गुरुवार, 25 अगस्त 2016

व्यंग्य / हमारे नेता...अमर रहें / डॉ. रामवृक्ष सिंह

अपने देश में लोगों को पीने का पानी नहीं, शौच जाने के लिए शौचालय नहीं, खाने को भोजन नहीं, रहने को मकान नहीं, पहनने को कपड़े नहीं, साँस लेने को खुला आसमान नहीं, लेकिन फिर भी न जाने क्यों लोग अमरत्व की आकांक्षा रखते हैं। और सबसे अधिक अमरत्व चाहिए हमारे नेताओं को। प्रकृति का नियम है- जो पैदा हुआ, उसे मरना पड़ेगा। मृत्यु से किसी को मुक्ति नहीं। किन्तु भारत के नेता और उनके अनुयायी इस ध्रुव सत्य को भी झुठलाना चाहते हैं। उन्हें अमर होना है। जहाँ देखिए नारे गूंजते रहते हैं- अमुक-अमुक अमर रहें। यदि नेताओं का वश चले तो यमराज को भी घूंस देकर अमरत्व पा लें। अंग्रेजी में ऐसा नारा नहीं है, वहाँ लॉङ्ग लिव अमुक-अमुक का नारा है, यानी नेता के दीर्घजीवी होने की आकांक्षा है। किन्तु हम हिन्दी-भाषियों को तो सीधे-सीधे अमरत्व चाहिए।

सवाल यह है कि नेता अमर क्यों होना चाहते हैं और उनके अनुयायी उन्हें अमर क्यों देखना चाहते हैं? एक लिहाज़ से देखें तो अमरत्व की आकांक्षा केवल सैडिस्ट यानी परपीड़नवादी ही कर सकते हैं। जब सबको भली भांति मालूम है कि जीवन का अन्तिम पड़ाव मृत्यु है, तब हम अमर रहकर क्या उखाड़ना चाहते हैं? सब मर जाएं और हम जीवित रहें! यह तो कोई अच्छी बात नहीं हुई। भई, जैसे सब, वैसे हम। यदि सब मरेंगे तो हम भी मरेंगे। हम सबसे अलग तो नहीं हो सकते, कि वे मरें तो मरें, हम तो जिन्दा रहेंगे।

ऐसा नेता किस काम का कि उसके अनुयायी मर जाएँ और वह मरदुआ अमर हो जाए? असली नेता तो वह है कि किसी और के मरने से पहले अपनी जान दे दे। दूसरों को मौत में झोंकने से पहले खुद अपने सीने पर वार झेलने वाला, अपने अनुयायियों को बचाकर खुद मर जानेवाला ही असली नेता हो सकता है। इसके विपरीत आचरण करनेवाला और चाहे जो कुछ हो, नेता नहीं हो सकता। ऐसे स्वार्थी, कापुरुष को हम नेता कैसे मान सकते हैं!

सवाल यह है कि नेता अमर हो जाए, यह दिल से चाहता भी कौन है! आज देश में कई राजनीतिक दल ऐसे हैं, जो अपने बूढ़े नेताओं को दरकिनार किए हुए हैं। उनकी जगह उनसे अपेक्षाकृत कम वय वाले, यानी कम बूढ़े और अधेड़ वय के नेताओं ने कमान संभाल ली है। अब ज़रा सोचिए कि यदि अग्रिम पंक्ति के नेता मरेंगे ही नहीं तो उनके पीछे चलनेवाले महत्त्वाकांक्षी छुटभैये नेताओं का क्या होगा? वे तो कभी भी अग्रिम पंक्ति के नेता नहीं बन पाएँगे। तो क्या यह मान लिया जाए कि नेताओं के अमर होने का नारा अपने-आप में एक वंचना है? हमें तो यही लगता है। तो फिर ऐसे झूठ-मूठ के नारे लगाने का क्या अर्थ है? क्या इसी को मुँह में राम बगल में छूरी कहते हैं? यानी एक ओर तो हम यह चाहते हैं कि नेता निपटे तो हम नेता बनें और दूसरी ओर झूठ-मूठ नारा लगाते हैं कि नेता अमर रहे! यदि नेता को ही सत्तासीन होना है तो यह नारा वाकई सरासर झूठा और छल-कपटपूर्ण है। इतिहास गवाह है कि कई बार बूढ़े शासक को मरवाकर उसका प्रतिद्वंद्वी सत्ता पर काबिज हुआ है। इसमें खून के रिश्ते भी कभी आड़े नहीं आए हैं। तो फिर सत्तासीन नेताओं को अपने रास्ते से हटाने की इच्छा मन में रखने वाले दूसरी पाँत के नेता अपने से वरिष्ठतर और सत्ताधारी नेता की अमरता की कामना क्यों करेंगे?

एक बार को मान लें कि भगवान ने अनुयायियों की सुन ली और नेताओं को अमर कर दिया तो क्या होगा? अभी कुछ दिन पहले अख़बार में पढ़ा कि देश के एक राज्य के आधे से अधिक मंत्री आपराधिक पृष्ठभूमि वाले हैं। इसका अभिप्राय यह हुआ कि आधे नेता दागी हैं। उन पर हत्या, बलात्कार, मारपीट आदि विभिन्न प्रकार के आपराधिक मामले दर्ज़ हैं। आय से अधिक संपत्ति, आर्थिक अपराध आदि में संलिप्तता तो नेताओं के लिए आम बात है। यदि देश के धार्मिक, आध्यात्मिक गुरुओं को भी नेता (नी-नयति धातु पर आधारित व्युत्पत्तिक अर्थ के लिहाज से) मान लिया जाए, तब तो स्थिति और भी भयावह है। ऐसे नेता यदि अमर हो जाएं तब तो बड़ी मुश्किल होगी। अभी तो यही तसल्ली रहती है कि चलो कुछ दिन बाद दुर्दान्त से दुर्दान्त नेता भी निपट जाएगा, उसके बाद जनता राहत की साँस लेगी। लेकिन यदि कोई दुर्दान्त व्यक्ति अमरत्व पा जाए तो?

मज़े की बात तो यह है कि कुछ नेताओं को शायद यह लगने लगता है कि वे और उनके परिवार के लोग अमर हैं। और चूंकि वे अमर हैं, इसलिए उनके लिए ज़मीनें, धन-संपदा आदि भी इतनी होनी चाहिए कि वह ता-कयामत, कभी खत्म न हो। यदि ऐसा नहीं होता तो ज़मीनों और धन-संपत्ति के लिए उनके मन में अंतहीन लिप्सा क्यों होती? क्या ऐसे भोले नेताओं को यह पता नहीं कि अमरता एक उटोपिया है?

हमारी विनम्र राय है कि अमरत्व की आकांक्षा ही प्रकृति के नियम-विरुद्ध है। नेता हो या आपका कोई बहुत ही प्यारा परिजन- जगत चबेना काल का, कुछ मुख में कुछ गोद। तो ऐसी बेतुकी आकांक्षा ही क्यों की जाए? आइए आकांक्षा करें कि हमारा नेता सत्कर्मी हो। हमारा नेता सर्व गुण-संपन्न हो। हमारा नेता दीन-बंधु हो। हमारा नेता भ्रष्टाचार-मुक्त हो। हमारा नेता सदाचारी और सच्चरित्र हो। हमारा नेता भला मानुस हो। और यकीन मानिए यदि नेता ऐसा हो जाए तो वह खुद ब खुद अमर हो जाएगा.. मरने के बाद भी उसे लोग श्रद्धा-पूर्वक याद करेंगे।

---0---

1 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------