रु. 25,000+ के  नाका लघुकथा पुरस्कार हेतु रचनाएँ आमंत्रित.

अधिक जानकारी के लिए यहाँ http://www.rachanakar.org/2018/10/2019.html देखें.

नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

व्यंग्य की जुगलबंदी 5 : आस्तिक कि नास्तिक

साझा करें:

23 अक्तूबर 2016 की व्यंग्य की जुगलबंदी (क्र. 5) का विषय था – आस्तिक कि नास्तिक निर्मल गुप्त का व्यंग्य : पाषाण काल में आस्तिकता और नास...

23 अक्तूबर 2016 की व्यंग्य की जुगलबंदी (क्र. 5) का विषय था – आस्तिक कि नास्तिक

clip_image001

निर्मल गुप्त का व्यंग्य :

clip_image002

पाषाण काल में आस्तिकता और नास्तिकता का रिमिक्स
एक समय वो भी था जब कांकर पाथर जोड़ कर आस्थावान लोग धर्मस्थल बना लेते थे और उसके ऊपर बैठ कर लाल कलगी वाले मुर्गे बांग दे लेते थेl सबकी बांग अलग अलग तरीके की होती थी l कहते हैं कि उन दिनों मुर्गे के बांग दिए बिना भी सलीके के साथ सवेरा हो जाता थाl तब पहाड़ की जगह चाकी को पूजने का सुझाव उपयोगिता के आधार पर दिया जाता था और इस तरह की नास्तिक अभिव्यक्ति पर कोई नाराज भी नहीं होता थाl इस बावजूद प्रजा से लेकर राजा तक सब घनघोर आस्तिक थे पर किसी एक की तथाकथित धार्मिकता किसी दूसरे द्वारा लागू किये गये जजिया नामक शुल्क के बावजूद कोई खास बहस का मुद्दा नहीं बनती थीl हम उस शहंशाह के इतिहास को भी उसी श्रृद्धा के साथ रखते हैं जैसे कलिंग में खूनखराबा करने वाले ‘महान’ शासक की धर्मनिरपेक्ष सोच कोlलुटियन की दिल्ली में दोनों के नाम किसी न किसी नयनाभिराम की सोच की वजह से लोगों की स्मृति में जिन्दा हैl


अब समय बदल गया है l पवित्र नदियों का जल गटर का पानी बन चुका है लेकिन उसके साथ जुड़ी हमारी भावुकता बीमारी के तमाम जीवाणुओं के साथ बकायदा समस्त तरलता के साथ बनी हुई हैllवाटर ट्रीटमेंट प्लांट से निकले साफ़ पानी पर कोई धर्मगत या जातिगत वजह से नाक भौं नहीं सिकोड़ता या निरर्थक सवाल उठाता हैlसब उसे बेहद विनम्र भाव से ग्रहण कर लेते हैंl वैसे पीते तो हम वो पानी भी हैं जो गंदा होने के बावजूद अपनी पारदर्शिता से भ्रम पैदा कर लेता हैlबीमारी की जड़ों का कोई आकार नहीं होता,वे निराकार होती हैंlवे देह और धरती के भीतर धीरे -धीरे पलती उपजती और पनपती रहती हैंlशारीरिक व्याधियां अब देह का अतिक्रमण करती हुई धरती के उस जर्रे जर्रे तक पहुँच गयी हैं जहाँ कभी दैवीय एकाधिकार हुआ करता थाl प्रबल आस्थावान लोगों की इस दुनिया में अब रक्तबीज पल्लवित होते हैं और उसी पर हमारी सहृदयता से भरी धारणाएं पुष्पित होती हैंl


समय बदला है तो घरों से लेकर पूजा स्थलों का वास्तु और तकनीक में बदलाव आया हैl अब निर्माण कंकड़ पत्थर से नहीं आग में तपाई गई ईंटों(ब्रिक्स) के जरिये होता हैlधरती के स्वर्ग पर पाषाण काल का आगमन हुआ तो ईंटों के गुम्बे हथियार बन गये l यह सिर्फ हथियार ही नहीं विकास का औजार भी हैlइनसे ही भविष्य के अमन चैन और अस्मिता की इबारत पूर्ण मनोयोग से लिखी जा रही हैl


इस पत्थर फेंक समय का फेक कालखंड में आतंक के प्यारे मासूम और दुलारे बच्चे पडोसी के आंगन में एक दूजे का हाथ पकड़ कर ‘रिंगा रिंगा रोजेस’ गाते हुए गोलचक्कर लगाते हैंl सब अपने अपने तरीके से खेल में मशगूल हैl सबके पास अपने खेल के लिए स्वदेशी हित में सराबोर मासूम तकनीक और हुनर हैl इस तकनीकी हुनरमंदी के साथ राजनीति और डिप्लोमेसी का गज़ब रिमिक्स हैl बड़े गुलाम अली खां के साथ यो यो जी की जुगलबंदी दिल को भरमाती हैl


सभी लोग कमोबेश नास्तिकता या आस्तिकता का इस्तेमाल अपनी समझ के हिसाब से करने के लिए एकमत हैंl वस्तुत: दोनों अवधारणायें एक ही जादुई सिक्के के दो पहलू हैं जिसके माध्यम से न किसी की निर्णायक जीत तय होती है और न पराजयl

#जुगलबंदी अनूप शुक्ल Udan Tashtari Arvind Tiwari

----------

 

अनूप शुक्ल का व्यंग्य :

clip_image003

आस्तिक कि नास्तिक
----------------------------

जो लोग ईश्वर को मानते हैं उनके हिसाब से दुनिया में जो हो रहा है उस सबका कर्ता-धर्ता भगवान ही है। वही लोगों को बनाता है। वही निपटाता है। भक्तों को परेशान करके इम्तहान लेता है, वही दयालु बनकर उनका कल्याण करता है। वही आतंकवादी बनाता है वही उनको ’सर्जिकल स्ट्राइक’ में निपटाता है। वही मनेरेगा चलाता है वही जियो का सिल दिलाता है। ट्रम्प के रूप में वही स्त्रियों के खिलाफ़ छिछोरी हरकतें करता है तो हिलेरी भौजी के रूप में वही उसकी भर्त्सना करता है। वही करण जौहर की पिच्चर में पाकिस्तानियों को रोल दिलाता है फ़िर वही उनके खिलाफ़ हल्ला मचवाता है इसके बाद वही बीच का रास्ता निकालता है। बहुत बड़ा कारसाज है ऊपर वाला।

clip_image004

नास्तिक भाई लोग मानते हैं कि ईश्वर जैसी कोई चीज ही नहीं। आस्तिकों द्वारा भगवान को साबित करने की हर दलील को वह उसी तरह नकार देता है जैसा आतंकवादी गतिविधियों के सबूत देखकर पाकिस्तान नेति, नेति कर देता है।

तमाम लोग भगवानों के भौकाल से जलते हैं। सोचते हैं कि ईश्वर के तो जलवे होते हैं। जो मन आये करें। जिसको जो मन आये वरदान दे दिया। न कोई काम न धाम। न मंहगाई की चिन्ता न आटे-दाल का सोचना। भक्त हैं न सब करने के लिये। लेकिन यह धारणा केवल जलवेदार भगवानों के किस्से सुनकर बनाई धारणा हैं। जैसे फ़िल्म इंडस्ट्री में बड़े अभिनेताओं और एक्स्ट्रा का काम करने वालों की हैसियत अलग-अलग हैसियत होती है वैसे ही देव समाज में भी छोटे देवताओं की सेवा शर्तें बड़ी कड़ी होती होंगी।पुराने समय में जो जरा-जरा सी बात पर पुष्पवर्षा करने के वाले देवता होते होंगे वे एक्स्ट्रा देवता लोग ही होते होंगे जिनको विमान का किराया देकर भेज दिया जाता होगा। क्या पता जो बहादुरी वाले स्टंट होते हैं ईश्वर के वो करने वाला कोई 'स्टंट देवता' होता हो उनके यहां।

क्या पता कि ईश्वर की जिन लीलाओं के किस्से हम सुनते आये हैं वो उनके द्वारा की गयी सर्जिकल स्ट्राइक होती हों। हर अगला अवतार आते ही कहता हो कि इसके पहले यह लीला किसी ने नहीं दिखाई।

लोग समझते हैं कि देवताओं की जिंदगी बड़ी ऐश से गुजरती होगी उनको केवल स्तुतियां मिलती होंगी लेकिन ऐसा होता नहीं हैं। आजकल देवताओं की सर्विस कंडीशन भी बड़ी कठिन हो गयी हैं। जैसे राजनीति में मंत्रिमंडल में मनमाफ़िक पद या चुनाव में टिकट न मिलने पर राजनीति में लोग पार्टी बदल लेते हैं वैसे ही जहां जरा सा काम नहीं बना किसी का तो वो फ़ौरन अपना देवता बदल देता है।

आजकल तो भगवानों पर भी पूजा, नमाज में गबन के आरोप लगते हैं और कोई कवि कहता है:

सब पी गये पूजा ,नमाज बोल प्यार के
नखरे तो ज़रा देखिये परवरदिगार के।

अगर भगवान के लिये भी चुनाव होते तो इसी तरह के आरोपों में उनकी सरकार गिर जाती।

माना जाता है कि आस्तिक मने ईश्वर को मानने करने वाला, नास्तिक मने ईश्वर को न मानने वाला। दोनों अलग-अलग स्कूल की तरह हैं। दोनों का अपना सिलेबस है। अपने मास्टर। अपने छात्र। दूर से देखने पर लगता है कि दोनों एक दूसरे के विरोधी हैं। लेकिन बाद में पता चलता है कि दोनों की मैनेजमेंट कमेटी में एक ही परिवार के लोग शामिल हैं।

यह कुछ ऐसे ही है जैसे किसी लोकतंत्र में तमाम तरह की विचारधाराओं वाली पार्टियां होती हैं। कभी किसी की सरकार बनती है, कभी किसी की। लेकिन असल में पार्टियों को चन्दा देने कारपोरेट से ही मिलती है चलती है उसी की है। लोकतंत्र में सरकारें तो बाजार की कठपुतली होती हैं। बाजार पक्ष को भी चन्दा देता है विपक्ष को भी। बाजार दोनों को बनाये रखता है ताकि दोनों आपस में हल्ला मचाते रहें और वो अपनी दुकान चलाता रहे।

खैर यह तो ’हरि अनंत हरि कथा अनंता’ की तरह हैं। बाजार में सेन्सेक्स की तरह ईश्वर के प्रति आस्था भी कम-ज्यादा होती रहती है। कभी तमाम लोगों के लिये भगवान सरीखे रहे बापू आशाराम बेचारे जेल की कोठरी में निराश पड़े हुये हैं महीनों से। नास्तिक लोग अपने स्वामी की बात उसी तरह मानते हुये कीर्तन मुद्रा में जमा हो जाते हैं जिस तरह आस्तिक अपने भगवान के लिये इकट्ठा होते हैं।

हमसे कोई पूछे कि ’आस्तिक’ कि ’नास्तिक’ तो हम तो यही कहेंगे कि भईया जौन पैकेज में फ़ायदा ज्यादा हो वही तौल देव हमको। जिअमें दीपावली का बम्पर डिस्काउंट चल रहा हो वही बुक कर देव हमारे लिये।

आपका क्या कहना है इस बारे में?

#व्यंग्यकीजुगलबंदी, #व्यंग्य, Nirmal Gupta, Arvind Tiwari, Udan Tashtari

---------

 

समीर लाल ‘समीर’ का व्यंग्य :

clip_image005

आस्तिक एवं नास्तिक
------------------------

मांसाहारी को यह सुविधा रहती है कि मांसाहार न उपलब्ध होने की दशा में वो शाकाहार से अपना पेट भर ले. उसे भूखा नहीं रहना पडता. जबकि इसके विपरीत एक शाकाहारी को, शाकाहार न उपलब्ध होने की दशा में कोई विकल्प नहीं बचता. वो भूखा पड़ा मांसाहारियों को जश्न मनाता देख कुढ़ता है. उन्हें मन ही मन गरियाता है. वह खुद को कुछ इस तरह समझाता है कि देख लेना भगवान इनको इनके किए की सजा जरुर देगा. ये जीव हत्या के दोषी हैं और फिर चुपचाप भूखा सो जाता है.


नास्तिक ओर आस्तिक में भी कुछ कुछ ऐसा ही समीकरण है. नास्तिक आस्तिकों की भीड़ में भी नास्तिक बना ठाठ से आस्तिकों की आस्था को नौटंकी मान मन ही मन मुस्करता रहता है. नास्तिक स्वभावतः एकाकी रहना पसंद करता है और जब तक उसे आस्तिक होने के उकसाया न जाये, अपने नास्तिकपने का ढिंढोरा बेवजह नहीं पीटता है.

clip_image006
आस्तिक गुटबाज होता है. वो आस्तिकों की भीड़ में रहना पसंद करता है. वह किसी नास्तिक को देख मन ही मन मुस्करता नहीं है बल्कि उसे बेवकूफ मान प्रभु से प्रार्थना करता है कि हे प्रभु, यह अज्ञानी है, इसे नहीं पता कि यह क्या कर रहा है. इसे माफ करना.


आस्तिक बेवजह नास्तिक को अपनी आस्था के चलते जीवन में हुए चमत्कारों को रस ले ले कर सुनता है ताकि नास्तिक भी उन चमत्कारों की बातों के प्रभाव में आकर आस्तिक बन उसके गुट में आ जाये. बस, इसी उसकाये जाने के चलते नास्तिक भड़कता है और पचास ऐसे किस्से सुनाता है जिसमें ह्र किस्से का अंत मात्र इस बात से होता है अगर भगवान होता है तो वो उस वक्त कहाँ था? तार्किक जबाब के आभाव में आस्तिक इसे नास्तिक की नादानी मान उसे उसके हाल पर छोड़ते हुए नाक भौं सिकोड़ कर मात्र इतना कह कर निकल लेता है कि एक दिन तुम्हें खुद अहसास होगा तब तुम अपनी बेवकूफी पर पछताओगे.


आस्तिक स्वभावतः भीरु एवं आलसी प्रवृति का प्राणी होता है अतः एक सीमा तक कोशिश करने के बाद आस्था की रजाई ओढ कर सो जाने का स्वांग रच, रजाई से कोने से किसी चमत्कार की आशा लिए झांकता रहता है और यह मान कर चलता है कि जैसा ईश्वर को मंजूर होगा, वैसा ही होगा. प्रभु जो करेंगे, अच्छा ही करेंगे. उसे अपनी मेहनत से ज्यादा यकीन आस्था के प्रभाव से हुए चम्त्कार पर होता है.


नास्तिकों में एक बड़ा प्रतिशत उन नास्तिकों का होता है जिन पर अब तक कोई ऐसी विपदा नहीं पड़ी है जिसका कोई उपाय न हो और मात्र प्रभु पर भरोसा ही एक सहारा बच रहे. ऐसे नास्तिक अधिकतर उस उम्र से गुजरते हुए युवा होते हैं जिस उम्र में में उन्हें अपने मां बाप दकियानूसी लगते हैं या गाँधी को वो भारत की आजादी नहीं, भारत की बर्बादी जिम्मेदार मानते हैं. उनकी नजरों में गाँधी की वजह से देश इस हालत में है वरना तो देश की तस्वीर कुछ और होती. उम्र का यह दौर उसकी मानसिकता पर अपना ऐसा शिकंजा कसता है कि उसे अपने आप से ज्ञानी और तार्किक कोई नहीं नजर आता. वो अक्सत गंभीर सी मुद्रा बनाये दुनिया की हर उस चीज को नाकारता दिखता है जिससे की यह दुनिया और इसकी मान्यतायें चल रहीं हैं. उसकी नजर में वह सब मात्र बेवकूफी, हास्यास्पद एवं असफल जिन्दगियों के ढकोसले हैं जो उनके माँ बाप गुजार रहे हैं.


उम्र के साथ साथ समय की थपेड़ इन नास्तिकों का दिमाग ठिकाने लगाने में सर्वदा सक्षम पाई गई है. जैसा कहा गया है कि गाँधी को समझने के लिए पुस्तक नहीं, एक उम्र की जरुरत है..ऐसे नास्तिक भी उम्र के साथ साथ आस्तिक की आस्था को समझने में सक्षम हो जाते हैं और फिर सही पाला तय कर पाते हैं.


कभी आस्तिक व नास्तिक मात्र भगवान के प्रति आस्था और विश्वास रखने एवं न रखने का प्रतीक था. आज के अस्तिक ,अपने बदलते स्वरुप के साथ, अपने राजनैतिक आकाओं को भगवान का दर्जा देकर उनके भक्त बने आस्तिकता का परचम लहरा रहे हैं ओर जो उनके भगवान में आस्था न रखते, उन्हें गाली बकने से लेकर उनके साथ जूतमपैजार करने तक को आस्था का मापदण्ड बनाये हुए.


इसी की परिणिति है कि आज भक्त का अर्थ भी मात्र एक राजनैतिक पार्टी के आका में आस्था रखने वालों तक सीमित होकर रह गया है, शेष सभी जो बच रहे, उन्हें आप अपनी इच्छा अनुसार दुष्ट, नास्तिक या देशद्रोही आदि पुकार सकते हैं. आज का आस्तिक भक्ति भाव से नाच नाच कर भजन पूजन का स्वांग रच रहा है और फिर थक कर आस्था की रजाई में मूँह ढाँपे अच्छे दिन लाने वाले चमत्कार का इन्तजार कर रहा है.


नास्तिक मानो मंदिर की दीवार पर सर टिकाये बीड़ी के धुँएं के छल्ले बना कर उड़ा रहा है उसे मालूम है कि अच्छे दिन आना मात्र एक चुनावी जुमला है. भला ऐसा भी कभी होता है कहीं.
-समीर लाल ’समीर’

#व्यंग्यकीजुगलबंदी, #व्यंग्य, Nirmal Gupta, Ravi Ratlami, अनूप शुक्ल,

-----------

 

रवि रतलामी का व्यंग्य :

clip_image007

पुनर्धर्मभीरूभव:

बहुत पुरानी बात है. धरती पर एक बार एक इंसान गलती से बिना धर्म का, नास्तिक पैदा हो गया. उसका कोई धर्म नहीं था. उसका कोई ईश्वर नहीं था. वो नास्तिक था.

clip_image008

चहुँ ओर हल्ला मच गया. आश्चर्य! घोर आश्चर्य!¡ एक इंसान बिना धर्म के, नास्तिक कैसे पैदा हो सकता है. वो बिना हाथ-पैर के, जन्मजात विकृतियों समेत भले ही पैदा हो सकता है, और अब तो विज्ञान की सहायता से बिना मां-बाप के भी पैदा हो सकता है, मगर बिना धर्म के? लाहौलविलाकूवत! ये कैसी बात कह दी आपने! पैदा होना तो दूर की बात, बिना धर्म के कोई इंसान, इंसान हो भी सकता है भला?

ताबड़तोड़ उस इंसान को अपने-अपने धर्मों में खींचने की, उसे आस्तिक बनाने की जंग शुरू हो गई.

“उद्धरेदात्मनात्मानम् ... वसुधैव कुटुंबकम्...” सहिष्णुता और विश्वबंधुत्व केवल हिंदुओं में है... इसका धर्म हिंदू होना चाहिए. हिंदुओं ने कहा.

“बिस्मिल्लाहिर्रहमानेहिर्रहीम...” ईश्वर केवल एक है और उसके सबसे निकट, शांति और सहिष्णुता का धर्म इस्लाम है, वही स्वर्ग जाने का एकमात्र रास्ता है. इसका धर्म इस्लाम होना चाहिए. मुस्लिमों ने अधिकार जताया.

“ईश्वर दयालु है- ईश्वर इन्हें माफ करना, ये नहीं जानते ये क्या कर रहे हैं...” दयालु ईश्वर केवल यीशु हैं और केवल वो ही इसके पापों को क्षमा कर सकते हैं. ईसाइयों ने बताया.

उस बेधर्मी इंसान ने कहा – ठीक है, मैं सभी धर्मों का अध्ययन करूंगा और जो सबसे अच्छा लगेगा उसे धारण करूंगा.

उसने विभिन्न धर्मों के अध्ययन के लिए पर्याप्त समय लगाया और अंततः अपना अध्ययन पूरा कर लिया. ओर फिर उसने एक सभा रखी जिसमें उसे घोषणा करनी थी कि वो कौन सा धर्म अपनाएगा.

बड़ी भीड़ जुटी. तमाम धर्मों की जनता और तमाम धर्मों के गुरु उस सभा में स्वतःस्फूर्त जुटे. एक बेधर्मी इंसान के धर्म के अपनाने का जो खास अवसर था यह. नास्तिक के आस्तिक बनने का अवसर जो था यह.

भरी सभा में उस बेधर्मी इंसान ने भीड़ की ओर दुःख भरी नजर डाली और ऐलान किया – मैं बिना किसी धर्म का ही अच्छा हूँ. मैं नास्तिक ही ठीक हूँ. मुझे किसी ईश्वर में, किसी धर्म में कोई विश्वास नहीं है.

“भला ऐसा कैसे हो सकता है?” क्रोध से हिंदू धर्माचार्य चिल्लाये. उनके त्रिनेत्र खुल चुके थे. लोग त्रिशूल, भाले लेकर उस बेधर्मी इंसान की ओर दौड़े.

“लाहौलविलाकूवत!” ये तो ईशनिंदा है. परम ईशनिंदा. इसे दोजख में भी जगह नहीं मिलनी चाहिए... मुसलिम धर्माचार्य गरजे. पत्थर, कंकर लेकर लोग उसे मारने दौड़े.

“हे ईश्वर इसे क्षमा करना.. ये नहीं जानता ये क्या कह रहा है...” ईसाई धर्माचार्यों ने हल्ला मचाया. लोग कीलें हथौड़े लेकर उसके पापों के प्रायश्चित्त करवाने के लिए उसे सूली पर टांगने दौड़े.

 

तब से, इस धरती पर कोई भी इंसान, गलती से भी, बिना धर्म के पैदा नहीं होता.

---

अरविंद तिवारी का व्यंग्य

image

अरविन्द तिवारी Arvind Tiwari जी का फ़ेसबुक पोस्ट सर्च में पता नहीं क्यों नहीं मिल पाई. बहरहाल, अनूप शुक्ल के वाल से उनके लिखे व्यंग्य के  मुख्य अंश -

 

१. दरअसल हमारे देश में नास्तिक आस्तिक वाला फिनोमिना सुविधानुसार बदल जाता है।घोर नास्तिक सियासी व्यक्ति चुनाव के दिनों में मन्दिर मस्जिद में पूजा अर्चना करता हुआ पाया जाता है।

२. धर्मनिरपेक्षता का दावा करने वाले चैनल शुल्क लेकर निर्मल टाइप की गतिविधि चलाते हैं।घोर नास्तिक वाममार्गीय स्वयं के सम्प्रदाय से इतर सम्प्रदाय के ढोंगों की वक़ालत करते नज़र आते हैं।घोर नास्तिक लेखक घर परिवार समाज का हवाला देकर कर्मकांड कर डालता है जो प्रकारान्तर नास्तिकता में हवाला कारोबार की तरह है। इस मामले में अक़बर इलाहाबादी याद आते हैं

मेरा ईमान क्या पूछती हो मुन्नी
शिया के साथ शिया सुन्नी के साथ सुन्नी

३.इस देश में नास्तिक व्यक्ति उस पटाखे के समान है जो फूटता नहीं फ़ुस्स होकर आस्तिक बन जाता है। बदबूदार सार्वजनिक शौचालय की दीवार से टिकी हवन सामग्री पण्डितजी इसलिए खरीद लाते हैं क्योंकि वह बाज़ार से सस्ती मिल रही है।इसमें पवित्रता का बन्धन शिथिल इसलिए होजाता है क्योंकि दीवाली के दिन सौ घरों में पूजन करना है।वैसे भी हवन कुण्ड में जाकर सब कुछ पवित्र हो ही जाता है।

जुगलबंदी की चौथी पेशकश रही निर्मल गुप्त की Nirmal Gupta निर्मल जी आजकल दनादन लिख रहे हैं और छप भी रहे हैं। निर्मल जी के लेख के मुख्य अंश:

१. अब समय बदल गया है l पवित्र नदियों का जल गटर का पानी बन चुका है लेकिन उसके साथ जुड़ी हमारी भावुकता बीमारी के तमाम जीवाणुओं के साथ बकायदा समस्त तरलता के साथ बनी हुई हैllवाटर ट्रीटमेंट प्लांट से निकले साफ़ पानी पर कोई धर्मगत या जातिगत वजह से नाक भौं नहीं सिकोड़ता या निरर्थक सवाल उठाता हैlसब उसे बेहद विनम्र भाव से ग्रहण कर लेते हैंl

२.समय बदला है तो घरों से लेकर पूजा स्थलों का वास्तु और तकनीक में बदलाव आया हैlअब निर्माण कंकड़ पत्थर से नहीं आग में तपाई गई ईंटों(ब्रिक्स) के जरिये होता हैlधरती के स्वर्ग पर पाषाण काल का आगमन हुआ तो ईंटों के गुम्बे हथियार बन गये l यह सिर्फ हथियार ही नहीं विकास का औजार भी हैlइनसे ही भविष्य के अमन चैन और अस्मिता की इबारत पूर्ण मनोयोग से लिखी जा रही हैl

३.सभी लोग कमोबेश नास्तिकता या आस्तिकता का इस्तेमाल अपनी समझ के हिसाब से करने के लिए एकमत हैंl वस्तुत: दोनों अवधारणायें एक ही जादुई सिक्के के दो पहलू हैं जिसके माध्यम से न किसी की निर्णायक जीत तय होती है और न पराजयl

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर

-----****-----

-----****-----

|नई रचनाएँ_$type=list$au=0$label=1$count=5$page=1$com=0$va=0$rm=1

.... प्रायोजक ....

-----****-----

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधाएँ ~

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---


|आपके लिए कुछ चुनिंदा रचनाएँ_$type=blogging$count=8$src=random$page=1$va=0$au=0

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3842,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,336,ईबुक,192,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2786,कहानी,2116,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,486,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,90,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,329,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,327,बाल कलम,23,बाल दिवस,3,बालकथा,50,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,9,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,17,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,831,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,4,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,315,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1920,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,648,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,688,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,55,साहित्यिक गतिविधियाँ,184,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,68,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: व्यंग्य की जुगलबंदी 5 : आस्तिक कि नास्तिक
व्यंग्य की जुगलबंदी 5 : आस्तिक कि नास्तिक
https://lh3.googleusercontent.com/-EbQHltCKT0g/WAxmxOqNdpI/AAAAAAAAwqo/q4x5ftktZ6E/clip_image001_thumb.png?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-EbQHltCKT0g/WAxmxOqNdpI/AAAAAAAAwqo/q4x5ftktZ6E/s72-c/clip_image001_thumb.png?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2016/10/5_23.html
https://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2016/10/5_23.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय खोजें सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ