरी सीखने के लिये।

-- सामने वाले की ''पीठ में छुरा मारना''.....टांग खींच कर पल्टी देना.....अपने खून के रिश्तों को भुलाना अथवा उनकी हत्या करना भी बतलाया जाता है।

-- अपने आला-कमानों की स्टाईल में एक तोते की तरह हमेशा रटे-रटाये डॉयलोग बोलना भी सिखलाया जाता है।

उपरोक्त सीखों के अतिरिक्त शेष रही सीखों को हमारे इस क्लास में एडमिशन लेने के बाद ही बतलाया जाता है।

 

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संपर्क:

अशोक जैन 'पोरवाल' ई-8/298 आश्रय अपार्टमेंट त्रिलोचन-सिंह नगर
(त्रिलंगा/शाहपुरा) भोपाल-462039 (मो.) 09098379074 (दूरभाष) (नि.) (0755) 4076446

साहित्यिक परिचय इस लिंक पर देखें - http://www.rachanakar.org/2016/07/blog-post_59.html

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