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लद गए अखबारों के ज़माने! / डॉ. रामवृक्ष सिंह

आलेख

 

खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो। जब तोप मुक़ाबिल हो तो अखबार निकालो। आम सोच है कि अखबार प्रजातंत्र के रखवाले होते हैं। वे सच को सच कहने का माद्दा रखते हैं। और इसीलिए, दुनिया के तमाम हुक्मरान अखबारों और अखबारनवीसों की इतनी इज्जत करते हैं। जब अकबर इलाहाबादी ने तोप के मुकाबिल अखबार निकालने की बात कही, तब उनका आशय यही था कि अखबार हर ज़ोर-जुलुम की टक्कर में निकलता है। उसमें अवाम की आवाज़ बुलन्द होती है।

इधर कुछ दिनों से मेरे घर कोई अखबार नहीं आया। तीन में से एक भी नहीं। इसलिए नहीं कि मैंने अखबार वाले भाई को मना कर दिया। इसलिए भी नहीं कि मैंने पैसे नहीं भरे। बल्कि दो अखबारों के पैसे तो उसके दफ्तर वाले पहले ही, अग्रिम ले गए हैं। जब कई दिन अखबार नहीं आए तो हमने विक्रेता श्री शुक्लाजी को फोन किया और पूछा कि भइयाजी, अखबार क्यों नहीं देते? शुक्लाजी ने सूचित किया- साहब, हड़ताल चल रही है। बाद में पता चला कि अखबार-विक्रेताओं को अखबार-प्रकाशकों की ओर से कम मुनाफा-राशि की पेशकश हुई थी, इसलिए विक्रेता हड़ताल पर चले गए हैं।

अखबार प्रकाशकों की ओर से एसएमएस आ रहा है कि आप अपनी कॉपी अपनी निकटस्थ पुलिस चौकी से प्राप्त कर लें। हद हो गई! हम तो पुलिस-थाने जाने से वैसे ही कतराते हैं, क्योंकि हम खुद को शरीफ समझते हैं। और ये अखबार वाले हैं कि हमें वहीं जाने को कह रहे हैं। लिहाज़ा अब हमारे घर अखबार नहीं आ रहे। न आ रहे, न हम जाकर ला रहे। तिसपर भी हम ज़िन्दा हैं- बजाब्ते जिन्दा हैं।

इससे और चाहे जो निष्कर्ष निकले, इतना तो तय हो गया कि अखबार का छपना एक बात है और उसका पढ़ा जाना बिलकुल दूसरी बात। अगर विक्रेता लाकर दें तो अखबार पढ़ा जाए, वरना वह छपता ज़रूर है, किन्तु पढ़ा नहीं जाता। यह भी सच है कि लागत के नज़रिए से, अखबार पाठकों के दम पर नहीं चलते। पाठक से एक कॉपी के कितने पैसे मिलते हैं? मुश्किल से तीन या चार रुपये। किन्तु अखबार छापने की लागत है लगभग पन्द्रह से बीस रुपये फी कॉपी। लिहाज़ा लागत के मामले में अखबार पाठक के दम पर नहीं, बल्कि विज्ञापनों के दम पर और किफायती न्यूज-प्रिंट व राजनीतिक शरण के दम पर चलते।

जब शुरु-शुरु में कोई पत्र-पत्रिका छपती है तो उसमें सत्ताधारी दल की तारीफों के पुल बाँधे जाते हैं, उसकी योजनाओं व अन्य कार्यों का रिपोर्ट कार्ड खूब बढ़ा-चढ़ाकर छापा जाता है। नेताओं के बड़े-बड़े चित्रों के साथ उनकी विरुदावलियाँ छापी जाती हं। पत्र-पत्रिका की ऐसी प्रतियाँ नेताओं तक पहुँचाई जाती हैं। नेता खुश होकर उनके संपादकों को पाँच-दस लाख के विज्ञापन दे डालते हैं। राज्य के जन-संपर्क विभाग के अधिकारियों तक पहुँच कायम हो जाने के बाद आगे के अंकों के लिए विज्ञापनों का मिलना सुगम हो जाता है।

कुछ पत्र-पत्रिकाएं, टेबलॉयड आदि इसके विपरीत भी होते हैं। ये पीत पत्रकारिता में विश्वास करते हैं। नेताओं के काले कारनामे उजागर करना, अफसरों के भ्रष्टाचार और भौंडी लोक-रुचि के समाचार बढ़ा-चढ़ाकर छापना इन्हें अधिक सुहाता है। जिस अंक में ऐसी खबरें या लेख हों उनकी प्रतियाँ ये उन लोगों तक पहुँचा देते हैं जिनके काले कारनामे इन्होंने तथाकथित तौर पर उजागर किए हों। कहते हैं कि भ्रष्टाचारी तो वैसे ही डरपोक होता है। प्रकाशन की प्रति मिलते ही भ्रष्टाचारियों की रूह काँपने लगती है। वे प्रकाशन के संपादक से संपर्क करके आगे के लिए उसका मुँह बन्द कर देते हैं। कुछ पत्रकार इस ब्लैकमेलिंग को ही बहुत बड़ा रोज़गार समझते हैं। कई टीवी चैनलों को भी यह रोज़गार करते पाया और पकड़ा गया है।

तो बात यह है कि हम पिछले लगभग एक हफ्ते से अखबार नहीं पढ़ रहे। पहले अखबार निकालना एक मिशन होता था। तोप के मुकाबिल होने पर प्रबुद्ध वर्ग अखबार निकालकर उसका जवाब देता था। लेकिन अब तो अखबार निकालना चलते-पुर्जे लोगों का व्यवसाय है। अखबार निकालो, पत्रकार कहलाओ, नेताओं और अफसरों को अर्दब में लो। गाड़ी पर पत्रकार लिखवाओ, यातायात पुलिस पर रौब गाँठो, यहाँ-वहाँ अपना परिचय-पत्र दिखाओ, विशेष सुविधाएँ, कोटा और रियायतें पाओ। अपने उत्तर प्रदेश में तो अखबार-नवीसों ने ऐसी-ऐसी बिल्डिंगों में फ्लैट आवंटित करा लिए हैं, जहाँ केवल विधायक और बड़े-बड़े नेताओं को ही रहना मयस्सर हो पाता है। अखबार-नवीसों पर यह मेहरबानी इसलिए होती है कि वे अपने आकाओं के बारे में अच्छा-अच्छा लिखते-छापते रहें और उनकी काली करतूतों पर पर्दा डाले रहें।

कड़वी सच्चाई तो यह है कि अब तोप के मुक़ाबिल होने पर अखबार निकालने का माद्दा किसी में नहीं रहा। बहुत-से अखबार तो राजनीतिक दल खुद ही निकालते-निकलवाते हैं। और बहुतों का मक़सद शुद्ध व्यवसाय और तज्जन्य लाभ मात्र है। लाभ के कुछ स्रोतों व स्वरूपों का वर्णन ऊपर हो चुका, जो हर अखबार और अखबार-नवीस को उसकी औक़ात व बिसात के हिसाब से मिलता है, और बराबर वसूला जाता है। अखबारी दुनिया में लाभ का एक बहुत बड़ा स्रोत विज्ञापन है। अगर ईमानदारी से अखबार निकालना हो तो बिना विज्ञापन के काम नहीं चलनेवाला- खर्चे ही नहीं पूरे होंगे। अखबारों में विज्ञापन का इतना महत्त्व है कि बहुत-से अखबार तो विज्ञापनों का पुलिन्दा ही लगते हैं। यही हाल टीवी चैनलों का है। वहाँ तो कई बार भ्रम होता है कि मुख्य कार्यक्रम ये विज्ञापन हैं, अथवा समाचार, फिल्म या अन्य प्रकार के फीचर।

हिन्दी-भाषी प्रान्तों में साक्षरता-दर बहुत कम है। किसी तरह काँख-काँखकर लगभग पचास-साठ प्रतिशत लोग उल्टा-सीधा कुछ पढ़-लिख भी ले रहे हैं तो उनमें ऐसी परिष्कारपूर्ण सांस्कृतिक, सामाजिक अथवा जातीय अभिरुचि नहीं विकसित हो पाती कि वे मोल चुकाकर साहित्य खरीदें और पढ़ें। दिल्ली प्रेस तो दशकों तक अपने पाठकों के जमीर को यह लिखकर झकझोरता रहा कि- क्या आप माँगकर खाते हैं? क्या आप माँगकर पहनते हैं? तो आप माँगकर पढ़ते क्यों हैं? माँगने की रवायत अपने देश में बहुत दिनों से रही है। लोग कहते हैं कि पहले गाँव में किसी-किसी संपन्न घर में ही एक जोड़ी अच्छा जूता होता था। यदि गाँव का कोई व्यक्ति किसी रिश्तेदारी जाता तो दूसरे के घर से वह अच्छा वाला जूता माँगकर पहन जाता और रिश्तेदारी से आकर लौटा देता। साइकिल, मोटरसाइकिल परात व तरह-तरह के अन्य बर्तन, चकला-बेलन, बटुली, भगौने, दरी, चौकी-तखत, पेट्रोमैक्स आदि माँगने-देने की परंपरा तो अपने गाँवों में अभी हाल तक रही है और कहीं-कहीं अब भी कायम है। तो माँगने में भी कोई गुरेज़ हो सकता है, यह तो हम ग्राम्य हिन्दुस्तानियों की समझ से ही परे है। यही कारण है कि जब यही हिन्दुस्तानी शहर जा बसा तब भी उसने माँगना जारी रखा। कभी एक कटोरी चीनी, कभी एक प्याज, दो आलू, कभी ज़रा-सी हरी मिर्च, कभी आधा कटोरी अचार... फेहरिश्त लम्बी है। और यह सिद्ध करने के लिए काफी कि भारत में माँगना..यानी माँग कर खाना कभी लज्जा की बात नहीं रही। हमारे घर के बुजुर्ग तो सिखाते थे- भइया माँग कर खा लेने में कोई बुराई नहीं है। बस चोरी न कीजो। माँगने और मुफ्त में तरह-तरह की सौगातें पाने की यह आदत हमारा राष्ट्रीय गुण है। हमने इसे विनियमित भी किया है। देश की जो गैर-सरकारी संस्थाएं विदेश से दान पाना चाहती हैं, उन्हें एफसीएनआर पंजीकरण कराना होता है। सरकार से तरह-तरह से धन पाने के लिए बहुत-सी योजनाएँ हैं और लाखों संस्थाओं का पूर्णकालिक और एकमेव कार्य उस धन की येन-केन-प्रकारेण प्राप्ति ही है। हो सकता है उससे कहीँ कुछ काम भी होता है, किन्तु उसका असर तो कहीं दिखता नहीं।

तो...ऐसे देश में यह उम्मीद करना बेकार है कि लोग माँगकर पढ़ेंगे नहीं। माननीय नरेन्द्र कोहली ने अपनी पुस्तक 'माज़रा क्या है' में बड़े मज़ेदार तरीके से इस गंभीर विमर्श पर प्रकाश डाला है कि माँगकर पढ़ने में बुराई नहीं है। मुद्रित साहित्य को एक बार पढ़ने के बाद भी पाठ्य-सामग्री (पत्रिका, पत्र, पुस्तक आदि) वैसी की वैसी बनी रहती है। वह कोई भोज्य-पदार्थ नहीं है कि एक बार खा लेने के बाद दूसरे के काम की न बचे। लिहाज़ा माँग कर पढ़ना किसी भी तरह से खराब बात नहीं है। यदि ऐसा न किया गया तो मुद्रित साहित्य को एक बार पढ़ने के बाद उसका कोई उपयोग ही नहीं बचेगा। वैसे भी भारत गरीबों का देश है। यदि यहाँ के नागरिक माँगकर पढ़ते हैं तो उसमें बुराई नहीं है। हाँ, इसमें ज़रूर बुराई है कि माँगकर लोग शराब पी जाते हैं। इस देश में पढ़ने की सामग्री नहीं मिलती, पीने की सामग्री इफरात में मिलती है। इस विषय पर हम कई बार स्वतंत्र लेख लिख चुके हैं।

मुद्दे की बात यह है कि हमारे घर अखबार नहीं आ रहे। इससे न हमें और न ही हमारे नगर के दूसरे तमाम नागरिकों की सेहत पर कोई असर पड़ रहा है। यह दीगर बात है कि हम बचपन से अखबार पढ़ने के अभ्यस्त रहे हैं। लेकिन धीरे-धीरे अखबार की हमें लत लग गई और उम्र के इस पड़ाव तक पहुंचते-पहुँचते वह एक प्रकार से अति तक जा पहुँची। किसी ने कहा है कि अति तो किसी भी चीज़ की बुरी होती है। हफ्ते भर से अखबार नहीं आ रहे तो सुबहें लम्बी लगने लगी हैं और अपने तथा परिवार के दूसरे सदस्यों के लिए समय निकालना, उनसे बातें करना, पोते को कंधे पर डालकर सामने पार्क में चहलकदमी करना, उसे तरह-तरह के पंछियों और तितलियों से मिलवाना अब शक्य हो गया है। पहले तो इस सबके लिए समय ही नहीं निकलता था।

यों भी आजकल के अखबारों में पहले जैसी बात नहीं रही। न ही वैसे प्रबुद्ध संपादक व संवाददाता रहे। सारा का सारा अखबार या तो विज्ञापनों से या अपराध समाचारों से भरा रहता है। पढ़कर सुरुचि नहीं, केवल अरुचि और वितृष्णा पैदा होती है। संवाददाता भी अब पहले जैसे मेहनती, निष्पक्ष और सुरुचि-संपन्न नहीं रहे। पीछे सरकारी नौकरी कर रही महिलाओं को छब्बीस हफ्ते के मातृत्व अवकाश का नियम आया। इसे एक अखबार ने अपनी सुर्खी बनाया और लिखा कि अब महिलाओं को साढे छह महीने की प्रसूति छुट्टी मिलेगी। यदि संवाददाता ने अपना दिमाग लगाया होता तो जान पाता कि छब्बीस को सात से गुणा करने पर एक सौ बयासी आता है। साल में तीन सौ पैंसठ दिन, यानी बारह महीने होते हैं। एक सौ बयासी दिन, यानी बावन हफ्ते का साढ़े छह महीना किस तरह हुआ, यह तो संवाददाता ही बता सकता है। ऐसी गणना का केवल एक आधार होगा- जब चार हफ्ते का एक महीना मान लिया जाए। लेकिन हम सब जानते हैं कि चार वर्ष में तीन बार, केवल फरवरी माह में ऐसा होता है। एक बार लीप वर्ष में फरवरी उनतीस दिन का होता है। बाकी हर महीना चार हफ्ते से दो या तीन तीन अधिक का होता है। पर इतना दिमाग कौन खपाए! लिख मारा कि अब साढ़े छह महीने का प्रसूति अवकाश मिलेगा।

हर समझदार आदमी के जीवन का एक फलसफा है- तू नहीं तो और सही। हमारे घर अखबार नहीं आ रहे, तो हम टीवी देखकर खबरें जान लेंगे। नेट पर पढ़ लेंगे। हमारी जिज्ञासा शान्ति के लिए जितनी सामग्री चाहिए, वह हम जुटा लेंगे। चिन्ता करनी है तो अखबार और उसके विक्रेता खुद अपनी चिन्ता करें। यदि अखबारों का सर्कुलेशन कम हो जाएगा, यानी पाठक-संख्या घट जाएगी तो उनमें विज्ञापन कौन छपवाएगा? और यदि पाठक ही टूट जाएँगे तो विक्रेता बन्धु अखबार बेचेंगे किसे? हम जानते हैं कि अखबार डालना अपने-आप में बहुत बड़ा व्यापार है। शहरों में सुबह चार बजे से लेकर साढ़े-सात, आठ बजे तक का यह सबसे चोखा धंधा है। उसके बाद चाहे जो मन आए करो। बहुत-से लोग सुबह अखबार डालते हैं, और उसके बाद दफ्तर जाते हैं, ऑटो चलाते हैं, कोई दुकान चलाते हैं। और जो कुछ नहीं करते वे बच्चों को स्कूल भेजकर पूरे दिन मज़े में पैर पसारकर सोते हैं। मज़े में इसलिए क्योंकि इस धंधे में प्रति कॉपी एक रुपये तक की कमाई है।

ऐसे में पाठक, यानी धंधे के सबसे महत्त्वपूर्ण घटक से यह उम्मीद करना निहायत ही बेहूदा सोच का परिणाम है कि वह समाज की सबसे भयावह, अकमनीय और गर्हित समझी जानेवाली जगह यानी पुलिस चौकी जाकर कुकुर झौं-झौं करेगा और अपनी कॉपी ले आएगा। व्यवसायीजी, अखबार बेचना है तो मेरे घर आकर डाल जाओ। पैसे चाहे साल भर के अभी ले लो, जैसाकि अक्सर होता है, या महीना पूरा होने पर लो, जैसीकि रवायत रही है। पर यह उम्मीद मत करो कि पाठक अखबार लाने जाएगा पुलिस थाने। ज़नाब, लद गए वैसे अखबारों के ज़माने।।

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