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कविताएं - वेणी शंकर पटेल ‘ब्रज’

1. माटी का दिया
गगनचुंबी इमारतों पर
जलने बाली दीपमालायें
कितना ही प्रकाष
क्यों न विखेर दें
अंतस के कलुष को
नही हटा पाती
प्रेम और सद्भाव के बजाय
ईष्या ही बढाती हैं
इन दीपमालाओं के सामने
भले ही बौना लगता हो दिया
परन्तु
झोपड़ी के अंधकार को
बेशक दूर भगाता है
और अंतर्मन को भी
आलोकित करता है
माटी का दिया


2. हरियाली
सूखी धरती के आंचल में
जब समाती हैं
वर्षा की बूंदे
तब तृप्त धरती की कोख से
उपजी हरियाली
करती है
बसुधा का श्रृंगार
नव वधु सी
सकुचाती शर्माती प्रकृति
झंकृत कर देती है
मन वीणा के तारों को
हवा के झोंको के साथ
जब हरियाली की चुनरी
उड़ती है
तो अंतर्मन में प्रवाहित
झरने का
कल कल बहता नीर
किसी सरिता की
अथाह जल राशि में
हो जाता है समाहित


3. यात्रा
तेज रफ्तार
दौड़ती टेन में
खिड़की के पास बैठे हुये
जब बाहर की ओर
दिखाई देते हैं
हमसे दूर भागते पेड़
और हरी भरी फसलों से लहलहाते खेत
तब कल्पनाओं के
निकलते हैं पंख
और प्रारंभ होती है
मन की यात्रा


4. बचपन
खलिहान में लगा
नीम का पेड़
जिसकी घनी छॉव में
गर्मियों की
न जाने कितनी दुपहरी
विताई हैें मैंने
मुहल्ले के बच्चों के साथ
खेला है गेंद गड़ा
ते कभी गिल्ली डंडा
खपडे से बनी सात ढिपरियों को
गेंद मारकर जमाया है कई बार
बचपन में खेले गये
इन खेलों से अंजान हैं
आज की नई पीढी
बस्तों के बोझ तले
गुम हो गया है
जिनका बचपन
जो धूल मिट्टी से दूर
खेलते हैं
स्मार्ट फोन पर गेम
तब बहुत याद आता है
नीम का वही पेड़
और अपना
बीता हुआ बचपन

5. लड़कियां
गॉव से शहर जाती
सायकिल पर सवार लड़कियां
केवल स्कूल ही नही जाती
बल्कि
सायकिल के कैरियर पर
अपने बीमार पिता को बिठाकर
ले जाती हैं अस्पताल
छोटे भाई को
पहुॅचा देती हैं स्कूल
खेत में काम कर रही अम्मा को
ले जाती हैं रोटियां
और तो और
गाय के लिये
चारे का गठ्ठर लानें में
पीछे नही हैं लड़कियां
और अपने मां बाप की
आंखों पर चढी उस घूल को
साफ कर रही हैं लड़कियां
जो समझते हैं
लड़कियों को दीन हीन
• वेणी शंकर पटेल ‘ब्रज’
साईंखेड़ा गाडरवार
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