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‘ विरोधरस ‘ [ शोध-प्रबन्ध ] विचारप्रधान कविता का रसात्मक समाधान +लेखक - रमेशराज

 

‘ विरोधरस ‘---1.  

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‘ विरोधरस ‘ [ शोध-प्रबन्ध ]  
विचारप्रधान कविता का रसात्मक समाधान

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+लेखक - रमेशराज
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‘ विरोधरस ‘ : रस-परम्परा एक नये रस की खोज 
समाज में  हमेशा सबकुछ सही घटित नहीं होता और न स्थितियां परिस्थितियां अनुकूल बनी रहती है | मनुष्य से मनुष्य के बीच के सम्बन्धों में जब कटुता उत्पन्न होती है , रिश्तों में स्वार्थ, धन , मद, मोह, अहंकार अपनी जड़ें  जमाने लगता है तो स्वाभाविक रूप से खिन्नता, क्लेश, क्षोभ, तिलमिलाहट, बौखलाहट, उकताहट, झुंझलाहट, बेचैनी, व्यग्रता, छटपटाहट, बुदबुदाहट, कसमसाहट से भरी प्राणी की आत्मा क्रन्दन प्रारम्भ कर देती है। इसी क्रन्दन का नाम है-आक्रोश।
आक्रोश स्वयं की विफलता से उत्पन्न नहीं होता। आक्रोश को उत्पन्न करने वाले कारक हैं-समाज के वे कुपात्र, जो अनीति, अनाचार, अत्याचार, शोषण और साम्राज्यवादी मानसिकता के कारण समाज के सीधे-सच्चे और कमजोर लोगों को अपना शिकार बनाते हैं। उन्हें तरह-तरह की यातना देते हैं। अपमानित करते हैं। उन्हें उनकी मूलभूत सुविधाओं से वंचित करने का कुत्सित प्रयास करते हैं, साधनहीन बनाते हैं। ऐसे लोगों अर्थात् दुष्टों को सबल और अपने को निबल मानकर असहाय और निरूपाय होते जाने का एहसास ही आक्रोश को जन्म देता है। आक्रोश मनुष्य की आत्मा में उत्पन्न हुई एक ऐसी दुःखानुभुति या शोकानुभूति है जो मनुष्य को हर पल विचलित किये रहती है। अपने असुरक्षित और अंधकारमय भविष्य को लेकर मनुष्य का चिंतित होना स्वाभाविक है। मनुष्य की यह चिन्ताएं हमें समाज के हर स्तर पर दिखायी देती हैं।
एक सबल व्यक्ति एक निर्बल-निरपराध व्यक्ति को पीटता है तो पिटने वाला व्यक्ति उसे सामने या उसकी पीठ पीछे लगातार गालियां देता है। उसे तरह-तरह की बद्दुआएं देता है। उसे अनेकानेक प्रकार से कोसता है। धिक्कारता है। उसके विनाश की कामनाएं करता है। किन्तु उस दुष्ट का विनाश करने या उसे ललकार कर पीटने में अपने को असहाय या निरुपाय पाता है। इसी स्थिति को व्यक्त करने के लिए कबीर ने कहा है-
                निर्बल को न सताइये जाकी मोटी हाय,
                मुई खाल की सांस सौं सार भसम ह्वै जाय।
क्या निर्बल की आह को देखकर कभी दुष्टजन सुधरे हैं? उत्तर है-नहीं। उनकी दुष्टता तो निरंतर बढ़ती जाती है। तुलसीदास की मानें तो दुष्टजन दूसरों को परेशान करने या उन्हें यातना देने के लिए ‘सन’ की तरह अपनी खाल तक खिंचवा लेते हैं ताकि दूसरों को बांधा  जा सके। दुष्टजन ‘ओले’ जैसे स्वभाव के होते हैं, वे तो नष्ट होते ही हैं किन्तु नष्ट होते-होते पूरी फसल को नष्ट कर जाते हैं। ऐसे दुष्ट, समाज को सिर्फ असुरक्षा, भय, यातना, अपमान, तिरस्कार, चोट, आघात और मात देने को सदैव तत्पर रहते हैं।
वर्तमान समाज में निरंतर होती दुष्टजनों की वृद्धि  समाज को जितना असहाय, असुरक्षित और कमजोर कर रही है, समाज में उतना ही आक्रोश परिलक्षित हो रहा है। कहीं पुत्र, पिता की बात न मानकर अभद्र व्यवहार कर रहा है तो कहीं भाई, भाई से कटुवचन बोलने में अपनी सारी ऊर्जा नष्ट कर रहा है। कहीं सास, बहू के लिये सिरदर्द है तो कहीं बहू, सास को अपमानित कर सुख ही नहीं, परमानंद का अनुभव कर रही है।
आज हमारी हर भावना आक्रोश से भर रही है। हर किसी के सीने में एक कटुवचनों की छुरी उतर रही है। अपमान,  तिरस्कार, उपेक्षा, थोथे दम्भ, घमंड और अहंकार का शिकार आज हमारा पूरा समाज है। निर्लज्ज बहू को देखकर ससुर या जेठ के मन में भयानक टीस है तो बहू को ससुर या सास का व्यवहार तीर या तलवार लग रहा है। किंतु कोई किसी का बिगाड़ कुछ नहीं पा रहा है। इसलिए हर किसी का मन झुंझला रहा है, झल्ला रहा है, बल खा रहा है। उसमें स्थायी भाव आक्रोश लगातार अपनी जड़ें जमा रहा है। इसी झुंझलाने-झल्लाने और बल खाने का ही नाम आक्रोश है। यही स्थायी भाव आक्रोश ‘विरोधरस’ की अनुभूति सामाजिको अर्थात् रस के आश्रयों को कराता है |
आक्रोश एक ऐसा जोश है जिसकी परिणति रौद्रता में कभी नहीं होती। आक्रोश ऊपर से भले ही शोक जैसा लगता है, क्योंकि दुःख का समावेश दोनों में समान रूप से है। लेकिन किसी प्रेमी से विछोह या प्रिय की हानि या मृत्यु पर जो आघात पहुंचता है, उस आघात की वेदना नितांत दुःखात्मक होने के कारण शोक को उत्पन्न करती है, जो करुणा में उद्बोधित  होती है। जबकि आक्रोश को उत्पन्न करने वाले कारकों के प्रति  सामाजिक प्रतिवेदनात्मक  हो जाता है  ।
किसी कुपात्र का जानबूझकर किया गया अप्रिय या कटु व्यवहार ही मानसिक आघात देता है और इस आघात से ही आक्रोश का जन्म होता है। दुष्ट की छल, धूर्त्तता, मक्कारी और अंहकारपूर्ण गर्वोक्तियां सज्जन को आक्रोश से सिक्त करती हैं।
किसी सेठ या साहूकार द्वारा किसी गरीब का शोषण या उसका निरंतर आर्थिक दोहन गरीब को शोक की ओर नहीं आक्रोश की ओर ले जाता है।
पुलिस द्वारा निरपराध को पीटना, फंसाना, हवालात दिखाना या उसे जेल भिजवाना, बहिन-बेटियों  को छेड़ना, सुरापान कर सड़क पर खड़े होकर गालियां बकना या किसी अफसर या बाबू द्वारा किसी मजबूर का उत्कोचन करना, उसके काम को लापरवाही के साथ लम्बे समय तक लटकाये रखना, उसे बेवजह दुत्कारते-फटकारते रहना या उस पर अन्यायपूर्वक करारोपण कर देना, सरल कार्य को भी बिना सुविधा  शुल्क लिये न करना या किसी दहेज-लालची परिवार द्वारा ससुराल पक्ष के लोगों से अनैतिक मांगे रखना, शोक को नहीं आक्रोश को जन्म देता है।
शोक में मनुष्य बार-बार आत्मप्रलाप या रुदन करता है। अपनी प्रिय वस्तु के खो जाने पर उसे पुनः प्राप्त करने की बार-बार कामना करता है। कृष्ण के गोपियों को छोड़कर चले जाने पर पूरे ब्रज की गोपियों में उत्पन्न हुई शोक की लहर, गोपियों के मन पर एक कहर बनकर अवश्य गिरती है किन्तु उसकी वेदना प्रिय है। गोपियों के अबाध क्रन्दन में भी कृष्ण से मिलन की तड़प है |
एक प्रेमी का प्रेमिका के साथ किया गया छल और बलात्कार किसी भी स्थिति प्यार को जन्म नहीं देता। बलत्कृत प्रेमिका सोते, जागते, उठते, बैठते उसे बार-बार धिक्कारती है। उसके वचन मृदु के स्थान पर कठोर हो जाते हैं। प्रेमी के समक्ष अशक्त, असहाय और निरुपाय हुई प्रेमिका अपने मन के स्तर पर प्रेमी के सीने में खंजर घौंपती है। उसके सर्वनाश की कामना करती है। कुल मिलाकर वह शोक से नहीं, आक्रोश से भरती है, जिसे मनुष्य के ऐसे आंतरिक क्रोध के रूप में माना जा सकता है, जो रौद्रता में तब्दील न होकर ‘विरोध’ में  तब्दील होता है।
साहित्य चूंकि मनुष्य के मनोभावों को व्यक्त करने का एक सर्वाधिक्  सशक्त साधन  या  माध्यम है, इसलिए समाज में जो कुछ घटित होता है, उस सबके लिए साहित्य में अभिव्यक्ति के द्वार खुलते हैं। आदि कवि बाल्मीकि की बहेलिये द्वारा कौंच-वध किये जाने पर लिखी गयी पंक्तियां मात्र तड़पते हुए क्रौंच की पीड़ा या दुःख को ही व्यक्त नहीं करतीं। वे उस बहेलिए के कुकृत्य पर भी आक्रोश से सिक्त हैं, जिसने क्रौंच-वध किया। इस तथ्य को प्रमाण के रूप में हम इस प्रकार भी रख सकते हैं कि कविता का जन्म आक्रोश से हुआ है और यदि काव्य का कोई आदि रस है तो वह है-‘विरोध’।
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+रमेशराज की पुस्तक ‘ विरोधरस ’ से
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+रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001 
मो.-9634551630      

 

 

 


‘ विरोधरस ‘---2.
काव्य की नूतन विधा तेवरी में विरोधरस
+रमेशराज
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काव्य की नूतन विधा  ‘तेवरी’ दलित, शोषित, पीडि़त, अपमानित, प्रताडि़त, बलत्कृत, आहत, उत्कोचित, असहाय, निर्बल और निरुपाय मानव की उन सारी मनः स्थितियों की अभिव्यक्ति है जो क्षोभ, तिलमिलाहट, बौखलाहट, झुंझलाहट, बेचैनी, व्यग्रता, छटपटाहट, अपमान, तिरस्कार से भरी हुई है। जिसमें स्थायी भाव आक्रोश है और आताताई अत्याचारी, अनाचारी, व्यभिचारी, बर्बर, निष्ठुर, अहंकारी, छलिया, मक्कार, धूर्त्त और अपस्वार्थी वर्ग के प्रति रस के रूप में सघन होता विरोध है।
कवि के रूप में एक तेवरीकार भी कवि होने से पूर्व इस समाज का एक हिस्सा है। इस कारण वह भी सामाजिक विसंगतियों, विकृतियों, विद्रूपताओं का शिकार न हुआ हो या न होता हो, ऐसा समझना भारी भूल होगी। इसलिए उसका गान [तेवरियां] आह, कराह, अपमान का व्याख्यान न हों, ऐसा कैसे हो सकता है।
कवि के आत्म [रागात्मक-चेतना] का विस्तार जब समूचे संसार की सत्योन्मुखी संवेदना बनकर उभरता है, तभी वह कविता की प्रामणिकता की शर्त को पूरा करता है। एक तेवरीकार का आत्म उस समूचे लोक का आत्म होता है, जिसमें नैतिकता, ईमानदारी और लोकसापेक्ष मूल्यवत्ता, भोलेपन और निर्मलता के साथ वास करती है।
एक  तेवरीकार को हर अनीति इस हद तक दुःखी, खिन्न, क्षुब्ध, त्रस्त और उदास करती है कि जब तक वह उसे अभिव्यक्त नहीं कर लेता, वह बेचैन रहता है। अपनी बेचैनी को दूर करने के लिए  तेवरीकार कहता है-
आदमी की हर कहानी दुःखभरी लिखनी पड़ी,
बात कहनी थी अतः खोटी-खरी लिखनी पड़ी।
जब ग़ज़ल से पौंछ पाया मैं न आंसू की व्यथा,
तब मुझे बेज़ार होकर तेवरी लिखनी पड़ी।|
[दर्शन बेज़ार,‘देश खण्डित हो न जाए’, पृ. 17 ]
पीडि़त, दलित और शोषित वर्ग की व्यथा ‘तेवरी’ के सृजन का कारण इसलिए बनती है ताकि हर सामाजिक व्याधि से मुक्त हुआ जा सके। शोषक, बर्बर और आतातायी वर्ग के प्रति ‘तेवरी’ को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा सके। यह तभी सम्भव है जबकि एक सामाजिक के रूप में पाठक या श्रोता द्वारा तेवरीकार के इस मंतव्य तक पहुंचा जा सके।
तेवरी, सामाजिकों को किस प्रकार और कैसी रसानुभूति कराती है, इसे समझने के लिए तेवरी में अन्तर्निहित स्थायी भाव के रूप में आक्रोश तक पहुंचने की प्रक्रिया को समझना आवश्यक है जो विरोध-रस की रसानुभूति कराती है।
    ‘विरोध’ इस जगत में  असंतुलन, अराजकता फैलाने वाले उस वर्ग के कुकृत्यों से उत्पन्न होता है जिसके थोथे दम्भ और अहंकार के सामने ये संसार क्रन्दन और चीत्कार कर रहा है। संसार का यह शत्रुवर्ग धूर्त और मक्कार होने के साथ-साथ सबल भी है और अपनी सत्ता को कायम रखने में सफल भी है। इसी के अनाचार और अताचार से सामाजिकों में विरोध उत्पन्न होता है |
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+रमेशराज की पुस्तक ‘ विरोधरस ‘ से
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+रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001 
मो.-9634551630      

 


‘ विरोधरस ‘---3.
|| विरोध-रस के आलंबन विभाव ||
+रमेशराज
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तेवरी में विरोध-रस के आलंबन विभाव के रूप में इसकी पहचान इस प्रकार की जा सकती है-

सूदखोर-
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लौकिक जगत के सीधे-सच्चे, असहाय और निर्बल प्राणियों का आर्थिक शोषण करने वाला सूदखोर-महाजन या साहूकार एक ऐसा परजीवी जन्तु है जो किसी निर्धन को एक बार ब्याज पर धन  देने के बाद उस धन की वसूली अन्यायपूर्ण, छल-भरे अनैतिक तरीकों से करता है। सूदखोर के कर्ज से लदा हुआ व्यक्ति उसके शिकंजे से या तो मुक्त ही नहीं हो पाता या मुक्त होता है तो भारी हानि उठाने के बाद। विरोध-रस का आलंबन बना सूदखोर तेवरी में इस प्रकार उपस्थित है-
खेत जब-जब भी लहलहाता है,
सेठ का कर्ज याद आता है।
जो भी बनता है पसीने का लहू,
तोंद वालों के काम आता है।
--गिरिमोहन गुरु, कबीर जिन्दा है [ तेवरी-संग्रह ]  पृ.17

हाथ जोड़कर महाजनों के पास खड़ा है होरीराम,
ऋण की अपने मन में लेकर आस खड़ा है होरीराम।
शोषण, दमन, भूख, उत्पीड़न,बदहाली, कंगाली का,
कब से ना जाने बनकर इतिहास खड़ा है होरीराम।
--सुरेश त्रस्त, कबीर जिन्दा है [ तेवरी-संग्रह ]  पृ. 5

भ्रष्ट नौकरशाह-
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धन के लालच और पद के मद में चूर आज की भ्रष्ट नौकरशाही मुल्क में सिर्फ तबाही ही तबाही के मंजर पेश कर रही है। जनता के लिये बनी कल्याणकारी योजनाएं इसकी फाइलों में कैद होकर सिसकती हुई कथाएं बनकर रह गयी हैं। फाइलों के आंकड़ों में तो खुशहाली ही खुशहाली है, लेकिन इनसे अलग पूरे मुल्क में कंगाली ही कंगाली है। जनता के खून-पसीने की गाढ़ी कमायी पर गुलछरें उड़ाते ये जनता के कथित सेवक जनता से सीधे मुंह बात नहीं करते। अपने को शासक मानकर ये मूंछों पर ताव देते हैं। न्याय के नाम पर सिर्फ घाव देते हैं। हर काम के बदले इनके सुविधा शुल्क [घूस] ने इन्हें भव्य कोठियों, आलीशान कारों में जीने का आदी बना दिया है। इनकी मौज-मस्ती में भारी इजाफा किया है। बदले में देश की जनता को इन्होंने केवल उलझनों, समस्याओं भरा जीवन दिया है। विरोध-रस का आलंबन बना जनता को तबाह करता नौकरशाह तेवरी में अपनी काली करतूतों के साथ किस प्रकार मौजूद है, आइए देखिए-
बीते कल की आस हमारी मुट्ठी में,
कितनी हुई उदास हमारी मुट्ठी में।
फर-फर उड़ती मेज के ऊपर बेकारी,
दबी फाइलें खास हमारी मुटठी में। 
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राहत तुमको ये कल देंगे, बातें झूठी,
बिन खाये कुछ चावल देंगे, बातें झूठी।
सिक्कों से चलते हों जिनके नाते-रिश्ते,
साथ तुम्हारे वे चल देंगे, बातें झूठी।
--राजेश मेहरोत्रा, 'कबीर जिन्दा है' पृ. 9 व 11

दुश्मनों के वार पर मुस्कराइए,
इस सियासी प्यार पर मुस्कराइए।
योजनाएं ढो रही हैं फाइलें,
देश के उद्धार पर मुस्काइए।
--अनिल अनल, 'इतिहास घायल है'  [ तेवरी-संग्रह ]  पृ.15

वैसे तो बिच्छुओं की तरह काटते हैं ये,
अटकी पै मगर तलुबा तलक चाटते हैं ये।
मजबूरियों की कैद में देखा जो किसी को,
हर बात पै कानून-नियम छांटते हैं ये।
--गिरिमोहन गुरु, कबीर जिन्दा है  [ तेवरी-संग्रह ] पृ. 24

भ्रष्ट पुलिस-
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कुछ अपवादों को छोड़कर यदि खाकी बर्दी में डकैतों, चोरों, बेईमानों, बलात्कारियों, ठगों का साक्षात्कार करना हो तो हिन्दुस्तान की पुलिस इसका जीता-जागता प्रमाण है। एक दरोगा से लेकर सिपाही तक न्याय के नाम पर आज नेता, धनवान, बलवान और अत्याचारी से गठजोड़ कर किस तरह आम आदमी को प्रताडि़त कर रहा है, यह किसी से छुपा नहीं है। गुण्डे, बलात्कारियों, चोरों, डकैतों को सरंक्षण देने के कुकृत्यों में लिप्त हमारी पुलिस आज असहाय-निर्दोष और पीडि़तों को न्याय देने या दिलाने के नाम पर अत्याचार और अन्याय का पर्याय बन चुकी है। जिन थानों में बलत्कृत, अपमानित और पीडि़त अबला की रिपेार्ट दर्ज होनी चाहिए, वहां का आलम यह है--
गोबर को थाने से डर है,
झुनियां आज जवान हो गयी।
--अरुण लहरी, कबीर जिंदा है [ तेवरी-संग्रह ]  पृ. 50
आज द्रोपदी का कान्हा ही,
नोच रहा है तन लिखने दो।
--दर्शन बेजार, ‘एक प्रहारः लगातार’ [ तेवरी-संग्रह ]  पृ. 46
‘सत्यमेव जयते’ के नारे आज हर थाने की दीवार पर शोभित हैं। किन्तु सबसे अधिक सत्य का गला थानों में ही घौंटा जाता है। इन्सानियत के दुश्मन हैवानियत के पुजारी पुलिस वाले आज क्या नहीं कर रहे-
डालते हैं वो डकैती रात में,
जो यहां दिन में हिपफाजत कर रहे।
;दर्शन बेजार, ‘एक प्रहारः लगातार’ [ तेवरी-संग्रह ]  पृ. 23

बन गया है एक थाना आजकल घर के करीब,
खौफ से दीवार तक हिलने लगी है बंधु अब।
--अजय ‘अंचल’, ‘अभी जुबां कटी नहीं’ [ तेवरी-संग्रह ] पृ. 22

  नेता-
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पीडि़त, शोषित, दलित जनता का नेतृत्व करने वाले को नेता कहा जाता है। जनता की आजादी के लिए असीम और कष्टकारी संघर्ष करने वाले क्रांतिकारी सुभाषचंद्र बोस को इस देश ने सर्वप्रथम सम्मानपूर्वक ‘नेताजी’ सम्बोधन से अंलकृत किया था। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि आज गुण्डा, तस्कर, डकैत, चोर, भ्रष्टाचारी देश और जनता के साथ छल और विश्वासघात करने वाले अधिकाँश कुकर्मी ‘नेताजी’ हैं, जिन्होंने देश को जातिवाद, साम्प्रदायिकता और प्रान्तवाद की आग में झौंक दिया है।
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के नाम को कलंकित करने वाले नेता आज एक शातिर अपराधी  की भूमिका में हैं, किन्तु दुर्भाग्य से ऐसे लोग देश के मेयर, जिला परिषद् अध्यक्ष, विधायक, सांसद, मंत्री  के रूप में ‘माननीय’ बने हुए हैं। इन माननीय नेताओं की काली करतूतें भी कोई कम नहीं। ये बड़े-बड़े घोटालों के जनक हैं। इनके संरक्षण में जालसाजी के अड्डे, चकलाघर, देशी शराब बनाने की अवैध भट्टियां, जाली नोट छापने के कारखाने चल रहे हैं। ये बोपफोर्स तोपों, पनडुब्बियों, सीमेंट, खादी, ताबूत, चारा, यूरिया, काॅमनवल्थ गेम, आदर्श सोसायटी, 2जी स्पेक्ट्रम के सौदों में घोटाले कर रहे हैं और उसके कमीशन को निगल रहे हैं।
सुरक्षा गार्डों की रायपफलों और अपने अवैध शस्त्रों से लैस होकर नेताओं के काफिले जिधर से भी गुजरते हैं, आईजी, डीआईजी, एसपी, एसएसपी इन्हें शीश  झुकाते हैं। इनकी खातिर गुलामों की मुद्रा में अफसरों के सैल्यूट, खट-खट बजते पुलिस के बूट इस बात की गवाही देते हैं कि आज के ये लुटेरे भले ही अंधेरे के पोषक हैं, लेकिन इन्होंने पूरी की पूरी सरकारी मशीनरी को अपने पक्ष में इस्तेमाल कर लिया है। पूरे के पूरे देश को ‘नेताजी’ बनकर हलाल कर लिया है। पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को तिरंगा लहराते, वंदे मातरम् के नारे लगाते नहीं अघाते ये लोग खादी को ओट में जनता की आजादी के सबसे बड़े दुश्मन बने हुए हैं। इनके इरादे आजादी के खून से सने हुए हैं।
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हिमायतदार ये सारे के सारे ‘नेताजी’ हमारी आजादी फिर विदेशी ‘दादाजी’ की बपौती बनाने पर तुले हैं। कमाल देखिए इतने कुकृत्यों के बावजूद ये दूध् के धुले हैं। जनता के मन में  बताशे-से घुले हैं। आज सोने के कलश में भरे विष का नाम ही ‘नेताजी’ है। इसलिए ये कहीं ‘बापजी’ है तो कहीं ‘संतजी’ हैं। कहीं ‘काजी’ हैं तो कहीं ‘महन्तजी’ हैं। कहीं ‘इमाम’ बन जनता को गुमराह कर रहे हैं तो कहीं ‘साधु'  या साध्वी’ बनकर जहर उगल रहे हैं।
नेताओं के षड्यंत्रों के खूबसूरत चक्रव्यूह भले ही जनता की रूह को बेचैन किये हों लेकिन वह इन भ्रष्ट नेताओं का कुछ भी बिगाड़ नहीं पा रही है। चाणक्य की नीतियों को अमलीजामा पहनाने वाले हमारे ये नेता, कराहती जनता के भीतर पनपते आक्रोश को दबाने के लिये अश्लीलता फैलाने, समाज को व्यभिचार में डुबाने के लिये प्रिण्ट और इलैक्ट्रोनिक मीडिया पर भी अपनी पकड़ मजबूत बनाने में जुटे हैं।
भले ही मीडिया आज अपने को सत्य और जनता का पुजारी बनने का ढोंग रचें, लेकिन सच्चाई यह है कि जनता इनके अश्लील, अंधविश्वासी और कथित धार्मिक इन्द्रजाल के मोहपाश में जकड़ी हुई है। यह सब किसी और के नहीं इन्हीं नेताओं के इशारे पर हो रहा है। सिनेमा हाल में  पिक्चर के साथ दिखाये जाने वाले ब्लूफिल्मों के टुकड़े समाज में बढ़ती बलात्कार की घटनाओं के उतने ही जिम्मेदार हैं, जितने साइबर कैफे। लेकिन नेताजी इस पर मौन हैं |
हमारे नेताजी को इस विकृत होते सामाजिक समीकरण को बदलने की चिन्ता नहीं है। उसकी चिन्ता तो गद्दी और अपनी सत्ता को सुरक्षित रखने की है-
राजा जी को डर है उनकी पड़े न खतरे में गद्दी
इसीलिये वे बढ़ा रहे हैं-हाला, प्याला, मधुशाला।
[रमेशराज, ‘मधु-सा ला’]
एक सजग तेवरीकार के लिये ये सारी स्थितियां ही असह्य, वेदनादायी, क्षुब्धकारी और आक्रोश से सिक्त करने वाली हैं। जहां जनता को सुविधा  और खुशहाली प्रदान करने के नाम पर पुलिस के ठोकर मारते बूट और दुनाली हैं, वहां तेवरीकार की आत्मा [रागात्मक चेतना ] क्रन्दन न करे, आक्रोश से न भरे और यह स्थिति तेवरी के रूप में रचनाकर्म में न उतरे, ऐसी हो ही नहीं सकता।
स्थायी भाव आक्रोश से सिक्त विरोध-रस का आलंबन बनने वाले नेताओं के विभिन्न रूप तेवरी में इस प्रकार देखे जा सकते हैं-
धर्म को बेचने वाले वतन भी बेच डालेंगे,
सत्य के सूर्य की चुन-चुन किरन भी बेच डालेंगे।
[सुरेश त्रस्त, ‘इतिहास घायल है’[तेवरी-संग्रह]  पृ. 30 ]
स्थायी भाव आक्रोश से सिक्त विरोध-रस का आलंबन बनने वाले नेताओं के विभिन्न रूप तेवरी में इस प्रकार देखे जा सकते हैं-
आप अपनी हकीकत छुपाएंगे कब तक,
नकाबों में सम्मान पाएंगे कब तक।
आप सोऐंगे संसद में कितने दिनों तक,
हम किबाड़ों पै दस्तक लगायेंगे कब तक?
[ विजयपाल सिंह, ‘इतिहास घायल है’ [तेवरी-संग्रह] पृ. 23 ]
स्थायी भाव आक्रोश से सिक्त विरोध-रस का आलंबन बनने वाले नेताओं के विभिन्न रूप तेवरी में इस प्रकार देखे जा सकते हैं-
अब सजाते हैं इसे तस्कर, डकैत देखिए,
राजनीति खून का  शंृगार होती जा रही।
लूटकर खाते हैं अब वे देश की हर योजना,
उनकी खातिर हर प्रगति आहार होती जा रही।
[ अरुण लहरी, ‘कबीर जिन्दा है’ [तेवरी-संग्रह ] पृ. 48 ]

साम्प्रदायिक तत्त्व- 
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ध्रर्म पूरे विश्व का एक है। हम सब हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई होने से पहले इन्सान हैं। पूरे विश्व के इंसानों का हंसने-रोने, जन्म लेने, मरने का तरीका एक है। हम सबकी आंखें, पांव, नाखून, मुंह, कान, बाल एक समान हैं। हम सबके स्वेद, कंपन, विहँसन, क्रंदन, थिरकन में एक जैसे अनुभाव हैं। भूख, प्यास और नींद हमें समान प्रकार की है । फिर भेद कहां हैं? हमारे समान मानवीय रूप-स्वरूप के बीच छेद कहां है?
प्रकृति फूलों को खिलाने, चांदनी बिखेरने, धूप लुटाने, जल बरसाने में जब मनुष्य से मनुष्य के बीच कोई भेद नहीं करती तो मनुष्य इतना पागल और स्वार्थी क्यों है? प्रकृति और मनुष्य के इतने साम्य या एकता के बावजूद अनेकता की दरारों को चौड़ी कर खाइयां बनाने या उन्हें और बढ़ाने में मनुष्य को सुख की प्रतीति क्यों होती है? यह मनुष्य का छद्म और बेबुनियाद अहंकार ही है कि उसने रंगभेद, जाति-भेद, नस्ल-भेद के आधर पर वार और उपचार के घिनौने तरीके ईजाद कर लिये हैं। अपने सोचों में ऐसे जल्लाद भर लिये हैं जो कि एक-दूसरे के खून के प्यासे हैं। ध्रर्म के नाम पर सम्प्रदायों के अधर्म का मर्म ही इन्हें सच्चा और न्यायपरक लगता है।
सम्प्रदाय यदि सच्चे ध्रर्म का अल्पांश भी लेकर चले तो सूर्यांश हो जाता है। किंतु उजाले के नाम पर एक-दूसरे की जि़ंदगी में अंधेरा भरने वाले सम्प्रदाय, परोक्ष या अपरोक्ष आज ‘हाय’ भर रहे हैं। धर्म   का नाम लेकर एक-दूसरे की गर्दन कतर रहे हैं। निर्दोषों, निर्बलों के घर उजाड़ रहे हैं। अबोध बच्चों, बूढ़ों और अबलाओं के पेट में चाकू उतार रहे हैं। इनके अपने-अपने अलग-अलग भगवान हैं, इसलिए इन्हें लगता है कि ये ही श्रेष्ठ हैं, महान हैं। एक-दूसरे के सम्प्रदाय को निकृष्ट या नीच समझने वाले ये सम्प्रदाय, धर्म के नाम पर लाशों का घिनौना व्यवसाय करते हैं। मनुष्य जाति का समूल नाश करने में ये दूसरे के क्या, अपने ही सम्प्रदाय के भगवान से नहीं डरते हैं। ये जहां भी अपने कुत्सित इरादों को लेकर उतरते हैं वहां चीत्कार और हाहाकार के मंजर पेश करते हैं।
ऐसे साम्प्रदायिक उन्माद के बीच कवि के रूप में एक तेवरीकार का मन ‘आक्रोश’ को सघन करता है। और यह आक्रोश उसके रचना-कर्म में विरोध-रस को परिपक्व बनाता है और ध्रर्म के नकाब में छुपे हुए अधर्मी की पहचान इस प्रकार कराता है-
कलियुगी भगवान ये भग के पुजारी,
भोग को अब योग बतलाने लगे हैं।
-गिरिमोहन गुरु, ‘कबीर जिंदा है’ पृ-20

उसका मजहब खून-खराबा,
वह चाकू में सिद्धहस्त है।
-सुरेश त्रस्त, कबीर जिंदा है’ [तेवरी-संग्रह ] पृ-5

ध्रर्मग्रंथों पर लगाकर खून के धब्बे ,
लोग पण्डित हो रहे हैं एकता के नाम पर।
-गिरीश गौरव,‘इतिहास घायल है’ [तेवरी-संग्रह ] पृ-34

वे क्या जानें जनहित यारो,
नरसंहार ध्रर्म है उनका।
लड़वाते हैं हिंदू-मुस्लिम,
रक्ताहार ध्रर्म  है उनका।
-अरुण लहरी, ‘अभी जुबां कटी नहीं’ [तेवरी-संग्रह ] पृ-10

बेच दी जिन शातिरों ने लाश तक ईमान की,
ढूंढते हैं आप उन में  शक़्ल क्यों इंसान की।
लूटना मजहब बना हो जिन लुटेरों के लिए,
ओढ़ते हैं वे यकीनन सूरतें भगवान की।
-दर्शन बेजार,‘ एक प्रहारः लगातार’ [तेवरी-संग्रह ] पृ-46
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+रमेशराज की पुस्तक ‘ विरोधरस ‘ से
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+रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001 
मो.-9634551630      

   

 

 

 

‘ विरोधरस ‘---4.
‘विरोध-रस’ के अन्य आलम्बन-  
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‘विरोध-रस’ स्थायी भाव ‘आक्रोश’ से उत्पन्न होता है और इसी स्थायी भाव आक्रोश को उद्दीप्त करने वाले कारकों में सूदखोर में, भ्रष्ट नौकरशाह, भ्रष्ट पुलिस, नेता, साम्प्रदायिक तत्वों के अतिरिक्त ऐसे अनेक कुपात्र हैं जो समाज की लाज के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। एय्याशी इनकी नसों में खून की तरह दौड़ रही है। इनके भीतर पवित्र रिश्तों की कहानी भी हनीमून की तरह दौड़ रही है। भोग-विलासी स्वभाव के ये लोग कलियों को मसलते हैं। इनके सोच बहिन, बेटियों, मां, भान्जी, भतीजी को लेकर वासना में फिसलते हैं। कोठे के भोग-विलास लेकर अबला, अबोध बालिकाओं के साथ ये बलात्कार करते हैं।
दुष्ट लोगों का एक अन्य वर्ग ऐसा है जो जहर देकर आदमियों को ट्रेनों या बसों में लूटता है। जेबें कतरता है। अटैचियां उड़ाता है। लोगों को मूर्ख बनाता है। अपने साधुई रूप में धनवृद्धि का लालच देता है और ठगकर चला जाता है।
धन के लोभ या लालच का संक्रामक रोग कुछ समय को सुविधा या भोग का योग जरूर बनाता है, लेकिन इस लालची सभ्यता के कारण जाने कितने लोगों की खुशियों का चीरहरण होता है, इसे जानने की फुरसत किसे है। धन के लालच में डाॅक्टर मरीज की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहा है। सास, गरीब-बाप की बेटी-बहू को कुलटा कुलक्षणी बता रही है। उसे घर से बाहर निकाल रही है। उसके मां-बाप की इज्जत उछाल रही है।
जमीन-जायदाद के झगड़े आज आम हैं। थाने या अदालत में भाई, चाचा, ताऊ, पिता पर मारपीट के इल्जाम हैं। धन जुटाने की तीव्र होड़ आज एक को सम्पन्न तो एक को निचोड़ रही है। समाज या परिवार के रिश्ते-नातों को तोड़ रही है। धन पाने के लिये कोई नकली नोट बना रहा है, तो कोई धनिये  में लीद मिला रहा है। कहीं नकली दवा का कारोबार है तो कहीं जाली नोटों और स्टाम्पों के बलबूते आती हुई रोशनी के पीछे ठगई, शोषण, डकैती के माल का कमाल है। यह मकड़ी का ऐसा बुना हुआ एक ऐसा जाल है जिसके भीतर शेयर बाजार जैसी उछाल है।
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+रमेशराज की पुस्तक ‘ विरोधरस ‘ से
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‘ विरोधरस ‘---5.
तेवरी में विरोधरस -- 
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कवि के रूप में एक तेवरीकार के लिये ऐसा सारा वातावरण मक्कारी, छल, फरेब, ठगई से बनता है, जो खुशियों के बजाय दुःख को जनता है। तेवरीकार ऐसे वातावरण को लेकर क्षुब्ध होता है और अपने मन में ऐसे आक्रोश को संजोता है जो तेवरी में विरोध-रस का परिपक्व बनता है-
खुदकुशी कर ली हमारे प्यार ने,
डस लिये हम आपसी तकरार ने।
-दर्शन बेज़ार, ‘देश खण्डित हो न जाए’, पृ-59

कुलटा और कलंकिन, निर्लज, बता-बता कर राख किया
हमने हर दिन अबलाओं को, जला-ला कर राख किया।
भूखे पेट रखा बिन पानी, सोने जैसी काया को
और इस तरह धन लोभी ने, उसे जलाकर राख किया।
-दर्शन बेजार, ‘देश खण्डित हो न जाए’, पृ.58

मयकदों में पड़े हैं गांव के मालिक,
हो गया बरबाद हर घरबार झूठों से।
-कृष्णावतार करुण, ‘कबीर जिन्दा है’,पृ.42
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+रमेशराज की पुस्तक ‘ विरोधरस ’ से
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‘ विरोधरस ‘---6.
|| विरोधरस के उद्दीपन विभाव ||
+रमेशराज
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आलंबन विभाव की चेष्टाएं, स्वभावगत हरकतें, उसकी शरीरिक संरचना, कार्य करने के तरीके आदि के साथ-साथ वहां का आसपास का वातावरण आदि ‘उद्दीपन विभाव’ के अंतर्गत आते हैं। इस संदर्भ में यदि तेवरी में विरोध-रस के उद्दीपन विभावों को विश्लेषित करें तो इसके अंतर्गत खलनायकों के वे सारे तरीके आ जाते हैं, जिनके माध्यम से वे समाज का उत्कोचन, दोहन, उत्पीड़न व शोषण करते हैं।
दुष्ट लोगों का स्वभाव कहीं बिच्छू की तरह डंक मारता महसूस होता है तो कहीं सांप की तरह फुंकारता तो कहीं किसी का जोंक के समान खून चूसता तो कहीं अपने ही कुत्ते के समान काटता हुआ-
हमीं ने आपको पाला पसीने की कमायी से,
हमारे आप कुत्ते थे, हमीं को काट खाया है।
--डॉ. देवराज,‘कबीर जिंदा है’ [ तेवरी-संग्रह ] पृ.-25

कुर्सियों पै पल रहे हैं नाग प्यारे,
वक्त की आवाज सुन तू जाग प्यारे।
--डॉ. एन.सिंह, ‘कबीर जिंदा है’ [ तेवरी-संग्रह ] पृ.-40

वैसे तो बिच्छुओं की तरह काटते हैं ये,
अटकी पै मगर तलवा तलक चाटते हैं ये।
--गिरिमोहन गुरु,‘ कबीर जिंदा है’ [ तेवरी-संग्रह ] पृ.-24
दुष्टजनों की काली करतूतों के कारण आदमी बेचैन हो उठता है। उसकी रातों की नींद के मधुर सपने चकनाचूर हो जाते हैं। दुष्ट लोग सज्जन की इस पीड़ा से अनभिज्ञ खर्राटे मारकर बेफिक्र सोते हैं-
नींदों में था उस मजूर के एक सपना,
लालाजी के खर्राटों ने लूट लिया।
--अरुण लहरी,‘कबीर जिंदा है’ [ तेवरी-संग्रह ] पृ.-45
विरोध-रस के आश्रय को नेता के खादी के वस्त्र भी आदमी की हत्या करने वाले खूनी लिबास नजर आते हैं-
खादी आदमखोर है लोगो
हर टोपी अब चोर है लोगो।
-अरुण लहरी, ‘अभी जुबां कटी नहीं’ [ तेवरी-संग्रह ] पृ.-12
कायिक व वाचिक अनुभावों के बीच जनसेवा और देशभक्ति का ढोंग रचने वाले नेता की करतूतें देखिए-
जब कोई थैली पाते हैं जनसेवकजी,
कितने गदगद हो जाते हैं जनसेवकजी।
भारत में जन-जन को हिंदी अपनानी है,
अंग्रेजी में समझाते हैं जनसेवक जी।
-रमेशराज, ‘इतिहास घायल है’ [ तेवरी-संग्रह ] पृ.44
एक तेवरीकार को सामाजिक परंपराओं, दायित्व, परोपकार का वह सारा का सारा ढांचा बिखरता नजर आता है जिसमें हमारे सामाजिक और राष्ट्रीय मूल्य उजाले की तरह ओजस् थे। उसे तो सनातन पात्रों का व्यवहार आज व्यभिचार और बलात्कार का एक घिनौना बिंब प्रस्तुत करता हुआ सभ्यता के बदबूदार हिस्से की तरह उद्दीप्त करता है-
राम को अब रावन लिखने दो,
ऐसा संबोधन  लिखने दो।
आज द्रौपदी का कान्हा ही,
नोच रहा है तन लिखने दो।
बुरी निगाहें डाल रहा अब ,
सीता पर लक्ष्मन लिखने दो।
-दर्शन बेजार, ‘एक प्रहारःलगातार’ [तेवरी-संग्रह ] पृ.-62
सम्प्रदाय और जातिवाद के समीकरण पर टिकी इस घिनौनी व्यवस्था के नायक भले ही ‘वंदे मातरम्’ और ‘जन-गण-मन’ के गायक हैं, लेकिन जनता इनकी करतूतों को पहचान रही है और यह मान रही है-
कत्ल कर मुंसिफ कहे जाते हैं कातिल आजकल,
शैतान में बेहद अकल है यार अपने मुल्क में।
-अजय अंचल, अभी जुबां कटी नहीं, पृ.21द्ध

चमन उजाड़ रहे हैं माली,
सिसक रहा गुलजार यहां है
--सुरेश त्रस्त, अभी जुबां कटी नहीं, पृ. 35द्ध
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ प्रिंट व इलैक्ट्रोनिक मीडिया को शोषक, त्रासद, उत्पीड़क वातावरण में अपने चरण उस उजाले की ओर बढ़ाने चाहिए, जिसमें हर गलत चीज साफ-साफ दिखाई दे। त्रासदियों से उबरने का कोई हल दिखायी दे। लेकिन सत्य के उद्घोषक ये सरस्वती पुत्र आज विरोध-रस का आलंबन बन चुके हैं और एक अराष्ट्रीय व अराजक भूमिका के साथ उद्दीप्त कर रहे हैं-
पुरस्कार हित बिकी कलम, अब क्या होगा?
भाटों की है जेब गरम, अब क्या होगा?
प्रेमचंद, वंकिम, कबीर के बेटों ने,
बेच दिया ईमान-ध्रम, अब क्या होगा?
--दर्शन बेजार, एक प्रहारः लगातार [तेवरी-संग्रह ] पृ.-39
समूचे विश्व का मंगल चाहने वाला साहित्यकार आज दरबार-संस्कृति का पोषक व उद्घोषक बनता जा रहा है। उसे ‘अभिनंदन और वंदन’ का संक्रामक रोग लग गया है। वह हमारी उद्दीपन क्रिया में कुछ इस तरह जग गया है-
तथाकथित लोलुप साहित्य-सेवियों को,
अभिनंदन का पला भरम, अब क्या होगा?
यूं कैसे साहित्य बने दर्पण युग का,
बने मात्र दरबारी हम, अब क्या होगा?
--दर्शन बेजार, एक प्रहारःलगातार [तेवरी-संग्रह ] पृ.3
प्रकृति का अबाध दोहन हमसे हरे-भरे दृश्य ही नहीं छीन रहा है, हमारे बीच से उन खुशियों को बीन रहा है, जिसकी स्वस्थ वायु में हम चैन की सांस ले सकें। कारखाने भयंकर प्रदूषण छोड़कर हमें ‘ग्लोबल वार्मिंग’ की त्रासदी की ओर धकेल रहे हैं। भौतिक सुख की अंधी होड़ में जुटा परिवहन हमें धुंआ पीने को मजबूर कर रहा है। हमारी खुशी से हमें दूर कर रहा है।
सड़कों के नाम पर पूरे परिवेश में सीमेंट, कंकरीट और तारकोल का जंगल उग आया है। फलतः जलस्तर नीचे जा रहा है। प्रकृति के तरह-तरह के प्रकोपों से सामना करना पड़ रहा है। पुष्पमंडित, जलप्रपातों से भरी, मीठेजल वाली प्रकृति आज हमें इस प्रकार उद्दीपत कर रही है-
है विषैला आजकल वातावरण,
पी गया कितना गरल वातावरण।
--गिरीश गौरव, इतिहास घायल है, पृ.-36
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‘ विरोधरस ‘---7.
|| विरोधरस के अनुभाव ||
+रमेशराज 
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    मन के स्तर पर जागृत हुए भाव का शरीर के स्तर पर प्रगटीकरण अनुभाव कहलाता है। भाव मनुष्य की आंतरिक दशा के द्योतक हैं, जबकि अनुभाव वाह्य दशा के। अतः भाव यदि एक क्रिया है तो अनुभाव अनुकिया या फिर एक प्रतिक्रिया।
हमारे मन में कौन-सा भाव जागृत है, इसका पता हम अनुभाव के ही द्वारा लगाते हैं। यदि मन में स्थायी भाव शोक है तो आंखों से अश्रुपात, स्वर में भंगता, कम्पन या आह-कराह की तीव्रता का प्रगट होना स्वाभाविक है।
जहां तक ‘विरोध-रस’ के स्थायी भाव ‘आक्रोश’ की बात है तो यह ‘करुण-रस’ के स्थायी भाव ‘शोक’ से इसलिए अलग है क्योंकि शोक में किसी प्रिय वस्तु, व्यक्ति आदि के अनिष्ट की आशंका अथवा इनके विनाश से उत्पन्न दुःख की संवेगात्मक स्थिति तो बनती है लेकिन यह संवेगात्मक अवस्था प्रिय की मधुर स्मृतियों से सिक्त होती है।
वियोग में भी योग या संयोग रहता है। निःश्वास, छाती पीटना, रुदन, प्रलाप, मूच्र्छा, कंप, विषाद, क्षोभ, जड़ता, दैन्य, उन्माद, व्याधि  आदि के बावजूद शोक-संतप्त प्राणी, प्रिय से बिछुड़कर भी उससे बिछुड़ना नहीं चाहता। प्रेम को खोकर भी उसी प्रेम को पाना चाहता है। वह तो  विछोह में ‘चंहु दिशि कान्हा-कान्हा की टेर आंसुओं के बहते हुए पनालों’ के साथ लगाता है। विरहाग्नि में जलता है। सिर को धुनता है।
सच्चे प्रेम में यदि प्रेमी या प्रेमिका के बीच यदि वियोग का संयोग बनता है तो इस में भी मोह या रति का आरोह-अवरोह रहता है। जबकि ‘आक्रोश’ से सिक्त प्राणी के निःश्वास, छाती पीटना, रुदन, प्रलाप, कंप, विषाद, क्षोभ, जड़ता, दैन्य, उन्मादादि में रति या सम्मति के ठीक विपरीत असहमति का समावेश होने के कारण इसकी दुःखानुभूति तीक्ष्ण, क्षोभपरक और दाहक होती है।
विरति की गति को ग्रहण करने वाले भाव का नाम आक्रोश है। आक्रोशित प्राणी प्रिय से विश्वासघात या छल पाने की स्थिति में अप्रिय लगने लगता है। विश्वास में चोट खाया प्राणी विश्वासघाती को मात देने की सोचता है। उसमें रति नहीं, घृणा घनीभूत होती है, जो उसे आक्रोश तक ले जाती है।
मान लीजिए-कोई प्रेमी अपने स्वार्थ-भरे प्रेम को पाने में असफल रहता है और प्रेमिका के चेहरे पर तेजाब फैंक देता है। तेजाब से झुलसी उस प्रेमी की कथित प्रेमिका इस घटना को लेकर क्रन्दन जरूर करेगी। उसके नेत्र अश्रुधारा के अविरल प्रपात बन जाएंगे। वह व्याकुल भी होगी। उसमें क्षोभ या विषाद भी सघन होगा। किंतु उसकी दुःखानुभूति शोक को नहीं आक्रोश को जन्म देगी। उसमें रति नहीं, विरति जागृत होगी। वह ऐसे प्रेमी के समूल नाश की कामना करेगी। वह उसे दुआ नहीं, बद्दुआ देगी।
ठीक इसी प्रकार एक एय्याश पति का प्यार उस नारी पर प्यार की नहीं, कटु और लीक्ष्ण अनुभवों की बौछार करेगा, जिसे पता चला है कि उसका पति कोठों पर नोटों के हार लुटाता है या परनारी को अपनी भोग्या बनाता है। सौतन से किया गया प्यार उसे डाह और कराह की ओर ले जाएगा।
एक भाई की सम्पत्ति को अनैतिक और बलात् तरीके से हड़पने वाला दूसरा भाई, पहले भाई को भ्रातत्व की हत्या करने वाला कसाई दिखायी देगा। वह उसे हर हालत में नीच कहेगा।
किसी मजदूर की भूमि को छल और बलपूर्वक छीनने वाला दबंग, मजदूर के अंग-अंग को शोक से नहीं आक्रोश से भरेगा। भले ही वह उसे भीमकाय को देखकर डरेगा, किंतु उसकी वाणी से दिन-रात अपशब्दों का प्रपात झरेगा।
किसी को उधार दिया धन जब वापस नहीं आता तो धन को दबोचने वाले के प्रति मन एक सीमा तक याचना, निवेदन करने के बाद ऐसे क्षोभ व विषाद से तिलमिलाता है जिसमें मलाल, धिक्कार  का अंबार लग जाता है। कुछ मिलकार धन  हड़पे जाने को लेकर ‘आक्रोश’ जग जाता है जिसकी निष्पत्ति ‘विरोध-रस’ में होती है।
‘विरोध-रस’ से सिक्त प्राणी के अनुभाव उस घाव का बयान होते हैं जो विश्वास में की गयी घात से उत्पन्न होते हैं। इन अनुभावों को केवल परंपरागत तरीके से नहीं समझा जा सकता है। ‘विरोध-रस’ को समझने के लिए आवश्यक है कि पहले हम आलंबनगत उद्दीपन विभाव अर्थात् आलंबन के अनुभावों तक पहुंचने का प्रयास करें और इन अनुभावों के आधार पर आश्रय में बनने वाले रस को परखें।
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‘ विरोधरस ‘---8.
|| आलम्बन के अनुभाव ||
+रमेशराज
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विरोधरस के आलम्बनों के कायिक अनुभाव ----
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विरोध-रस के आलंबन बनने वाले अहंकारी, व्यभिचारी, अत्याचारी, ठग, धूर्त्त, शोषक और मक्कार लोग होते हैं जो कभी चैन से नहीं बैठते। ऐसे लोग यदि किसी असहाय की लात-घूंसों से पिटाई करते हैं तो कहीं दहेज के लालच में बहू को जलाकर मारने की कोशिश करते हैं। कहीं इनके हाथ रिश्वत के नोटों को गिन रहे होते है तो कहीं तिजोरियों को तोड़ रहे होते हैं। कहीं डकैती डालते वक्त किसी का सिर फोड़ रहे होते हैं।
विरोधरस के आलंबन कहीं कोरे स्टांप पेपर पर निर्धन और भोले कर्जदार के अंगूठों के निशान लगवाते हुए सेठ-साहूकार के रूप में दिखायी देते हैं तो कहीं विकलांगों पर लाठियां बरसाती पुलिस वाले बन जाते हैं। कहीं निर्दोषों के पेट में चाकू घौंपते साम्प्रदायिक तत्त्व तो कहीं अबला का शीलहरण या चीरहरण करके मूंछें तानते हुए गुण्डे-
लोग हैवान हुए दंगों में, हिंदू-मुसलमान हुए दंगों में
धर्म चाकू-सा पड़ा लोगों पर, कत्ल इन्सान हुए दंगों में।
-योगेंद्र शर्मा, कबीर जिंदा है [तेवरी-संग्रह ] पृ. 67

जुल्म इतना ढा गया है देखिए विकलांग वर्ष,
घाव ज्यों का त्यों हरा है लाठियों का मार का।
[अनिल कुमार अनल, कबीर जिंदा है [तेवरी-संग्रह ] पृ. 63]

रिश्वत चलती अच्छी-खासी खुलकर आज अदालत में,
सच्चे को लग जाती फांसी खुलकर आज अदालत में।
[सुरेश त्रस्त, कबीर जिंदा है [तेवरी-संग्रह ] पृ. 52 ]

फर्जी मुठभेड़ों में मारा निर्दोषों को,
पुलिस इसतरह रही सफाई अभियानों में ।
[अरुण लहरी, कबीर जिंदा है [तेवरी-संग्रह ] पृ. 49 ]
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‘ विरोधरस ‘---9.
|| विरोधरस के आलम्बनों के वाचिक अनुभाव ||
+रमेशराज
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अत्याचारी, दुराचारी व्यक्ति विष के घड़े, कुत्सित इरादों से लैस, छल और अहंकार से भरे होते हैं। उनकी कटूक्तियों व गर्वोक्तियों का उद्देश्य दूसरे के मर्म को चोट पहुंचाना, अपमानित करना होता है। वह अपनी विषैली वाणी से दूसरों को पराजित करने के उद्देश्य से हमेशा तीक्ष्ण और चुभने वाली बातें करते हैं। अश्लील गालियों की बौछार ही उनका अन्य प्राणियों का स्वागत या सत्कार होता है।
विरोध-रस के आलंबन एक ऐसी बीमारी या हीनग्रन्थि के शिकार, हर प्रकार से मक्कार तत्त्व होते हैं जो अपने को दूसरों से श्रेष्ठ साबित करने के लिए सदैव झूठ, छल का सहारा लेते हैं। अनीति का साम्राज्य स्थापित करने वाली उनकी वाणी यदि कभी विनम्र होती भी है तो उसके पीछे उनकी स्वार्थपूर्ति छुपी होती है।
विरोध-रस के आलंबनों के वचन तीर या तलवार की तरह सज्जनों के मन में घाव करते हैं। ये धूर्त्त  लोग वैसे तो बहुत बढ़-चढ़ कर बातें करते हैं, किंतु बात जब न्याय की आती है तो इनकी जुबान बर्फ जैसी जम जाती है-
आये इतिहास में इंसाफ के अवसर कितने,
भीष्म-सी साध गये चुप्पियां गुरुवर कितने?
-राजेश मेहरोत्रा, कबीर जिंदा है [तेवरी-संग्रह ] पृ. 12

स्वार्थ की गीता सभी गाने लगे हैं,
सभ्यता को बेचकर खाने लगे हैं।
-गिरिमोहन गुरु, कबीर जिन्दा है [तेवरी-संग्रह ] पृ. 20

देके दुहाई धर्म की, मजहब की देखिए,
नफरत से आज खाइयों को पाटते हैं ये।
-गिरिमोहन गुरु, कबीर जिंदा है [तेवरी-संग्रह ] पृ.24

भारत में जन-जन को हिंदी अपनानी है,
अंगरेजी में समझाते हैं जनसेवकजी।
-रमेशराज, इतिहास घायल है [तेवरी-संग्रह ] पृ.44

बोल खुशबू में घुले हैं,
शिष्टता दुर्गंधमय है।
+सुरेश त्रस्त, इतिहास घायल है [तेवरी-संग्रह ] पृ. 32

धर्म के उपदेशकों ने आजकल
शांति का प्रस्ताव ठुकराया हुआ है।
-दर्शन बेज़ार, एक प्रहारः लगातार [तेवरी-संग्रह ] पृ.15

बड़ी-बड़ी डींगें अपना तकिया कलाम हैं
हम हैं फन्नेखान दिवाने, धत्त तेरे की।
-राजेंद्र मिलन, सूर्य का उजाला, समीक्षा अंक, पृ.2
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‘ विरोधरस ‘---10.
|| विरोधरस के सात्विक अनुभाव || 
+रमेशराज
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भाव-दशा में प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होने वाले कायिक परिवर्तन ‘सात्विक अनुभाव’ कहलाते हैं। किसी भी सुन्दर स्त्री या अबला को देखकर उसे पाने या दबोचने के लिए दुष्टजनों की भुजाएं फड़कने लगती हैं। जीभ लार टपकाने लगती है। ये खूबसूरत चीजों पर केवल अपनी कुदृष्टि ही नहीं डालते, उन्हें कुचलने या मसलने को भी बेचैन रहते हैं-
बुरी निगाहें डाल रहा है, नारी पर लक्ष्मण लिखने दो।
-दर्शन बेज़ार, एक प्रहारःलगातार, [तेवरी-संग्रह ] पृ.46
मंच पर सम्मानित होने वाले नेताजी रोमांचित और गदगद हो जाते हैं-
जब कोई थैली पाते हैं जनसेवकजी
कितने गदगद हो जाते हैं जनसेवकजी।
-रमेशराज, इतिहास घायल हैं,[तेवरी-संग्रह ] पृ. 44
अपने ही आनंद में डूबे रहने वाले अत्याचारी वर्ग की एक विशेषता यह होती है कि यह वर्ग दूसरों की त्रासद परिस्थितियों को देखकर हँसने, मुस्कराने के साथ-साथ ठहाके लगाने लगता है। आतंकवादियों को लाशों के ढेर देखकर जिस आनंद की प्राप्ति होती है, वह किसी से छुपा नहीं है। ऐसे लोग चीखते वातावरण के बीच अट्टहास करते हुए अपनी प्रसन्नता का इजहार करते हैं-
फातिमा की चीख पर करते दरिन्दे अट्टहास, आज मरियम बन्द कमरे में पड़ी चिल्ला रही।
-दर्शन बेजारः एक प्रहारः लगातार [तेवरी-संग्रह ] पृ. 41

सच्चाई ताने सहती,
झूठ सभी का यार हुआ।
-राजेंद्र वर्मा, सूर्य का उजाला, समीक्षा अंक, पृ.2
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‘ विरोधरस ‘---11.
|| विरोध-रस का आलंबनगत संचारी भाव ||
+रमेशराज
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विरोध की रस-प्रक्रिया को समझने के लिये आवश्यक यह है कि सर्वप्रथम आलंबन के उन भावों को समझा जाये जो आश्रय के मन में  रसोद्बोधन का आधार बनते हैं। विरोध-रस के आलंबन चूंकि धूर्त्त , मक्कार, अत्याचारी, बर्बर, आतातायी और हर प्रकार की अनैतिकता के व्यवसायी होते हैं और इनकी काली करतूतें ही आश्रय अर्थात् आमजन को एक दुखानुभूति के साथ उद्दीप्त करती हैं, अतः इनके भीतर छुपे हुए हर कुटिल भाव का आकलन भी जरूरी है। चतुर और शोषक वर्ग के मन में निम्न भाव हमेशा वास करते हैं-
असामाजिक और अवांछनीय तत्त्वों में पाये जाने वाला रस-पदार्थ मद है। मद में चूर लोगों का मकसद दूसरे प्राणियों को शारीरिक और मानसिक हानि पहुंचाना होता है। साथ ही यह बताना होता है कि हम ही महान है। इस जहां के बाकी जितने इन्सान हैं, वे उन्हें अपने पैरों की जूती समझकर अपनी तूती की आवाज को बुलंद करना चाहते हैं।
मदांध लोग सभ्य समाज के बीच खंजर उठाये, बाहें चढ़ाये, अहंकार और गर्व के साथ घूमते हैं-
खून के धब्बे न अब तक सूख पाये
आ गये फिर लोग लो खंजर उठाये।
-दर्शन बेजार, देश खण्डित हो न जाए [तेवरी-संग्रह ] पृ. 41

' मद ' 
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मदांध लोग अपनी सत्ता के नशे में किसी असहाय या गरीब की आह-कराह को नहीं सुनते-
लाश के ऊपर पर टिका जिसका तखत
क्या सुनेगी आह ऐसी सल्तनत।
-दर्शन बेजार, देश खण्डित हो न जाए [तेवरी-संग्रह ] पृ.52
      मद में चूर लोग दुराचार की पराकष्ठा तक जाते हैं। असहाय द्रौपदी को अपनी जांघ पर बिठाते हैं-
सड़क पर असहाय पांडव देखते
हरण होता द्रौपदी का चीर है।
-दर्शन बेजार, एक प्रहारः लगातार [तेवरी-संग्रह ] पृ. 21

उग्रता 
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गलत आचरण का वरण करने वाले लोगों के मन से शांति का हरण हो जाता है। ऐसे लोग अशांत चित्त वाले ही नहीं होते, इनके मन में आक्रामकता और उग्रता भरी होती है जो इन्हें सदैव हिंसक कार्य के लिए उकसाती है-
जो हुकूमत कर रहे हैं ताकतों से, जुड़ गये जुल्मोसितम की आदतों से।
-दर्शन बेजार, एक प्रहारः लगातार [तेवरी-संग्रह ] पृ. 49
उग्र लोगों की अगर कोई विचारधारा होती है तो वह है-आतंकवाद। भयावह आक्रामकता से भरे इनके इरादे जनता को गाजर-मूली की तरह काटते हैं-
जान का दुश्मन बना क्यों भिंडरा,
संत पर हैवानियत आसीन क्यों?
-दर्शन बेजार, एक प्रहारः लगातार [तेवरी-संग्रह ] पृ.59

स्वार्थ 
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     विरोधरस के आलंबन बने स्वार्थी लोगों के मन सदैव सद्भावना के दर्पन चटकाते हैं। ये जिस किसी के दिल में जगह बनाते हैं, उसी के साथ विश्वासघात करते हैं। अपनी स्वार्थपूर्ति के लिये ये कहीं सूदखोर महाजन हैं तो कहीं जहरखुरानी करते राहजन हैं। जनता को ठगने के लिये कहीं ये साधु के रूप में उपस्थित हैं तो कहीं घोर आदर्शवाद को दर्शाते इनके छल भरे इनके आचरण हैं-
जिस हवेली को रियाया टेकती मत्था रही, वह हवेली जिस्म के व्यापार का अड्डा रही।
-दर्शन बेजार, एक प्रहारः लगातार [तेवरी-संग्रह ] पृ. 41
अपनी स्वार्थसिद्धि के लिये ऐसे लोग ईमानदारी का मर्सिया पढ़ते हैं तो दुराचरण को कसीदे की तरह गाते हैं। अभिनंदन और धन के लिये ऐसे लोगों के मुंह से दुराचारियों की तारीफ में फूल झड़ते हैं। इस तरह ये लोग अनीति को आधार बनाकर प्रगति की सीढि़यां चढ़ते हैं-
पुरस्कार हित बिकी कलम अब क्या होगा?
भाटों की है जेब गरम अब क्या होगा?
‘प्रेमचंद’, ‘वंकिम’, ‘कबीर’ के बेटों ने,
बेच दिया ईमान-धरम अब क्या होगा?
-दर्शन बेजार, एक प्रहारःलगातार [तेवरी-संग्रह ] पृ. 39
स्वार्थी लोगों की अतृप्त इच्छाएं कभी तृप्त नहीं होतीं। ऐसे लोग अति महत्वाकांक्षी होते हैं। ये लोग छल-कपट का व्यापार करते हैं। ये दूसरों के हाथ के निवाले छीनते हैं।  औरों के लिये विषैला वातावरण तैयार करते हैं। इनके घिनौने व्यापार की मार से आज न धरती अछूती है, न आसमान-
जमीं पै रहने वालों की हवस आकाश तक पहुंची,
धरा की बात छोड़ो ये गगन तक बेच डालेंगे।
-सुरेश त्रस्त, इतिहास घायल है [तेवरी-संग्रह ] पृ.30

अंगरेजी में कर हिंदी की ऐसी-तैसी,
अपनी बड़ी दुकान अजाने, धत्त तेरे की।
-डॉ.राजेंद्र मिलन, सूर्य का उजाला, समीक्षा अंक, पृ.2

वितर्क या कुतर्क
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अपनी बात या विचारधारा को मनवाने या स्थापित करने के लिये धूर्त्त और मक्कार लोग कुतर्क या वितर्क का सहारा लेते हैं। हर कथित धर्म का संचालक अपने अधर्म को स्थापित करने के लिये सत्य के नाम पर तरह-तरह के कुतर्क गढ़ता है। असत्य को सत्य के रूप में स्थापित करने वाले लोगों का, जो साक्षात प्रमाणित है, उसे न मानकर, जो छद्म है, झूठ है, छल है, की स्थापना करना ही उद्देश्य होता है -
एक ‘रेप’ अंकित है जिसकी हर धड़कन पर, तुम उसको-
उल्फत का सैलाब कह रहे, जाने तुम कैसे शायर हो?
-विजयपाल सिंह, इतिहास घायल है [तेवरी-संग्रह ] पृ.22
वितर्क या कुतर्क के सहारे अफवाहों को जन-जन के बीच फैलाना और उन्हें दंगों के द्वारा ‘वोट’ के रूप में भुनाना हमारे देश के नेताओं को भलीभांति आता है। अफवाहों के बीच हिंदू और मुसलमान में तब्दील हुए लोग कुतर्क या वितर्क से एक ऐसा नर्क पैदा करते हैं, जिसके भीतर निर्दोष लोग चाकुओं, गोलियों से घायल होते हैं, मरते हैं-
बड़ी विषैली हवा चली है शहरों में,
घिरे लोग सब अफवाहों की लहरों में ,
सड़कों पर कस दिया शिकंजा कर्फ्यू ने,
कैद हुए हम संगीनों के पहरों में।
-दर्शन बेजार, एक प्रहारः लगातार [तेवरी-संग्रह ] पृ. 28
यह भी धर्मिक उन्मादियों के वितर्क का ही परिणाम है-
लोग हैवान हुए दंगों में, हिंदू-मुसलमान हुए दंगों में।
धर्म चाकू-सा पड़ा लोगों पर, कत्ल इन्सान हुए दंगों में।
-योगेन्द्र शर्मा, कबीर जिंदा है [तेवरी-संग्रह ] पृ. 67
वितर्क एक ऐसा भाव है जिसके द्वारा वकील एक निर्दोष को फांसी पर चढ़वा देता है। थाने में आये असहाय, निर्बल और निर्धन से धन न आता देखकर हमारे देश की पुलिस सबसे अधिक वितर्क का सहारा लेती है।
एक नेता अपनी सत्ता को कायम रखने या सत्ता का मजा चखने के लिये मंच पर भाषण देते समय केवल वितर्क के बलबूते पूरे जन समुदाय को मंत्रमुग्ध कर देता है-
‘भारत में जन-जन को हिंदी अपनानी है’,
अंगरेजी में समझाते हैं जनसेवक जी।
-रमेशराज, इतिहास घायल है [तेवरी-संग्रह ] पृ. 44
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+रमेशराज की पुस्तक ‘ विरोधरस ’ से
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+रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001 
मो.-9634551630      

 

 

 

 

‘ विरोधरस ‘---12.
|| विरोध-रस के आश्रयगत संचारी भाव ||
+रमेशराज
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विरोध-रस के आश्रय अर्थात् जिनमें रस की निष्पत्ति होती है, समाज के वे दबे-कुचले-सताये-कमजोर और असहाय लोग होते हैं जो यथार्थवादी काव्य या उसके एक रूप तेवरी के सृजन का आधार बनते हैं। तेवरी इन मानसिक और शारीरिक रूप से पीडि़त लोगों के घावों पर मरहम लगाती है, उन्हें क्रांति के लिए उकसाती है। तेवरी-काव्य के ये आश्रय, आलंबन अर्थात् स्वार्थी, शोषक लोगों के अत्याचारों के शिकार सीधे-सच्चे व मेहनतकश लोग होते हैं। इनके मन में स्थायी भाव आक्रोश तीक्ष्ण अम्ल-सा उपस्थित रहता है और अनेक संचारी भाव, घाव के समान पीड़ादायी बन जाते हैं, जो निम्न प्रकार पहचाने जा सकते हैं-
[ रमेशराज की सद्यः प्रकाशित पुस्तक ' विरोध-रस ' से ]
 
विरोध-रस का आश्रयगत संचारी भाव-- ' दुःख ' 
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विरोध-रस के आश्रयों में दुःख का समावेश बार-बार होता है। कहीं उसे भूखे बच्चों की भूख ने दुःखी कर रखा होता है तो कहीं उनके मन में साहूकार का कर्ज न लौटा पाने के कारण पनप रही चिंता होती है। कहीं नौकरी नहीं मिल पाने के कारण तनाव है तो कहीं  जमीन-जायदाद को जबरन हड़पने की व्यथा-
जो भी मुखड़े दिखाई देते हैं, उखड़े-उखड़े दिखायी देते हैं।
-गिरिमोहन गुरु, ‘कबीर-जिन्दा है [तेवरी-संग्रह ] पृ. 19
लोगों को दुःख के कारण जैसे एक दिन में कई बार मरने की आदत-सी हो गयी होती है---
हर दिन में अब कई मर्तबा,
मरने की आदत है लोगो!  
-शिवकुमार थदानी, ‘कबीर जिन्दा है’ [तेवरी-संग्रह ] पृ. 43

हर चीज का अभाव कोई देखता नहीं,
इस दर्द का बसाव कोई देखता नहीं।
-ज्ञानेंद्र साज़, अभी जुबां कटी नहीं, [तेवरी-संग्रह ] पृ. 44

विरोध-रस का आश्रयगत संचारी भाव-- ' दैन्य '
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वांछित स्वतंत्र और सुखद जीवन को जब स्वार्थी या अधम व्यक्ति पराधीन बना देते हैं तो पराधीन व्यक्ति की हालत, दीनता व असहायता में बदल जाती है-
शक्ति पराजित हो जाती है मात्र समय से,
सिंह खड़ा है बन्दी-बेबस चिडि़याघर में।
-राजेश महरोत्रा, कबीर जिन्दा है [तेवरी-संग्रह ] पृ. 15

टोपी जिसकी रही उछलती-टुकड़े जिसे नसीब नहीं,
दुनिया उड़ा रही है हाँसी, चुप बैठा है गंगाराम।
-जगदीश श्रीवास्तव, कबीर जिन्दा है [तेवरी-संग्रह ] पृ. 41
अशांति, यातना, शोषण, उत्पीड़न के शिकार व्यक्ति का शांत और प्रसन्नचित्त, अशांति की भाव-दशा ग्रहण कर लेता है-
मेरे मेहमान ही घर आ के मुझे लूट गये,
मैं उन्हें ढूंढता फिरता हूं निगहतर लेकर।
-दर्शन बेज़ार, देश खण्डित हो न जाए [तेवरी-संग्रह ] पृ. 29

हर किसी में तिलमिलाहट-सी है एक,
दर्द कुछ हद से घना है आजकल।
-सुरेशत्रस्त, अभी जुबां कटी नहीं [तेवरी-संग्रह ] पृ. 38

विरोध-रस का आश्रयगत संचारी भाव-- ' याचना  '
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खल, हर किसी को पल-पल प्रताडि़त, अपमानित करते हैं। सज्जन उन्हें ऐसा न करने के लिये दया की भीख मांगते हैं। वे याचक-भाव के साथ हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं-
याचक भाव लिये मुख पर-आंखों में आंसू का दरिया,
मुखियाजी का जैसे होकर दास खड़ा है होरीराम।
-सुरेशत्रस्त, ‘कबीर जिन्दा है’ [तेवरी-संग्रह ] पृ.51

विरोध-रस का आश्रयगत संचारी भाव-- ' शंका '
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अनगिनत उलझनों, समस्याओं से घिरे आदमी के जीवन में भविष्य को लेकर शंकाओं का ज्वार उठना स्वाभाविक है। ठीक इसी प्रकार साम्प्रदायिक वातावरण में कर्फ्यू घोषित हो जाने के बाद दो जून की रोटी की जुगाड़ में घर से बाहर गये निर्धन के परिवार को उसके अनिष्ट की शंका सतायेगी ही। साहूकार के कर्ज को समय पर न लौटा पाने वाले निर्धन का मन आने वाले बुरे दिनों से आशंकित तो रहेगा ही।

विरोध-रस का आश्रयगत संचारी भाव-- ' याचना  '
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जनतांत्रिक तरीके से चुनी गयी एक घोषित जनवादी सरकार जब अजनवादी कार्य करने लगे तो शंकित होना स्वाभाविक हैं-
पूंजीवाद प्रगति पर यारो,
ये कैसा जनवाद देश में।
-गिरिमोहन गुरु, कबीर जिन्दा है [तेवरी-संग्रह ] पृ. 17


विरोध-रस का आश्रयगत संचारी भाव-- ' विषाद '
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अपनी बर्बादी का मातम करता हुआ व्यक्ति जब यह देखता है कि उसके अपनों ने ही उसे लूटा है, उसके रंगीन सपनों को कमरतोड़ महंगाई ने कूटा है, वह इस व्यवस्था के लुटेरों के चुंगल से जैसे-तैसे छूटा है तो उसके मन में एक गहरा विषाद छा जाता है-
देश हुआ बरबाद आजकल,
पनपा घोर विषाद आजकल।
चोर-सिपाही भाई-भाई,
कौन सुने फरियाद आजकल।
-अनिल कुमार ‘अनल’, कबीर जिन्दा है’ [तेवरी-संग्रह ] पृ.-64


विरोध-रस का आश्रयगत संचारी भाव-- ' संताप '
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ताप के समान भाव लिये शोषित और उत्पीडि़त व्यक्ति की दशा ऐसी होती है, जिसमें वह तड़पता-छटपटाता और तिलमिलाता रहता है-
अब तो प्रतिपल घात है बाबा,
दर्दों की सौगात है बाबा।
-सुरेश त्रस्त, अभी जुबां कटी नहीं [तेवरी-संग्रह ] पृ.37

हर खुशी अब आदमी के गाल पर,
एक झुर्री-सी जड़ी है दोस्तो!
-ज्ञानेंद्र साज़, अभी जुबां कटी नहीं [तेवरी-संग्रह ] पृ. 46


विरोध-रस का आश्रयगत संचारी भाव-- ' आवेग '
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अत्याचार से पीडि़त व्यक्ति भले ही असहाय होकर एकांत में बैठा हो, लेकिन उसका मन अपमान-तिरस्कार-मार-बलात्कार से उत्पन्न आघात के कारण असह्य वेदना को प्राप्त होता है। ऐसे व्यक्ति अपने शत्रु के साथ मन के स्तर पर युद्ध लड़ते हैं। उनका मन शत्रु के प्रति सदैव उग्र रहता है और बार-बार यही कहता है-
मैं डायनमाइट हूं ये भी,
इक दिन दूंगा दिखा लेखनी।
टूटे बत्तीसी दर्दों की,
ऐसे चांटे जमा लेखनी।
-रमेशराज, अभी जुबां कटी नहीं [तेवरी-संग्रह ] पृ.51,53़


तुम पहने हो बूट मिलन के ठेंगे से,
तुम पर महंगा सूट मिलन के ठेंगे से।
-डॉ. राजेंद्र मिलन, सूर्य का उजाला, वर्ष-16, अंक-16, पृ.2

हमसे सहन नहीं होते हैं अब सुन लो,
बहुत सहे आघात, महंगाई रोको।
-ज्ञानेंद्र साज़, अभी जुबां कटी नहीं [तेवरी-संग्रह ] पृ. 47

विरोध-रस का आश्रयगत संचारी भाव-- ' भय '
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विरोध-रस के आलंबन, आश्रयों को आतंकित और भयग्रस्त करते हैं। किंतु असहाय और निर्बलों के भीतर पनपा भय, भयानक-रस का परिचय न देकर उस वक्त विरोध-रस की लय बन जाता है, जब इस सच्चाई तक आता है-
रहनुमा सैयाद होते जा रहे हैं देश में,
भेडि़ए आबाद होते जा रहे हैं देश में।
आदमी सहता रहा जुल्मो-सितम ‘अंचल’ मगर,
जिस्म अब फौलाद होते जा रहे हैं देश में।
-अजय अंचल, अभी जुबां कटी नहीं [तेवरी-संग्रह ] पृ.20


विरोध-रस का आश्रयगत संचारी भाव-- ' साहस '
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यह तय है कि स्थायी भाव आक्रोश, दमन, शोषण, उत्पीड़न आदि से उत्पन्न होता है, अतः दमित, शोषित, पीडि़त व्यक्ति का दुःख, शोक, भय, दैन्य, अशांति, आत्म-प्रलाप, संताप, शंका, याचना, क्रंदन आदि से भर उठना स्वाभाविक है।
पीडि़त व्यक्ति में  दुःख, शोक, भय, दैन्य, अशांति, आत्म-प्रलाप, संताप, शंका, याचना, क्रंदन आदि की स्थिति कुछ समय को ही अपना अस्तित्व रखती है। तत्पश्चात एक अग्नि-लय बन जाती है, जो पीडि़त व्यक्ति को एक नयी क्रांति के लिए उकसाती है।
आक्रोशित व्यक्ति के याचना-भरे स्वर मर जाते हैं। उनकी जगह ऐसी भाषा जन्म लेती है, जिनके हर शब्द में शत्रु वर्ग के विरुद्ध विस्फोटक भरा होता है। वाणी चाकू की धार का काम करती है। शत्रु वर्ग के कलेजे में छुरी की तरह उतरती है-
देश-भर में अब महाभारत लिखो,
आदमी को क्रांति के कुछ खत लिखो।
-अनिल कुमार अनल, इतिहास घायल है [तेवरी-संग्रह ] पृ. 12

कसम है तुझे अपने देश की मांओं की,
संविधान बेचने वालों से वास्ता न रखना।
-अशोक अश्रु, सूर्य का उजाला, समीक्षा अंक, पृ.2
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+रमेशराज की पुस्तक ‘ विरोधरस ’ से
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+रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001 
मो.-9634551630      

 

 

 

‘ विरोधरस ‘---13.
|| विरोध-रस के आश्रयों के अनुभाव ||
+रमेशराज
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हिंदी काव्य की नूतन विधा तेवरी के पात्र जिनमें विरोध-रस की निष्पत्ति होती है, ऐसे पात्र हैं, जो इसके आलंबनों के दमन, उत्पीड़न के तरह-तरह से शिकार हैं। एक तरफ यदि इनकी आंखों में अत्याचारियों का खौफ है तो दूसरी ओर अत्याचारियों के प्रति अंगार भी हैं। ये कभी मुरझाये हुए हैं तो कभी झल्लाए-तमतमाए और तिलमिलाए हुए।
विरोध-रस के आश्रयों के  भीतर स्थायी भाव ‘आक्रोश’ पूरे जोश के साथ शत्रु वर्ग को अपशब्दों में कोस रहा होता है तो कहीं ललकार रहा होता है तो कहीं खलों के निर्मूल विनाश की कामनाएं कर रहा होता है।
तेवरी में विरोध-रस के आश्रयों के अनुभाव उस घाव की मार्मिक कथाएं हैं, जिनमें आहें हैं-कराहें हैं संताप क्षोभ विषाद आवेश-आवेग और उन्माद से भरी संवेदनाएं हैं-
मौन साधे बैठा है होंठ-होंठ और अब,
आंख-आंख द्रौपदी है, तेवरी की बात कर।
-अरुण लहरी, इतिहास घायल है [तेवरी-संग्रह ] पृ. 26
तेवरी काव्य में वर्णित विरोध-रस के आश्रयों के अनुभावों का विश्लेषण करें तो निम्न प्रकार के हैं-

अपशब्द बोलना-
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जब कोई किसी को सताये, किसी की मजबूरी पर ठहाके लगाए, अपमानित करे, अहंकारपूर्ण कटूक्तियों से कोमल मन में विष भरे तो पीडि़त व्यक्ति क्या करेगा? वह गालियां देगा-
सब ही आदमखोर यहां हैं,
डाकू, तस्कर, चोर यहां हैं।
-कुमार मणि, कबीर जिंदा है [तेवरी-संग्रह ] पृ. 37

खुदगर्जों, मक्कारों को कुर्सी मिलती ,
कैसा चयन हुआ है मेरे देश में ।
-ज्ञानेंद्र साज़, अभी जुबां कटी नहीं [तेवरी-संग्रह ] पृ. 48
सताया गया व्यक्ति इस घिनौने सिस्टम के गम को यूं व्यक्त करेगा----
देश यहां के सम्राटों ने लूट लिया,
सत्ताधारी कुछ भाटों ने लूट दिया।
-अरुण लहरी, कबीर जिंदा है [तेवरी-संग्रह ] पृ65

लूट लिया करते थे पहले धन-दौलत,
इज्जत भी अब करें कसाई टुकड़े-टुकड़े।
-राजेश मेहरोत्रा, कबीर जिंदा है [तेवरी-संग्रह ] पृ.4

तड़पना-
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नदी किनारे तड़प रही मछली बेचारी,
पानी से भर मरुथल देंगे बातें झूठी।
-राजेश मेहरोत्रा, कबीर जिंदा है [तेवरी-संग्रह ] पृ.9

मुट्ठियों को भींचना-
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मुट्ठियों को भींचता वो स्वप्न में, 
आंख खुलने पर मगर लाचार है।
-गिरिमोहन गुरु, कबीर जिंदा है [तेवरी-संग्रह ] पृ.23
भयग्रस्त हो जाना-
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रातों को तू ख्वाब में चिल्लायेगा साँप,
लोगों के व्यक्तित्व में चंदन-वन मत खोज।
-रमेशराज, इतिहास घायल है [तेवरी-संग्रह ] पृ.43

मति फिर जाना---
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तर्क की उम्मीद फिर क्या कीजिए,
आदमी जब राशिफल होता गया।
-योगेंद्र शर्मा, इतिहास घायल है [तेवरी-संग्रह ] पृ.39

आंखों से रंगीन सपनों का मर जाना-
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दर्दों को काटेंगे सारी उम्र हम,
बो गया है वो फसल वातावरण।
मर गये आंखों के सपने जब कभी,
हो गया तब-तब तरल वातावरण।
-गिरीश गौरव, इतिहास घायल है [तेवरी-संग्रह ] पृ.36

सिसकियां भरना-
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जो विदूषक मंच पर हंसता रहा,
सिसकियां भरता वही नेपथ्य में।
-दर्शन बेजार, इतिहास घायल है [तेवरी-संग्रह ] पृ.18

चट्टान जैसा सख्त हो जाना-
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फूल ने जब बात की आक्रोश की,
पांखुरी चट्टान जैसी हो गयी।
-गजेंद्र बेबस, इतिहास घायल है [तेवरी-संग्रह ] पृ.16

सुबकना-
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सिर्फ सुबकती रहती हैं रूहें जिसमें,
देखा है वो आलम भी अब तो हमने।
-दर्शन बेजार, एक प्रहारः लगातार [तेवरी-संग्रह ] पृ. 60

थर-थर कांपना-
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कांपता थर-थर यहां हर आदमी,
घूमता कातिल यहां स्वाधीन क्यों?
-दर्शन बेजार, एक प्रहारःलगातार [तेवरी-संग्रह ] पृ.46

विक्षिप्त-सा हो जाना-
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गांव-गांव विक्षिप्त ‘निराला’ घूम रहा,
दलबदलू जा कलम मिली दरबारों से।
-दर्शन बेजार, एक प्रहारः लगातार [तेवरी-संग्रह ] पृ.54

आग-सा दहक उठना-
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आप अब ‘बेजार’ से मिल लें जरा,
आग से कुछ रू-ब-रू हो जाएंगे।
-दर्शन बेजार, एक प्रहारः लगातार [तेवरी-संग्रह ] पृ.48

कृशकाय हो जाना-
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भूख की ऐसी फसल घर-घर उगी,
पेट को छूने लगी लो पसलियां।
-दर्शन बेजार, एक प्रहारः लगातार [तेवरी-संग्रह ] पृ.47

कलेजा मुंह तक आना---
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साथियो! आकाश में कैसा अँधेरा छा गया,
वो उठी काली घटा, मुंह को कलेजा आ गया।
-दर्शन बेजार, एक प्रहारः लगातार [तेवरी-संग्रह ] पृ.45

आशंका व्यक्त करना-
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पुरस्कार-हित बिकी कलम, अब क्या होगा?
भाटों की है जेब गरम, अब क्या होगा?
-दर्शन बेजार, एक प्रहारः लगातार [तेवरी-संग्रह ] पृ.39

त्रासद परिस्थितियों की चर्चा करना-
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किस कदर हिंसक हुआ है आदमी,
लोग आये हैं बताने गांव के।
-दर्शन बेजार, एक प्रहारः लगातार [तेवरी-संग्रह ] पृ.37

कैसा चलन हुआ है मेरे देश का,
गौरव रेहन हुआ है मेरे देश का।
-ज्ञानेंद्र साज़, अभी जुबां कटी नहीं [तेवरी-संग्रह ] पृ. 48

फिर यहां ‘जयचंद’ पैदा हो गये,
‘मीरजाफर’ जिन पै शैदा हो गये।
मंदिरों की सभ्यता तो देखिए,
संत भी गुण्डे या दादा हो गये।
-दर्शन बेजार, एक प्रहारः लगातार [तेवरी-संग्रह ] पृ.35

निरंतर चिंताग्रस्त रहना---
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जिंदगी दुश्वार है अब रामजी,
हर कोई लाचार है अब रामजी!
-गिरीश गौरव, इतिहास घायल है [तेवरी-संग्रह ] पृ.34
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+रमेशराज की पुस्तक ‘ विरोधरस ’ से
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+रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001 
मो.-9634551630      

 

 

 

‘ विरोधरस ‘---14.
|| विरोधरस का स्थायीभाव---'आक्रोश' ||
+रमेशराज
विरोध-रस को परिपक्व अवस्था तक पहुंचाने वाला स्थायी भाव ‘आक्रोश’ अनाचार और अनीति के कारण जागृत होता है। इसकी पहचान इस प्रकार की जा सकती है-
जब शोषित, दलित, उत्पीडि़त व्यक्ति की समझ में यह तथ्य आने लगता है कि वर्तमान व्यवस्था सुविधा  के नाम पर सिर्फ दुविधा में डाल रही है-कोरे आश्वासनों के बूते आदमी का कचूमर निकाल रही है तो उसे नेताओं की वसंत के सपने दिखाने वाली वाणी खलने लगती है-
इस व्यवस्था ने दिए अनगिन जखम इन्सान को,
बात नारों की बहुत खलने लगी है बंधु अब।
-अजय अंचल, अभी जुबां कटी नहीं [तेवरी-संग्रह ] पृ. 22
भूख-गरीबी-बदहाली का शिकार आदमी जब यह जान लेता है कि महंगाई-बेरोजगारी-अराजकता किसी और ने नहीं फैलायी है, इसकी जिम्मेदार हमारी वह सरकार है जो लोकतांत्रिक तरीके से चुनी अवश्य गयी है, लेकिन लोकतंत्र के नाम पर सारे कार्य अलोकतांत्रिक कर रही है, नये-नये टैक्स लगाकर आम आदमी की कमर तोड़ रही है। यह सब देखकर या जानकार उसका ऐसी सरकार से मोहभंग ही नहीं होता, उसके भीतर व्यवस्था या सत्ता परिवर्तन की एक बैचैनी परिलक्षित होने लगती है। इसी बैचेनी का नाम आक्रोश है। आक्रोशित आदमी में बार-बार एक ही सवाल मलाल की तरह उछाल लेता है---
रोटी के बदले आश्वासन,
कब तक देखें यही तमाशा?
-दर्शन बेजार, देश खण्डित हो न जाए [तेवरी-संग्रह ] पृ.51
धर्म, आस्था व श्रद्धा का विषय इसलिए है क्योंकि इसके माध्यम से मनुष्य आत्मिक शांति को प्राप्त करना चाहता है। अहंकार-मोह-मद और स्वार्थ के विनाश को सहज सुकोमल व उदार बनाने वाली अंतर्दृष्टि मनुष्य के मन में दया, करुणा और मंगल की भावना की वृष्टि करती है। मनुष्य धर्म के वशीभूत होकर शेष सृष्टि को भी अपना ही हिस्सा या परिवार मानता है। उसमें परोपकार की भावना अभिसंचित होती है। ऐसे मनुष्य की आत्मा समस्त सृष्टि के साथ हंसती-गाती-मुस्काती और रोती है।
समूचे विश्व से अपने परिवार जैसा व्यवहार करने वाला व्यक्ति जब यह देखता है कि धार्मिकस्थल मादक पदार्थों की आपूर्ति करने वाले, लोभ-लालच देकर आम आदमी का धन अपनी अंटियों में धरने वाले, सांप्रदायिकता को लेकर उन्मादी, छल-प्रपंच के आदी बन चुके हैं तो उसकी आदर्शवादी, कल्याणकारी भावनाएं रक्तरंजित हो जाती हैं। सांप्रदायिक उन्माद से पनपी हिंसा उसे केवल विरक्ति की ही ओर नहीं ले जाती है, उसे यह कहने को भी उकसाती है-
भ्रष्टाचार धर्म है उनका,
दुर्व्यवहार धर्म है उनका।
राखी-रिश्ता वे क्या जानें,
यौनाचार धर्म है उनका।
-अरुण लहरी, अभी जुबां कटी नहीं [तेवरी-संग्रह ] पृ. 10
धर्म का अधर्मी रूप देख कर एक मानव-सापेक्ष चिन्तन करने वाला व्यक्ति, छटपटाता है-तिलमिलाता है। क्षुब्ध होता है | इसी क्षुब्धता-छटपटाहट-तिलमिलाहट से स्थायी भाव आक्रोश जागृत हो जाता है---
-गौतम’ जिन्हें हमने कहा इस सदी में दोस्तो?
आज वो जल्लाद होते जा रहे हैं देश में।
-अजय अंचल, अभी जुबां कटी नहीं [तेवरी-संग्रह ] पृ.20
एक मानवतावादी चिंतक धार्मिक पाखण्ड के विद्रूप के शिकार उस हर भोले इंसान को देखकर दुखी होता है, जो प्रबुद्ध चेतना के स्थान पर राशिफल में उलझ गया है-
अब बदलना है जरूरी हर तरफ इसका दिमाग,
आदमी बस राशिफल है यार अपने देश में।
-अजय अंचल, अभी जुबां कटी नहीं [तेवरी-संग्रह ] पृ.21
मनुष्य का एक सुकोमल स्वभाव है कि वह सहज ही दूसरों पर विश्वास कर लेता है, उनके प्रति समर्पित हो जाता है। बस इसी का फायदा उठाते हैं दुष्टजन। वे उसके साथ बार-बार छल करते हैं। उसके धन को हड़पने के नये-नये तरीके खोजते हैं। उसके विश्वास को ठेस पहुंचाते हैं। विश्वास के बीच में ही विश्वासघात के रास्ते निकलते हैं, इसलिये साथ-साथ जीने-मरने की सौगंदें खाने वाले दुष्टजन गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं।
प्रेम स्वार्थसिद्धि का जब साधन बनता है तो सज्जन का माथा ठनकता है। आपसी संबंध एक लाश में तब्दील हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में सज्जन बार-बार हाथ मलता है। मन उस दुष्ट के प्रति आक्रोश से भर उठता है। उसमें मित्रता के प्रति शंकाएं जन्म लेने लगती हैं। उसका मन आसक्ति के स्थान पर विरक्ति से भर जाता है-
हर पारस पत्थर ने हमको
धोखे दिये विकट के यारो।
सब थे खोटे सिक्के,
जितने देखे उलट-पलट के यारो।
-अरुण लहरी, इतिहास घायल है [तेवरी-संग्रह ] पृ.26
प्यार में विश्वासघात को प्राप्त ठगई-छल-स्वार्थ के शिकार आदमी में व्याप्त आक्रोश की दशा कुछ इस प्रकार की हो जाती है-
आदमखोर भेडि़ए सब हैं,
सबकी खूनी जात यहां हैं।
-सुरेश त्रस्त, अभी जुबां कटी नहीं [तेवरी-संग्रह ] पृ. 37
रहनुमा पीते लहू इन्सान का,
भेडि़यों-सी तिश्नगी है दोस्तो।
-ज्ञानेंद्र साज़, अभी जुबां कटी नहीं [तेवरी-संग्रह ] पृ. 46
व्यक्ति में व्याप्त आक्रोश की पहचान ही यह है कि जिस व्यक्ति में आक्रोश व्याप्त होता है, वह असहमत अधीर  और उग्र हो जाता है। उसके सहज जीवन में चिंताओं का समावेश हो जाता है। वह रात-रात भर इस बात को लेकर जागता है-
इस तरह कब तक जियें बोलो,
जिंदगी बेजार किश्तों में।
-दर्शन बेजार, एक प्रहारः लगातार [तेवरी-संग्रह ] पृ.64
आक्रोश को जागृत कराने वाले वे कारक जो मनुष्य की आत्मा [रागात्मक चेतना] को ठेस पहुंचाते हैं या मनुष्य के साथ छल-भरा, अहंकार से परिपूर्ण उन्मादी व्यवहार करते हैं तो ऐसे अराजक-असामाजिक और अवांछनीय तत्त्वों का शिकार मनुष्य शोक-भय-खिन्नता-क्षुब्ध्ता से सिक्त होकर अंततः आक्रोश से भर उठता है।
आक्रोशित मनुष्य मानसिक स्तर पर तरह-तरह के द्वंद्व झेलते हुए व्यग्र और उग्र हो उठता है। यह उग्रता ही उसके मानसिक स्तर पर एक युद्ध शत्रु वर्ग से लड़ती है। यह युद्ध शत्रु से सीधे न होकर चूंकि मन के भीतर ही होता है, अतः इसकी परिणति रौद्रता में न होकर विरोध में होती है। इस तथ्य को हम इस प्रकार भी स्पष्ट कर सकते हैं कि आक्रोश शत्रु से टकराने से पूर्व की एक मानसिक तैयारी का नाम है-
इस आग को भी महसूस करिए, हम बर्फ में भी उबलते रहे हैं।
-गजेंद्र बेबस, इतिहास घायल है [तेवरी-संग्रह ] पृ.6
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+रमेशराज की पुस्तक ‘ विरोधरस ’ से
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+रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001 
मो.-9634551630      

 

 

 


‘ विरोधरस ‘---15.
|| विरोधरस की पहचान ||
+रमेशराज
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विरोध-रस का स्थायी भाव ‘आक्रोश’ है। रसों के आदि आचार्यों ने जो रसों के कई स्थायी भाव गिनाये हैं उनमें से कई स्थायी भाव विरोध-रस को परिपक्व अवस्था में पहुंचाने के लिए संचारी भाव की तरह कार्य  करते हैं।

भय को लीजिए-
भय, भयानक रस की निष्पत्ति कराता है लेकिन जब अत्याचार-शोषण-उत्पीड़न को सहने वाला प्राणी महसूस करता है कि अगर हम यूं ही डरे-सहमे-दब्बू और कायर बने रहे तो हालात और बद से बदतर होंगे। अतः वह इस भय से बाहर निकलता है और कहता है-
सत्य के प्रति और भी होंगे मुखर?
आप कितने भी हमें डर दीजिए।
-दर्शन बेजार, देश खण्डित हो न जाए [तेवरी-संग्रह ] पृ. 52
करुणरस को लीजिये-
स्थायी भाव शोक करुण-रस में उद्बोधित होता है, किन्तु विरोध-रस के अंतर्गत स्थायी भाव शोक, करुणा के दृश्य संचारी भाव की तरह उपस्थित करते हुए आक्रोश में घनीभूत होता है और स्थायी भाव बन जाता है, जो ‘विरोध-रस’ के माध्यम से अनुभावित होता है।

स्थायी भाव शोक स्थायी भाव आक्रोश में कैसे बदलता है?

इसे एक तेवरी की तीन तेवरों के माध्यम से देखिए। इसके प्रथम व द्वितीय तेवर में लाज को लूटे जाने की खबर में कारुणिक दृश्य उपस्थित हैं, लेकिन दुर्योध्न को दुष्ट बताकर आक्रोश के घनीभूत होने का प्रमाण भी मौजूद है तो तीसरे तेवर में करुणा से उत्पन करने वाला स्थायी भाव शोक विरोध में सघन होता है-
फिर किसी अखबार ने छापी खबर,
लाज को लूटा गया है रात-भर।
दुष्ट दुर्योधन बिठाने फिर लगा,
सभ्यता को अपनी नंगी जांघ पर।
आबरू कोई न अब बेजार हो,
नौजवानो! तुम उठो ललकार कर।
-दर्शन बेजार, एक प्रहारः लगातार [तेवरी-संग्रह ] पृ. 34
शोकग्रस्त व्यक्ति क्रन्दन और प्रलाप भले ही करता है किन्तु यही शोक जब आक्रोश में तब्दील होता है तो क्रान्ति का पैगाम बन जाता है। विरोध की रसात्मक अनुभूति का एक उदाहरण और देखिए।
लिख रहा हूं दर्द की स्याही से जिनको,
क्रान्ति की बू आयेगी कल उन खतों में।
-दर्शन बेजार, एक प्रहारः लगातार [तेवरी-संग्रह ] पृ. 49

क्रोध और आक्रोश में अन्तर 
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क्रोध और आक्रोश में अन्तर यह है कि क्रोधित मनुष्य शत्रुपक्ष का विनाश करता है जबकि आक्रोशित व्यक्ति उसके विनाश की केवल कामनाएं करता है।
रौद्रता में रक्तपात होता है, जबकि विरोध, जो कुछ गलत घटित हो रहा है उसे बदलने की एक वैचारिक प्रक्रिया है।
क्रोध अंधा होता है जबकि आक्रोश में मनुष्य अपना विवेक नहीं खोता। विरोध हिंसा का न तो पर्याय है, और न कोई हिंसात्मक कार्यवाही।
विरोध के रसात्मक आवेग में क्रोध से उत्पन्न हिंसा के विरुद्ध कवि का बयान देखिये -
देश की तब क्या नियति रह जायेगी,
शेष जब हिंसक प्रवृत्ति रह जायेगी।
-दर्शन बेजार, एक प्रहारः लगातार [तेवरी-संग्रह ] पृ. 43
विरोध-रस का परिदर्शन कराने वाली विधा तेवरी के आश्रयों में अहंकारी-साम्राज्यवादी हिंसक आलंबनों के प्रति विरोध का स्वरूप दृष्टव्य है-
विजय-पताका भाई तुम कितनी ही फहरा दो,
वांछित फल पाया है किसने बन्धु समर में।
-राजेश मेहरोत्रा, कबीर जिन्दा है [तेवरी-संग्रह ] पृ. 15
सच तो यह है कि क्रोध को विनाश की लीला से बचाने और उसे एक सार्थक दिशा में मोड़ने का नाम विरोध है-
बस्ती-बस्ती नगरी-नगरी गूंज रही यह बोली,
अब न खेल पायेगा कोई यहां खून की होली।
अब इतिहास रचा जायेगा फुटपाथों की खातिर,
खुशियां से भरनी है हमको अब जनता की झोली।
-डॉ. एन.सिंह, कबीर जिन्दा है [तेवरी-संग्रह ] पृ. 31

|| रचनात्मक पहल का नाम विरोध ||
शोषण-अत्याचार-विहीन समाज की स्थापना हेतु एक रचनात्मक पहल का नाम विरोध है जो अपने रसात्मक रूप में इस प्रकार परिलक्षित होता है-
जुल्म की दीवार ढाना चाहता हूं,
इक नया संसार लाना चाहता हूं।
सांस भी लेना यहां मुश्किल हुआ,
इस व्यवस्था को हटाना चाहता हूं।

|| दमन से विरोध का जन्म ||
घिनौनी-शोषक-दमनकारी व्यवस्था की पीर जब तीर-सी चुभने लगती है तो दमन से विरोध का जन्म होता है। विरोध का बोध उस हर अवरोध का खत्म करता है जो कान्ति अर्थात् व्यवस्था परिवर्तन में बाधक होता है-
कौन कर देगा हमें गुमराह तब,
रुढि़यों में हम अगर जकड़े न हों।
हो सके तो अब उन्हें दुत्कारिए,
रोशनी का हाथ जो पकड़े न हों।
-दर्शन बेजार, देख खण्डित हो न जाए [तेवरी-संग्रह ] पृ. 55

|| विरोध में सात्विक प्रेम को जिन्दा रखने का जयघोष ||
विरोध-रस की विशेषता ही यह है कि विरोध में सात्विक प्रेम को जिन्दा रखने का जयघोष परिलक्षित होता है-
बांटनी चाही अगर धरती हमारी,
खाक में मिल जाएगी हस्ती तुम्हारी।
सिर्फ नफरत में जिये जो, वे सुनें अब,
प्यार का हमने किया जयघोष जारी।
-दर्शन बेजार, देख खण्डित हो न जाए [तेवरी-संग्रह ] पृ. 44

कल के भारत की तामीर करनी अगर,
कोई दुश्मन बचे ना, यही फर्ज है।
ब्रह्मदेव शर्मा [अप्रकाशित]

‘विरोध-रस’, विद्वेष, बैर, घृणा को मिटाये जाने का एक संकल्प है---
हम नहीं आदी रहे विद्वेष के,
प्रेम को ‘बेजार’ ने पूरा फकत।
-दर्शन बेजार, देख खण्डित हो न जाए [तेवरी-संग्रह ] पृ. 32
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+रमेशराज की पुस्तक ‘ विरोधरस ’ से 
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‘ विरोधरस ‘---16
|| विरोध-रस की निष्पत्ति और पहचान ||
+रमेशराज
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तिरस्कार-अपमान-शोषण-यातना-उत्कोचन आदि से उत्पन्न असंतोष, संताप, बेचैनी, तनाव, क्षोभ, विषाद, द्वंद्व आदि के वे क्षण जिनमें अत्याचार और अनीति का शिकार मानव मानसिक रूप से व्यग्र और आक्रामक होता है, उसकी इस अवस्था को ‘आक्रोश’ कहा जाता है।
आक्रोशित व्यक्ति अत्याचार अनाचार शोषण उत्पीड़न कुनीति अपमान-तिरस्कार के संताप को एक सीमा तक ही झेलता है, तत्पश्चात वह अपने भीतर एक ऐसा साहस जुटाता है, जिसका नाम ‘विरोध’ है, जो काव्य में ‘विरोध-रस’ के नाम से जाना जाता है।
विरोध से घनीभूत व्यक्ति अपनी व्यथा से मुक्ति पाने को तरह-तरह के तरीके अपनाने लगता है। मान लो किसी मोहल्ले के निवासी विद्युत-आपूर्ति के अवरोध से बुरी तरह परेशान हैं। यह परेशानी उन्हें जब ‘आक्रोश’ से भरेगी तो वे बिजली-विभाग के कर्मचारियों-अधिकारियों को बार-बार कोसेंगे। उन्हें विद्युत-आपूर्ति के अवरोध से अवगत कराने हेतु पत्र लिखेंगे, फोन खटखटाएंगे। इस सबके बावजूद यदि उनकी समस्याओं का हल नहीं होता, तो वे विद्युत सब स्टेशन पर जाकर नारेबाजी के साथ उग्र प्रदर्शन करेंगे। अधिकारियों को खरी-खोटी सुनायेंगे। मौहल्लेवासियों का यह प्रदर्शन और नारेबाजी तथा अधिकारियों को खरी-खोटी सुनाना ही उनके विद्युत-आपूर्ति अवरोध के प्रति ‘विरोध’ का परिचायक है।
गांधीजी का ‘नमक तोड़ो आन्दोलन’, ‘असहयोग आन्दोलन, सविनय अवज्ञा आन्दोलन’ या लाला लाजपत राय का ‘साइमन गो बैक’, भगतसिंह का विस्फोट के बाद संसद में पर्चे फैंकना आदि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे उदाहरण हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने ‘आक्रोशित’ होकर अंग्रेजों के अनीति-शोषण-अत्याचार भरे तरीकों का डटकर विरोध किया।
कारखानों में होने वाली हड़तालें, सड़कों को जाम कर देना, थानों पर प्रदर्शन, जिलाधिकारी, एस.एस.पी. आदि के दफ्तर की घेराबंदी या वहां भूख-हड़ताल पर बैठना, ग्लोबन वार्मिंग के प्रति नग्न प्रदर्शन आदि व्यवस्था-विरोध के ऐसे विभिन्न तरीके हैं जिनका प्रयोग मनुष्य सदियों से करता आया है।
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+रमेशराज की पुस्तक ‘ विरोधरस ’ से
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‘ विरोधरस ‘---17.
|| तेवरी में विरोध-रस ||
साहित्य चूंकि समाज का दर्पण होता है अतः जो विरोध हमें सड़कों-कार्यालयों-परिवार आदि में दिखायी देता है, वही काव्य में सृजन का कारण बनता है। काव्य के रूप में काव्य की नूतन विधा ‘तेवरी’ तो आक्रोशित आदमी के उस बयान की गाथा है, जिसका आलोक ‘विरोध-रस’ के रूप में पहचाना जा सकता है।
विरोध-रस का स्थायी भाव आक्रोश है जो आश्रयों में अपनी परिपक्व अवस्था में इस प्रकार पहचाना जा सकता है-
दुःख-दर्दों की तनीं कनातें,
अब अधरों पर भय की बातें।
वैद्य दिखें यमराज सरीखे,
प्राण हनें कर मीठी बातें।
फिर भी कहता खुद को सूरज,
दिन के बदले लाता रातें।
केसर की क्यारी पर देखीं,
दुर्गंधों की हमने घातें।
‘मिश्र’ क्रान्ति आये समाज में,
भले लहू की हों बरसातें।
--तेवरीपक्ष के जुलाई-सितंबर-08
तेवरीपक्ष के जुलाई-सितंबर-08 में प्रकाशित राजकुमार मिश्र की तेवरी दुखदर्दों की तनी कनातों के बीच भय को इसलिए उजागर करती है क्योंकि कवि-मन को प्राणों का हनन करने वाला यमराज के रूप में हर वैद्य दिखायी देता है। सूरज जैसे किरदार अंधेरे को उगलते महसूस होते हैं। केसर की क्यारी में दुर्गंध का आभास मिलता है। कवि को यह सारा वातावरण असह्य वेदना देता है। स्पष्ट है कि दुराचार और भय से स्थायी भाव ‘आक्रोश’ जागृत होता है और यह आक्रोश रस परिपाक की अवस्था में विरोध के रूप में क्रान्ति लाने के लिये प्रेरित करता है। क्रान्ति अर्थात् शोषक अत्याचारी व्यवस्था का अंत करने का एक सार्थक प्रयास है, जिसे केवल और केवल विरोध के रूप में ही जाना जा सकता है।
एक अन्य तेवरीकार गिरीश गौरव यह तथ्य दलित-शोषित आश्रयों के समक्ष रखता है-
जो हमें रास्ता दिखाते हैं,
मार्ग-दर्शन में लूट जाते हैं।
जब दीये झोंपड़ी में जलते हैं,
लोग कुछ आंधियाँ उठाते हैं।
वो खुशी का शहर नहीं यारो,
हादिसे जिसमें मुस्कराते हैं।
इसी तेवरी में आगे चलकर कवि विरोधरस से भरा यह तथ्य भी सबके समक्ष रखता है-
हम परिन्दों की बात क्या कहिए,
क्रान्ति के गीत गुनगुनाते हैं।
गिरीश गौरव, इतिहास घायल है, पृ.35
तेवरी-काव्य का आश्रय बना पीडि़त व्यक्ति मानता है-
दुःख-दर्दो में जिये जि़न्दगी, ऐसा कैसा हो सकता है
सिर्फ जहर ही पिये जि़न्दगी, ऐसा कैसे हो सकता है।
वो तो चांद भरी रातों में मखमल के गद्दों पर सोयें
फटी रजाई सिये जिन्दगी, ऐसा कैसे हो सकता है।
-योगेंन्द्र शर्मा, इतिहास घायल है, पृ. 39
एक तेवरीकार व्यवस्था-परिवर्तन का उत्तम औजार ‘तेवरी’ को बताता है-
तिलमिलाती जि़न्दगी है, तेवरी की बात कर
त्रासदी ही त्रासदी है, तेवरी की बात कर।
जि़न्दगी आतंकमय है आजकल कुछ इस तरह
पीड़ाओं की छावनी है, तेवरी की बात कर।
मौन साधे बैठा है होंठ-होंठ और अब
आंख-आंख द्रौपदी है, तेवरी की बात कर।
नोच-नोच खा रहा है आदमी को आदमी
हर सू दरिन्दगी है, तेवरी का बात कर।
-विजयपाल सिंह, इतिहास घायल है, पृ. 26
विरोध-रस के आलंबन बने शोषक अत्याचारी व्यभिचारी देश-द्रोहियों की करतूतें, आश्रय अर्थात् सत्योन्मुखी संवेदनशीलता से लैस शोषित-पीडि़त किन्तु मेहनतकश व ईमानदार आदमी को इसलिए आक्रोशित करती हैं क्योंकि वह देखता है-
फिर यहां जयचंद पैदा हो गये
मीरजाफर जिन पै शैदा हो गये।
दर्शन बेजार, एक प्रहार लगातार, पृ. 35
तेवरीकार अपने चिन्तन से यह निष्कर्ष भी निकालता है-
सूदखोरों ने हमारी जि़न्दगी गिरवी रखी 
इस जनम क्या, हर जनम गिरवी रखी।
-दर्शन बेजार, एक प्रहार लगातार, पृ.26
एक तेवरीकार के लिये आक्रोशित होने का विषय यह भी है-
सड़क पर असहाय पांडव देखते
हरण होता द्रौपदी का चीर है।
-दर्शन बेजार, एक प्रहार लगातार, पृ. 21
एक तेवरीकार के मन में पनपे आक्रोश में अनेक सवाल होते हैं। तरह-तरह के मलाल होते हैं। उसकी पीड़ा और झुब्धता का कारण वे दरबारीलाल होते हैं, जो इस घिनौनी व्यवस्था के पोषक हैं। अपसंस्कृति को बढ़ावा देने वाले विदूषकों की जमात की हर बात उसे टीसती है-
पुरस्कार हित बिकी कलम, अब क्या होगा?
भाटों की है जेब गरम, अब क्या होगा?
प्रेमचंद, वंकिम, कबीर के बेटों ने
बेच दिय ईमान-धरम, अब क्या होगा?
दर्शन बेजार, एक प्रहार लगातार, पृ. 39
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+रमेशराज की पुस्तक विरोधरस से 
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रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001 
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‘ विरोधरस ‘---18.
|| विरोध-रस की पूर्ण परिपक्व रसात्मक अवस्था ||
+रमेशराज
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स्थायी भाव आक्रोश जागृत होने के बाद आश्रय में घनीभूत होने वाले ‘विरोध-रस’ से सिक्त अपमानित-प्रताडि़त-दमित-उत्कोचित और पीडि़त व्यक्ति की रस-दशा कैसी और किस प्रकार की होती है, उसे आश्रय के अनुभावों द्वारा स्पष्ट रूप से पहचाना सकता है।
‘विरोध-रस’ का स्थायी भाव ‘आक्रोश’ जब अपनी जागृत अवस्था के चरम पर पहुंचता है तो  इसके भीतर से संचारी भाव दैन्य, उत्साहहीनता, शोक, भय, जड़ता, संताप आदि तो अपनी-अपनी भूमिका निभाकर शांत हो जाते हैं, सिर्फ जागृत रहता है क्षोभ, विषाद, व्यग्रता के बाद तीक्ष्ण आक्रोश। आक्रोश ही विरोध-रस की पूर्ण परिपक्व रसात्मक अवस्था है |
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+रमेशराज की पुस्तक ‘ विरोधरस ’ से
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‘ विरोधरस ‘---19.
|| विरोधरस के अनुभाव ||
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1. व्यंग्यात्मक प्रहार-
आक्रोशित आश्रय व्यंग्य के माध्यम से गम्भीर और मर्म पर चोट करने वाली बातें बड़ी ही सहजता से कह जाते हैं। व्यंग्य तीर जैसे घाव देने की तासीर रखता है।
तेवरी के आलंबनों से दुराचारी लोगों पर आश्रयों अर्थात् पीडि़तों के व्यंग्यों की बौछार की बानगी प्रस्तुत है-
डाकुओं कौ तुम ही सहारौ थानेदारजी
नाम खूब है रहयौ तिहारौ थानेदारजी!
धींगरा ते कबहू न पेश त्यारी पडि़ पायी
बोदे-निर्बल कूं ही मारौ थानेदारजी!
आप कभी आऔ जो अपने मौहल्ला बीच
कांपि जाय गली-गलियारौ थानेदारजी!
का मजाल आंख कोई तुमसे मिलाय जाय
रोज नयी छोकरी निहारौ थानेदारजी!
योगेंद्र शर्मा, अभी जुबां कटी नहीं, पृ. 20
वर्णिक छंद में लिखी गयी उक्त तेवरी में व्याप्त आक्रोश का बोध् विरोधस्वरूप दरोगाजी के उस व्यक्तित्व पर निरंतर व्यंग्य के माध्यम से प्रहार करता है, जो डकैतों को संरक्षण देने के कारण बदनाम हो चुका है। जो ताकतवर के सामने तो थर-थर कांपता है किन्तु किसी न्याय की आस लिये निर्बल-पीडि़त को थाने में आता देखता है तो उसे न्याय के नाम पर केवल पिटाई और भद्दी गालियों की सौगात देता है। दरोगा की एक खासियत यह भी है कि यह जिस गली-मौहल्ले से होकर गुजरता है तो इसके राक्षसी रूप को देखकर समस्त मौहल्लेवासी थर-थर कांपने लगते हैं। इतना ही नहीं दरोगा के कारण इलाके की बहिन-बेटियों की इज्जत भी सुरक्षित नहीं है। ऐसे दरोगा पर आश्रय द्वारा आक्रोश में कसा गया अपरोक्त व्यंग्य सामाजिकों को विरोध-रस के रंग से सराबोर करेगा ही।

2. धिक्कारना—
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आक्रोश से सिक्त आश्रय जब विरोध-रस की पूर्ण परिपक्व अवस्था को प्राप्त करते हैं तो वे चुन-चुनकर गलत आचरण करने वाले आलंबनों को डांटने-फटकारने और उनके कुकृत्यों के प्रति उनको ध्क्किारने लग जाते हैं। यह तथ्य तेवरीकार ‘सुरेश त्रस्त’ की ‘समाज कल्याण’ में प्रकाशित तेवरी के माध्यम से सरलता से समझा जा सकता है-
कभी क्या जि़न्दगी लेना धर्म कोई सिखाता है-
बता फिर भाई को पगले निशाना क्यों बनाता है।
किसी की छीनकर राखी, किसी की मांग सूनी कर
अदा से देखिए पागल खड़ा वह मुस्कराता है।

3.ललकारना-
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आक्रोशित आदमी एक सीमा तक ही अत्याचार-शोषण-उत्पीड़न को मौन या अन्तर्मुखी रहकर सहन करता है, उसके बाद जब उसके आक्रोश का ज्वालामुखी फूटता है तो सख्त पहाड़ों जैसे अत्याचारियों को भी जड़ से उखाड़ फैंकना चाहता है। आक्रोशित आदमी जब अपनी तेवरयुक्त मुद्रा या भाव-भंगिमा से ललकारता है तो अच्छे-अच्छे कुव्यवस्था के पोषकों के दिल दहल जाते हैं-
हमारे पूर्वजों को आपने ओढ़ा-बिछाया है
कफन तक नोच डाला, लाश को नंगा लिटाया है।
सभी के शीश काटेंगे कि जितने पाप के होंगे
यही सबने, यही हमने यहां बीड़ा उठाया है।
जमाखोरो कुशल चाहो अगर तो ध्यान से सुन लो
निकालो अन्न निर्धन का जहां तुमने छुपाया है।
डॉ. देवराज, कबीर जिन्दा है, पृ. 25

3. चेतावनी देना-
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विरोध-रस की एक महत्वपूर्ण और ध्यान देने योग्य विशेषता यह भी है कि इसका जन्म चूंकि सत्योन्मुखी रागात्मक चेतना के कारण होता है, अतः विरोध के पीछे सार्थक मंतव्य या उद्देश्य छुपे होते हैं।
तेवरी में अन्तर्निहित आक्रोश और विरोध का भी अर्थ यही है कि तेवरी उन अराजक-शोषक और बर्बर शक्तियों का मुकाबला करती है जो समाज को अराजक और अशांति के वातावरण में धकेल देना चाहती हैं।
अमर क्रान्तिकारी भगतसिंह के शब्दों में -‘क्रान्ति बम-पिस्तौल या बल की संस्कृति की पोषक नहीं, किन्तु क्रान्ति में यदि आवश्यक हो तो बल का प्रयोग किया जा सकता है।’’
तेवरी का आश्रय इसी मान्यता के तहत आलंबन बने अत्याचारी वर्ग को सर्वप्रथम चेतावनी देते हुए कहते हैं-
जो हिमालय बर्फ से पूरा ढका है,
भूल मत ज्वालामुखी उसमें छुपा है।
जिस्म पर आरी न कोई अब चलेगी,
पेड़ ने हर पेड़ से अब ये कहा है।
लालटेनें पर्वतों की कह रही हैं,
घाटियों में रतजगा है, रतजगा है।
-दर्शन बेजार, एक प्रहार लगातार, पृ. 33

4. टकराने की बात करना-
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तेवरी काव्य के आश्रय जब विरोध् से भरते हैं तो मारने-मरने के इरादों के साथ में उतरते हैं। ऐसे में सबका व्यक्तिगत आत्मालाप सामाजिक समूह का गान बन जाता है। उनके भीतर आक्रोश एक उम्मीद की रोशनी का प्रतिमान बन जाता है-
जीत निश्चित है तुम्हारी तुम अभी हिम्मत न हारो
कांप सिंहासन उठेगा तुम तपस्या तो संवारो।
वक्त के भागीरथो! चट्टान की औकात क्या है
राह खुद देगा हिमालय, ठानकर गंगा उतारो।
हो बहुत ‘बेजार’ अर्जुन न्याय के कुरुक्षेत्रा में अब
आ गया है वो समय तुम क्रान्ति की गीता उचारो।
दर्शन बेजार, देश खण्डित हो न जाए, पृ. 25

5. प्रतिहिंसा को प्रेरित करना-
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विरोध-रस के आश्रय न तो स्वभाव से हिंसक होते हैं और न व्यर्थ के किसी रक्तपात में विश्वास रखते हैं। अराजकता, अशांति फैलाना भी उनके उद्देश्य में कभी शामिल नहीं है। शोषणविहीन व्यवस्था या समाज की स्थापना के लिये उन्हें कभी-कभी मक्कार, लुटेरे, उन्मादी, अहंकारी, अत्याचारी वर्ग की हिंसा के विरुद्ध हिंसा को सांकेतिक रूप में उजागर करना पड़ता है।
विरोध-रस के आश्रयों के लिए हिंसा एक ऐसा अन्तिम मानसिक विकल्प होता है, जिसमें अंततः हिंसा के विरुद्ध ही अहिंसा का संकल्प होता है-
आ गया है वक्त अब व्यभिचारियों की खैर हो,
आबरू उनकी लुटेगी उनके घर के सामने।
-अजय अंचल, अभी जुबां कटी नहीं, पृ. 23
विरोध-रस के आश्रयों के लिए हिंसा एक ऐसा अन्तिम मानसिक विकल्प होता है, जिसमें अंततः हिंसा के विरुद्ध ही अहिंसा का संकल्प होता है-
हर तरफ हैं आंधियाँ पर ज्योति जलनी चाहिए
शैतान की शैतानियत बस अब कुचलनी चाहिए।
चैन सारा डस गयीं विषधर हुई यह टोपियां
बिष बुझी कोई छुरी इन पर उछलनी चाहिए।
अजय अंचल, अभी जुबां कटी नहीं, पृ.24
विरोध-रस के आश्रयों के लिए हिंसा एक ऐसा अन्तिम मानसिक विकल्प होता है, जिसमें अंततः हिंसा के विरुद्ध ही अहिंसा का संकल्प होता है-
शब्द अब होंगे दुधारी दोस्तो!
जुल्म से है जंग जारी दोस्तो!
आदमी के रक्त में मदमस्त जो
टूटनी है वो खुमारी दोस्तो!
दर्शन बेजार, इतिहास घायल है, पृ. 19

6. क्रान्ति की बातें करना-
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विरोध-रस की पूरी की पूरी व्यवस्था या सत्ता का आधार ही त्रासद हालातों में परिवर्तन लाने की मांग पर टिका है। अतः यह कहना असंगत न होगा कि विरोध शोषक, धूर्त्त और मक्कार लोगों द्वारा खड़ी की गयी व्यवस्था को परिवर्तित करना चाहता है। विरोध-रस से सिक्त तेवरी-काव्य के आश्रय वर्तमान व्यवस्था के विद्रूप को देखकर भिन्नाये-तिलमिलाये-बौखलाये हुए हैं। वे केवल क्रान्ति अर्थात् वर्तमान व्यवस्था में परिवर्तन की रट लगाये हुए हैं-
गोबर कहता है संसद को और नहीं बनना दूकान
परचों पर अब नहीं लगेंगे आंख मूंदकर और निशान।
-देव शर्मा ‘देवराज’, कबीर जिन्दा है, पृ.26

अब खुले नभ के तले रहने का ख्वाब है,
तैयार सवालों का तेरे यूं जवाब है
-सतीश सारंग, कबीर जिंदा है, पृ.31

राजनीति देश की खूंख्वार हुई,
आज बन्दूक की जरूरत है।
-विक्रम सोनी, कबीर जिन्दा है, पृ. 34
दर्द जब तक अगन नहीं बनता,
जिन्दगी का चमन नहीं बनता।
-राजकुमार निजात, कबीर जिन्दा है, पृ.35

क्रोध की मुद्रा बनाओ दोस्तो!
जड़ व्यवस्था की हिलाओ दोस्तो!
-सुरेश त्रस्त, अभी जुबां कटी नहीं, पृ. 40

जख्म जहरीले को चीरा चाहिए,
काटने को कांच, हीरा चाहिए।
अब मसीहा हो तो कोई ऐसा हो,
देश को फक्कड़ कबीरा चाहिए।
-दर्शन बेजार, एक प्रहार लगातार, पृ. 32
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+रमेशराज की पुस्तक ‘ विरोधरस ’ से 
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+रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001 
मो.-9634551630      

 

 

 

 

 


‘ विरोधरस ‘---20.
|| ‘विरोध-रस’ के रूप व प्रकार ||
+रमेशराज
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आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निबंध् ‘काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था’ नामक निबन्ध में कहते हैं -
‘‘लोक में फैली दुःख की छाया को हटाने में ब्रह्म की आनंद-कला जो शक्तिमय रूप धारण करती है, उसकी भीषणता में भी अद्भुत मनोहरता, कटुता में भी अपूर्व मधुरता, प्रचण्डता में भी गहरी आद्रता साथ लगी रहती है---यदि किसी ओर उन्मुख ज्वलंत रोष है तो दूसरी ओर करुण दृष्टि फैली दिखायी पड़ती है। यदि किसी ओर ध्वंस और हाहाकार है तो और सब ओर उसका सहगामी रक्षा और कल्याण है।’’
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निबंध् ‘काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था’ के उपरोक्त कथन के आधार पर यह तथ्य, सत्य हो जाते हैं कि काव्य को रसनीय मात्र वे भाव ही नहीं बनाते हैं, जो मधुर और कोमल होते हैं। ध्वंस और अत्याचार के वातावरण में प्रतिकार का जो स्वर मुखर होता है, उसकी गति करुणा से उत्पन्न होकर रक्षा और कल्याण की ओर जाती है, जिसके भीतर प्राणी की हर क्रिया, प्रतिक्रिया या अनुक्रिया अधर्म  के प्रति असहमति की ऊर्जा बनकर आक्रोश का रूप धारण करती है। आहत मन के भीतर जब ‘आक्रोश’ स्थायित्व ग्रहण करता है तो इस स्थायी भाव का अनुभावन ‘विरोध’ के रूप में सामने आता है।
‘विरोध’ को एक नये रस के रूप में प्रस्तुत करना माना एक नये अनुभव से गुजरना है। लेकिन यह कार्य अटपटा या अतार्किक इसलिए नहीं है क्योंकि ‘‘केवल परम्परागत स्थायी भाव ही रसत्व को प्राप्त हो सकते हों, ऐसी बात नहीं है, तथाकथित संचारी भी रसत्व को प्राप्त हो सकते हैं। रुद्रट, उद्भट, आनंदवर्धन आदि अनेक आचार्यों ने इस बात को स्वीकार किया था।
आचार्य भोज ने एक और कदम आगे बढ़ाया और कहा कि उनचास भावों के अतिरिक्त भी जो कुछ रसनीय है या बनने की सामथ्र्य रखता है, उसे रस कहा जा सकता है। इसी आधर पर उन्होंने रसों की संख्या का विस्तार भी किया।’’ [रस-सिद्धांत , डा.ऋषि कुमार चतुर्वेदी, पृष्ठ 119-120]

अस्तु! नये रस ‘विरोध’ का रस-रूप वर्तमान यथार्थोंन्मुखी काव्य में अनेक रूप व प्रकारों में दृष्टिगोचर होता है। ‘विरोध’ के यह रूप तथा प्रकार अनेक हो सकते हैं |
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+रमेशराज की पुस्तक ‘ विरोधरस ’ से
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+रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001 
मो.-9634551630      

 

 


‘ विरोधरस ‘---20.
|| ‘विरोध’ के रूप ||
+रमेशराज
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1.अभिधात्मक विरोध-
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बिना किसी लाग-लपेट के सपाट तरीके से विरोध के स्वरों को भाषा के माध्यम से व्यक्त करना इस श्रेणी के अन्तर्गत आता है। यथा-
नाम धर्म का लेकर लाशें ‘राजकुमार’ न और बिछें
-राजकुमार मिश्र, तेवरीपक्ष अप्रैल-सिंत.-08,पृ.16

2-लक्षणात्मक विरोध-
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काव्य में किसी समूह, समाज या व्यक्ति के लक्षणों के माध्यम से विरोध के स्वरूप को प्रकट करना लक्षणात्मक विरोध के अन्तर्गत आता है-
अब ये सर ‘बेजार’ का उनके मुकाबिल है उठा,
जिनके हाथों में सियासत की खुली शमशीर है।
दर्शन ‘बेजार’, तेवरीपक्ष, जन.-मार्च-08 पृ.2
उपरोक्त पंक्तियों में ‘सियासत की शमशीर’ लिये हुए हाथों के सामने’ अत्याचार के शिकार व्यक्ति का ‘सर को उठाना’ इस लक्षण को प्रकट करता है कि अत्याचारी के अत्याचार को अब सहन नहीं किया जायेगा।

3-व्यंजत्मक विरोध-
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किसी बात को जब संकेतों के माध्यम से कहा जाये, या शब्द जब अपने मूल अर्थ को त्याग कर, एक नये अर्थ में ध्वनित हों तो वहां व्यंजना शक्ति का प्रयोग माना जाता है। ‘विरोध’ अपने व्यंजनात्मक रूप में किस प्रकार प्रकट होता है, उदाहरण देखिए-
‘सुर्ख फूलों में बारूद बिछाते क्यूं हो,
घोलना है फजा में तो रंग घोलिये साहिब।
-कैलाश पचौरी, तेवरीपक्ष, परिचर्चा अंक-1,पृष्ठ 28
उक्त पंक्तियों में ‘सुर्ख फूलों’ का मूल अर्थ लुप्त होकर एकता, अमर चैन, भाईचारे का नया अर्थ ध्वनित करता है तथा ‘बारूद’ शब्द ‘घृणा, बेर, द्वेष, हिंसा के अर्थ में ओजस होता है और सम्पूर्ण पहली पंक्ति का नया अर्थ-‘देश की अमन-चैन के साथ जीती जनता के बीच आतंकवादी गतिविधियों का विरोध करना’ हो जाता है।

4-व्यंग्यात्मक विरोध-
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कुव्यवस्था, अनीति, अत्याचार का विरेाध् व्यंजना के माध्यम से चोट करते हुए होता है तो इस विरोध का रूप व्यंग्यात्मक होता है। यथा-
राह हजारों खुल जाएंगी, कोई-सा दल थाम भतीजे।
देश लूटना है मंत्री बन, फिर करना आराम भतीजे।
-खालिद हुसैन सिद्दीकी, तेवरीपक्ष जन.-मार्च-08,पृ.9
या
जो भी करे लांछित तुझको, दोष उसी पर मढ़ जा प्यारे।
डॉ. संतकुमार टंडन ‘रसिक’, तेवरीपक्ष अ.-सि. 08, पृ.21

5-प्रतीकात्मक विरोध-
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जब उपमेय ही उपमान के सम्पूर्ण लक्षणों को उभारकर उपमान के स्थान पर प्रस्तुत होकर ‘विरोध’ को ध्वनित करने लगे तो ऐसे विरोध का रूप प्रतीकात्मक होता है-
दंगे में मारे गये, हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख,
केसरिया बोला सखे-केवल हिन्दू लिक्ख।
जितेन्द्र जौहर, तेवरीपक्ष, जन.-मार्च-08, पृ. 10

6-भावनात्मक विरोध-
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शब्दों के माध्यम से विरोध स्वरूप जब आश्रय की भावनात्मक दशा प्रकट हो-
जिस्म जिसमें हो न शोलों की इबारत
जुल्म से कर पायेगा वह क्या बगावत।
-दर्शन बेजार, ललित लालिमा, ज.-जू.-03, पृ.04

7-वैचारिक विरोध-
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एक निश्चित विचारधारा के तहत योजनाबद्ध  तरीके से किया गया विरोध वैचारिक होता है व उसकी रचनात्मकता भी असंदिग्ध होती है-
हम तो हैं बाती, दीये की आग से नाता पुराना,
रोशनी बढ़ जायेगी यह सर अगर कट जायेगा।
-डॉ. जे.पी. गंगवार, निर्झर-93-14, पृ. 45

8-चिन्तात्मक विरोध-
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डाल-डाल पर जुट गयी अब गिद्धों की भीड़
कहां बसेरा ले बया, कहां बनाये नीड़?
-रामानुज त्रिपाठी, तेवरीपक्ष वर्ष-24, अंक-1, पृ.14

9-तीव्र विरोध-
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‘मिश्र’ क्रांति आये समाज में,
भले लहू की हों बरसातें।
-राजकुमार मिश्र, तेवरीपक्ष अ.-सि.-08, पृ.20

10-विश्लेषणात्मक विरोध-
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देखलो यारो मन्दिर-मस्जिद,
बारूदी खान हुये दंगों में।
-योगेन्द्र शर्मा, कबीर जिन्दा है, पृ.67

11-क्षुब्धात्मक विरोध-
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हाल मत पूछा जमाने का ‘खयाल’
सच को सच कहने की रिश्वत दी गयी।
-खयाल खन्ना, तेवरीपक्ष अ.-सि.08, पृ.1

12-रचनात्मक विरोध-
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उठ रहा है धर्मग्रन्थों से धुंआ ,
आइये हम फिर गढ़ें अक्षर नये।
-श्रीराम शुक्ला ‘राम’, तेवरीपक्ष परिचर्चा अंक-1

13-खण्डनात्मक विरोध-
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मानते हैं शक्ति-स्तुति धर्म है,
धूर्त्त को पर देवता कैसे कहें?
-दर्शन बेजार, तेवरीपक्ष अप्रैल-जून-81, पृ.24

14-परिवर्तनात्मक विरोध-
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होली खूं से खैलौ भइया
बनि क्रांति-इतिहास रचइया
बदलो भारत की तस्वीर,
समय आजादी कौ आयौ।
-लोककवि रामचरन गुप्त, तेवरीपक्ष जन-दिस.-97, पृ.07

15-उपदेशात्मक विरोध-
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नौनिहालों में भरो मत मजहबी नफरत कभी,
एकता के वास्ते लालो-गुहर पैदा करो।
-रसूल अहमद सागर, ललित लालिमा, जन-मार्च-04

16-रागात्मक विरोध-
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मैं समन्दर की भला क्यों पैरवी करने लगा,
एक पोखर से भी पूछो, उसका मैं हमराज हूं।
डाॅ. शिवशंकर मैथिल, निर्झर-93-94, पृ.47

17-संशयात्मक विरोध-
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अंधकार गर्जन करे, राष्ट्र बहाये नीर,
राजाजी के हाथ में लकड़ी की शमशीर।
-अशोक अंजुम, ललित लालिमा, जन.जून-03, पृ.23

18-एकात्मक विरोध-
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कहते हैं कि अकेला चला भाड़ नहीं फोड़ सकता। लेकिन अकेला चना [मनुष्य] यह भी उम्मीद लगाये रहता है कि आज नहीं तो कल हम एक से अनेक होंगे। कुव्यवस्था के विरोध में तनी हुई एक मुट्ठी का साथ कल अनेक मुटिठ्यां देंगी-
आज नहीं तो कल विरोध हर अत्याचारी का होगा,
अब तो मन में बांधे यह विश्वास खड़ा है ‘होरीराम’।
-सुरेश त्रस्त, कबीर जिंदा है, पृ.5

19-सामूहिक विरोध-
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एक जैसी यातनाओं, अत्याचारों, त्रासदियों को जब एक समाज या वर्ग झेलता है तो शोषक और बर्बर वर्ग के प्रति उसके विरोध के स्वर भी एक जैसे हो जाते हैं-
आंख अंगारे उगलना चाहती हैं,
भूख अधरों पर मचलना चाहती हैं।
शीशमहलो! बेखबर अब तुम न सोओ,
गिट्टियां तुम पर उछलना चाहती हैं।
-जयमुरारी सक्सेना ‘अजेय’ निर्झर-93-94, पृ.46
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+रमेशराज की पुस्तक ‘ विरोधरस ’से
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+रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001 
मो.-9634551630      

 

 

 

 

‘ विरोधरस ‘---21.
|| विरोध के प्रकार ||
+रमेशराज
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1-स्व-विरोध-
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कभी-कभी आदमी भूलवश या अन्जाने में ऐसी गलतियां कर बैठता है जिनके कारण वह अपने को ही धिक्कारने लगता है-
उसको ही सुकरात बताया, ये क्या मैंने कर डाला?
जिसने सबको जहर पिलाया, ये क्या मैंने कर डाला?
छन्दों, बिम्बों, उपमानों का जो कविता का हत्यारा,
कविता का घर उसे दिखाया, ये क्या मैंने कर डाला?
-रमेशराज [सूर्य का उजाला, तेवरी विशेषांक ]

2-पर-विरोध-
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स्व से ‘पर’ का रिश्ता निस्संदेह आत्मीयता, आस्था और श्रद्धा पर टिका होता है। किन्तु जब रिश्तों के बीच छल पनपता है, स्वार्थ घनीभूत होते हैं तो समान आत्म वाले दो व्यक्तित्व एक दूसरे के प्रति विरोधी स्वरों में बात करने लगते हैं। ऐसी स्थिति में विरोध का स्वर निम्न प्रकार मुखर होने लगता है-
जीत लेंगे आप छल से सत्य को,
आपका अनुमान था, वो दिन गये।
आपकी जादूगरी को देखकर,
‘त्रस्त’ भी हैरान था, वो दिन गये।
-सुरेश त्रस्त, ‘सम्यक’ तेवरी विशेषांक-92, पृ.12

3-व्यक्तिविशेष-विरोध-
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जब कोई व्यक्ति विशेष अनाचार-अनीति-भ्रष्टाचार का प्रतीक बन जाता है तो उस व्यक्ति के प्रति व्यक्त किया गया विरोध समूची हैवानियत के धिक्कार  की गूंज बन जाता है-
खींचता हर शख्स की अब खाल दातादीन
कर रहा हर जिन्दगी मुहाल दातादीन।
-योगेन्द्र शर्मा, कबीर जिन्दा है, पृ. 70

4-चारित्रिक विरोध-
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आप राणा बनें, न बनें,
खुद को जयचंद ना कीजिए।
-जितेंन्द्र जौहर, तेवरीपक्ष, अ.-सि.-08, पृ.1

विश्वामित्र कहाता है पर,
खुद का मित्र न हो पाया है।
-गिरिमोहन गुरु, तेवरीपक्ष अ.-सि.-08,पृ.23

5-अहंकार-विरोध-
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जमीं से ही जुड़े रहियो ये इन्सानी तकाजा है,
न बेजा अपने सर पर तू गुमां का आसमां रखियो।
-रसूल अहमद सागर, तेवरीपक्ष अ.-सि.-08,पृ.1

6-विडंबना-विरोध-
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विद्वानों के ग्रन्थ पर आमुख लिखें गंवार,
हंस बजायें तालियां कौए पहनें हार।
-अशोक अंजुम, ललित लालिमा, जन.मार्च-08,पृ.23

7-साम्प्रदायिकता-विरोध-
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काम ईश्वर का या अल्ला का नहीं
जिस तरह से ले रहा है जान तू।
-राजकुमार मिश्र, तेवरीपक्ष अ.-सि.-08,पृ.20

8-छद्मता-विरोध-
---------------------------
चोर-डकैतों ने यहां बदला अपना वेश,
पहले रूप सियाह था, आज धवल परिवेश।
-टीकमचन्दर ढोडरिया, तेवरीपक्ष अ.-सि.-08,पृ.23

9-आतंकवाद का विरोध-
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आह्वान हो युग-पुरुषों का, वीर धनुर्धर का,
आतंकवाद या उग्रवाद के सपने हो जायें अतीत।
-हितेशकुमार शर्मा, तेवरीपक्ष अ.-सि.-08,पृ.23


10-असह्य परिस्थिति-विरोध-
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सोच-सोच के हारा, घबराता जिगर है,
‘भारती’ क्या कहूं, शाम-सी सहर है।
-सुभाष नागर भारती, तेवरीपक्ष अ.-सि.-08,पृ.22

11-परम्परा-विरोध-
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नारी भी कैसे सशक्त हो, दासी बनकर साथ रहे,
नर से अलग न स्वप्न रह सकें, जाये किसके धाम कहां।
-डॉ. परमलाल गुप्त, तेवरीपक्ष अ.-सि.-08,पृ.22

12-छल-विरोध-
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सबेरे को मजे से शाम लिख तू,
तेरे अनुसार अक्षर हो गये हैं।
-केशव शरण, तेवरीपक्ष जन.-मार्च-08, पृ.9

13-विघटन-विरोध-
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अब तो आपस में घात रहने दो,
खुशनुमा कायनात रहने दो।
-डॉ. बी.पी. दुबे, तेवरीपक्ष जन-मार्च-08, पृ.11

14-समाधानात्मक-विरोध-
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हकीकत के अल्फाज गढ़ने पड़ेंगे,
हमें आईने अब बदलने पड़ेंगे,
बहुत लुट चुकी है शराफत की दुनिया,
हमें अपने तेवर बदलने पड़ेंगे।
-आजाद कानपुरी, तेवरीपक्ष, जन-मार्च-08 पृ.11

15-व्यवस्था-विरोध-
की थी राम-राज्य की आशा,
हाथ लगी बस घोर निराशा।
यह बेजारी कब जायेगी?
मन में रही यही अभिलाषा।
-दर्शन बेजार, तेवरीपक्ष, वर्ष-6,अंक-3, पृ.19

---------------- समाप्त ----------------------------------
+रमेशराज की पुस्तक ‘ विरोधरस ’  
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+रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001 
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-----वही पुराना किस्सा यारो....
----कविता का जन्म आक्रोश से नहीं हुआ अपितु प्रथम कविता प्रकृति के प्रति सौन्दर्यानुभूति से अभिभूत होकर उद्भूत हुई ..ऋग्वेद ७/७२ में एक वर्णन देखें--

.“एषा शुभ्रा न तन्वो विदार्नोहर्वेयस्नातो दृश्ये नो अस्थातु
अथ द्वेषो बाधमाना तमो स्युषा दिवो दुहिता ज्योतिषागात |
एषा प्रतीचि दुहिता दिवोन्हन पोषेव प्रदानिणते अणतः
व्युणतन्तो दाशुषे वार्याणि पुनः ज्योतिर्युवति पूर्वः पाक: ||” ----प्राची दिशा में उषा इस प्रकार आकर खड़ी होगई है जैसे सद्यस्नाता हो | वह अपने आंगिक सौन्दर्य से अनभिज्ञ है तथा उस सौन्दर्य के दर्शन हमें कराना चाहती है | संसार के समस्त द्वेष-अहंकार को दूर करती हुई दिवस-पुत्री यह उषा प्रकाश साथ लाई है, नतमस्तक होकर कल्याणी रमणी के सदृश्य पूर्व दिशि-पुत्री उषा मनुष्यों के सम्मुख खडी है | धार्मिक प्रवृत्ति के पुरुषों को ऐश्वर्य देती है | दिन का प्रकाश इसने पुनः सम्पूर्ण विश्व में फैला दिया है

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