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प्राची - सितम्बर 2016 : शिक्षक दिवस विशेष 2 आलेख / विभा खरे

आलेख

शिक्षक दिवस पर विशेष लेख

महान दार्शनिक, शिक्षाविद् एवं कुशल प्रशासक डॉ. राधाकृष्णन

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विभा खरे

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन हमारे देश के एक महान दार्शनिक, शिक्षाविद् और कुशल प्रशासक थे. वे हमारे देश के प्रथम उपराष्ट्रपति थे और 10 वर्ष तक (1952-62) तक इस पद पर रहे. उपराष्ट्रपति पद पर वे निर्विरोध चुने गये थे. उसके पश्चात् 1962 से 1967 तक वे देश के राष्ट्रपति रहे. उनको दार्शनिक राष्ट्रपति कहकर पुकारा जाता है.

डॉ. राधाकृष्णन का जन्म 5 सितम्बर, 1888 को चित्तूर जिले (आंध्र प्रदेश) के सर्वपल्ली नामक गांव में हुआ था. दर्शनशास्त्र में एम. ए. करने के बाद मद्रास के प्रेजीडेन्सी कालेज में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर रहे. 1939 में जब पं. मदनमोहन मालवीय बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति पद से हटे तो उन्हें कुलपति बनाया गया.

डॉ. राधाकृष्णन मूलतः अध्यापक थे और अपने जीवन का अधिकांश समय उन्होंने अध्ययन व अध्यापन में ही बिताया. राष्ट्रपति बनने के बाद भी वे अपने आपको एक शिक्षक ही समझते रहे भले ही वे देश के राष्ट्रपति बन गये थे. यही कारण है कि उनका जन्म दिवस हमारे देश में ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में मनाया जाता है. शिक्षकों पर केंद्रित यह अपेक्षाकृत नया पर्व है. भारतीय परम्परा में पहले शिक्षक की बजाए गुरु की पूजा होती थी, जिसके लिए गुरुपूर्णिमा का दिन नियत था.

उनकी शिक्षा भारतीय वेद-दर्शन पर आधारित है. भारतीय संस्कृति को अच्छा बताते हुए उन्होंने धार्मिक शिक्षा पर जोर दिया व कहा कि व्यक्ति के जीवन में धर्म का महत्वपूर्ण स्थान है. यदि धर्म को शिक्षा से अलग कर दिया जाए तो मनुष्य की आध्यात्मिक मृत्यु हो जाएगी. वे मानवीय गुणों के विकास को बहुत अधिक महत्व देते थे. उनका स्पष्ट मत था कि विद्यार्थियों को धार्मिक महापुरुषों के जीवन-चरित्रों के बारे में शिक्षा देना नितांत आवश्यक है, जिससे कि वे उनसे प्रेरणा पाकर अपने व्यक्तित्व में ईमानदारी, पवित्रता व सत्य जैसे नैतिक गुणों का विकास कर सकें.

वे कहते थे कि शिक्षा का उद्देश्य मनोरंजन करना व नौकरी प्राप्त करना ही न होकर मनुष्य का सर्वांगीण विकास होना चाहिए. शिक्षा के संबंध में उनके विचार थे कि ‘शिक्षा केवल मस्तिष्क का प्रशिक्षण नहीं वरन आत्मा का प्रशिक्षण है. इसका उद्देश्य ज्ञान और विवेक दोनों प्रदान करना है. अतः शिक्षण संस्थाओं में दोनों की व्यवस्था की जानी चाहिए.’ शिक्षा की प्राचीन पद्धति आज के संदर्भ में उचित नहीं बैठ सकती, क्योंकि परिस्थितियों में बहुत परिवर्तन आया है. शिक्षा वर्तमान की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए होनी चाहिए.

विद्या मनुष्य के लिए अति आवश्यक है. यह हमको महत्वपूर्ण क्षमता प्रदान करती है. यदि हम शिक्षित हैं तो आसानी से निर्णय कर सकते हैं कि क्या ठीक है और क्या ठीक नहीं.

उन्होंने स्त्री शिक्षा को महत्ता देते हुए कहा कि बच्चे के लिए मां का प्यार मिलना आवश्यक और उपयोगी होता है और प्यार के स्थान को कोई दूसरा नहीं ले सकता. आज महिलाएं शिक्षा पाकर आगे बढ़ रही हैं. जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कार्य कर रही हैं. उन्होंने कहा कि महिलाएं शिक्षा का उचित प्रयोग करें. शिक्षा प्राप्त करके वे स्वतंत्रता के नाम पर स्वच्छन्दता और उन्मुक्तता को बढ़ाव न दें.

उन्होंने पश्चिम में शिक्षा प्राप्त नहीं की थी. एक बार छात्रों ने उनसे पूछा कि क्या आपने कोई विदेशी डिग्री प्राप्त की है तो उत्तर में उन्होंने कहा था, ‘मैं विदेशों में पढ़ने नहीं जाऊंगा.’ वे भारतीय संस्कृति के अनेन्य उपासक और पुरोधा थे, न केवल भारतीय कलाओं के मर्मज्ञ बल्कि उनको सक्रिय रूप से प्रोत्साहन देने वाले प्रचारक/प्रसारक भी थे. 1926 में आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में ‘जीवन का हिन्दू दृष्टिकोण’ (ए हिंदू न्यू ऑफ लाइफ) पर व्याख्यान देना हमारे देश के लिए गौरव की बात है. उस समय बर्ट्रेण्ड रसेल ने कहा था, ‘इस समय फिलासफी सम्मानित हुई है.’ जब वे रूस में राजदूत थे तो स्टालिन ने कहा था, ‘मैं उस व्यक्ति से मिलना चाहता हूं जो हर समय पढ़ता रहता है.’

आज जब हमारी शिक्षा प्रणाली पश्चिम से अधिक प्रभावित हो रही है, मनुष्य में स्वार्थ, बेईमानी व अहम् की भावना बढ़ रही है, शिक्षक भी अपने उत्तरदायित्व की ओर से आंखें मूंद कर ट्यूशन आदि के चक्कर में रहते हैं और विद्यार्थी भी अपने

अध्यापक को उचित आदर नहीं देते. ऐसे समय में उनके विचार कहीं अधिक प्रासंगिक हैं.

सम्पर्कः जी-9, सूर्यपुरम्, नन्दनपुरा, झांसी-284003

मोबाइस 94150.55655

 

आलेख

शिक्षक दिवस पर विशेष लेख

तार-तार हो गई है गुरु-शिष्य की परम्परा

विभा खरे

जारों वर्ष पुरानी हमारी गुरु-शिष्य परम्परा आज तार-तार है. गुरु जो ज्ञान का पुंज था, जो धर्म-कर्म, आत्मा-परमात्मा, दर्शन, मीमांसा, युद्ध-कौशल, अस्त्र-शस्त्र चालन, राजनीति, अर्थनीति, नाट्य-संगीत का मर्मज्ञ होने के कारण समाज के शिखर पर था जो गोविंद तक पहुंचने का मार्ग बताने के कारण प्रथम वंदनीय था, सत्ता जिसकी उंगली के इशारों पर नाचती थी, वही सर्व सत्तावान गुरू आज बाजार में खड़ा है जहां एक ओर वह अपनी आजीविका के लिए ‘शिक्षा उद्योग’ के नियोजकों से मोलभाव करता है तो दूसरी ओर शिष्यों के प्रति उसका कोई भावात्मक संबंध शेष नहीं बचा. उसका दायित्व अब अपने नियोजक और स्वयं के प्रति अधिक है. शिष्य के प्रति अब कोई रिश्ता रह गया है तो सिर्फ ज्ञान के ‘फुटकर’ विक्रेता के रूप में ही.

नैतिक शिक्षा-दीक्षा के लिए गुरु-शिष्य पद्धति महत्वपूर्ण

प्राचीन युग से शुरू होकर हमारे देश में धार्मिक सामाजिक एवं नैतिक शिक्षा-दीक्षा के लिए गुरु-शिष्य पद्धति एक महत्वपूर्ण सीमा तक अत्यंत ही सहायक रही थी. आश्रमों में रहकर मौखिक रूप में चले आ रहे शास्त्रों का ज्ञान समाज के एक वर्ग तक ही सीमित था जिसे गुरु के रूप में वे ही शिष्य अपने पुत्रों, शासकों के पुत्रों तथा अपने वर्ग के अनुजों को ही दे सकते थे. वे शिष्य अपने पिता, गुरुओं और अन्य गुरुओं से जो प्राप्त करते थे, वही उनके लिए ब्रह्मवाणी थी. उसी समय से गुरु को पिता का स्थान दिया जाने लगा और शिष्य को पुत्र का, जिसके चलते गुरु-पिता की आज्ञा का पालने हमारे समाज में एक विशेष कर्तव्य माना जाता रहा है.

जबर्दस्त फायदा हुआ प्राचीन गुरु-शिष्य-परम्परा से

भारत की गुरु-शिष्य की इस परम्परा में ज्ञान को वर्ग विशेष तक ही सीमित रखा. आम लोगों और शासित वर्ग के लिए इसके दरवाजे पूर्ण रूप से बंद रहे. एकलव्य इसका एक प्रकरण है. और हां, इसके विरोध में जो लोग खड़े हुए उन्हें राक्षस, भौतिकवादी, नास्तिक आदि नाम दिये गये.

फिर भी, भारत की प्राचीन गुरु-शिष्य-परम्परा से एक जबर्दस्त फायदा यह हुआ कि हिन्दू शास्त्रों में निहित ज्ञान अक्षुण्ण रहा और पीढ़ी दर पीढ़ी बना रहा, और उसी क्रम में आगे चलकर लिखित रूप में आ गया. बिना गुरु-शिष्य पद्धति के यह परम कल्पनाओं पर आधारित धर्मशास्त्रों और कर्मकाण्डों में निहित अपार और अगाध ज्ञान आज हमारे बीच तक शायद ही पहुंच पाता. यही सही है कि इस क्रम में इस ज्ञान के काफी भौतिक अंश विलुप्त हो गये, या संशोधित हो गये, परन्तु जो बच पाया है वह प्रचुर है और मूल तत्व है. और उसी को प्रस्थान बिन्दु मानकर आज तमाम विद्वान वैज्ञानिक रोशनी में व्याख्या करने में जुटे हैं और उसे पैरों के बल पर खड़ा करके भविष्य के लिए मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं.

मुगल काल के दौरान हुआ गुरुकुल पद्धति का हृास

प्राचीनकाल से चली आयी गुरुकुल पद्धति का हृास मुगल काल के दौरान शुरू हो गया था, किन्तु हिन्दू समाज में किसी न किसी रूप में यह परम्परा चलती रही. मुसलमानों ने इसके समांतर मदरसा पद्धति चलायी जो मूलरूप से गुरू-शिष्य परम्परा के काफी समान थी. दोनों पद्धतियां अधिकांशतः मौखिक और गुरु या मौलवी की कृपा पर आश्रित थीं. लेकिन सोलहवीं सदी के पूर्वार्द्ध में जो बयार का झोंका आया उससे हमारे देश का समूचा ढांचा ही चरमरा गया. भाप के इंजन पर चढ़कर आये अंग्रेजों ने यहां के अर्थतंत्र में नये संबंधों का बीजारोपण किया जिसके परिणामस्वरूप हमारे समाज की बनावट में फर्क आने लगा. राजनीतिक सोच में बदलाव आया और उसी के अनुरूप बदलने लगे सांस्कृतिक मूल्य भी.

आधुनिक ज्ञान खोजपूर्ण दृष्टि की उपज

वास्तव में गुरु-शिष्य परम्परा को असली चुनौती भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की स्थापना से ही मिली. अंग्रेजों ने गुरुकुल पाठशाला और मदरसा दोनों शिक्षा पद्धतियों को नकार दिया और बिलकुल एक नयी शिक्षा पद्धति की स्थापना की. इसकी भाषा अंग्रेजी रखी गयी और विषय आधुनिक ज्ञान-गुरु-शिष्य का मौलवी-चेला

आधारित शिक्षा पद्धति से बिलकुल अलग-वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित संस्थागत शिक्षा पद्धति की स्थापना हुई. इसकी नींव किसी व्यक्ति विशेष गुरु या विशिष्ट वर्ग या जाति पर नहीं,

आधुनिक युक्तिपूर्ण वस्तुपरक ज्ञान पर थी. इसे कोई भी अपनी सूझ-बूझ तीक्ष्ण बुद्धि प्रयोग से शिक्षक के मार्ग दर्शन में हासिल कर सकता था.

आधुनिक ज्ञान खोजपूर्ण दृष्टि की उपज है, जबकि पारम्परिक गुरु-शिष्य परम्परा पर आधारित ज्ञान अंधविश्वास और श्रद्धा की उपज है. प्राचीन या महत्व कालीन हिन्दू शास्त्रों में खोजी दृष्टि की कोई गुंजायश नहीं, जबकि वैज्ञानिक आधारित ज्ञान में भावना को कोई स्थान नहीं.

अंग्रेजों ने भी बदले हिन्दुस्तान के सांस्कृतिक मूल्य

इग्लैंड में भाप के इंजन के आविष्कार ने सामाजिक उत्पादन में एक क्रांति कर दी. तद्नुसार उत्पादन में मशीनों के विस्तृत इस्तेमाल से श्रम विभाजन के कारण मध्यकालीन उस्ताद, कारीगर के छोटे से वर्कशाप को औद्योगिक विशाल कारखानों में बदल दिया. इस श्रम विभाजन ने पुराने सामाजिक ढांचे को ही बदल कर रख दिया.

ईस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से सात समन्दर पार करके जब अंग्रेज व्यापार के लिये आये और जब इस देश के आंतरिक अंतर्विरोधों का लाभ उठाकर जब वे ‘सोने की चिड़िया’ के मालिक बन बैठे तो भारत के सामन्ती ढांचे पर औद्योगिक समाज का महल बनाना शुरू किया. उत्पादन के औजारों में लगातार क्रांतिकारी परिवर्तन और उसके फलस्वरूप उत्पादन के संबंधों में और इसके साथ ही समाज के और संबंधों में क्रांतिकारी परिवर्तन होना इसकी स्वाभाविक परिणति था. श्रम के विभाजन ने भारत की वर्णाश्रम पद्धति की नींव पर चोट की. मध्यकाल के जाति आधारित श्रम विभाजन का स्थान उद्योग के विशेषीकृत श्रम विभाजन ने ले लिया जिसमें सभी धर्मों और जातियों के लोग एक ही मशीन पर कंधे से कंधा मिलाकर काम करने के लिए बाध्य थे. भारतीय समाज के बुलंद छुआछूत की प्रथा पर औद्योगीकरण की यह पहली चोट थी और समाज विज्ञानियों का पक्का मत है कि भारत में औद्योगीकरण के स्वतंत्र विकास को पूर्ण अवसर मिला होगा तो जातिवाद, धार्मिक कट्टरता, अंधविश्वास बूढ़ी नानी की कहानियां बन गयी होतीं.

नयी शिक्षा पद्धति में शिक्षक बन गया पूर्णरूपेण वेतन भोगी

नये पगकार के श्रम विभाजन के आधार पर निर्मित समाज का संस्थागत ढांचे के खड़े किये जाने के क्रम में शिक्षा का स्वरूप भी बदला. गुरुकुल तथा मदरसों के स्थान पर लार्ड मैकाले ने ऐसी शिक्षा पद्धति की आधारशिला रखी जो अंग्रेजों द्वारा इस देश में खड़े किए जा रहे औद्योगिक विकास की आवश्यकता की अनुरूप थी.

औद्योगीकरण के लिए, प्रशिक्षित मजदूर उपनिवेशी हितों की रखवाली के लिए, नये सरकारी ढांचे के लिए, बाबू व अहलकार और छोटे-मोटे हुक्काम और इनकी शिक्षा दीक्षा के लिए स्थापित किये गये स्कूलों में अध्यापकों की जरूरत थी.

नयी स्थापित की गयी शिक्षा पद्धति में शिक्षक पूर्णरूपेण वेतन भोगी बन गया. जिस पेशे के प्रति अब तक लोगों में आदर और श्रद्धा की भावना थी उन सबका प्रभामडंल औद्योगीकरण ने छीन लिया. अब नकद पैसे, कौड़ी के हृदयशून्य व्यवहार ने गुरु-शिष्य के बीच श्रद्धा और सम्मानपूर्ण संबंधों को विशुद्ध द्रव्य के संबंध में बदल डाला. बस गुरुदक्षिणा का रूप अब शुल्क ने ले लिया. शिक्षक मजदूर बन गया जो अपना मानसिक श्रम बेचकर पेट पालता है और शिष्य माल का खरीददार.

शिक्षक भी उपभोक्ता संस्कृति की गिरफ्त में

हालांकि औद्योगिक विकास के शुरुआती काल में शिक्षण संस्थाएं सरकार द्वारा ही संचालित की जाती थीं. अभी तक इनका लक्ष्य उद्योगों के लिए प्रशिक्षत मजदूर पैदा करने के लिए तथा सरकारी तंत्र के संचालन के लिए अमला तैयार करना मात्र था. अभी शिक्षण संस्थानों में मुनाफा की वृत्ति नहीं बनी थी. काम के लिए, बेहतर सुविधाओं के लिए शिक्षकों की टकराहट सरकार से ही रहती थी. इस टकराहट में शिष्य अपने गुरुओं के साथ ही खड़े होते. किन्तु जैसे ही अन्य उत्पादन इकाइयों की भांति शिक्षा के पूर्णरूप से सार्वजनिक क्षेत्र में चले जाने, शिक्षकों के अच्छे वेतन निर्धारित हो जाने तथा और बेहतरी के लिए उन्हें यूनियनों के रूप में संगठित होने के अघिकार मिल जाने से अब शिक्षक भी उपभोक्ता संस्कृति की गिरफ्त में पूरी तरह आ गया. अब शिक्षक की छात्रों की शिक्षा-दीक्षा में कम रुचि रह गयी. वह आमदनी के अन्य स्रोतों की जुगाड़ करने लगा. ट्यूशनखोरी उसका प्रस्थान बिन्दु था.

आजखंड-खंड हो गयी गुरु-शिष्य परम्परा

उसके बाद से अपने कृपावानों, शिक्षा के खरीदारों की उत्तर पुस्तिकाओं में हेराफेरी, परीक्षाओं में छात्रों को ठेके पर नकल कराना, छात्रों को ट्यूशन के लिए बाध्य करना, प्रयोगात्मक परीक्षाओं में परीक्षा के नामपर महंगी गृहउपयोगी सामग्री की प्राप्ति, इसके अलावा शिक्षकों का शिक्षा के अलावा कमाई के अन्य कारोबारों में लिप्त रहने से शिक्षक अपने मुख्य आदर्श से विमुख हो गया तब गुरु-शिष्य परम्परा खंड-खंड हो गयी. अब शिष्य भी ‘कोचिंग सेन्टर-ट्यूशन हॉल’ पर पूरा मोल-भाव कर परिणामों को भी घाटे-मुनाफे की दृष्टि से देखता है.

गुरु बन गया शिक्षा माफियाओं की व्यवस्था का पोषक

गुरू-शिष्य संबंधों में उस समय और बिखराव आया जब पूर्ण रूप से मुनाफे पर आधारित शिक्षा की दुकानें खुलना शुरू हुईं. सार्वजनिक शिक्षा संस्थानों के पूर्णरूप से नाकारा हो जाने के पश्चात निजी क्षेत्र में शिक्षा उद्योग जो फला-फूला उसके शोषण की चक्की में गुरु-शिष्य दोनों ही पिस रहे हैं.

इंग्लिश मीडियम के साइनबोर्डों तले गली-गली में खुली शिक्षा की दुकानों के मालिक जहां एक ओर आम लोगों के अपने नौनिहालों को कुछ बनाने की आकांक्षाओं को दोहन कर रहे हैं- अनाप-शनाप फीस, बिल्डिंग फीस, डोनेशन, वर्दी, पुस्तकें स्वयं उपलब्ध कराने के नाम पर अभिभावकों की जेबें ही उलटा कर रहे हैं और बची-खुची कसर टीचर्स डे पर बच्चों से नकद उपहारों की वसूली, अव्यवहारिक परीक्षा शुल्क, सांस्कृतिक समारोहों पर चंदा वसूली आदि तमाम बहानों से अभिभावकों को लूट रहे हैं तो दूसरी ओर शिक्षित युवकों में व्याप्त भयंकर बेरोजगारी से भी लाभ उठा रहे हैं. शिक्षकों का श्रम बहुत सस्ता खरीदा जाता है जिसे उपभोक्ता शिष्य को बहुत ही मंहगा बेचा जा रहा है. और गुरु जिसकी सत्ता सर्वोच्च थी पूरे सामाजिक जीवन का नियोजक था, शिक्षकों में आदर्श बनाना, गुण पोषित कर श्रद्धा और सम्मान का अधिकारी था आज वही गुरु शिक्षा माफियाओं के समक्ष निरीह, शोषण पर टिकी व्यवस्था का पोषक बन गया है. निज स्वार्थों की पूर्ति के उपक्रम में लिप्त होने के कारण उसकी त्यागमयीमूर्ति चटक गयी है और टूट रहा है शिष्य से उसका भावात्मक संबंध!

सम्पर्कः जी-9, सूर्यपुरम्,

नन्दनपुरा, झांसी-284003

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