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प्राची - सितम्बर 2016 : राष्ट्रभाषा हिन्दी की दशा और दिशा / डॉ. नलिनी मिश्र

राष्ट्रभाषा हिन्दी की दशा और दिशा

डॉ. नलिनी मिश्र

भाषा राष्ट्रीय भावना का पोषण करती है. अपनी भाषा के माध्यम से जनमानस में देश-प्रेम का भाव जागता है. धर्म और जाति की एकता के तत्व भी अपनी भाषा के द्वारा ही उत्पन्न होते हैं. राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन ने इसको प्रमाणित किया है. बहुभाषी देश होने पर भी भारत के स्वाधीनता आन्दोलन का शंखनाद हिन्दी में ही किया गया.

देश की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले बांग्लाभाषी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का यह कथन सदा स्मरणीय रहेगा- ‘‘देश की एकता के लिऐंअगर आज हिन्दी भाषा मान ली गई है, तो इसलिए नहीं कि वह किसी प्रान्त विशेष की भाषा है, बल्कि इसलिए कि वह सरलता, व्यापकता और क्षमता के कारण सारे देश की भाषा हो सकती है.’’ गुजराती भाषी महात्मा गांधी ने 1936 ई. के ‘हिन्दी प्रचार समिति’ के सभापति के रूप में स्पष्ट कहा था- ‘‘अगर हिन्दुस्तान को सचमुच एक राष्ट्र बनाना है, तो चाहे कोई माने या न माने, राष्ट्रभाषा तो हिन्दी ही हो सकती है.’’

इसी प्रकार मराठी भाषी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने भी हिन्दी को राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक माना था. अहिन्दी भाषी चक्रवर्ती राजगोपालचार्य, गोपाल स्वामी आयंगर, विनोबा भावे, काका साहब कालेलकर, कन्हैयालाल माणिक लाल मुंशी, डॉ. भीमराव अम्बेडकर आदि मनीषियों-राजनेताओं ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का समर्थन किया था. सुप्रसिद्ध घुमन्तू साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन ने अपने अनुभव के आधार पर कहा था- ‘‘हिन्दी हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक व्यवहार में आने वाली भाषा है.’’

अंततः संविधान सभा ने 14 सितम्बर, 1949 ई. को हिन्दी राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार कर ली गई. साथ ही निर्णय हुआ कि 15 वर्ष तक अंग्रेजी ही राजभाषा रहेगी और उसके बाद हिन्दी को अंग्रेजी का स्थान प्राप्त हो जाएगा, लेकिन यह निर्णय आज तक पूरा नहीं हो सका है.

यह विडम्बना है कि एक अरब से अधिक लोगों द्वारा बोली या समझी जाने वाली हिन्दी अपने ही देश में हेय दृष्टि से देखी जाती है. सरकारी संस्थाओं एवं कार्यालयों में उसकी घोर उपेक्षा होती है.

भारत को छोड़कर एशिया महाद्वीप के किसी भी देश में अंग्रेजी मुख्य भाषा नहीं है. रूस, चीन, जापान जैसे समृद्ध और शक्तिशाली देशों ने अपनी मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा प्रदान कर श्रेष्ठता प्राप्त की है.

भारत की युवाशक्ति अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा ग्रहण करने के कारण मौलिक शोध-दृष्टि से वंचित हो रही है. उसकी अस्सी प्रतिशत ऊर्जा अंग्रेजी सीखने में व्यय हो जाती है. शेष बीस प्रतिशत क्षमता के बल पर वैज्ञानिक दृष्टि कैसे प्राप्त की जा सकती है? अंग्रेजी परस्त मानसिकता ने देश के बौद्धिक विकास को अवरुद्ध कर दिया है. अंग्रेजी से जुड़े आर्थिक प्रलोभनों ने भी राष्ट्रभाषा हिन्दी का विकास रोका है. देश का कुलीन तंत्र (इलीट वर्ग) सत्ता पर हावी होकर राष्ट्रीय संशाधनों का दोहन करता रहा है.

आज देश को तर्की के राष्ट्राध्यक्ष अतातुर्क कमाल पाशा जैसी दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत है, जिन्होंने सत्ता संभालते ही तुर्की को राष्ट्रभाषा घोषित कर उसी के माध्यम से कामकाज शुरू करा दिया था.

सम्पर्कः एसोसिएट प्रोफेसर-हिन्दी,

एल.एम.एस. कालेज, एटा-207001 (उ.प्र.)

सम्पर्कः 111, शक्तिनगर, जबलपुर (म.प्र.)

मो. 9424310984

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