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भूख / व्यंग्य / अशोक जैन पोरवाल

(व्यंग्य)

(आलीशान एवं प्रसिद्ध एक कान्वेंट स्कूल के हिन्दी भाषा के एक शिक्षक ने मजबूरी ने छात्र को हिन्दी भाषा में 'भूख' विषय पर निबंध लिखने को कहा। इसके लिये छात्र को अपने परिवार में से किसी एक सदस्य से अपने मोबाइल फोन पर सिर्फ दो मिनट में पूछकर उक्त निबंध तैयार कर लिखने की छूट दे रखी थी। छात्र को 'भूख' के संबंध में कुछ भूखी (असंवेदनशील) आश्चर्यजनक जानकारियां मिली। कहीं आपभी तो वैसी भूखों से पीड़ित नहीं हैं?)

वो 'फाईव-स्टार' जैसी हैसियत रखने वाला एक आलीशान एवं देश-प्रसिद्ध कान्वेंट स्कूल था। जिसमें 'क्लास-रूम'से लेकर 'इनडोर-गैम्स' तक....'स्वीमिंग' से लेकर घुड़सवारी तक....'डे'-वोडिंग'से लेकर 'नाईट होस्टल' तक सभी गतिविधियों के लिये अलग-अलग विशेष स्थानआदि.....आधुनिक उच्च-तकनीकों की सुख-सुविधाओं सहित नियुक्त था।

विदेशी अंग्रेजी भाषा जो कि उस स्कूल की देशी मातृभाषा थी। वहां अभी तक कई अन्य दूसरी विदेशी भाषाओं का अध्ययन भी छात्रों को कराया जाता था,देशी एवं गरीब हिन्दी भाषा को छोड़कर। चूंकि वह स्कूल भारतवर्ष में था। इसलिये यहां कि शिक्षा नीतियों के नियमों के अनुसार स्कूल में हिन्दी भाषा पढ़ाना भी अनिवार्य था। अतः मजबूरी में अब स्कूल प्रबंधक को अपनी एवं छात्रों की सुविधानुसार अनिवार्य द्वितीय भाषा....तृतीय भाषा के रूप में छात्रों को पढ़ाना शुरू करवाना पड़ा था।

जाहिर सी बात है। इतने महंगे स्कूल में 'मेंगो-मेन' (आम-आदमी) के बच्चे तो पढ़ने से रहे। वहां तो सिर्फ इंपोटेड 'एप्पिल-मेन'....'लीची-मेन'.....'किवी-वुमेन'...यानिकि बड़े-बड़े उद्योगपतियों, नेताओं, अफसरों और ठेकेदारों के बच्चे ही पढ़ सकते हैं। जिन्हें कि ये भी पता न होता था कि 'भूख' क्या होती है ? क्योंकि उनका पेट तो भूख लगने से पहले ही भर दिया जाता है।

14 सितम्बर हिन्दी दिवस के अवसर पर स्कूल में एक हिन्दी शिक्षक ने कक्षा 5वी के अपने छात्रों को हिन्दी भाषा में 'भूख' विषय पर निबंध लिखने को कहा। चूंकि शिक्षक को पता था, कि छात्रों के लिये यह एक बड़ा ही कठिन कार्य होगा। इसलिये उन्होंने छात्रों को यह सुविधा दे दी थी, कि वे अपने-अपने अभिभावकों...परिवार के सदस्यों में से किसी एक से मोबाइल फोन पर सिर्फ दो मिनट में 'भूख' के संबंध में पूछ सकते हैं। तत्पश्चात सभी नौ छात्रों को मिलकर 90 मिनट (डेढ़ घंटे) में उक्त निबंध एक प्रोजक्ट वर्क के रूप में तैयार कर लिखकर दिखलाना होगा।

सभी नौ छात्रों ने क्रमशः एक के बाद एक दो मिनट की सीमावधि के अंदर अपने-अपने परिवार के सदस्यों में से किसी एक से 'भूख' के संबंध में....साथ ही उनकी सर्वाधिक प्रिय एक 'भूख' के बारे में पूछना शुरू कर दिया। तत्पश्चात छात्रों को निम्नानुसार रोचक एवं चौकाने वाली जानकारियां मिली।

''मेरी सर्वाधिक प्रिय एकमात्र 'भूख', एक प्रसिद्ध कहावत के अनुसार, 'दो पैसों का फायदा हो'अथवा 'दो पैसे कमाना'। इसी 'भूख' के कारण आज मैं इतनी फैक्ट्रिया खोल पाया हूँ'':- एक उद्योगपति पिता ने अपने बेटे से कहा।

''बेटा, मुझे तो बड़ी जोर से भूख तभी लगती है, जबकि केन्द्र अथवा राज्य सरकारों द्वारा सूखा-पीड़ितों....बाढ़-पीड़ियों...दंगा-पीड़ितों की मदद के लिये मेरे विभाग को धन-राशि आवंटित होती है और मिलती है।वैसे मेरी सर्वाधिक प्रिक एक मात्र 'भूख' है, किसी भी तरह फलां कुर्सी (पद) पाना'':- एक नेता पिताने अपने पुत्र से कहा।

''माई डियर सन, माई मोस्ट लवली हंग्री (भूख) इज ऑनली फॉर माई बिग प्रमोशन.... आई डोन्ट नो एनी अदर स्मॉल हंग्री'':- एक ऑफिसर डेड ने अपने 'सन'को बतलाया।

''मेरी भूख तो मेरे देश से भी महान है।मेरा बस चले तो मैं अपने देश में बनने वाली सभी नहरों....बांधों...तलाबों....पुलो को पूरे का पूरा निगल जाउं और डकार तक न लूं'':- एक ठेकेदार पापा अपने पुत्तर से बोला।

''बेटा मेरी तो पूरी जिंदगी में शुरू से ही एक मात्र भूख रही थी कि मैं अपने देश के दुश्मन को मार गिराऊं। इसलिये मैंने सेना में लेफ्टिनेंट कर्नलकी नौकरी करते हुए एसा किया भी। फिर मैंने तुम्हारे पिता को भी एक सैनिक ऑफिसर बनाकर देश की सीमा पर शहीद कर दिया। बस अब मैं किसी दूसरी भूख के बारे में नहीं जानता'':- एक रिटायर्ड कर्नल दादा जी ने अपने पोते से कहा।

''बेटा, मेरी सर्वाधिक प्रिय 'भूख' है, महंगी से महंगी साड़ियां....गहनों...विदेशी कीमती चीजों को खरीदना और किटी आदि पार्टीयों में जाकर उसका प्रदर्शन करना। ताकि मैं भी वहां दूसरी महिलाओं को नीचा दिखा सकूं।'':- एक हाउस वाईफ मम्मी अपने बेटे से बोली।

''मेरे प्यारे भतीजे, मैं तुझे उस 'भूख' के बारे में कैसे बता सकती हूँ ? क्योंकि तू अभी बहुत ही छोटा है और फिर धीमे सी बड़-बड़ाने लगी, 'अपने ऑफिस सहित हर जगह मौजूद

'भूखे-भेड़ियों' की वासना भरी आंखों से घूरते रहते मेरे तन को....'':-नौकरीशुदा जवान एक अविवाहित बुआ जी ने अपने भतीजे से कहा।

''मुझे सबसे अधिक भूख है तो सिर्फ अपने कैरियर बनाने की...अपने नाम की....सिने-जगत में स्थापित होने की'':-एक संघर्षशील गायिका एवं संगीतकार बड़ी दीदी अपने छोटे भाई से बोली।

''बेटा अब तो मुझे किसी प्रकार की कोई भूख ही नहीं है। क्योंकि न अब तो मैं कुछ खा पाती हूँ और न ही पचा पाती हूँ। अब तो बस भगवान के पास जाने की ही एक मात्र भूख बची है, मेरी'':- अत्यधिक वृद्ध दादी माँ अपने पोते को समझाते हुए कहने लगी।

उपरोक्त तथ्यों के आधार पर सभी नौ छात्रों ने अपना-अपना 'भूख' पर निबंध लिखकर हिन्दी शिक्षक को दे दिया और क्लासरूम से निकलकर कैंटीन में कुछ खाने के लिये पहुंच गये।

कैंटीन में लगे टी.वी. पर एक समाचार चैनल पर समाचार दिखलाये जा रहे थे,''फलां प्रदेश में लगभग आधे से ज्यादा छोटे-छोटे गांवों में पड़े भयानक सूखे के कारण वहां अकाल जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है। पीड़ितों को राज्य सरकार द्वारा दी जाने वाली भोजन सामग्रियों के अभाव के कारण पिछले एक माह में 'भूख' से मरने वाले लोगों की संख्या सौ से ऊपर एवं मवेशियों की हजार से ऊपर पहुंच गई है'':- उक्त समाचार देख सुनकर सभी छात्र आश्चर्य में पड़ गये और सोचने लगे कि 'भूख' से मौत भी हो सकती है ?

इसी बीच स्कूल में पुताई का काम करवाने वाले एक ठेकेदार के ग्रुप में एक 10 - 12 साल का लड़का पुताई कर रहा था। अचानक चक्कर खाकर वह गिर गया। उस लड़के के दूसरे साथी ने जल्दी से उसे उठाकर पानी पिलाया। और फिर कुछ क्षणों पश्चात एक रोटी के टुकड़े करते हुए उसे धीरे-धीरे खिलाने लगा। रोटी खाने के बाद वह लड़का बोला, ''पैसे न होने के कारण दो दिन से मैं कुछ खा नहीं पाया था...आज काम मिला है। सोचा शाम को मजदूरी मिलने के बाद रोटी खा लूंगा। 'भूख' के कारण मुझे चक्कर आ गये थे। अब ठीक हूँ'':- कहते हुए वो लड़का पुनः पुताई करने लगा।

पेट की 'भूख' के संबंध में उस लड़के की दयनीय स्थिति को देखकर उन सभी नौ छात्रों को भूख के बारे में अब तक बहुत कुछ समझ में आने लगा था। उन्हें यह आभास भी हो चुका था कि भूख पर भूखा (असंवेदनशील एवं झूठा) निबंध लिखकर अपने टीचर को दिया है। उन्हें हिन्दी टीचर की पूर्व में कही गई बातें भी याद आने लगी थी, कि '' हमेशा ए.सी. में रहने वाले....दिन भर फ्री टाईम में जानवरों की तरह हमेशा खाते रहने वाले क्या जाने कि 'भूख' क्या होती ?''

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अशोक जैन 'पोरवाल' ई-8/298 आश्रय अपार्टमेंट त्रिलोचन-सिंह नगर
(त्रिलंगा/शाहपुरा) भोपाल-462039 (मो.) 09098379074 (दूरभाष) (नि.) (0755) 4076446

साहित्यिक परिचय इस लिंक पर देखें - http://www.rachanakar.org/2016/07/blog-post_59.html

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