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शुभम श्री की घोर विवादास्पद पुरस्कृत कविता बनाम कविता क्या है? - एक पड़ताल

हिंदी काव्यजगत में तूफ़ान मचा है. शुभम श्री की एक कविता 'पोएट्री मैनेजमेंट' को भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार मिला तो आरोप-प्रत्यारोप, प्रशंसा-खारिज करने का दौर चल पड़ा.

इस बहाने आइए, आज पड़ताल करते हैं कि हिंदी के पुरोधा इस बारे में क्या कहते.

आचार्य रामचन्द्र शुल्क ने एक लंबा निबंध लिखा था - कविता क्या है. पहले इस निबंध को पढ़ें और फिर इस निबंध के नीचे दी गई शुभम श्री की पुरस्कृत कविता का पाठ करें. और फिर स्वयं उत्तर खोजें कि रामचन्द्र शुक्ल के हिसाब से यह कविता कितने पानी में है, या कि आपके हिसाब से यह कविता, कवित्व के कितना करीब या दूर है.

 

कविता क्या है?

रामचन्द्र शुक्ल

( सन् १८८४-१९४१)

कविता वह साधन है जिसके द्वारा शेष सृष्टि के साथ मनुष्य के रागात्मक संबंध की रक्षा और निर्वाह होता है । राग से यहाँ अभिप्राय प्रवृत्ति और निवृत्ति के मूल में रहने वाली अंतःकरण-वृत्ति से है । जिस प्रकार निश्चय के लिए प्रमाण की आवश्यकता होती है उसी प्रकार प्रवृत्ति या निवृत्ति के लिए भी कुछ विषयों का बाह्य या मानस प्रत्यक्ष अपेक्षित होता है । यही हमारे रागों या मनोवेगों के-जिन्हें साहित्य में भाव कहते हैं-विषय हैं । कविता उन मूल और आदिम मनोवृत्तियों का व्यवसाय है जो सजीव सृष्टि के बीच सुख-दुःख की अनुभूति से विरूप परिणाम द्वारा अत्यन्त प्राचीन कल्प में प्रकट हुई और जिनके सूत्र से शेष सृष्टि के साथ तादात्म्य का अनुभव मनुष्य-जाति आदि काल से करती चली आई है, । वन, पर्वत, नदी, नाले, निर्झर, कछार, पटपर, चट्टान, वृक्ष, लता, झाड़, पशु, पक्षी, अनंत आकाश, नक्षत्र इत्यादि तो मनुष्य के आदिम सहचर है ही पर खेत, ढुर्री, झोंपड़े, चौपाए आदि भी कुछ कम पुराने नहीं है । इनके द्वारा प्राप्त रागात्मक संस्कार मानव-अंतकरण में दीर्घ परंपरा .के कारण मूल रूप से बद्ध हैं, अत: इनके द्वारा जैसा पका रसपरिपाक संभव है वैसा कल, कारखाने, गोदाम, स्टेशन, एंजिन, हवाई जहाज इत्यादि द्वारा नहीं ।

रागों या वेगस्वरूप मनोवृत्तियों का सृष्टि के साथ उचित सामंजस्य स्थापित करके कविता मानव-जीवन के व्यापकत्व की अनुभूति उत्पन्न करने का प्रयास करती है । यदि इन वृत्तियों को समेटकर मनुष्य अंतःकरण के मूल रागात्मक अंश को सृष्टि से किनारे कर ले तो फिर उसके जड़ हो जाने में क्या सन्देह है? यदि वह लहलहाते खेती और जंगलों, हरी घास के बीच घूम-घूमकर बहते हुए नालों, काली चट्टानों पर चाँदी की तरह ढलते हुए झरनों, मंजरियों से लदी हुई अमराइयों, पटपर के बीच खड़े झाड़ों को देख क्षणभर लीन न हुआ, यदि कलरव करते हुए पक्षियों के आनंदोत्सव में उसने योग न दिया, यदि खिले हुए फूलों को देख वह न खिल, यदि सुन्दर रूप देख पवित्र भाव से मुग्ध न हुआ, यदि दीन दुखी का आर्तनाद सुन न पसीजा, यदि अनाथों और अबलाओं पर अत्याचार होते देख क्रोध से न तिलमिलाया, यदि हास्य की अनूठी उक्ति पर न हँसा तो उसके जीवन में रह क्या गया? ज्यों-ज्यों मनुष्य के व्यापार का क्षेत्र जटिल और सघन होता गया त्यों-त्यों सृष्टि के साथ उसके रागात्मक संबंध के विच्छेद की आशंका बढ़ती गई । ऐसी स्थिति में बड़े-बड़े कवि ही संभालते आए है ।

जो कुछ अब-तक कहा. गया उससे यह स्पष्ट है कि सृष्टि के नाना रूपों के साथ मनुष्य की रागात्मिका प्रकृति का सामंजस्य ही कविता का लक्ष्य है । वह जिस प्रकार प्रेम, क्रोध, करुणा, घृणा, आदि मनोवेगों या भावों पर सान चढ़ाकर उन्हें तीक्ष्ण करती है उसी प्रकार जगत् के नाना रूपों और व्यापारों के साथ उन का उचित सम्बन्ध स्थापित करने का भी उद्योग करती है इस बात का निश्चय हो जाने पर वे सब मतभेद दूर हो जाते है जो काव्य के नाना लक्षणों और विशेषतः रस आदि के भेद-प्रतिबन्धों के कारण चल पड़े हैं । ध्वनि-संप्रदायवालों का नैयायिकों से उलझना, आलंकारिकों का रस-प्रतिपादकों से झगड़ना एक पतली गली में बहुत से लोगों का धक्कमधक्का करने के समान है । ''वाक्य रसात्मकं काव्यं' में कुछ लोगों को जो अव्याप्ति दिखाई पड़ी है वह नौ भेदों के कारण । रस के नौ भेदों की' लीक के भीतर सृष्टि के बहुत थोड़े से अंश के वर्णन के लिए शृंगार के उद्दीपन विभाव के अन्तर्गत उन्हें थोड़ी सी जगह दिखाई पड़ी । हमारे पिछले खेवे के हिन्दी कवियों ने तो उतने ही पर संतोष किया । रीति के अनुसार ‘षट्ऋतु’ के अंतर्गत कुछ इनी-गिनी वस्तुओं को लेकर कभी नायिका को हर्ष पुलकित करके और विरह से विफल करके वे चलते हुए ।

बात यह है कि आरम्भ में कहे हुए काव्य के व्यापक आदर्श से जिस समय संस्कृत काव्य च्युत हो चुका था उस समय हिन्दी काव्य अग्रसर हुआ इससे उसमें सृष्टि-वर्णन का व्यापक समावेश न होने पाया । यह कमी केशव की लीक पीटनेवाले 'कविदों' में ही नहीं है, उनसे पहले के वास्तविक काव्य, महाकाव्य, आख्यान-काव्य रचनेवाले बड़े बड़े कवियों में भी पाई जाती है । वाल्मीकि के वर्षा और शरद् के विशद वर्णन को गो० तुलसीदासजी के वर्णनों से मिलाने से यह बात समझ में आ जाएगी ।

 

कहाँ--

क्वचित्प्रकाशं क्वचिदप्रकाशं

नमः प्रकीर्णाम्बुधनं विभाति ।

व्यामिश्रितं सर्जकदंबपुष्पै-

र्नवं जलं पर्वतधातुताम्रम् ।

मयूरकेकाभिरनुप्रयातं

शैलापगा: शीघ्रतरं वहन्ति ।।

 

और कहाँ -

बरषहिं जलदभूमि नियराए ।

यथा नवाह बुध विद्या पाए ।।

दामिनि दमक रही धन माहीं ।

खल की प्रीति यथा थिर नाहीं ।।

कहाँ प्रकृति का वह सूक्ष्म निरीक्षण, कहाँ उदाहरण की, ओर यह- टूटना । बाबाजी की दृष्टि 'यथा नवहिं बुध विद्या पाए' इस उपदेशात्मक' वाक्य की ओर अधिक जान पड़ती हैं, वस्तु-वर्णन की ओर कम । भारतेन्दु का गंगा और यमुना वर्णन अच्छा कहा जाता है पर वह भी परंपराभुक्त और उपमा-प्रधान है ।

हिन्दीवाले चाहे ऐसे वर्णनों से संतोष कर लें पर जिनकी आँखों के सामने कुमारसंभव का हिमालय-वर्णन और मेघदूत का नाना-प्रदेशवर्णन' नाच रहा था वे स्पष्ट देख सके कि प्रकृति का यह सूक्ष्म निरीक्षण शृंगार के उद्दीपन विभाव की दृष्टि से नहीं है, शुद्ध वर्णन के निमित्त दृश्य अंकित करने के निमित्त है । उन्हों ने रस की नौ नलियों के भीतर ऐसे शुद्ध वर्णनों के लिए कोई गड्ढा न पाकर 'रसात्मकं वाक्यम्' से असन्तोष प्रकट किया पर असन्तोष नाली बनाने वालों के प्रति होना चाहिए था, रस के सिद्धान्त के प्रति नहीं । प्राकृतिक दृश्यों के वर्णन में एक प्रकार का रस अवश्य है चाहे उसे अनिर्वचनीय कहिए, चाहे उसका कोई नाम रखिए, चाहे उसे किसी रस के भीतर कीजिए ।

 

कार्य में प्रवृत्ति

यदि क्रोध, करुणा, दया, प्रेम आदि मनोभाव मनुष्य के अंतःकरण से. निकल जायँ तो वह कुछ नहीं कर सकता । कविता हमारे मनोमावों को उच्छवसित करके हमारे जीवन में एक नया जीवन डाल देती हैं, हम सृष्टि के सौन्दर्य को देखकर मोहित होने लगते हैं, कोई अनुचित या निष्ठुर-. काम हमें असह्य होने लगता है, हमें जान पड़ता है कि हमारा जीवन कई- गुना अधिक होकर समस्त संसार मैं व्याप्त हो गया है । इस प्रकार कविता की प्रेरणा से कार्य में प्रवृत्ति बढ़ जाती है । केवल विवेचना के बल से हम, किसी कार्य में बहुत कम प्रवृत्त होते हैं । केवल इस बात को जानकर ही हम किसी काम के करने या न करने के लिए प्राय: तैयार नहीं होते कि वह काम अच्छा है या बुरा, लाभदायक है या हानिकारक । जब उसकी या उसके परिणाम की कोई ऐसी बात हमारे सामने उपस्थित हो जाती है तो हमें आह्लाद, कोध, करुणा आदि से विचलित कर देती है तभी हम उस काम को करने या न करने को प्रस्तुत होते हैं । केवल बुद्धि हम काम करने के लिए उत्तेजित नहीं करती । काम करने के लिए मन ही हमको उत्साहित करता है । अत: कार्य-प्रवृत्ति के लिए मन मैं वेग का आना आवश्यक है । यदि किसी जन-समुदाय के बीच कहा जाय कि अमुक देश तुम्हारा इतना रुपया प्रतिवर्ष उठा ले जाता है, इसी से तुम्हारे यहाँ अकाल और अर्धस्थंभ बन रहा है, तो सम्भव है कि उस पर कुछ प्रभाव न पड़े । पर यदि दारिद्र्य और अकाल का भीषण दृश्य दिखाया जाय, पेट की ज्वाला से जले हुए प्राणियों के अस्थिपंजर कल्पना के सम्मुख रखे जायँ और भूख से तड़पते हुए बालक के पास बैठी हुई माता का आर्त्त स्वर सुनाया जाय तो बहुत से लोग क्रोध और करुणा से विह्वल हो उठेंगे और इन बातों को दूर करने का यदि उपाय नहीं तो संकल्प अवश्य करेंगे । पहले प्रकार की बात कहना राजनीतिज्ञ का काम है और पिछले प्रकार का दृश्य दिखाना कवि का कर्तव्य है । मानव-हृदय पर दोनों में से किसका अधिकार अधिक हो सकता है, यह बतलाने की आवश्यकता नहीं ।

 

स्वभाव-संशोधन

कविता के द्वारा हम संसार के सुख, दुःख, आनन्द और क्लेश आदि यथार्थ रूप से अनुभव करने में अभ्यस्त होते है जिससे हृदय की स्तब्धता हटती है और मनुष्यता आती है । किसी लोभी और कंजूस दूकानदार को देखिए जिसने लोभ के वशीभूत होकर क्रोध, दया, भक्ति, आत्माभिमान आदि मनोविकारों को दबा दिया है और संसार के सब सुखों से मुखमोड़ लिया है । अथवा किसी महाक्रूर राजकर्मचारी के पास जाइए जिसका हृदय पत्थर के समान जड़ और कठोर हो गया है, जिसे दूसरे के दुःख और क्लेश का अनुभव स्वप्न में भी नहीं होता । ऐसा करने से आपके मन में यह प्रश्न अवश्य उठेगा कि क्या इनकी भी कोई दवा है । ऐसे हृदयों को द्रवीभूत .करके उन्हें अपने स्वाभाविक धर्म पर लाने की सामर्थ्य काव्य ही में हैं । कविता ही उस दूकानदार की प्रवृत्ति को भौतिक और आध्यात्मिक सृष्टि के सौन्दर्य की ओर ले जाएगी, कविता ही उसका ध्यान औरों को आवश्यकताओं की ओर आकर्षित करेगी और उनकी पूर्ति करने की इच्छा उत्पन्न करेगी, कविता ही उसे उचित अवसर पर क्रोध, दया, भक्ति, आत्माभिमान आदि सिखावेगी । इसी प्रकार उस राजकर्मचारी के सामने कविता ही उसके कार्यों का प्रतिबिम्ब खींचकर रखेगी और उनकी जघन्यता और भयंकरता का आभास दिखलावेगी, तथा देवी किंवा अन्य मनुष्यों द्वारा पहुंचाई हुई पीड़ा और क्लेश के सूक्ष्म से सूक्ष्म अंश को दिखलाकर उसे दया दिखाने का अम्यास कराएगी ।

 

मनोरंजन

प्राय: लोग कहा करते हैं कि काव्य का मुख्य उद्देश्य मनोरंजन है । पर मेरी समझ में केवल मनोरंजन उसका साध्य नहीं है । कविता पढ़ते समय मनोरंजन अवश्य होता है, पर उसके उपरान्त कुछ और भी होता है । मनोरंजन करना कविता का वह प्रधान गुण है जिससे वह मनुष्य के चित्त को अपना प्रभाव जमाने के लिए वश किए रहती है उसे इधर उधर जाने नहीं देती यही कारण है कि नीति और धर्म सम्बन्धी उपदेश चित्त पर वैसा असर नहीं करते जैसा कि काव्य या उपन्यास से निकली हुई शिक्षा असर करती है । केवल यही कहकर कि 'परोपकार करो', 'सदैव सच बोलो', 'चोरी करना महापाप है', हम यह आशा कदापि नहीं कर सकते कि कोई अपकारी मनुष्य परोपकारी हो जाएगा, झूठा सच्चा हो जाएगा, और चोरी करना छोड़ देगा । क्योंकि पहले तो मनुष्य का चित्त ऐसी सूखी शिक्षाएँ ग्रहण करने के लिए उद्यत नहीं होता; दूसरे मानव-जीवन पर उनका कोई प्रभाव अंकित न देखकर वह उनकी कुछ परवाह नहीं करता । पर कविता अपनी. मनोरंजन शक्ति के द्वारा पढ़ने या सुनने वाले का चित्त उचटने नहीं देती, उसके हृदय के मर्म स्थानों का स्पर्श करती है और सृष्टि में उक्त कर्मों के स्थान और सम्बन्ध की सूचना देकर मानव-जीवन पर उनके प्रभाव और परिमाण विस्तृत रूप से अंकित करके दिखलाती है। इन्द्रासन खाली कराने का वचन देकर, यमराज का स्मरण दिलाकर, दोजख की जलती हुई आग की धमकी देकर हम बहुधा किसी मनुष्य को सदाचारी और कर्तव्यपरायण नहीं बना सकते । बात यह है कि इस तरह का लालच या धमकी ऐसी है जिससे, मनुष्य परिचित नहीं और जो इतनी दूर की है कि उसकी परवा करना मानवप्रकृति के विरुद्ध है । सदाचार में एक अलौकिक सौंदर्य और माधुर्य होता है । अत: लोगों को सदाचार की ओर आकर्षित करने का प्रकृत उपाय यही है कि उनको उसका सौन्दर्य और माधुर्य दिखाकर लुभाया जाय, जिससे वे बिना आगा-पीछा सोचे मोहित होकर उसकी ओर ढल पड़े ।

मन को अनुरंजित करना और उसे सुख पहुँचाना ही यदि कविता का धर्म माना जाय तो कविता भी केवल विलास की सामग्री हुई । परन्तु, क्या हम कह सकते हैं कि वाल्मीकि का आदि-काव्य, कालिदास का मेघदूत, तुलसीदास का रामचरितमानस या सूरदास का सूरसागर विलास की सामग्री है ? इन ग्रन्थों से मनोरंजन होगा तो चरित्र-संशोधन भी अवश्य ही होगा । मन लगने से यह सूचित होगा कि मन अब इस अवस्था में हो गया है कि उस पर कोई प्रभाव डाला जाय । खेद के साथ कहना पड़ता है कि हिन्दी भाषा के अनेक कवियों ने श्रृंगारस की उन्मादकारिणी उक्तियों से साहित्य को इतना भर दिया है कि कविता भी विलास. की एक सामग्री समझी जाने लगी है । पीछे से तो ग्रीष्मोपचार आदि के नुसखे भी कवि लोग तैयार करने लगे । गरमी के मौसिम के लिए एक कविजी आज्ञा करते हैं-

 

सीतल गुलाबजल भरि चहबच्चन में,

डारि के कमलदल न्हायबे को धँसिए।

कालिदास अंग अंग अगर अतर संग,

केसर उसीर नीर धनसार घँसिए ।

जेठ में गोबिन्दलाल चंदन के चहलन,

भरि भरि गोकुल के महलन बसिए।

अब शिशिर के मसाले सुनिए--

गुलगुली गिलमें गलीचा है गुनीजन हैं,

चिक हैं चिराके हैं चिरागन की माला हैं।

कहै पदमाकर हैं गजक गजा हू सजी,

सेज है, सुरा है, सुराही है, सुप्याला है

शिशिर के पाला को न व्यापत कसाला तिन्हैं,

जिनके अधीन एते उदित मसाला है

ऐसी श्रृंगारिक कविता को कोई विलास की सामग्री कह बैठे तो उसका क्या दोष? सारांश यह कि कविता का काम मनोरंजन ही नहीं, कुछ और भी है ।

चरित्र चित्रण द्वारा जितनी सुगमता से शिक्षा दी जा सकती है उतनी सुगमता से किसी और उपाय द्वारा नहीं । आदिकाव्य रामायण में जब हम भगवान् रामचन्द्र के प्रतिज्ञा-पालन, सत्यदताचरण, और पितृभक्ति आदि की छटा देखते हैं; भरत के सर्वोच्च स्वार्थत्याग और सर्वांगपूर्ण सात्विक चरित का आलौकिक तेज देखते हैं तब हमारा हृदय श्रद्धा, भक्ति और आश्चर्य से स्तंभित हो जाता है । इसके विरुद्ध जब हम रावण की दुष्टता और उद्दंडता का चित्र देखते हैं तब समझते है कि दुष्टता क्या चीज है .और उसका प्रभाव और परिमाण सृष्टि में क्या है । अब देखिए, कविता द्वारा कितना उपकार होता है । उसका काम भक्ति, श्रद्धा, दया, करुणा, 'क्रोध और प्रेम आदि मनोवेगों को सम और परिमार्जित करना तथा सृष्टि की वस्तुओं और व्यापारों से उनका उचित और उपयुक्त सम्बन्ध स्थिर करना है ।

 

उच्च आदर्श

कविता मनुष्य के हृदय को उन्नत करती है और ऐसे ऐसे उत्कृष्ट और अलौकिक पदर्थों का परिचय करती है जिनके द्वारा यह लोक देवलोक और मनुष्य देवता हो सकता है ।

 

कविता की आवश्यकता

कविता इतनी प्रयोजनीय वस्तु है कि संसार की गय और असम्य सभी जातियों में पाई जाती है । चाहे इतिहास न हो, विज्ञान न हो, प्रदर्शन .न हो, पर कविता अवश्य होगी । इसका क्या कारण है? बात यह है कि मनुष्य अपने ही व्यापारों का ऐसा घना मण्डल बाँधता. चला आ रहा है जिसके भीतर फँसकर वह शेष सृष्टि के साथ अपने हृदय का सम्बन्ध कभी कभी नहीं रख सकता । इस बात से मनुष्य की मनुष्यता जाती रहने का डर रहता है । अतएव मानुषी प्रकृति को जाग्रत् रखने के लिए कविता मनुष्य-जाति के संग लग गई है । कविता यही प्रयत्न करती है कि शेष प्रकृति से मनुष्य की दृष्टि फिरने न पावे । जानवरों को इसकी जरूरत नहीं । हमने किसी उपन्यास में पढ़ा है कि एक चिड़चिड़ा बनिया अपनी सुशीला .और परम रूपवती वधू को अकारण निकालने के उद्यत हुआ । जब उसके पुत्र ने अपनी स्त्री की ओर से कुछ कहा तो वह चिढ़कर बोला-चल चल! भोली सूरत पर मरा जाता हैं ।'' आह! यह कैसा अमानुषिक बर्ताव है । संसारिक बन्धनों में फँसकर मनुष्य का हृदय कभी कभी इतना कठोर और कुंठित हो जाता है कि उसकी चेतनता-उसका मानुष भाव--कम हो जाता है । न उसे किसी का रूप-माधुर्य देखकर उस पर उपकार करने की इच्छा होती है, न उसे किसी दीन दुखिया की पीड़ा देखकर करुणा आती है, न उसे अपमान-सूचक बातें सुनकर क्रोध आता है । ऐसे लोगों से यदि किसी लोमहर्षण अत्याचार की बात कही जाय तो मनुष्य के स्वाभाविक धर्मानुसार वे क्रोध या घृणा प्रकट करने के स्थान पर रुखाई के साथ यही कहेंगे-''जाने दो' हमसे क्या मतलब ? चलो, अपना काम देखो ।'' याद रखिए, यह महाभयानक मानसिक रोग है इससे मनुष्य जीते जी मृतवत्‌ हो जाता है । कविता इसी मर्ज की दवा है ।

 

सृष्टिसौन्दर्य

कविता सृष्टि-सौन्दर्य का अनुभव कराती है और मनुष्य को सुन्दर वस्तुओं में अनुरक्त और कुत्सित वस्तुओं से विरक्त करती है । कविता जिस प्रकार विकसित कमल, रमणी के मुख आदि का सौन्दर्य चित्त में अंकित करती है उसी प्रकार सौन्दर्य, वीरता, त्याग, दया इत्यादि का सौन्दर्य भी दिखाती है । जिस प्रकार वह रौरव नरक और गंदी गलियों की वीभत्सता दिखाती है उसी प्रकार क्रूरों की हिंसावृत्ति और दुष्टों की ईर्षा आदि की जघन्यता भी । यहीं तक नहीं, जिन वृत्तियों का प्राय: बुरा रूप ही हम संसार में देखा करते हैं उनका सुन्दर रूप भी वह अलग करके दिखाती है । दशवदन-निधनकारी राम के क्रोध के सौन्दर्य पर कौन मोहित न होगा? जो कविता रमणी के रूप-सौंदर्य से हमें आह्लादित करती है वही उसके अंतःकरण की सुन्दरता और कोमलता आदि की मनोहारिणी छाया दिखा- कर मुग्ध भी करती है । जिस बंकिम की लेखनी ने गढ़ के ऊपर बैठी हुई राजकुमारी तिलोत्तमा के अंग-प्रत्यंग की शोभा को अंकित किया है उसी ने आयशा के अंतःकरण की अपूर्व सात्विकी ज्योति दिखाकर पाठकों को चमत्कृत किया है । बाह्य सौन्दर्य के अवलोकन से हमारी आत्मा को जिस प्रकार सन्तोष होता है उसी प्रकार मानसिक सौन्दर्य से भी । जिस प्रकार वन, नदी, पर्वत, झरने आदि से हम आह्‌लादित होते हैं उसी प्रकार मानसिक अंतःकरण में प्रेम, स्वार्थत्याग, दया, दाक्षिण्य, करुणा, भक्ति आदि उदात्त वृत्तियों को प्रतिष्ठित देख हम आनन्दित होते हैं । यदि इन दोनों बाह्य और आभ्यन्तर सौन्दयों का संयोग कहीं दिखाई पड़े तो फिर क्या कहना है? यदि किसी अत्यन्त सुन्दर पुरुष या अत्यन्त रूपवती स्त्री के रूप मात्र का वर्णन करके हम छोड़ दें तो चित्र अपूर्ण होगा; किन्तु यदि हम साथ ही हृदय की दृढ़ता और सत्यप्रियता अथवा कोमलता और स्नेह-शीलता आदि की भी झलक दिखाएँ तो उस वर्णन में सजीवता आ जायगी ।

बात यह है कि कविता सौन्दर्य और सात्विकशीलता या कर्तव्य परायणता में भेद नहीं देखा चाहती । इसी से उत्कर्ष-साधन के लिए कवियों ने प्राय: रूप-सौन्दर्य और अंतःकरण के सौन्दर्य का मेल कराया है । राम का रूप-माधुर्य और रावण का विकराल रूप अन्तःकरण के प्रतिबिम्ब मात्र हैं । बाह्य प्रकृति को भी मिला लेने से वर्णन. का प्रभाव कभी कभी बहुत बढ़ जाता है । चित्रकूट ऐसे रम्य स्थान में राम और भरत ऐसे रूपवानों के रम्य अन्तःकरण की छटा का क्या कहना है!

 

कविता का दुरुपयोग

जोग लोग स्वार्थवश व्यर्थ की प्रशंसा और खुशामद करके वाणी का' दुरुपयोग करते हैं वे सरस्वती का गला घोंटते हैं । ऐसी तुच्छ वृत्तिवालों को कविता न करनी चाहिए । कविता उच्चाशय, उदार और निःस्वार्थ हृदय की उपज है । सत्कवि मनुष्य-मात्र के हृदय में सौन्दर्य का प्रवाह बहाने वाला है । उसकी दृष्टि में राजा और रंक सब समान है । वह उन्हें मनुष्य के सिवा और कुछ नहीं समझता । जिस प्रकार महल में रहनेवाले बादशाह के वास्तविक सद्‌गुणों की वह प्रशंसा करता है उसी प्रकार झोपड़े में रहने-वाले किसान के सद्‌गुणों की भी । श्रीमानों के शुभागमन की कविता' लिखना और बात बात पर उनको बधाई देना सत्कवि का काम नहीं । हां, जिसने निःस्वार्थ होकर और कष्ट सहकर देश और समाज की सेवा की है, दूसरों का हित-साधन किया है, धर्म का पालन किया है ऐसे परोपकारी महात्मा का गुणगान करना उसका कर्तव्य है ।

 

कविता की भाषा

मनुष्य स्वभाव ही से प्राचीन पुरुषों और वस्तुओं को श्रद्धा की दृष्टि से देखता है । पुराने शब्द हम लोगों को मालूम ही रहते हैं । इसी से कविता में कुछ न कुछ पुराने शब्द आ ही जाते हैं । उनका थोड़ा बहुत बना रहना अच्छा भी है । वे आधुनिक और पुरातन कविता के बीच सम्बन्ध सूत्र का काम देते हैं । हिन्दी में राजते हैं', गहते हैं', लश्कें हैं' सरसाते हैं' आदि प्रयोगों का खड़ी बोली तक की कविता में बना रहना कोई अचम्भे की बात नहीं । अंगरेजी कविता में भी ऐसे शब्दों का अभाव नहीं जिनका व्यवहार बहुत पुराने जमाने से कविता में होता आया है । “Main” “Swain” ( मेन स्वेन ) आदि शब्द ऐसे ही है । अंगरेजी कविता समझने के लिए इनसे परिचित होना पड़ता है । पर ऐसे शब्द बहुत थोड़े आने चाहिएँ; वे भी ऐसे जो भद्दे और गँवारू न हों । खड़ी बोली में संयुक्त क्रियाएँ बहुत लम्बी होती हैं; 'जैसे-'लाभ करते है', 'प्रकाश करते हैं' आदि कविता में इनके स्थान पर लहते हैं', प्रकाशते हैं' कर देने से कोई हानि नहीं । पर यह बात इस तरह के सभी शब्दों के लिए ठीक नहीं हो सकती ।

कविता में कही गई बात चित्र रूप में हमारे सामने आती है, संकेत रूप में नहीं । अत: उसमें गोचर रूपों का ही विधान अधिकतर होता है । वह ऐसे ही व्यापारों को लेती है जो संसार में सबसे अधिक मनुष्यों को सबसे अधिक दिखाई पड़ते हैं । उसमें प्रत्यक्ष और स्वभावसिद्ध व्यापार- सूचक शब्दों की संख्या अधिक रहती है । 'समय बीता जाता है' कहने की अपेक्षा 'समय भागा जाता है' कहना अधिक काव्य-सम्मत है। किसी काम से 'हाथ खींचना', किसी का रुपया खा जाना', बात 'पी जाना', 'दिन ढलना या डूबना', 'मन मारना', 'मन छूना', 'शोभा बरसना' आदि ऐसे ही कवि- समयसिद्ध वाक्य हैं जो बोलचाल में आ गए हैं । नीचे कुछ पद्य उदाहरण स्वरूप दिए जाते हैं-

 

( क) धन्य भूमि बन पंथ पहारा ।

जँह जँह नाथ पाँव तुम धारा --तुलसी

( ख) मनहुं उमगि अँग अँग छबि छलके ।-तुलसी

( ग) चूनर चाह हुई सी परै ।

( घ) बीथिन में बज में नवेलिन में बेलिन बनन में बागन में बगरो र

बसन्त है ।-पद्माकर

 

बहुत से ऐसे शब्द जिनसे एक ही का नहीं किन्तु कई क्रियाओं का 'एक ही साथ बोध होता है । ऐसे शब्दों को हम मिश्रसंकेत कह सकते हैं । किसी ने कहा ''वहाँ बड़ा अत्याचार हो रह।. है'' इस अत्याचार शब्द के 'अन्तर्गत मारना-पीटना, डाटना-डपटना, लूटना-पाटना इत्यादि बहुत से व्यापार हो सकतें हैं । अत:' 'अत्याचार' शब्द के सुनने से उन सब व्यापारों का एक मिला-बुला अस्पष्ट भाव अन्तःकरण में आता है, कल्पना में किसी .एक व्यापार का स्पष्ट चित्र अंकित नहीं होता । इससे यह शब्द कविता .के काम का नहीं है । ऐसे शब्द वैज्ञानिक विषयों में अधिक आते है । उनमें से कुछ शब्द तो एक विलक्षण ही अर्थ देते हैं और पारिमाषिक कहलाते हैं । विज्ञानवेत्ता को किसी बात की सत्यता या असत्यता के निर्णय की जल्दी रहती है । इससे वह कई बातों को एक' मानकर अपना काम चलाता है; प्रत्येक काम को पृथक-पृथक् दृष्टि से नहीं देखता । यही कारण है जो वह 'ऐसे शब्द अधिक व्यवहार करता है जिनसे कई क्रियाओं से घटित' एक ही भाव का अर्थ निकलता है । परन्तु कविता प्राकृतिक व्यापारों को कल्पना द्वारा प्रत्यक्ष करती है-मानवहृदय पर अंकित करती है । अतएव पूर्वोंक्त प्रकार के शब्द अधिक लाने से कविता के प्रसाद गुण की हानि होती है और व्यक्त किए गए भाव हृदय पर अच्छी तरह अंकित नहीं होते । बात यह है कि मानवी कल्पना इतनी प्रशस्त नहीं कि एक ही बार में कई व्यापार उसके द्वारा हृदय पर स्पष्ट रीति से खचित हो सकें । यदि कोई ऐसा शब्द, प्रयोग में लाया गया जो कई संयुक्त व्यापारों का बोधक है, तो संभव है, कल्पना-शक्ति किसी एक व्यापार को भी न ग्रहण कर सके; अथवा तदन्तर्गत कोई ऐसा व्यापार ग्रहण करे जो रागात्मिका प्रकृति का उद्दीपक न हो तात्पर्य यह कि पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग, तथा ऐसे शब्दों का समावेश जो किन्हीं संयुक्त व्यापारों की सूचना देते हैं, कविता में वांछित नहीं ।

किसी ने प्रेमफजौदारी' नाम की श्रृंगार-रस-विशिष्ट एक छोटी सी कविता अदालती कार्रवाइयों पर घटाकर लिखी है और उसे 'एकतरफा:- डिगरी आदि कानूनी शब्दों से भर दिया है । यह उचित नहीं । कविता का उद्देश्य इसके विपरीत व्यवहार से सिद्ध होता है । जब कोई कवि किसी दार्शनिक सिद्धान्त को अधिक प्रभावोत्पादक बनाकर उसे लोगों के चित पर अंकित करना चाहता है तब वह जटिल और पारिभाषिक शब्दों को निकाल कर उसे अधिक प्रत्यक्ष और मर्मस्पर्शी रूप देता है । भर्तृहरि, कबीर गोस्वामी तुलसीदास आदि इस बात में बहुत निपुण थे ।

अँगरेजी में पोप कवि इस विषय में बहुत सिद्धहस्त था । नीचे उसका एक साधारण सिद्धान्त लिखा जाता है ''भविष्यत् क्या होनेवाला है, इस बात की अनभिज्ञता इसलिए दी गई है जिसमें सब लोग, आनेवाले अनिष्ट की शंका से, उस अनिष्ट घटना के पूर्ववर्ती दिनों के सुख को भी न खो: बैठें ।'' इसी बात को पोप कवि इस तरह कहता है-

 

उस बलि-पशु को देख आज जिसका, त् हे नर!

निज उमंग में रक्त बहाएगा ' बेदी पर ।।n

होता उसको ज्ञान कहीं तेरा है जैसा ।

करता कभी उछलता फिरता ऐसा?

अंतिम क्षण तक खाता-पीता काल काटता ।

हनने को जो हाथ उठा है उसे चाटता ।

आहम का अज्ञान ईश का परम अनुग्रह।

 

'अनिष्ट' शब्द का अर्थ बहुत व्यापक और संदिग्ध है अत: कवि मृत्यु .ही को सबसे अधिक अनिष्ट वस्तु समझता है । मृत्यु की आशंका से प्राणिमात्र का विचलित होना स्वाभाविक है । कवि दिखलाता है कि पशु भी मृत्यु के शिर पर नाचते रहते खाता-पीता जाता है, यहाँ तक कि वह प्रहारकर्ता के हाथ को भी चाटता जाता है, यह एक अद्‌भुत और मर्मस्पर्शी दृश्य है । पूर्वोक्त सिद्धान्त को यहाँ काव्य का रूप प्राप्त हुआ है ।

एक और साधारण सा उदाहरण लीजिए । 'तुमने उससे विवाह किया' 'एक बहुत ही साधारण वाक्य है । पर 'तुमने हाथ पकड़ा' यह एक विशेष अर्थ-गर्भित और काव्योचित वाक्य है । 'विवाह' शब्द के अन्तर्गत बहुत से विधान हैं जिन पर सब कोई एक दफे दृष्टि नहीं डाल सकते । अत: उससे कोई बात स्पष्ट रूप से कल्पना में नहीं आती । इस कारण इन विधानों में से सबसे प्रधान और स्वाभाविक बात जो हाथ पकड़ना है उसे चुनकर कवि अपने अर्थ को मनुष्य के हृदयपटल पर रेखांकित करता है ।

 

श्रुति-सुखदता

कविता की बोली और साधारण बोली में बड़ा अन्तर है । शुष्को वृक्षस्तिष्ठत्यग्रे'' और नीरसतरुरिह विलसति पुरत:'' वाली बात हमारी पंडित-मंडली में बहुत दिन से चली आती है । भाव-सौंदर्य और नाद- सौन्दर्य दोनों के संयोग से कविता की सृष्टि होती है । श्रुतिकटु मानकर कुछ अक्षरों का परित्याग, वृत्त-विधान और अंत्यानुप्रास का बन्धन, इसी नाद-सौन्दर्य के निबाहने के लिए है । बिना इसके कविता करना, अथवा इसी को सर्वस्व मानकर कविता' करने की कोशिश करना, निष्फल है । नाद- सौन्दर्य के साथ भाव-सौन्दर्य भी' होना चाहिए । हिन्दी के कुछ पुराने कवि नाद-सौन्दर्य के इतना पीछे पड़ गए थे कि उनकी अधिकांश कविता विकृत और प्रायः भावशून्य हो गई है यह देख आजकल के कुछ समलोचक इतना चिढ़ गए हैं कि ऐसी कविता को एकदम निकाल बाहर करना चाहते हैं । किसी को अंत्यानुप्रास का बन्धन खलता है; कोई गणात्मक छन्दों को देखकर नाक-भौं चढ़ाता है; कोई फारसी के मुखम्मस और रुबाई की ओर झुकता है । हमारी छन्दोरचना तक की कोई-कोई अवहेलना करते हैं-वह छन्दों- रचना जिसके माधुर्य को भू-मंडल के किसी देश का .छंद शास्त्र नहीं पा सकता और हमारी श्रुति सुखदता के स्वाभाविक प्रेम के सर्वथा अनुकूल है । जो लोग अंत्यानुप्रास की बिलकुल आवश्यकता नहीं समझते उनसे' मुझे यही पूछना है कि अंत्यानुप्रास ही पर इतना कोप क्यों? छन्द और तुक दोनों ही नाद-सौन्दर्य के उद्देश्य से रखे गए हैं । फिर क्यों एक निकाल जाय, दूसरा नहीं १ यदि कहा जाय कि सिर्फ छन्द ही से उस उद्देश्य की सिद्धि हो जाती है तो यह जानने की इच्छा बनी रहती है कि क्या कविता के लिए नाद सौन्दर्य की कोई सीमा नियमित है । यदि किसी कविता में भाव-सौन्दर्य भी वर्तमान हो तो वह अधिक ओजस्विनी और चिरस्थायिनी होगी । नाद-सौन्दर्य कविता के स्थायित्व का वर्धक है, उसके बल से कविता ग्रन्थाश्रयविहीन होने पर भी किसी न किसी अंश में लोगों की जिह्वा पर बनी रहती है । अतएव इन नाद-सौन्दर्य को केवल बन्धन ही न समझना चाहिए । यह कविता की आत्मा नहीं तो शरीर अवश्य है ।

नाद-सौन्दर्य-सम्बधी नियमों को गणित-क्रिया के समान काम में लाने से हमारी कविता में कहीं-कहीं बड़ी विलक्षणता आ गई है । श्रुतिकटु वर्णों का निर्देश इसलिए नहीं किया गया कि जितने अक्षर श्रवण-कटु है वे एकदम त्याज्य समझे जायँ और उनकी जगह पर श्रवण-सुखद वर्ण ढूंढ ढूंढकर रखे जायँ इस नियम-निर्देश का मतलब इतना ही है कि यदि मघुराक्षरवाले शब्द मिल सके और बिना तोड़मरोड़ के प्रसंगानुसार खप सकें तो उनके स्थान पर श्रुति-कर्कश अक्षरवाले शब्द न लाए जायँ । संस्कृत से संबन्ध रखनेवाली भाषाओं में इस नाद-सौन्दर्य का निर्वाह अधिकता से हो सकता है । अत: अंगरेजी आदि अन्य भाषाओं की देखा- देखी, जिनमें इसके लिए कम जगह है, अपनी कविता को भी हमें इस विशेषता से वंचित कर देना बुद्धिमानी का काम नहीं । पर, याद रहे, सिर्फ श्रुतिमधुर अक्षरों के पीछे दीवाने रहना और कविता को अन्यान्य गुणों से भूषित न करना सबसे बड़ा दोष है ।

एक और विशेषता हमारी कविता में है । वह यह है कि कहीं-कहीं व्यक्तियों के नामों के स्थान पर उनके रूप, गुण या कार्य-बोधक शब्दों का व्यवहार किया जाता है । यों देखने में पद्य के नपे हुए चरणों में खपाने के लिए शब्दों की संख्या का बढ़ना ही इसका प्रयोजन जान पड़ता है; पर विचार करने से इसका इससे भी गुरुतर उद्देश्य प्रकट होता है । सच पूछिए तो यह बात कृत्रिमता बचाने के लिए की जाती है । मनुष्यों के नाम यथार्थ में कृत्रिम संकेत हैं जिनसे कविता की परिपोषकता नहीं होती । अतएव कवि मनुष्यों के नामों के स्थान पर कभी-कभी उनके ऐसे रूप, गुण या व्यापार की ओर इशारा करता है जो स्वाभाविक होने के कारण सुनने वाले के ध्यान में अधिक आ सकते हैं और प्रसंग-विशेष के अनुकूल होने से वर्णन की यथार्थता को बढ़ाते हैं । गिरिधर, मुरारी, त्रिपुरारि, दीनबन्धु, चक्रपाणि, दशमुख आदि शब्द ऐसे ही हैं । ऐसे शब्दों को चुनते समय प्रसंग या अवसर का ध्यान अवश्य रखना चाहिए । जैसे, यदि कोई मनुष्य किसी दुर्धर्ष अत्याचारी के हाथ से छुटकारा पाना चाहता हो तो उसके लिए 'हे गोपिका- रमण !' 'हे वृन्दावन-विहारी ।' आदि कहकर कृष्ण को पुकारने की अपेक्षा 'हे मुरारि ।' 'हे कंसनिकटन !' आदि संबोधनों से पुकारना अधिक उपयुक्त है । क्योंकि श्रीकृष्ण के द्वारा मुर और कंस आदि दुष्टों का मारा जाना देखकर उसे उनसे अपनी रक्षा की आशा हुई है, न कि उनका वृन्दावन में गोपियों के साथ विहार करना देखकर । इसी तरह किसी आपत्ति से उद्धार पाने के लिए कृष्ण को 'मुरलीधर' कहकर पुकारने की अपेक्षा 'गिरिधर' कहना अधिक अर्थसंगत है ।

 

अलंकार

कविता में भाषा को खूब जोरदार बनाना पड़ता है-उसकी सब शक्तियों से काम लेना पड़ता है । वस्तु या व्यापार का चित्र चटकीला करने और रस-परिपाक के लिए कभी किसी वस्तु के रूप और गुण को वैसी ही और वस्तुओं के साहचर्य द्वारा और मनोरंजक बनाने के लिए उसके समान रूप और धर्मवाली और-और वस्तुओं को सामने लाकर रखना पड़ता है । इस तरह की भिन्न-भिन्न वर्णन-प्रणालियों का नाम अलंकार है । इनका उपयोग काव्य में प्रसंगानुसार विशेष रूप से होता है । इनसे वस्तु-वर्णन में बहुत सहायता मिलती है । कहीं-कहीं तो इनके बिना कविता का काम ही नहीं चल सकता । किन्तु इससे यह न समझना चाहिए कि अलंकार ही कविता है । अलंकार बोल-चाल में 'भी रोज आते रहते हैं । जैसे, लोग कहते हैं ''जिसने शालग्राम को भून डाला उसे भटा भूनते क्या लगता है ?'' ये काव्य नहीं कहे जा सकते । जहाँ किसी-प्रकार की रसव्यंजना होगी वहीं किसी वर्णन-प्रणाली को अलंकारता प्राप्त हो सकती है ।

कई वर्ष हुए अलंकारप्रकाश' नामक पुस्तक के कर्ता का एक लेख सरस्वती' में निकला था । उसका नाम था 'कवि और काव्य' उसमें उन्होंने -अलंकारों की प्रधानता स्थापित करते हुए और उन्हें काव्य का सर्वस्व मानते हुए लिखा था कि ''आजकल के बहुत से विद्वानों का मत विदेशी भाषा के प्रभाव से काव्य-विषय में कुछ परिवर्तित देख पड़ता है । वे महाशय सर्व- लोकमान्य साहित्य ग्रंथों में विवेचन किए हुए अलंकार-युक्त काव्य को उत्कृष्ट न समझ केवल सृष्टिवैचित्र्य-वर्णन में काव्यत्व समझते है ।'' यदि ऐसा' है तो इसमें आश्चर्य ही क्या ? रस और भाव ही कविता के प्राण है । पुराने विद्वान् रसात्मक कविता ही को कविता कहते थे । रसों अथवा मनोविकारों के यथेष्ट परिपाक ही की ओर उनका' ध्यान अधिक था । अलंकारों को वे आवश्यकतानुसार वर्णित विषय को विशेषतया हृदयंगम कराने के लिए ही लाते थे । यह नहीं समझा जाता था कि अलंकार के बिना कविता हो ही नहीं सकती । स्वयं काव्यप्रकाश के कर्ता मम्मटाचार्य ने बिना अलंकार के काव्य का होना माना है और उदाहरण भी दिया है- तददोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृती पुन: क्वापि ।'' किन्तु पीछे से इन अलंकारों ही में काव्यत्व मान लेने से कविता अभ्यासगम्य और सुगम प्रतीत होने लगी । इसी से लोग उनकी ओर अधिक झुक पड़े । धीरे-धीरे इन अलंकारों के लिए आग्रह बढ़ने लगा, यहाँ तक कि चंद्रालोककार ने लिख डाला-

अंगीकरोति य: काव्यं शब्दार्थावनलंकृती ।

असौ न मन्यते कस्मादनुष्णामनलं कृती ।।

अर्थात् जो अलङ्काररहित शब्द और अर्थ को काव्य मानता है वह अग्नि को उष्णतारहित क्यों नहीं मानता? किंतु यथार्थ बात कब तक छिपाई जा सकती है । इतने दिनों पीछे समय ने फिर पलटा खाया । '.विचारशील लोगों पर यह बात प्रगट हो गई कि रसात्मक वाक्यों ही का नाम कविता है और रस ही कविता की आत्मा है ।

इस विषय में पूर्व ग्रंथकार महोदय को एक बात कहनी थी; पर उन्होंने नहीं कही । वे कह सकते थे कि सृष्टि-वैचित्र्य वर्णन भी तो स्वभावोक्ति अलंकार है । इसका उत्तर यह है कि स्वभावोक्ति को अलंकार, मानना उचित नहीं । वह अलंकार की श्रेणी में आ ही नहीं सकती । वर्णन करने की प्रणाली का नाम अलंकार है । जिस वस्तु को हम चाहें उस प्रणाली के अन्तर्गत करके उसका वर्णन कर सकते हैं । किसी वस्तु- विशेष से उसका सम्बन्ध न होना चाहिए । वस्तुनिर्देश अलंकार का विषय. नहीं, वह यथार्थ में रस का विषय है । अलंकार वर्ण-शैली मात्र को कह सकते हैं । इस दृष्टि से कई अलंकार ऐसे हैं जिन्हें अलंकार नहीं कहना, चाहिए; जैसे, स्वाभावोक्ति, अतिशयोक्ति से भिन्न अत्युक्ति, स्मरण, अल्प, उदात्त । स्वभावोक्ति में वर्ण्य वस्तु का निर्देश है; पर वस्तु-विर्नाचन. अलंकार का काम नहीं । इससे स्वभावोक्ति को अलंकार मानना ठीक. नहीं । उसे अलंकार में गिननेवालों ने बहुत सिर खपाया हैं; पर उसका निर्दोष लक्षण नहीं कह सके । काव्यप्रकाश के कारिकाकार, ने उसका लक्षण लिखा है –

स्वभावोक्तिस्तु डिम्भादेः स्वक्रियारूपवर्णनम् ।

अर्थात् जिसमें बालकादिकों की निज की क्रिया या रूप का वर्णन हो, वह स्वभावोक्ति है । बालकादिक कहने से किसी वस्तुविशेष का बोध तो होता नहीं । इससे यही समझा जा सकता है कि सृष्टि की वस्तुओं के व्यापार और रूप का वर्णन स्वभावोक्ति है । इस लक्षण में अतिव्याप्ति दोष, के कारण अलंकारता नहीं आती । अलडार-सर्वस्व के कर्ता राजानक. रूय्यक ने इसका यह लक्षण लिखा है-

सूक्ष्वस्तुस्वभावयथावद्वर्णनं स्वभावोक्तिः ।

अर्थात् वस्तु के सूक्ष्म स्वभाव का ठीक-ठीक वर्णन करना स्वभावोक्ति. है । आचार्य दंडी ने अवस्था की योजना करके यह' लक्षण लिखा है -

नानावस्थं पदार्थानां रूपं साक्षाद्विवृण्वती

स्वभावोक्तिश्च जातिश्चेत्याद्या। सालंकृतिर्यथा ।।

बात यह है कि स्वमावोक्ति अलंकार के अन्तर्गत आ ही नहीं सकती, क्योंकि वह वर्णन करने की प्रणाली नहीं, किन्तु वर्ण्य वस्तु या विषय है ।

जिस प्रकार एक कुरूपा स्त्री अलंकार धारण करने से सुन्दर नहीं हो सकती उसी प्रकार अस्वाभाविक, भद्दे और क्षुद्र भावों को अलंकार-स्थापना, सुन्दर और मनोहर नहीं बना सकती । महाराज भोज ने भी अलंकार को: अलमर्थमलंकर्तु:' अर्थात् सुन्दर अर्थ को शोभित करने वाला ही कहा है ।' इस कथन से अलंकार आने के पहले ही कविता की सुन्दरता सिद्ध है । अतः उसे अलंकारों में ढूंढना भूल है । अलंकारों से युक्त बहुत से ऐसे काव्योदाहरण दिए जा सकते हैं जिनको अलंकार के प्रेमी लोग भी भद्दा और नीरस कहने में संकोच न करेंगे । इसी तरह बहुत से ऐसे उदाहरण भी दिए जा सकते हैं जिनमें एक भी अलंकार नहीं; किन्तु उनके सौन्दर्य और मनोरंजकत्व को सब स्वीकार करेंगे । जिन वाक्यों से मनुष्य के चित्त- में रस-संचार न हो-उसकी मानसिक स्थिति में कोई परिवर्तन न हो-- वे कदापि काव्य नहीं । अलंकार शास्त्र की कुछ बातें ऐसी है जो शब्द. चातुरी मात्र हैं । शब्दकौशल के कारण वे चित्त को चमत्कृत करती हैं । उनसे रस-संचार नहीं होता । वे चमत्कृत चाहे भले ही करें, पर मानव- हृदय के स्रोतों से उनका विशेष सम्बन्ध नहीं । उनका चमत्कार शिल्पकारों की कारीगरी के समान सिर्फ शिल्प-प्रदर्शिनी में रखने ही योग्य होता है ।

अलङ्कार है क्या वस्तु ? विद्वानों ने काव्यों के सुन्दर-सुन्दर स्थलों को पहले चुना । फिर उनकी वर्णनशैली के सौन्दर्य का कारण ढूंढा । तब वर्णन-वैचित्र्य के अनुसार भिन्न-भिन्न लक्षण बनाए; जैसे 'विकल्प' अलंकार को पहले पहल राजानक रुय्यक ने ही निकाला है । अब कौन कह सकता है कि काव्यों के जितने सुन्दर-सुन्दर स्थल थे सब ढूंढ डाले गए, अथवा जो सुन्दर समझे गए--जिन्हें लक्ष्य करके लक्षण बने-उनकी सुन्दरता का कारण कही हुई वर्णन-प्रणाली ही थी । अलंकारों के लक्षण बनने तक काव्यों का बनना नहीं रुका रहा । आदि कवि महर्षि वाल्मीकि ने- “मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शाश्वतीः समा:'' का उच्चारण' किसी .अलंकार को ध्यान में रखकर नहीं किया । अलङ्कार-लक्षणों के बनने के बहुत पहले कविता होती थी । और अच्छी होती थी । अथवा यों कहना चाहिए कि जब से इन अलंकारों को हठात् लाने का उद्योग होने लगा तब से कविता कुछ बिगड़ चली ।

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शुभम श्री की भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार प्राप्त कविता "पोएट्री मैनेजमेंट"

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कविता लिखना बोगस काम है !

अरे फ़ालतू है !

एकदम

बेधन्धा का धन्धा !

पार्ट टाइम !

साला कुछ जुगाड़ लगता एमबीए-सेमबीए टाइप

मज्जा आ जाता गुरु !

माने इधर कविता लिखी उधर सेंसेक्स गिरा

कवि ढिमकाना जी ने लिखी पूँजीवाद विरोधी कविता

सेंसेक्स लुढ़का

चैनल पर चर्चा

यह अमेरिकी साम्राज्यवाद के गिरने का नमूना है

क्या अमेरिका कर पाएगा वेनेजुएला से प्रेरित हो रहे कवियों पर काबू?

वित्त मन्त्री का बयान

छोटे निवेशक भरोसा रखें

आरबीआई फटाक रेपो रेट बढ़ा देगी

मीडिया में हलचल

समकालीन कविता पर संग्रह छप रहा है

आपको क्या लगता है आम आदमी कैसे सामना करेगा इस संग्रह का ?

अपने जवाब हमें एसएमएस करें

अबे, सीपीओ (चीफ़ पोएट्री ऑफ़िसर) की तो शान पट्टी हो जाएगी !

हर प्रोग्राम में ऐड आएगा

रिलायंस डिजिटल पोएट्री

लाइफ़ बनाए पोएटिक

टाटा कविता

हर शब्द सिर्फ़ आपके लिए

लोग ड्राइँग रूम में कविता टाँगेंगे

अरे वाह बहुत शानदार है

किसी साहित्य अकादमी वाले की लगती है

नहीं जी, इम्पोर्टेड है

असली तो करोड़ों डॉलर की थी

हमने डुप्लीकेट ले ली

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एलआईसी पोएट्री इंश्योरेंस

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ईरान के रुख़ से चिन्तित अमेरिका

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नमस्कार

आज प्रधानमन्त्री तीन दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय काव्य सम्मेलन के लिए रवाना हो गए

इसमें देश के सभी कविता गुटों के प्रतिनिधि शामिल हैं

विदेश मन्त्री ने स्पष्ट किया है कि भारत किसी क़ीमत पर काव्य नीति नहीं बदलेगा

भारत पाकिस्तान काव्य वार्ता आज फिर विफल हो गई

पाकिस्तान का कहना है कि इक़बाल, मण्टो और फ़ैज़ से भारत अपना दावा वापस ले

चीन ने आज फिर नए काव्यालंकारों का परीक्षण किया

सूत्रों का कहना है कि यह अलंकार फिलहाल दुनिया के सबसे शक्तिशाली

काव्य संकलन पैदा करेंगे

भारत के प्रमुख काव्य निर्माता आशिक़ आवारा जी काआज तड़के निधन हो गया

उनकी असमय मृत्यु पर राष्ट्रपति ने शोक ज़ाहिर किया है

उत्तर प्रदेश में फिर दलित कवियों पर हमला

उधर खेलों में भारत ने लगातार तीसरी बार

कविता अंत्याक्षरी का स्वर्ण पदक जीत लिया है

भारत ने सीधे सेटों में ‍‍६-५, ६-४, ७-२ से यह मैच जीता

समाचार समाप्त हुए

आ गया आज का हिन्दू, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, प्रभात ख़बर

युवाओं पर चढ़ा पोएट हेयरस्टाइल का बुखार

कवियित्रियों से सीखें हृस्व दीर्घ के राज़

३० वर्षीय एमपीए युवक के लिए घरेलू, कान्वेण्ट एजुकेटेड, संस्कारी वधू चाहिए

२५ वर्षीय एमपीए गोरी, स्लिम, लम्बी कन्या के लिए योग्य वर सम्पर्क करें

गुरु मज़ा आ रहा है

सुनाते रहो

अपन तो हीरो हो जाएँगे

जहाँ निकलेंगे वहीं ऑटोग्राफ़

जुल्म हो जाएगा गुरु

चुप बे

थर्ड डिविज़न एम० ए०

एमपीए की फ़ीस कौन देगा?

प्रूफ़ कर बैठ के

ख़ाली पीली बकवास करता है

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(आचार्य रामचंद्र शुक्ल का लेख - डिजिटल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया से साभार तथा शुभम श्री की कविता जानकीपुल से साभार प्रकाशित)

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रचनाकार में मैंने हजारों कविताएँ छापी हैं, और इस बहाने आधा-अधूरा पढ़ा-गुना भी है. शुभम श्री की कविताएँ अलग तेवर की हैं. अंदाजेबयां में नायाब, खिलंदड़ा पन तो है ही, जमाने को ठेठ आईना दिखाता, क्रांतिकारी तेवर और 'बेहद तीक्ष्ण धार' भी है, जो किसी किसी को ही हासिल होता है. जो इन्हें खारिज कर रहे हैं उन्हें ही खारिज हो जाना चाहिए. :)

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

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