लद गए अखबारों के ज़माने! / डॉ. रामवृक्ष सिंह

SHARE:

आलेख   खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो। जब तोप मुक़ाबिल हो तो अखबार निकालो। आम सोच है कि अखबार प्रजातंत्र के रखवाले होते हैं। वे सच को सच ...

आलेख

 

खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो। जब तोप मुक़ाबिल हो तो अखबार निकालो। आम सोच है कि अखबार प्रजातंत्र के रखवाले होते हैं। वे सच को सच कहने का माद्दा रखते हैं। और इसीलिए, दुनिया के तमाम हुक्मरान अखबारों और अखबारनवीसों की इतनी इज्जत करते हैं। जब अकबर इलाहाबादी ने तोप के मुकाबिल अखबार निकालने की बात कही, तब उनका आशय यही था कि अखबार हर ज़ोर-जुलुम की टक्कर में निकलता है। उसमें अवाम की आवाज़ बुलन्द होती है।

इधर कुछ दिनों से मेरे घर कोई अखबार नहीं आया। तीन में से एक भी नहीं। इसलिए नहीं कि मैंने अखबार वाले भाई को मना कर दिया। इसलिए भी नहीं कि मैंने पैसे नहीं भरे। बल्कि दो अखबारों के पैसे तो उसके दफ्तर वाले पहले ही, अग्रिम ले गए हैं। जब कई दिन अखबार नहीं आए तो हमने विक्रेता श्री शुक्लाजी को फोन किया और पूछा कि भइयाजी, अखबार क्यों नहीं देते? शुक्लाजी ने सूचित किया- साहब, हड़ताल चल रही है। बाद में पता चला कि अखबार-विक्रेताओं को अखबार-प्रकाशकों की ओर से कम मुनाफा-राशि की पेशकश हुई थी, इसलिए विक्रेता हड़ताल पर चले गए हैं।

अखबार प्रकाशकों की ओर से एसएमएस आ रहा है कि आप अपनी कॉपी अपनी निकटस्थ पुलिस चौकी से प्राप्त कर लें। हद हो गई! हम तो पुलिस-थाने जाने से वैसे ही कतराते हैं, क्योंकि हम खुद को शरीफ समझते हैं। और ये अखबार वाले हैं कि हमें वहीं जाने को कह रहे हैं। लिहाज़ा अब हमारे घर अखबार नहीं आ रहे। न आ रहे, न हम जाकर ला रहे। तिसपर भी हम ज़िन्दा हैं- बजाब्ते जिन्दा हैं।

इससे और चाहे जो निष्कर्ष निकले, इतना तो तय हो गया कि अखबार का छपना एक बात है और उसका पढ़ा जाना बिलकुल दूसरी बात। अगर विक्रेता लाकर दें तो अखबार पढ़ा जाए, वरना वह छपता ज़रूर है, किन्तु पढ़ा नहीं जाता। यह भी सच है कि लागत के नज़रिए से, अखबार पाठकों के दम पर नहीं चलते। पाठक से एक कॉपी के कितने पैसे मिलते हैं? मुश्किल से तीन या चार रुपये। किन्तु अखबार छापने की लागत है लगभग पन्द्रह से बीस रुपये फी कॉपी। लिहाज़ा लागत के मामले में अखबार पाठक के दम पर नहीं, बल्कि विज्ञापनों के दम पर और किफायती न्यूज-प्रिंट व राजनीतिक शरण के दम पर चलते।

जब शुरु-शुरु में कोई पत्र-पत्रिका छपती है तो उसमें सत्ताधारी दल की तारीफों के पुल बाँधे जाते हैं, उसकी योजनाओं व अन्य कार्यों का रिपोर्ट कार्ड खूब बढ़ा-चढ़ाकर छापा जाता है। नेताओं के बड़े-बड़े चित्रों के साथ उनकी विरुदावलियाँ छापी जाती हं। पत्र-पत्रिका की ऐसी प्रतियाँ नेताओं तक पहुँचाई जाती हैं। नेता खुश होकर उनके संपादकों को पाँच-दस लाख के विज्ञापन दे डालते हैं। राज्य के जन-संपर्क विभाग के अधिकारियों तक पहुँच कायम हो जाने के बाद आगे के अंकों के लिए विज्ञापनों का मिलना सुगम हो जाता है।

कुछ पत्र-पत्रिकाएं, टेबलॉयड आदि इसके विपरीत भी होते हैं। ये पीत पत्रकारिता में विश्वास करते हैं। नेताओं के काले कारनामे उजागर करना, अफसरों के भ्रष्टाचार और भौंडी लोक-रुचि के समाचार बढ़ा-चढ़ाकर छापना इन्हें अधिक सुहाता है। जिस अंक में ऐसी खबरें या लेख हों उनकी प्रतियाँ ये उन लोगों तक पहुँचा देते हैं जिनके काले कारनामे इन्होंने तथाकथित तौर पर उजागर किए हों। कहते हैं कि भ्रष्टाचारी तो वैसे ही डरपोक होता है। प्रकाशन की प्रति मिलते ही भ्रष्टाचारियों की रूह काँपने लगती है। वे प्रकाशन के संपादक से संपर्क करके आगे के लिए उसका मुँह बन्द कर देते हैं। कुछ पत्रकार इस ब्लैकमेलिंग को ही बहुत बड़ा रोज़गार समझते हैं। कई टीवी चैनलों को भी यह रोज़गार करते पाया और पकड़ा गया है।

तो बात यह है कि हम पिछले लगभग एक हफ्ते से अखबार नहीं पढ़ रहे। पहले अखबार निकालना एक मिशन होता था। तोप के मुकाबिल होने पर प्रबुद्ध वर्ग अखबार निकालकर उसका जवाब देता था। लेकिन अब तो अखबार निकालना चलते-पुर्जे लोगों का व्यवसाय है। अखबार निकालो, पत्रकार कहलाओ, नेताओं और अफसरों को अर्दब में लो। गाड़ी पर पत्रकार लिखवाओ, यातायात पुलिस पर रौब गाँठो, यहाँ-वहाँ अपना परिचय-पत्र दिखाओ, विशेष सुविधाएँ, कोटा और रियायतें पाओ। अपने उत्तर प्रदेश में तो अखबार-नवीसों ने ऐसी-ऐसी बिल्डिंगों में फ्लैट आवंटित करा लिए हैं, जहाँ केवल विधायक और बड़े-बड़े नेताओं को ही रहना मयस्सर हो पाता है। अखबार-नवीसों पर यह मेहरबानी इसलिए होती है कि वे अपने आकाओं के बारे में अच्छा-अच्छा लिखते-छापते रहें और उनकी काली करतूतों पर पर्दा डाले रहें।

कड़वी सच्चाई तो यह है कि अब तोप के मुक़ाबिल होने पर अखबार निकालने का माद्दा किसी में नहीं रहा। बहुत-से अखबार तो राजनीतिक दल खुद ही निकालते-निकलवाते हैं। और बहुतों का मक़सद शुद्ध व्यवसाय और तज्जन्य लाभ मात्र है। लाभ के कुछ स्रोतों व स्वरूपों का वर्णन ऊपर हो चुका, जो हर अखबार और अखबार-नवीस को उसकी औक़ात व बिसात के हिसाब से मिलता है, और बराबर वसूला जाता है। अखबारी दुनिया में लाभ का एक बहुत बड़ा स्रोत विज्ञापन है। अगर ईमानदारी से अखबार निकालना हो तो बिना विज्ञापन के काम नहीं चलनेवाला- खर्चे ही नहीं पूरे होंगे। अखबारों में विज्ञापन का इतना महत्त्व है कि बहुत-से अखबार तो विज्ञापनों का पुलिन्दा ही लगते हैं। यही हाल टीवी चैनलों का है। वहाँ तो कई बार भ्रम होता है कि मुख्य कार्यक्रम ये विज्ञापन हैं, अथवा समाचार, फिल्म या अन्य प्रकार के फीचर।

हिन्दी-भाषी प्रान्तों में साक्षरता-दर बहुत कम है। किसी तरह काँख-काँखकर लगभग पचास-साठ प्रतिशत लोग उल्टा-सीधा कुछ पढ़-लिख भी ले रहे हैं तो उनमें ऐसी परिष्कारपूर्ण सांस्कृतिक, सामाजिक अथवा जातीय अभिरुचि नहीं विकसित हो पाती कि वे मोल चुकाकर साहित्य खरीदें और पढ़ें। दिल्ली प्रेस तो दशकों तक अपने पाठकों के जमीर को यह लिखकर झकझोरता रहा कि- क्या आप माँगकर खाते हैं? क्या आप माँगकर पहनते हैं? तो आप माँगकर पढ़ते क्यों हैं? माँगने की रवायत अपने देश में बहुत दिनों से रही है। लोग कहते हैं कि पहले गाँव में किसी-किसी संपन्न घर में ही एक जोड़ी अच्छा जूता होता था। यदि गाँव का कोई व्यक्ति किसी रिश्तेदारी जाता तो दूसरे के घर से वह अच्छा वाला जूता माँगकर पहन जाता और रिश्तेदारी से आकर लौटा देता। साइकिल, मोटरसाइकिल परात व तरह-तरह के अन्य बर्तन, चकला-बेलन, बटुली, भगौने, दरी, चौकी-तखत, पेट्रोमैक्स आदि माँगने-देने की परंपरा तो अपने गाँवों में अभी हाल तक रही है और कहीं-कहीं अब भी कायम है। तो माँगने में भी कोई गुरेज़ हो सकता है, यह तो हम ग्राम्य हिन्दुस्तानियों की समझ से ही परे है। यही कारण है कि जब यही हिन्दुस्तानी शहर जा बसा तब भी उसने माँगना जारी रखा। कभी एक कटोरी चीनी, कभी एक प्याज, दो आलू, कभी ज़रा-सी हरी मिर्च, कभी आधा कटोरी अचार... फेहरिश्त लम्बी है। और यह सिद्ध करने के लिए काफी कि भारत में माँगना..यानी माँग कर खाना कभी लज्जा की बात नहीं रही। हमारे घर के बुजुर्ग तो सिखाते थे- भइया माँग कर खा लेने में कोई बुराई नहीं है। बस चोरी न कीजो। माँगने और मुफ्त में तरह-तरह की सौगातें पाने की यह आदत हमारा राष्ट्रीय गुण है। हमने इसे विनियमित भी किया है। देश की जो गैर-सरकारी संस्थाएं विदेश से दान पाना चाहती हैं, उन्हें एफसीएनआर पंजीकरण कराना होता है। सरकार से तरह-तरह से धन पाने के लिए बहुत-सी योजनाएँ हैं और लाखों संस्थाओं का पूर्णकालिक और एकमेव कार्य उस धन की येन-केन-प्रकारेण प्राप्ति ही है। हो सकता है उससे कहीँ कुछ काम भी होता है, किन्तु उसका असर तो कहीं दिखता नहीं।

तो...ऐसे देश में यह उम्मीद करना बेकार है कि लोग माँगकर पढ़ेंगे नहीं। माननीय नरेन्द्र कोहली ने अपनी पुस्तक 'माज़रा क्या है' में बड़े मज़ेदार तरीके से इस गंभीर विमर्श पर प्रकाश डाला है कि माँगकर पढ़ने में बुराई नहीं है। मुद्रित साहित्य को एक बार पढ़ने के बाद भी पाठ्य-सामग्री (पत्रिका, पत्र, पुस्तक आदि) वैसी की वैसी बनी रहती है। वह कोई भोज्य-पदार्थ नहीं है कि एक बार खा लेने के बाद दूसरे के काम की न बचे। लिहाज़ा माँग कर पढ़ना किसी भी तरह से खराब बात नहीं है। यदि ऐसा न किया गया तो मुद्रित साहित्य को एक बार पढ़ने के बाद उसका कोई उपयोग ही नहीं बचेगा। वैसे भी भारत गरीबों का देश है। यदि यहाँ के नागरिक माँगकर पढ़ते हैं तो उसमें बुराई नहीं है। हाँ, इसमें ज़रूर बुराई है कि माँगकर लोग शराब पी जाते हैं। इस देश में पढ़ने की सामग्री नहीं मिलती, पीने की सामग्री इफरात में मिलती है। इस विषय पर हम कई बार स्वतंत्र लेख लिख चुके हैं।

मुद्दे की बात यह है कि हमारे घर अखबार नहीं आ रहे। इससे न हमें और न ही हमारे नगर के दूसरे तमाम नागरिकों की सेहत पर कोई असर पड़ रहा है। यह दीगर बात है कि हम बचपन से अखबार पढ़ने के अभ्यस्त रहे हैं। लेकिन धीरे-धीरे अखबार की हमें लत लग गई और उम्र के इस पड़ाव तक पहुंचते-पहुँचते वह एक प्रकार से अति तक जा पहुँची। किसी ने कहा है कि अति तो किसी भी चीज़ की बुरी होती है। हफ्ते भर से अखबार नहीं आ रहे तो सुबहें लम्बी लगने लगी हैं और अपने तथा परिवार के दूसरे सदस्यों के लिए समय निकालना, उनसे बातें करना, पोते को कंधे पर डालकर सामने पार्क में चहलकदमी करना, उसे तरह-तरह के पंछियों और तितलियों से मिलवाना अब शक्य हो गया है। पहले तो इस सबके लिए समय ही नहीं निकलता था।

यों भी आजकल के अखबारों में पहले जैसी बात नहीं रही। न ही वैसे प्रबुद्ध संपादक व संवाददाता रहे। सारा का सारा अखबार या तो विज्ञापनों से या अपराध समाचारों से भरा रहता है। पढ़कर सुरुचि नहीं, केवल अरुचि और वितृष्णा पैदा होती है। संवाददाता भी अब पहले जैसे मेहनती, निष्पक्ष और सुरुचि-संपन्न नहीं रहे। पीछे सरकारी नौकरी कर रही महिलाओं को छब्बीस हफ्ते के मातृत्व अवकाश का नियम आया। इसे एक अखबार ने अपनी सुर्खी बनाया और लिखा कि अब महिलाओं को साढे छह महीने की प्रसूति छुट्टी मिलेगी। यदि संवाददाता ने अपना दिमाग लगाया होता तो जान पाता कि छब्बीस को सात से गुणा करने पर एक सौ बयासी आता है। साल में तीन सौ पैंसठ दिन, यानी बारह महीने होते हैं। एक सौ बयासी दिन, यानी बावन हफ्ते का साढ़े छह महीना किस तरह हुआ, यह तो संवाददाता ही बता सकता है। ऐसी गणना का केवल एक आधार होगा- जब चार हफ्ते का एक महीना मान लिया जाए। लेकिन हम सब जानते हैं कि चार वर्ष में तीन बार, केवल फरवरी माह में ऐसा होता है। एक बार लीप वर्ष में फरवरी उनतीस दिन का होता है। बाकी हर महीना चार हफ्ते से दो या तीन तीन अधिक का होता है। पर इतना दिमाग कौन खपाए! लिख मारा कि अब साढ़े छह महीने का प्रसूति अवकाश मिलेगा।

हर समझदार आदमी के जीवन का एक फलसफा है- तू नहीं तो और सही। हमारे घर अखबार नहीं आ रहे, तो हम टीवी देखकर खबरें जान लेंगे। नेट पर पढ़ लेंगे। हमारी जिज्ञासा शान्ति के लिए जितनी सामग्री चाहिए, वह हम जुटा लेंगे। चिन्ता करनी है तो अखबार और उसके विक्रेता खुद अपनी चिन्ता करें। यदि अखबारों का सर्कुलेशन कम हो जाएगा, यानी पाठक-संख्या घट जाएगी तो उनमें विज्ञापन कौन छपवाएगा? और यदि पाठक ही टूट जाएँगे तो विक्रेता बन्धु अखबार बेचेंगे किसे? हम जानते हैं कि अखबार डालना अपने-आप में बहुत बड़ा व्यापार है। शहरों में सुबह चार बजे से लेकर साढ़े-सात, आठ बजे तक का यह सबसे चोखा धंधा है। उसके बाद चाहे जो मन आए करो। बहुत-से लोग सुबह अखबार डालते हैं, और उसके बाद दफ्तर जाते हैं, ऑटो चलाते हैं, कोई दुकान चलाते हैं। और जो कुछ नहीं करते वे बच्चों को स्कूल भेजकर पूरे दिन मज़े में पैर पसारकर सोते हैं। मज़े में इसलिए क्योंकि इस धंधे में प्रति कॉपी एक रुपये तक की कमाई है।

ऐसे में पाठक, यानी धंधे के सबसे महत्त्वपूर्ण घटक से यह उम्मीद करना निहायत ही बेहूदा सोच का परिणाम है कि वह समाज की सबसे भयावह, अकमनीय और गर्हित समझी जानेवाली जगह यानी पुलिस चौकी जाकर कुकुर झौं-झौं करेगा और अपनी कॉपी ले आएगा। व्यवसायीजी, अखबार बेचना है तो मेरे घर आकर डाल जाओ। पैसे चाहे साल भर के अभी ले लो, जैसाकि अक्सर होता है, या महीना पूरा होने पर लो, जैसीकि रवायत रही है। पर यह उम्मीद मत करो कि पाठक अखबार लाने जाएगा पुलिस थाने। ज़नाब, लद गए वैसे अखबारों के ज़माने।।

---0---

COMMENTS

BLOGGER
नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2360,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,1,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: लद गए अखबारों के ज़माने! / डॉ. रामवृक्ष सिंह
लद गए अखबारों के ज़माने! / डॉ. रामवृक्ष सिंह
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2016/09/blog-post_10.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2016/09/blog-post_10.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content