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रचना समय - अप्रैल - मई 2016 / सैलाब / कहानी / अंजली काजल

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अंजली काजल सैलाब पम्मी ने चार उंगलियाँ आटे में डालीं, थोड़ा आटा हथेली पर रखा और मसलकर उसका गोला बनाया। उस गोले को चकले पर रखकर चार उंगलिय...

अंजली काजल

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सैलाब

पम्मी ने चार उंगलियाँ आटे में डालीं, थोड़ा आटा हथेली पर रखा और मसलकर उसका गोला बनाया। उस गोले को चकले पर रखकर चार उंगलियों से दबाया। रोटी बेलने से पहले ही उसके हाथ रुक गए। अंदर हौल सा उठा। वो रसोई से बाहर आई और छत की सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। पहली मंज़िल पर आने के बाद और ऊपर जाने के लिए अगली सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। फिर बनेरे पर खड़ी हो गई। उसने एक बार नीचे देखा। वो अपने आपको तैयार कर रही थी। उसकी सांस तेज़ थी। उसके हाथ पैर कांपने लगे। वो चुपचाप खड़ी रही। कुछ पल और खड़े रहने के बाद वो वापस मुड़ी और सीढ़ियाँ उतरकर नीचे रसोई में आ गई। उसने जो आटे का गोला बनाया था, उसकी रोटी बेलने लगी।

प्रोफेसर नहाकर बाहर निकल आया था। पम्मी ने घड़ी में टाइम देखा। तकरीबन दस बजे प्रोफेसर घर से कॉलेज के लिए निकलता है। अब से ठीक एक घंटे बाद। उसने चकले पर रखी रोटी को फिरसे इकट्ठा किया और फिर से गोला बनाने लगी। वो भूल गई थी वो तो हाथ पर ही बनाई रोटी खाता है। उसने चकला हटा दिया और पानी लगाकर पनियाली रोटी बनाने लगी।

‘‘तेल फिर चोखा डाल दिया सब्ज़ी में। हर चीज़ ज्यादा ही पड़ती है तुमसे।’’

जाने से पहले उसने उसे पकड़कर इस तरह चूमा कि पम्मी की साँस रुकने को हुई। दरवाज़े के पास जाकर उसने आवाज़ लगाई, ‘‘गेट बंद करलो।’’

उसने गेट बंद किया और कुछ देर वहीं खड़ी देखती रही। फिर अपना मुँह धोने चली गई। वो कमरे में वापस आई और कम्प्युटर चला दिया। अपना मेलबॉक्स खोला। एक मेल था कबीर का।

‘‘स्टैंड अगेन्स्ट यूअर फियर!’’

वो हिचकियों में रोती है। वो चीख़ना चाहती है! पर वो हिचकियों में रोती है।

2

उसे बचपन जब भी याद आता तो घर की छत से दिखती, खेतों में खड़ी पेड़ों की कतार याद आती। वो छत पर खड़ी घंटों उन पेड़ों को देखती। उससे भी पहले का बचपन वो याद करती है तो उसे पिता याद आते, उसे बाहों में झुलाते, कभी कंधों पर बिठाकर नचाते। वही एक अपना सा स्पर्श किसी पुरुष का उसे याद है। ऐसा स्पर्श जिसे वो कभी नहीं भूल पाई। ऐसा स्पर्श जिसे उसने कम उम्र में ही खो दिया। क्या पुरुष में एक पिता की तलाश उसे भटकाती रही

बड़ी होते-होते उसने अपने आपको धीरे-धीरे एक जिस्म में बदलते देखा। उसके आस पास हर कोई दो जोड़ी आँखों में बदल गया था। वो कितना भी कोशिश करती जिस्म को छुपाने की, कहीं न कहीं से वो दिख ही जाता। एक दिन नहाते हुए उसने महसूस किया दो जोड़ी आँखें उसे छुपकर ताड़ रही थी। वो सड़क पर चलती तो ताड़ती आँखों की वजह से उसके पैर उखड़ने लगते। वो एक तरफ दुपट्टा संभालती, वो दूसरी तरफ से खिसक जाता। घर के अंदर इतनी बेचैनी होती कि वो छत पर जाकर दूर पेड़ों की कतारों को देर तक देखना चाहती, बचपन की तरह, आँखें वहाँ भी पहुँच जातीं। लोग अपना जिस्म उघाड़कर उसके अंदर दहशत भर देते। वो नहीं जानती थी वो इस जिस्म से कैसे छुटकारा पाए। वो इतना तंग आ चुकी थी, कई बार वो जिस्म को उतार फेंकना चाहती।

माँ भी अब बदल गई थी। वो शीशे के सामने खड़ी होती तो माँ उसे घूरने लगती। वो बनेरे पर खड़ी होती तो माँ की त्यौरियां चढ़ जाती। वो भाई की तरह बाहर खेलने जाती, माँ उसे जल्दी बुला लेती। राह चलते कोई उसे घूरता तो माँ उसे डांटने लगती। कोई लड़का रिश्तेदार आता तो माँ का डाँटना और बढ़ जाता। आखिर माँ को हुआ क्या था उसे माँ पर बेहद गुस्सा आता। वो खुलकर बात करने की बजाय उसे बुरी तरह उलझन में डाले रखती। आज वो सोचती है माँ की तमाम वर्जनाओं के बावजूद, क्या माँ उसे बचा पाई जिस भेड़िये से वो उसे बचाना चाहती थी, उस भेड़िये के बारे में क्यों नहीं बताया कुछ आखिर माँ ने भी वही किया जो उसकी माँ ने उसके साथ किया था!

उसकी अल्मारी से अचानक सारी स्कर्ट गायब हो गईं। कपड़ों में स्कर्ट उसे सबसे ज्यादा पसंद थी। स्कर्ट की जगह अब सलवार कमीज़ों ने ले ली थी। सलवार कमीज़ से उसे कोई दिक्कत नहीं थी पर दुपट्टा उसे परेशान करता। जब तक वो सलवार सूट नहीं पहनती थी उसे दुपट्टे की कोई जरूरत नहीं थी पर अब दुपट्टा उसके साथ चिपका रहता।

उन दिनों उसके पास बहुत सारे सवाल थे पर जवाब देने वाला कोई न था। मन उलझी गुत्थियों को सुलझाने में नाकाम था। अपने शरीर को वो नहीं जानती थी। उसे हर तरह से इसे जानने से बचाया जा रहा था। शरीर के बारे में बात करना गुनाह था, सवाल करना और भी बड़ा गुनाह। एक तरफ शरीर का नाम भी लेना गुनाह था और दूसरी तरफ उसके आस पास कोई पुरुष घात लगाए बैठा रहता।

वो चौदह साल की थी। वो अपने एक रिश्तेदार की शादी में गई थी। वो उसे बार-बार देखता था। जहाँ भी भीड़ होती वो उसके करीब आने की कोशिश करता और एक बार उसने उसका हाथ कसके पकड़ भी लिया था। वो उससे कई साल बड़ा था। वो अकेले होने से बच रही थी। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था उसे क्या करना चाहिए। माँ को बताएगी तो माँ और डांटेगी। रात में वो अपनी चाचा की बेटियों के साथ ही सोई थी। बहुत से लोग एक कमरे में सोये थे।

उसे नहीं पता वो रात का कौन सा समय था जब उसे किसी ने कसकर पकड़ा था। वो उसका चेहरा स्पष्ट नहीं देख पा रही थी। अंधेरे में कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। उसने हाथ से टटोलना चाहा उसके साथ कोई नहीं था। उसने उसका मुँह हाथों से दबा रखा था। उस काली रात के बाद उसके अंदर कुछ मर गया था।

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उसने अपनी और कबीर की पुरानी चैट को पढ़ना शुरू किया। वो अक्सर ऐसा करती। उनकी पुरानी चैट को उसने कभी डीलीट नहीं किया। चैट करते हुए उस दिन पम्मी ने सब कुछ खोलकर रख दिया था अपने अतीत और वर्तमान का।

कबीर- तुम कैसे मिली इस आदमी को?

पम्मी- मैं इसके पास ट्यूशन पढ़ने जाती थी। मैंने वो बैच देर से जॉइन किया था। वो मुझे इतवार को भी बुलाने लगा ताकि पीछे छूटा सिलेबस कवर किया जा सके। वो अकेला रहता था। मैं जाती तो और कोई नहीं होता था। धीरे धीरे वो मुझसे बातें करने लगा। वो अपना सब काम खुद करता था। खाना भी खुद बनाता था। बातों बातों में मैं अपने मन की सारी बातें उससे करने लगी। उसने बहुत हमदर्दी दिखाई और मैं पिघल गई। मेरे अंदर जो बचपन से जमा हुआ था मैंने सब कह सुनाया। मैंने उसे बताया किस तरह से मैं बचपन से पुरुषों का शिकार होती आई जिसमें मेरे घर का एक पुरुष भी था जो मेरा चाचा था। मैंने तब-तक किसी से ये बातें नहीं कही थीं। मेरे अंदर बहुत सा ज़हर इकट्ठा हो चुका था। पता नहीं क्यों मैंने इतना विश्वास किया उस पर मुझे अपने आपसे एक अजीब तरह की नफरत हो गई थी। मुझे लगता था जो कुछ मेरे साथ हुआ उसके लिए मैं भी जिम्मेदार थी क्योंकि मैंने कभी जो हो रहा था उसके खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई। हालाँकि मेरे किसी से कुछ ना कहने का कारण मेरा डर था। कोई आस-पास इतना अपना नहीं लगता था कि बता सकूँ मेरे साथ क्या हो रहा है। मैं अंदर ही अंदर अपने आपको अपवित्र समझने लगी।

कबीर- क्या तुम उससे प्रेम करने लगी थी?

पम्मी- नहीं वो प्रेम नहीं था। मेरे जीवन में अकेलापन था। जीवन में कोई भावनात्मक सहारा चाहती थी। उसने हमदर्दी दिखाई और मैं बिखर गई।

कबीर- तुम दोनों की उम्र में कितना फर्क है?

पम्मी- उसकी सही उम्र मैं कभी नहीं जान पाई। वो मुझे दस साल ज्यादा बताता था पर मुझे लगता है इससे कहीं ज्यादा था।

कबीर- तुम कबसे उसके साथ रहने लगी?

पम्मी- मैं उन्नीस साल की हो चुकी थी जब मैं अपना घर छोड़कर भाग आई थी।

कबीर- उसने तुम्हें कभी नहीं बताया था कि उसकी पहली बीवी है?

पम्मी- बताया पर इतना ही कि उनका तलाक हो गया है।

कबीर- तुम लोगों ने शादी की है?

पम्मी- नहीं।

कबीर- उसपर इतना यकीन करने का कारण?

पम्मी- मुझे नहीं पता।

कबीर- क्यों नहीं पता?

पम्मी- नहीं जानती।

कबीर- तुम उसके साथ सब-कुछ छोड़कर चली आई और तुम्हें नहीं पता क्यों?

पम्मी- .....

कबीर- तुम जवाब नहीं दे रही हो

पम्मी- दे रही हूँ। मैं कैसे कहूँ समझ नहीं पा रही। तुम समझ सकोगे

कबीर- कहो, मैं समझ रहा हूँ।

पम्मी- तुम्हें पता है मैं सब कुछ छोड़कर उसके पास क्यों चली आई क्योंकि हम लोगों के बीच शारीरिक संबंध हो गए थे और इसी वजह से मुझे लगता था मुझे उससे शादी कर लेनी चाहिए।

कबीर- तुमने उसे अपना इस्तेमाल क्यों करने दिया?

पम्मी- ये आधा सच है।

कबीर- बाकी आधा सच क्या है

पम्मी- तुम नहीं समझ सकते। तुम भी तो पुरुष ही हो।

कबीर- मैं पुरुष हूँ पर एक घटिया पशु नहीं हूँ।

पम्मी- हर पुरुष घटिया पशु बनने की संभावना लिए होता है।

कबीर- हाँ पर ये उसके बस में होता है कि वो घटिया पशु न बनके इंसान बना रहे।

4

वो अपने घर से निकली तो उसे मर गया मान लिया गया। उस घर की यही परंपरा थी।

प्रोफेसर ने उसे पढ़ने से नहीं रोका पर शर्त थी वो घर पर ही पढ़े। वो पढ़ाई में उसकी मदद करता। उसे नोट्स लाकर दे दिये जाते। उसने ग्राजुएशन करने के बाद सोशल वर्क में आगे की पढ़ाई करने की इच्छा जताई। उसने कॉलेज में दाखिला लेने की बात की, पर इस कोर्स के लिए किसी दूसरे शहर जाना पड़ता। वो तैयार ना हुआ। वो अक्सर कहता,

‘तुम्हें क्या चाहिए तुम कहो तो क्लासरूम को घर पर ला दूँ’।

घुटन ज़िंदगी में ज़्यादा थी या चारदीवारी के भीतर कहना मुश्किल था। पम्मी घर पर पढ़ाई करती। कुछ और था भी नहीं करने को। अतीत के सारे दरवाजे उसके लिए बंद हो गए थे और खिड़की भर थी उसकी सहेली नैना। वो उससे अभी भी जुड़ी थी। मिलना कम होता पर अक्सर फोन पर बात हो जाती।

नैना उसके साथ कॉलेज में पढ़ी थी। नैना संस्कारों के महल में एक चोर दरवाजे जैसी थी। उसी की तरह एक मध्यवर्गीय परिवार की लड़की। हर सोमवार को अच्छे पति की कामना में व्रत रखती। उसका धार्मिक होना उसके बाकी के व्यक्तित्व से मेल नहीं खाता था। अपने परिवार से हर तरह लड़ने के बाद, हारकर उसने अपनी सब उम्मीदें अपने होने वाले पति को लेकर पाल ली थीं।

जब वो स्कूल में थी, उसे एक लड़के से प्रेम जैसा कुछ हुआ था। उसके परिवार वालों ने उस लड़के को बहुत पीटा था और खुद उसे एक कमरे में बीस दिन तक बंद रखा गया। बीस दिन के बाद जब वो उस कमरे से बाहर आई, वो एक बदली हुई लड़की थी। वो जितनी उदास होती उतनी ही ज़ोर से हँसती। उसे लगा इस दुनिया के साथ उसका रिश्ता खत्म होता जा रहा है। दूसरा, उसने मान लिया, जिस दिन वो इस घर से निकलेगी वही दिन उसकी आज़ादी का दिन होगा।

‘‘तू मर जा’’ नैना अक्सर कहती! वो ऐसा कहती जब उसे किसी पर प्यार या गुस्सा आता। घर के संस्कार उसे जितना एक लड़की की तरह रहने का उपदेश देते, पर उसका विद्रोह करने का मन होता। इसीलिए अक्सर उसपर पाबंदियाँ लगी रहतीं। शहर में अगर सनातन धर्म और दयानन्द विध्यालय छाप लड़कियों के स्कूल और कॉलेज नहीं होते तो शायद उसे बाहर पढ़ने भी न भेजा जाता। घर से कॉलेज और कॉलेज से घर के इलावा उसे कहीं और जाने की इजाज़त थी तो सिर्फ मंदिर। सो वो लगभग रोज़ ही मंदिर जाती। घर वालों के लिए वो पराया धन थी और उस पराए धन के लिए एक मालिक ढूंढा जा रहा था। देर थी तो उसके लिए अच्छे ख़ासे दहेज जितने पैसे जुटाने की।

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नैना और पम्मी को वो दिन याद है जिस दिन दोनों भले घर की लड़कियों ने कॉलेज ना जाकर शहर घूमने का तय किया। ये तरकीब नैना की ही सोची हुई थी।

उनको एक अच्छा, मौज-मस्ती वाला दिन गुज़ारने के लिए पैसे की नहीं, आज़ादी की दरकार थी। पाँच रुपये का खूब सारी हरी-लाल मिर्च, धनिया, प्याज, नींबू पड़ा छोले वाला कुल्चा जितना स्वाद देता, उतना मज़ा आज का पिज़्ज़ा और बर्गर भी क्या देता। गोल गप्पों के आगे कुछ नहीं टिकता था।

उस दिन वे दोनों फिल्म नहीं देखने गईं। सिनेमा हाल में बैठकर तीन घंटे बर्बाद करना उनको मंज़ूर ना था। वे तो साथ में घूमना चाहती थीं... बेमतलब। लड़कियों को इस तरह बेमतलब यहाँ वहाँ घूमने की इजाज़त उनके घरों से कभी नहीं मिलती थी। उस दिन कुछ खास उनके मन में नहीं था जो उन्होंने उस दिन के लिए सोचा हो। उन्हें अचानक मिली ये आज़ादी उत्साहित कर रही थी। डर भी लग रहा था कहीं कोई जान पहचान वाला ना देख ले और घर में उनकी शामत ना आ जाए। उन लोगों ने एक छोटा बाज़ार चुना जो घर से काफी दूर था जहाँ उनके मोहल्ले के लोगों के मिलने की संभावना सबसे कम थी। छोटे शहरों में बहुत सारी सवारियाँ लादकर चलने वाले ऑटो रिक्शा में बैठकर उन्होंने वहाँ जाने का तय किया। ऑटो रिक्शा में बहुत तेज़ पंजाबी गाना बज रहा था- ‘किते कल्ली बह के सोचीं नी असीं की नी कीता तेरे लई’। नैना लगातार बोले जा रही थी। जबकि पम्मी इतने सारे लोगों में असहज महसूस कर रही थी। ऑटो में बैठे लोग उनकी बातें सुन रहे थे, इसकी परवाह किए बिना नैना बोलती रही। उनके सामने वाली सीट पर दो लड़के बैठे थे जो उन दोनों को देख रहे थे। बाज़ार आते ही वे दोनों उतर गईं।

उस दिन पम्मी ने नैना को एक बच्ची की तरह शरारतें करते देखा। वे दोनों इतना हँसी कि पम्मी को लगा वो अपने जीवन में, उस दिन से पहले शायद ही इतना कभी हँसी हो। उनकी बेलगाम हँसी सुनकर कुछ लड़के उनके पीछे-पीछे आने लगे। पम्मी डर गई पर नैना उन लड़कों का मज़ाक उड़ाने में लगी रही। लड़के उनके पीछे आते ही जा रहे थे। अचानक एक जगह नैना को दो पुलिस वाले खड़े दिखाई दिये। नैना उनके पास गई और धीमी आवाज़ में उनसे कोई रास्ता पूछने लगी। इतनी देर में वे लड़के इस तरह से गायब हुए जैसे कभी उनका पीछा कर ही नहीं रहे थे।

जहाँ बाज़ार ख़त्म होता था वहाँ एक बहुत छोटा सा पार्क भी था। वे दोनों वहीं बैठ गईं। अचानक नैना ने कहा चलो बाबा फरीद की दरगाह चलते हैं। आज गुरुवार है आज वहाँ मेला होगा। सुनकर पम्मी उत्साहित नहीं दिखी,

‘‘मुझे भीड़-भड़क्का पसंद नहीं। एक दिन गुरुवार के मेले में मैं वहाँ गई थी। दर्शन करने के लिए जब हम अंदर जाने लगे, अचानक हेड़ सी आई, पैर रखने की जगह नहीं थी। भीड़ में लोगों के हाथ पागल कुत्ते की तरह नोचते हैं... नैना... क्या तुम्हें भी ऐसा लगता है जैसे... हम मांस का लोथड़ा भर हैं’’ नैना एकटक पम्मी की आँखों में देखती रही। फिर बोली,

‘‘तू मर जा!’’

भविष्य से डरी हुई दो लड़कियाँ, बैठी अपनी-अपनी बात सुना रही थीं।

पम्मी- और वो कैसा है... जो फोन करता है लैंड्लाइन पे?

नैना-ओ मरजाना! ओ ते बस टाइम पास है। यार सब लोग काम पर चले जाते हैं और अकेले में मेरा दिमाग खराब होने लगता है, तो उससे बात कर लेती हूँ।

पम्मी- तो फिर दिमाग ठीक हो जाता है?

नैना- नहीं और खराब हो जाता है

(दोनों खिलखिलाकर हँसीं)

नैना- एक नंबर का कमीना है दफाहोणा! बार-बार मिलने को बोलता है। मैं जानती हूँ उसे क्या चाहिए।

पम्मी- तुम उसके लिए सिरियस हो क्या?

नैना- पागल हो क्या? वही मुझे फोन करता है जैसे ही मम्मी घर से निकलती है (कुछ देर सोचती रही).. जानती हो मैं इस तरह के किसी सयापे में नहीं पड़ती। की फैदा?

इसी तरह माँ बाप दुयारा तय जगह पर एक दिन नैना की शादी हो गई। पम्मी जानती थी उसके सपनों में एक राजकुमार था। वही एक सपना- कोई राजकुमार आएगा और उसे इस कैद से आज़ादी मिलेगी!

नैना की शादी होने के बाद पम्मी ने भी जल्दी ही निर्णय ले लिया था उस घर को छोड़ने का। उसने अपनी माँ को उस घर का एक पुरजा बनते देखा था। एक विधवा औरत उस बड़े घर में होते हुए भी कहीं दिखाई नहीं देती थी। पम्मी का भाई दिनभर घर से बाहर रहता अपने दोस्तों के साथ। उस घर में लड़कियों की तरह, लड़कों पर कोई पाबन्दियाँ ना थीं। लोगों की यह धारणा कि संयुक्त परिवारों में बच्चों की देखभाल बहुत अच्छी तरह हो जाती है, पम्मी के जीवन में गलत साबित हुई। माँ की आधी से ज्यादा ज़िंदगी रसोई में निकली थी। वो इतने बड़े परिवार के तीन समय के खाने में ही दिनभर उलझी रहती। पम्मी कई बार आत्महत्या करने की सोचती। उसे यही एक रास्ता लगता था इस घर से छुटकारा पाने का। प्रोफेसर उसे अपने साथ आ जाने के लिए कहता रहता था। एक दिन वो उस घर से भाग गई और प्रोफेसर के साथ रहने लगी।

नैना को जैसे धक्का लगा था उसके बारे में सुनकर। बहुत दिन तो पम्मी ने नैना से बात नहीं की। उसके पास कोई सफाई थी भी नहीं अपने किए की। उन दिनों कुछ समझ नहीं आता था -क्या सही क्या गलत।

6

सालों बाद एक दिन उसने नैना का नंबर मिलाया था। नैना उसकी आवाज़ सुनकर बोली थी,

‘‘पम्मी तू मर जा... मर जा तू... कहाँ थी जो मैंने सुना सब सच है’’

पम्मी ने हाँ कहा तो नैना एक बार चुप हो गई। दोनों उसदिन कुछ बात ना कर पाईं। कुछ दिन बाद फिर फोन पर बात हुई थी। इस बार नैना ने अपने मोबाइल फोन से फोन किया था। देर तक बात होती रही। वो बेहद नाराज़ थी पम्मी से।

‘‘मैं दुखी इस बात से नहीं हूँ कि तुम घर से भाग गई ...दुखी इस बात से हूँ तुमने अपने साथ अच्छा नहीं किया। क्यों किया तुमने ऐसा’’

पम्मी को नैना पर गुस्सा आता था जब भी वो ऐसी बातें करती। महीनों झगड़ा होता रहा उनके बीच। फिर दोनों में समझौता हो गया।

एक दिन वे मिलीं। दोनों अकेली मिलना चाहती थीं इसलिए घर से बाहर कहीं मिलने का मन बनाया। नैना खूब सजकर आई थी। दूसरी तरफ पम्मी अभी भी पहले जैसी ही दिखती थी। उसे सजने सँवरने का शौक था ही नहीं। पम्मी ने प्रोफेसर के बारे में कोई बात नहीं की। वो जानती थी नैना अभी भी उससे नाराज़ थी और अभी भी इस बात पर उसके भड़क जाने का डर था। पम्मी ने उससे पूछा,

‘‘तुम अभी भी व्रत रखती हो सोमवार का’’

‘‘नहीं...अब बस खाती हूँ जमके’’

‘‘हाँ वो तो दिख रहा है... तुम बहुत सुंदर हो गई हो नैना और मोटी भी।’’

‘‘तेनु पता ही है, पंजाबी कुढ़ियाँ शादी के बाद कैसे मुटाती हैं।’’

‘‘तो मिल गया तुझे तेरे सपनों का राजकुमार’’ पम्मी ने पूछा।

जवाब में नैना हँसी, पम्मी हँसी। दोनों देर तक हँसती रहीं। पम्मी ने आज जाना जो दोस्तियाँ स्कूल-कॉलेज के दिनों में होती हैं ऐसी दोस्तियाँ दुबारा किसी उम्र में नहीं हो पातीं।

‘‘राजीव किसी को चाहता था’’ नैना का चेहरा एकदम उदास हो गया।

पम्मी- तो क्या हुआ... सबका एक अतीत होता है।

वो एकदम गुस्से में आ गई, ‘‘मेरा नहीं है... मुझसे तो उम्मीद की जाती थी, मैं बस अपने होने वाले पति के लिए अपने आपको संभाल के रखूँ...मुझे तो किसी से प्रेम करने की आज़ादी नहीं थी’’

पम्मी- तू अभी भी उतनी ही बेवकूफ है। किसी का बदला तुम किसी से नहीं ले सकती।

नैना की आँखें तरल हो गईं और आवाज़ नर्म- ‘‘लेकिन मुझे उसकी छाया हमेशा महसूस होती है। जैसे वो हमारे बीच हमेशा रहती है।’’

पम्मी- यह तेरी बेवकूफी है। वो तुम्हारे दिमाग में रहती है।

जाने से पहले नैना ने पूछा था,

‘‘क्या तुम खुश हो अपनी ज़िंदगी से’’

सवाल के बाद वो पम्मी की आँखों में देखती रही। पम्मी जैसे अपने ही आपसे बात कर रही थी,

‘‘मैंने एक रास्ता देखा था उस घर से निकलने का, और कुछ नहीं। कुछ समय बाद हर रिश्ता पिंजरे में बदलने लगता है। और मेरा फिर भाग खड़े होने का मन करता है।’’

‘‘तुम खुश नहीं हो’’

‘‘बहुत घुटन है। सांस लेते नहीं बन रहा। लगता है एक अंधेरे से निकलकर दूसरे अंधेरे में आ गई हूँ। उसे हर समय शक रहता है मुझपर। असुरक्षा की भावना! फिर वो दीवारें तानने लगता है मेरे आस पास। जितना वो दीवार तानता है मैं उतना ही छटपटाती हूँ। उसके बीवी बच्चे भी हैं यह तो मुझे पता था। मुझे बताया था कि उनका तलाक हो चुका है पर अब मुझे लगता है वो झूठ था।’’

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पम्मी को महसूस हुआ प्रोफेसर उसे पूरी तरह अपने ऊपर निर्भर बनाकर रख रहा था। शुरू में उसे लगा वो उसे बहुत चाहता है, उसका ख्याल रखता है इसलिए उसे कहीं भी अकेले जाने नहीं देता था। बाद में पता चला यह उसका तरीका था उसपर नज़र रखने का। हर समय प्रोफेसर उसे लोगों दुयारा औरतों के इस्तेमाल किए जाने के बारे में बताता रहता। वो किसी के करीब आने लगती, चाहे वो पुरुष हो या स्त्री वो उसी की कोई ऐसी कहानी बनाकर सुनाता। पम्मी को लगने लगा बाहर सारी दुनिया एक बड़ा सा मुंह खोले है और जैसे ही कोई औरत घर के बाहर कदम रखेगी, यह बड़ा सा मुंह उसे अपना निवाला बना लेगा। धीरे-धीरे उसके अंदर से आत्मविश्वास कम होता गया। उसे लगने लगा वो अकेले बाहर निकल ही नहीं सकती। कोई काम अकेले नहीं कर सकती। वो बाहर जाकर किसी से बात ना कर पाती।

इस साल पम्मी को एक प्रोजेक्ट करने को मिला। वो किसी एनजीओ में जाकर प्रोजेक्ट करना चाहती थी पर प्रोफेसर नहीं चाहता था वो ऐसा करे। उसने अपनी एक एनजीओ में जान पहचान होने की बात कही और बताया कि सारा कुछ उसे घर पर ही मिल जाएगा और वो रिपोर्ट बना सकती है। इस बार पम्मी ने विरोध किया। वो अपना प्रोजेक्ट खुद करना चाहती थी। उसने एक एनजीओ चुन लिया था जो झौपड़ पट्टी में रह रहे बच्चों को शिक्षित करने का काम कर रहा था। वो उसी स्कूल में पढ़ाना चाहती थी। इस बार प्रोफेसर को झुकना पड़ा। वहीं पर वो कबीर से मिली थी।

8

एक दिन पम्मी ने प्रोफेसर से पूछा था,

‘‘आपने मेरे साथ शारीरिक संबंध क्यों बनाए थे आपने भी मुझे केवल शरीर में बदल दिया मैं एक दुख साझा करने के लिए आपके पास आयी थी, आपने भी मेरे साथ वही नहीं किया मैं तब केवल सोलह साल की थी।’’

उस दिन पहली बार प्रोफेसर को लगा उसने सवाल करना सीख लिया है जो उसे बेहद खतरनाक बात लगी। उसने जवाब दिया था,

‘‘तुम पहले से ही शरीर से गुज़र चुकी थी। तुम कुँवारी होती तो मैं तुमसे शारीरिक संबंध नहीं बनाता।’’

पम्मी ने सोचा था वो कहेगा मैं तुमसे प्रेम करता था। उस दिन उसने अपने आपको ख़त्म करना चाहा था, छत से कूदकर। उसे लगा था मरना जीने से आसान होगा पर ये भी सच नहीं था।

उस दिन के बाद उसपर पाबंदियाँ लगनी शुरू हुईं। घर का लैंड्लाइन फोन हमेशा के लिए खराब हो गया। वो अब नैना से बात भी ना कर पाती। जब वो इसकी शिकायत करती तो वो कहता,

‘‘मैं क्या किसी से मिलता जुलता हूँ मैं अपने सब रिश्ते तुममें ही तलाशता हूँ। तुम्हें ही क्यों जरूरत पड़ती है इसका मतलब है तुम मेरे साथ खुश नहीं हो और तुम्हें कुछ और चाहिए’’।

कम्प्युटर के ज़रिए वो कबीर से बात कर सकती थी। पर वो नैना या कबीर की मदद लेना नहीं चाहती थी। उसे नहीं पता था ज़िंदगी का नरक उसे कहाँ ले जाने वाला था। वो और किसी को इसमें शामिल नहीं करना चाहती थी। उसने तय कर लिया था वो जिएगी या मरेगी पर इस नरक से बाहर आने की कोशिश जरूर करेगी।

एक दिन उसने हिम्मत करके कहा था वो इस रिश्ते से आज़ाद होना चाहती है। उस दिन से शुरू हुआ था एक असहनीय मानसिक अत्याचार। एक पल वो रोता, गिड़गिड़ाता और जब उसके नाटक का कोई असर पम्मी पर होता ना दिखता, दूसरे पल वो क्रूर और हिंसक हो उठता। वो कभी उसे प्यार के वास्ते देता और कभी उसे ‘रंडी’ जैसी गालियां देता। गालियों का सिलसिला घंटों चलता। गालियाँ रुकतीं तो उसका भावनात्मक ब्लैकमेल शुरू हो जाता। पम्मी का दिमाग फटने को हो जाता। उसपर नौकर की शक्ल में एक पहरेदार बिठा दिया गया ताकि उसपर नज़र रखी जा सके। प्रोफेसर उसे तरह-तरह से धमकाता, डराता बाहर की दुनिया के बारे में भयानक बातें बताता। जब कुछ भी पम्मी के इरादे बदल ना सका, उसने ताने मरने शुरू किए पम्मी को एहसास दिलाने के लिए कि कितना पैसा उसपर खर्च करके उसने पढ़ाया है उसे। पम्मी ने पलटकर बोला था, ‘‘उसकी कीमत भी वसूल कर ली मुझसे अच्छी तरह।’’

हर दिन पम्मी को पहले से ज़्यादा रौंधता हुआ गुज़र रहा था। डर, सहम, घुटन, दर्द का लम्बा कारवाँ जैसा महसूस होता जो रात में भी ना ठहरता। जितना उसके अंदर आक्रोश और इन्कार उठता, उतनी ही उस आदमी की भूख बढ़ती जाती। अपने शरीर से इतनी नफरत उसे पहले कभी नहीं हुई। उसे अतीत में लिए अपने हर कदम पर पछतावा होता। शायद इसीलिए वो सबकुछ चुपचाप सहन कर रही थी। शरीर हमेशा उसके अंदर आत्मग्लानि ही पैदा करता आया था। उसने दहलीज़ के बाहर कदम रखा इसलिए उसे यह सब भुगतना पड़ा, वो सोचती। पर दहलीज़ के अंदर उसका कसूर क्या था?

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धीरे-धीरे प्रोफेसर को भी एहसास हो गया था वो उसे रोक नहीं पाएगा अब। वो यह भी जानता था कि बात उसकी नौकरी पर भी बन आ सकती थी।

एक सुबह पम्मी ने भागने का रास्ता खोज ही लिया। वो जब भागी तो पीछे एक पत्र छोड़कर गई, जिसमें उसने लिखा अगर मेरे सामने कभी पड़े तो वही दिन होगा, जिस दिन मैं कानून का दरवाजा खटखटाउंगी और तुम जेल जाओगे। कुछ दिन वो उसी झौंपड़पट्टी में उन्हीं लोगों के बीच रही जो उसे अब अच्छी तरह पहचानते थे। फिर कबीर ने उसका रहने का इंतज़ाम एक वुमेन हॉस्टल में किसी दूसरे शहर में करवा दिया। कबीर चाहता था वो उस आदमी को जेल भिजवाए पर पम्मी नहीं मानी।

पम्मी अपने इस अतीत को बस भूल जाना चाहती थी और नई शुरुआत करना चाहती थी। उसने वो शहर छोड़ा, बहुत सारे रिश्तों को तोड़ा, पर क्या स्मृतियों को छोड़ पाना उसके बस में था?

कबीर के ज़रिए उसने एक एनजीओ में नौकरी कर ली और काम में अपने आपको झौंक दिया। उसके सहकर्मी उसके अतीत के बारे में कुछ नहीं जानते थे पर उन्हें लगता जैसे वो खुदपर ज़ुल्म करने की हद तक काम करती। कुछ है जो उसके अंदर सुलगता रहता। कोई यह नहीं जानता था कि वो इतना थक जाना चाहती थी कि बिस्तर पर गिरते ही नींद उसे निगल ले। पर अक्सर होता उल्टा। वो सो जाती पर अतीत जागा रहता। कोई रात ऐसी ना निकलती जिस रात वो सपने में प्रोफेसर को ना देखती। हर रात एक ही सपना... कि वो बाज़ार में कहीं चली जा रही है और सामने चेहरों की भीड़ में से एक चेहरा उसका है जो कंटीली मुस्कान लिए उसे घूर रहा है, ...कि वो अपने कैबिन में काम कर रही है और दरवाजा खुलता है और वो अचानक अंदर आ रहा है, ...कि वो घर लौटती है और अपने घर के आगे उसे खड़ा पाती है। इन सपनों से वो जगती तो शरीर पसीने से नहाया हुआ होता। नींद की गोलियाँ भी उसे चैन की नींद नहीं सुला पातीं।

10

हफ्ते में एक दो बार कबीर उससे मिलने आता। फोन पर बात तो होती ही। कबीर कभी उससे अतीत का ज़िक्र न करता। वो अपनी लंबी-लंबी योजनाएं बताता जो उसने सोच रखी थीं अपना एक एनजीओ खोलने की। कबीर ने एक दिन उसे बताया, एक लड़की थी जिसे वो प्रेम करता था। वो भी उसे प्रेम करती थी। बेहद गरीब परिवार से थी। पिता की मौत हो जाने के बाद, उसकी माँ ने लोगों के घरों में काम कर करके उसे किसी तरह पाला था। फिर उसने पूछा तो कबीर ने बताया,

‘‘फिर कुछ नहीं। एक दिन उसने परीक्षा पास कर ली और उसे नौकरी मिल गई। वो शादी करना चाहती थी पर ये नहीं चाहती थी कि मैं कुछ भी न कमाऊँ। उसे एक नॉर्मल जीवन जीना था। मैं कभी पैसा कमाने के काम में नहीं लगना चाहता था। उसका कहना था वो पहले ही बहुत झेल कर बड़ी हुई थी। उसे ऐसा जीवन नहीं चाहिए था जिसमें आगे भी झेलना हो।’’

पम्मी ने महसूस किया कबीर को उससे बहुत उम्मीदें थीं। जितना हो सके उतनी जल्दी वो अपना एनजीओ खोलने की बात करता। वो कभी अपनी माँ की बात करती तो उसे गुस्सा आने लगता। शायद ये सोचकर कि कहीं वो अपने घर लौटने की बात तो नहीं करेगी। जितनी जल्दी कबीर उसके अतीत को भूल गया था, उतनी ही जल्दी वो उससे उम्मीद कर रहा था कि वो भी भूल जाए। जब वो अपने सपनों की बात करता, उसे वो बहुत सच्चा और ईमानदार लगता, और कई बार उसे लगता वो उसे एक पुर्जे की तरह इस्तेमाल करना चाहता है अपने सपनों को पूरा करने के लिए। वो अक्सर कहता, ‘‘हम दोनों में से एक नौकरी करेगा, एक अपने आपको सामाजिक कार्य को समर्पित करेगा’’।

11

साल बीत गया और उसने दुबारा उस छूट चुके शहर की ओर वापस मुड़कर नहीं देखा। यहाँ तक कि उसका मन नैना को फोन करने का भी नहीं हुआ। अपने शहर से जुड़ी हर चीज तकलीफ देती सी लगती। लगता था कभी उस शहर में दुबारा कदम रखा तो सारे ज़ख्म खुल जायेंगे। एक भीड़ का हिस्सा बनी वो रास्ते पर चली जा रही होती और यह एहसास कि इस भीड़ में कोई चेहरा उसका जाना पहचाना नहीं, उसे एक अलग सा सुकून देता।

साल भर बाद उसने आखिर एक दिन नैना को फोन लगाया। नैना उसकी आवाज़ सुनकर स्तब्ध थी,

‘‘पम्मी ...साली, कमीनी, धोखेबाज... तू एकदम निर्मोही है!’’ और फिर जो गालियों की बौछार उसने शुरू की, वो तब तक जारी रही जब तक उसकी तस्सली ना हो गई। फिर शांत होकर उसने मुलायम आवाज़ में पूछा,

‘‘पम्मी तू ठीक है न कहाँ है तू खस्मा नू खाणिए’’

पम्मी का मन पिघल गया, ‘‘तूने मुझे आज ‘खस्मा नू खाणिए बोला’, मेरी माँ मुझे यही गाली देती थी। शायद उसकी माँ भी उसे यही गाली देती रही होगी।’’

नैना का भी गला भर आया। दोनों की तीव्र इच्छा हुई मिलने की। नैना ने उससे उसका पता लिया और उसे मिलने का करार कर दिया।

हर बार जब वे मिलतीं, दोनों की ज़िंदगियाँ नई करवट ले चुकी होतीं।

‘‘तेरे पैरों में चक्कर है। टिकेगी भी कहीं मैं तेरी इस अजीब आदत से परेशान हूँ, तू जब भी तकलीफ में होती है, कहीं गायब हो जाती है, किथ्थे मर जाती है’’

पम्मी की सारी कहानी सुनने के बाद नैना ने ठंडी साँस ली,

‘‘कहाँ से लाई है ऐसा जिगरा कैसे जर लेती है इतना सब’’

‘‘अच्छा तू बता तेरा राजकुमार कैसा है’’ पम्मी ने पूछा।

‘‘ठीक है’’ ठंडा सा जवाब दिया उसने। नैना के चेहरे से नहीं लगता था कि सब ठीक है। बातों बातों में आज नैना ने अपनी शादी का राज़ खोला था,

‘‘शादी के चार साल में किसी एक दिन भी उसने मुझे शारीरिक सुख नहीं दिया जो एक स्त्री पुरुष से पाती है!’’

पम्मी उसे देखती रह गई। बेध्यानी में उसने नैना की दो बच्चियों की ओर देखा। नैना का चेहरा आग की तरह भखने लगा,

‘‘बच्चे बच्चे तो कुतिया भी पैदा कर लेती है’’

पम्मी ने उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया।

‘‘तुम नहीं जानती हो, वो मुझे छूता है पर छूता नहीं। ऐसा लगता है मैं उसके जीवन में एक बोझ हूँ। उसकी जिम्मेदारी भर हूँ। मैं पानी के अंदर मछली की तरह प्यासी हूँ। कई बार शरीर मुझपर इतना हावी हो जाता है कि मैं पागल हो उठती हूँ। पर जानती हो पम्मी, जब शरीर जागता है तब संस्कार भी जाग जाते हैं... जो हमें इंजेक्ट किए गए हैं बचपन से।’’

पम्मी नैना के बहते आँसू देखती रही। हर रिश्ता एक दांव ही होता है क्या

12

कबीर और पम्मी के बीच कुछ तो पनप रहा था। वो इस पर बात नहीं करती। पम्मी के अंदर एक सवाल अक्सर उठता- हमेशा कोई सहारा क्योंदोनों अक्सर मिलते। कभी वो उसके फ्लैट में चली जाती, कभी वो आ जाता। दोनों का टकराना भी जारी रहता। एक रात वो कबीर के फ्लैट पर ही थी। वे देर तक बालकनी में बैठे बातें कर रहे थे। हमेशा की तरह कबीर बातों बातों में उसे अपनी भविष्य की योजनाओं में बिना उसकी मर्ज़ी जाने ही शामिल कर रहा था। क्या वो मान चुका था वो उसके साथ ही जीवन बिताना चाहती थी वो उसके जीवन में आए सैलाब से कितना बेखबर था। उस रात पहली बार कबीर ने उसे चूमा था। कबीर ने महसूस किया पम्मी ने अपने आपको पीछे खींच लिया था।

13

एक रात वो अपने कम्प्युटर पर कुछ काम कर रही थी और अचानक नैना ऑनलाइन हुई। पम्मी बहुत खुश हुई कि नैना ने भी कम्प्युटर इस्तेमाल करना सीख लिया। दोनों तकरीबन रोज़ ऑनलाइन होतीं। एक बार कई दिन तक नैना ऑनलाइन नहीं हुई। पम्मी ने फोन किया तो उसने फोन भी नहीं उठाया। पम्मी को शक हुआ कुछ ठीक नहीं है। फिर एक दिन वो उसके पते पर उसे मिलने चली गई। नैना उसे देख रोने लगी। उसने बताया उसका पति उसे छोड़कर अपनी प्रेमिका के साथ रहने चला गया है। छोटे से उस फ्लैट में नैना अपनी दो बच्चियों के साथ अकेली थी।

नैना का वो मुश्किल समय था। उसने अपने बच्चों की परवरिश के लिए पति से खर्चा देने की अर्ज़ी लगा दी। कोर्ट-कचहरी-पुलिस स्टेशन सब देख डाला उसने एक साल में। जब-तक हमारे ऊपर कोई ऐसा वक़्त नहीं आता जब हमें न्याय की गुहार लगानी पड़े, तब तक हमें लगता है देश-समाज में सब व्यवस्थाएं अपना काम सही तरीके से कर रही होंगी। एक साल में इतना खज्जल ख़्वार होने के बाद वो अकेले जीना भी सीख गई थी। कुछ परेशान करता था तो माँ बाप, रिश्तेदार, पड़ोसियों का यह कहना, ‘कहाँ जाएगा धक्के खाकर आखिर एक दिन तुम्हारे ही पास आयेगा।’

उस दिन भी हर बार की तरह नैना सुबह दस बजे कोर्ट में पहुँच गई थी, और उसका पति हर बार की तरह चार बजे से ठीक पद्रह मिनट पहले आया जो कि कोर्ट के बंद होने का समय था।

उस दिन हर किसी को उसका कोर्ट में इस तरह बन सँवर कर आना खटक रहा था। पर उसे किसी की परवाह नहीं थी। वो अच्छे कपड़े पहन कर आयी थी। अपनी आँखें बिना काजल के देखना उसे पसंद नहीं था। शीशे में देखती तो काजल बिना आँखें उदास लगतीं। आज उसने अपनी पसंद की लिपस्टिक भी लगाई थी। शायद यही खटका सबको। जबसे उसका पति उसे छोड़कर अपनी प्रेमिका के साथ रहने चला गया था, उसके आस-पास बहुत से लोग उसे आसानी से उपलब्ध औरत मानने लगे थे। पुलिस स्टेशन में पुलिस वाले की आँख में, कोर्ट में वकीलों और उनके स्टाफ की आँखों से लार टपकती। यहाँ तक कि सालों से घर पर मुरम्मत के लिए बुलाए जाने वाले प्लंबर, बढ़ई, दूध वाले की निगाहें भी बदल गई थीं।

जब उसके पति ने उसे देखा तो जज के सामने उसकी ओर उंगली उठाकर बोला,

‘‘देखिये जज साब! इस औरत को देखकर लगता है कि इसके पति ने इसे छोड़ दिया है और इसे इस बात का कोई ग़म भी है’’

वो गुस्से में जलने लगी। जब जज साहब कुछ नहीं बोले, जब दोनों वकील भी चुप रहे, जब वहाँ खड़े हर आदमी की आँखों में खामोश सहमति दिखाई दी, तब वो फट पड़ी,

‘‘हरामजादे, कमीने...तूने दहेज के लालच में मुझसे शादी की, मुझे पाँच साल तक पत्नी होने के बावजूद एक दिन भी शारीरिक सुख नहीं दिया। दूसरी औरत के साथ सोते रहे। अब मुझे दो बच्चों के साथ अकेली छोड़कर, ऐश कर रहे हो और चाहते हो मैं इन बच्चों का हक़ भी ना मांगू ये कहाँ का इंसाफ है, मेरी ज़िंदगी का सत्यानाश करके भी मेरा खसम सुख भोगे और मैं मनहूस सूरत बनाकर इसका सयापा करने कोर्ट में आऊँ’’

आज एक बार फिर ये दुनिया उसकी नज़रों से गिर गई थी।

14

एक दिन पम्मी को एक सेमिनार में जाने का मौका मिला। पहली बार वो अपने शहर से बहुत दूर समंदर के किनारे बसे उस शहर में गई। बहुत से लोगों से मिलने का मौका मिला। आखिरी दिन जिस विषय पर बोलने के लिए एक जाने-माने मनोवैज्ञानिक आने वाले थे वो विषय था- ‘‘बचपन में हुआ यौन शोषण और उसके दीर्घकालिक प्रभाव’’। उस दिन सुबह उठते ही पम्मी ने समंदर देखा। उसके अंदर भी कुछ अशांत था। कुछ डर थे जो लहरों की तरह उठते और खुद से ही टकराकर टूट जाते।

स्मृतियों के जिस काले अंधेरे कोने को उसने हमेशा के लिए मिटा देना चाहा था आज फिर वही अंधेरा उसे डरा रहा था। एक समय उसे लगा था अगर उसने अतीत को भुलाया नहीं तो जीना संभव नहीं था। क्या वो जानबूझकर यहाँ आई थी कबीर कई बार इशारों में कह चुका है कि उसे काउंसिलिंग की जरूरत है।

सेमिनार शुरू हुआ। पम्मी एक पीछे वाली सीट पर जा बैठी। शुरुआती भूमिका के बाद, बुलाये गए वक्ता विषय पर बोलते गए।

‘‘बचपन में होने वाले यौन शोषण के कई रूप हो सकते हैं। यौन शोषण किसी करीबी रिश्तेदार, किसी बहुत अपने दुयारा लालच देकर या एक अजनबी दुयारा की गई एक हिंसक कार्रवाई हो सकती है। यौन शोषण को परिभाषित करना कठिन है। इसके कई अलग-अलग रूप हो सकते हैं।’’

पम्मी को वो अपरिचित और डरावने स्पर्श याद आने लगे। उसे याद आया उसका एक कज़न था जो एक बार नहाकर निकला था और उसे अकेला पाकर उसने अपना तौलिया हटा दिया था। वो जड़ हो गई थी। एक समय ऐसा आया था जब उसे अपने सगे भाई के साथ भी अकेले रहने से डर लगने लगा था।

‘‘बचपन के यौन शोषण को उच्च स्तर के डिप्रेशन, अपराधबोध, शर्म, स्वयं को दोष, खाने संबंधी विकार, पेनिक अट्टेक्स, अलग-थलग रहना, यौन इच्छायों का दमन, इन्कार, यौन समस्याएँ, दूसरों पर अविश्वास और रिश्ते बनाने में समस्याओं के साथ जोड़ा गया है...’’

पम्मी के हाथ पैर बर्फ की तरह ठंडे पड़ गए थे।

‘‘वे अक्सर अपराधबोध और आत्म-दोष के शिकार होते हैं। वे अक्सर इसकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी लेते हैं। यौन शोषण जब एक सम्मानित विश्वसनीय वयस्क दुयारा किया जाता है तब बच्चे उस व्यक्ति पर इतना भरोसा करते हैं कि उनके लिए उस व्यक्ति को एक अपराधी की तरह देखना मुश्किल लगता है और वे खुद को ही इसका दोषी समझते हैं। इन बच्चों में बड़े होते हुये अक्सर आत्मघाती प्रवृतियाँ भी विकसित हो जाती हैं...’’

पम्मी की आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा।

‘‘यौन शोषण के शिकार बच्चे वयस्क होने पर पारस्परिक संबंधों को स्थापित करने में कठिनाई का अनुभव कर सकते हैं। उन्हें नए संबंध बनाने से, अंतरंगता से डर लग सकता है... ऐसे लोग कई बार बेमेल और अपमानजनक रिश्ते भी बना लेते हैं...’’

सेमिनार खत्म होने पर उसने अपने आपको लाश की तरह ढोया, बाहर आई और चलने लगी। वो शाम तक चलती रही। ऐसा लग रहा था पूरा शहर कदमों से नाप लेगी। अंधेरा होते होते वो समंदर के किनारे थी। उसे बचपन से पानी से डर लगता था। पर वो पानी में आगे बढ़ती गई। उसे सांस फँसती महसूस हुई। पानी उसकी छाती तक था। वो रुक गई। आँसू गालों से लुढ़कने लगे। वो पूरा दम लगाकर चीख़ी।

15

एक दिन नैना ने अचानक आकर पम्मी को चौंका दिया। नैना उससे मिलने आई थी। इतनी आत्मविश्वास से भरी वो पहले कभी नहीं लगी। उसने कहीं पर नौकरी कर ली थी। उस दिन उसके चेहरे पर एक अलग तरह की चमक थी। पम्मी को शक हुआ,

‘‘अब बता भी दे क्या हुआ’’

‘‘पम्मी...तू यकीन न करेगी। मैं नहीं जानती मैं किधर जा रही हूँ। वो मुझे पता नहीं कैसे मिल गया! मैं कम्प्युटर सीखने जाती थी उससे। हमें नहीं पता चला कब, कैसे, क्यों हुआ, बस हम पागल से हो गए। हम इतने खुश हैं। जब, जिस जगह हम साथ मिल जाते हैं वो जगह ही कुछ और हो जाती है! मैं इस जीवन में इतना खुश कभी नहीं हो पाई। मुझे अपने आपसे प्यार हो गया है। मैं उड़ रही हूँ पम्मी। मुझे नहीं पता दुनिया, जहान, कानून, धर्म क्या है मैंने दुनिया की किताब को बंद कर दिया है!’’

पम्मी सोच रही थी, इंसान जब प्रेम में होता है, क्या वही रहता है या कुछ और हो जाता है?

16

पम्मी और कबीर दोनों को पता था एक दिन इस पल का सामना उन्हें करना होगा। कबीर इसकी ओर इशारे करता आया था और पम्मी हर इशारे पर चुप हो जाती थी।

‘‘क्या हम साथ रह सकते हैं जीवन भर के लिए’’ इस सवाल को पूछते हुए कबीर इतना आश्वस्त था जैसे जवाब भी उसे ही देना है।

‘‘जिस तरह हम अब साथ हैं यही सबसे अच्छा है हम दोनों के लिए,’’ पम्मी ने सहजता से जवाब दिया, उसी तरह जैसे सवाल पूछा गया था।

‘‘इसे मैं तुम्हारी ‘ना’ समझूँ’’ कबीर की आवाज़ में तल्खी थी।

‘‘आजतक मुझे सिर्फ सवाल करने वाले मिले। सवाल करना तो मुझे सिखाया ही नहीं गया। जवाब भी सबको अपनी पसंद का चाहिए था’’ ...पम्मी की सांसें अचानक तेज़ हो गईं। उसने कुछ समय लिया और अनियंत्रित साँसों को समेटा। फिर कहना शुरू किया,

‘‘मैं मुक्त रहना चाहती हूँ अब रिश्तों से। मित्रता के सिवा कोई और रिश्ता मेरे जीवन में नहीं चाहिए मुझे अब। मैं खुद को महसूस करना चाहती हूँ। जीकर देखना चाहती हूँ अपने जीवन को। ये अपने आपको ‘हील’ करने जैसा कुछ है’’। उस पल पम्मी की आवाज़ में इतनी ताकत थी जो आज तक कबीर ने कभी महसूस नहीं की थी।

17

आज वो नैना के नए घर में बैठी थी। किराए का ही सही पर ये घर नैना का था। उसकी और संजय की छोटी सी दुनिया। जिसमें सामान कम था और प्रेम ज़्यादा। पास में नैना की दोनों बेटियाँ खेल रही थी। उनकी बातें सुनकर उन्हें वो दिन याद आ गया, जब वे कॉलेज से भागकर पार्क में बैठी बातें कर रही थीं। कितना डर डर के जीती थीं वे। हँसती भी डरते हुए, रोती भी डरते हुए। उन्हें ये डर कहाँ से मिला था

नैना ने कबीर का ज़िक्र छेड़ दिया,

‘‘शायद कबीर तुम्हें चाहता है।’’

‘‘और मैं खुद को चाहना सीख रही हूँ।’’

‘‘शायद वो तुम्हारा साथ चाहता है।’’

‘‘लेकिन साथ जीने की कुछ शर्तें होंगी।’’

‘‘वो शर्तें ना होकर उसकी उम्मीदें भी हो सकती हैं।’’

‘‘उम्मीद कब शर्तों में बदल जाएँ पता नहीं चलता।’’

‘‘तुम इतनी डाहडी (सख़्त) कब से हो गई’’ नैना गुस्सा हो गई।

‘‘अब यह क्या बात हुई’’ पम्मी झल्ला गई।

कुछ पल की खामोशी के बाद नैना ने प्यार से पूछा,

‘‘क्या तुम कभी अपने आपको अतीत से अलग नहीं करोगी’’

पम्मी के चेहरे पर एक क्रूर सी मुस्कान उभरी। काश वो मिटा पाती सब-कुछ अपने जीवन से! बस एक मौका मिलता फिर से जीने का! वो फिरसे देखना चाहती है नन्हें कोमल सपने! अतीत से उसे अब उतनी शिकायत नहीं थी। हाँ, एक चेहरा उसे दिखाई देता था अतीत की गलियों से... माँ का चेहरा!

पम्मी की आवाज़ किसी सुरंग से आ रही थी, ‘‘काश! मेरी माँ ने थोड़ी हिम्मत दिखाई होती। दुनिया से लड़ना सिखाया होता नाकि आँख बंद करके वही सीख दी होती जो उसकी माँ ने उसे दी थी।’’

नैना ने खेलती बच्चियों को नज़र भरके देखा,

‘‘हम अपनी बेटियों के साथ ऐसा नहीं करेंगे!’’

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टी 20/7, अतुल ग्रोव रोड,

तोल्स्तोय मार्ग के पास,

नई दिल्ली-110001

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भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,644,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,685,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,54,साहित्यिक गतिविधियाँ,183,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,68,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: रचना समय - अप्रैल - मई 2016 / सैलाब / कहानी / अंजली काजल
रचना समय - अप्रैल - मई 2016 / सैलाब / कहानी / अंजली काजल
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