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रावण कब मरेगा - हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन

रावण कब मरेगा
राम जिसे मारते हैं , उसको तारते भी हैं । ताड़का को मारा , मारीच को मारा , बाली को मारा – ऐसे ही अनेक दुष्टों का संहार किया , परंतु प्रत्येक को परमधाम का ही सुख दिया । रावण के मरने की जब बारी आयी , तब सभी देवता हाथ जोड़कर राम से प्रार्थना कर रहे थे । राम ने देवताओं की ओर मुखातिब होते हुए कहा – अब तो तुम्हारे कष्टों का अंत हो रहा है , खुशियां मनाने की तैयारी करो । इंद्र ने कहा – वह तो ठीक है प्रभु । पर इस कष्ट के अंत के साथ दूसरे आने वाले कष्ट का भय सता रहा है । प्रभु ने कहा – क्या कष्ट ? आप जिसे भी मारते हैं , चाहे वह कितना भी पापी क्यों न हो , ब्रम्हाजी उसे , सीधे स्वर्ग भेज देते हैं । यह मरकर स्वर्ग आएगा , तब एक दिन ऐसा भी आयेगा जब स्वर्ग में , इंद्र की जगह रावण का राज्य होगा , क्योंकि इसका तपोबल अभी भी प्रबल है – इंद्र ने बड़ी मासूमियत से जवाब देते कहा - तब स्वर्ग , एक नए लंका के रूप को धारण कर लेगा , फिर हम कहां जायेंगे प्रभु ? राम कुछ कह पाते , इसके पूर्व यम ने कहा – इसका अर्थ , इंद्र जी आप यह कहना चाह रहे हैं , कि इसे यम लोक भेज दिया जाय । प्रभु आप जानते ही हैं , यम लोक का अर्थ ही है दुष्टों का घर । पर यह तो महादुष्ट है । यह वहां चला गया तब इसको सम्भालने के चक्कर में बाकी दुष्ट की सजाओं का क्या होगा । फिर इसने वहां पहुंच कर यदि संगठन बना लिया , तो यम लोक पर कब्जा कर लेगा । ब्रम्हा की व्यवस्था छिन्न भिन्न हो जायेगी । फिर आपके हाथ से मरने वाला यदि स्वर्ग की जगह यमलोक पहुंच गया , तब आपके यश को , प्रतिष्ठा को नुकसान होगा । राम जी ने परिस्थितियों को भांपते हुए इन सारी बातों से पल्ला झाड़ते हुए प्रस्थान करने में अपनी भलाई समझी । ब्रम्हा जी को मोर्चा सम्भालने की जिम्मेदारी देकर माता सीता को लेने चले गए ।

रावण मरा नही , देवताओं के मध्य वाक युद्ध शुरू हो गया । कुर्सी पाने या कुर्सी बचाने के लिए , संगठन बनने - बिगड़ने का खेल त्रेतायुगीन है । सत्ता की डगमगाहट की आशंका ने संगठन में दरार पैदा करना शुरू कर दिया । किसी भी जीव का अंत समय नजदीक आता है , तब मरने वाले को देवता , स्वर्ग- नरक सब दिखने लगता है । रावण को भी दिखने लगा । सांसों की टूटन के बीच मुस्कुराने लगा था वह । रावण यह भी देख रहा है कि ब्रम्हा जी कैसे दुविधा में पड़े हैं । सांस बंद होने के पूर्ब इस परिस्थिति को फायदे में बदलने की कुत्सित मानसिकता ने फिर जोर मारा । वह सुन चुका था कि स्वर्ग या नरक के अधिष्ठाता देव गण उसे अपनी भूमि में नही रखना चाहते । वह ब्रम्हा जी से , जान बूझ कर नरक जाने की जिद करने लगा । वह जानता था कि , मुझे नरक भेजेंगे ही नही , क्योंकि वह भगवान के हाथों मर रहा है । दूसरी ओर , नरक भेज ही दिया तो वहां दुष्टों का संगठन बनाकर , स्वर्ग - नर्क और पृथ्वी पर फिर अधिकार कर लेगा ।
रावण कहने लगा - नरक भेजना सम्भव नही , तो स्वर्ग ही भेज दीजिए ब्रम्हा जी , आपका विधान भी नही टूटेगा । ब्रम्हा जी ने यम और इंद्र की भी सारी बातें सुन ली थी । एक ओर वे दुविधा मे थे तो , दूसरी ओर रावण इस दुविधा का भरपूर फायदा उठाना चाहता था । ब्रम्हा जी , आपकी दुविधा मुझसे देखी नही जा रही , उससे अच्छा क्यों न आप मुझे पृथ्वी पर ही रहने का वरदान दे देते । परंतु पृथ्वी पर पैदा लेने की मेरी कुछ शर्तें हैं , जो आपको मानना पड़ेगा , अन्यथा स्वर्ग या नर्क में ही भेज दीजिए । मेरी पहली शर्त यह है , कि मैं यहां सीधे सीधे किसी भी साधारण जनता के द्वारा , पहचाना न जाऊं । मुझे वही पहचाने , जो मेरा बंधु बांधव हो , या जो माता मुझे जन्म देने की इच्छुक हो । दूसरी बात , मैं चाहे कुछ भी करूं , पकड़ा न जाऊं । यदि धोखे से किसी ने मुझे रावण समझकर पकड़ लिया और जेल में डालने या मारने की कोशिश की तो , मै उसे भी अपना भाई बना कर अपनी रक्षा कर सकूं । तीसरी बात मैं अब किसी देवता के द्वारा न मारा जाऊं । मुझे मारने के लिए मेरे ही बंधु बांधव मेरे ऊपर हाथ उठायेंगे तभी मै मारा जाऊं । आखिरी बात - यदि कोई देव मुझे मारने में सफल हो ही गया तो सीधे स्वर्ग में ही मुझे स्थान मिले । आनन फानन में बिना कुछ सोचें बिचारे , हां कहकर ब्रम्हा जी भी अपने धाम के लिए प्रस्थान कर गए । रावण मर गया । खुशी के मारे , देवता गणों ने फूलों की बारिश कर दी ।

चौरासी लाख योनि भटकने के बाद मनुष्य रूप में आने की बारी फिर आ गयी रावण की । तब तक कलयुग भी आ गया । ब्रम्हाजी बड़े चिंतित थे – क्योंकि रावण को गर्भ में धारण करने की क्षमता किसी भी नारी में नही थी । इधर रावण ब्रम्हा जी को रोज तंग कर रहा था । ब्रम्हाजी ने नारियों की सभा आयोजित की । सभा में त्रेतायुग से द्वापर तक की पूरी कहानियों को सुनाते हुए भगवान के पृथ्वी अवतरण के लिए रावण का जन्म जरूरी बताते हुए पूछा – कौन अपनी कोख से पैदा कर सकती है रावण को ? सभी ने असहमति जताते हुए , राम को पुत्र रूप में प्राप्त करने की इच्छा की । ब्रम्हा ने लालच भी दिया - रावण के साथ अनेक पुत्रों की माता बनाने का । तब भी कोई तैयार नही ।

ब्रम्हा ने चालाकी की । सभा समाप्त होने पर इशारे से एक महिला को पास बुलाया और कहा – इन लोगों को जाने दो , मै तुम्हे कुछ राज की बात बताना चाहता हूं । कोई राज की बात हो और स्त्री न सुने – संभव ही नही । ब्रम्हा जी कहने लगे – राम पैदा करना इतना आसान नही है । इसके लिये कठिन तपस्या करनी पड़ती है । खूब संयम नियम व्रत का पालन करना पड़ता है । फिर राम उम्र के आखिरी पड़ाव में पैदा होता है , कभी अपने मां - बाप और पत्नी को सुख नही देता , जंगल जंगल भटकता है । लक्ष्मण , सुग्रीव , हनुमान और विभीषण जैसे दूसरे के भरोसे सत्ता की दहलीज तक पहुंच पाता है । जबकि रावण सोने की लंका में रहता है । दुनिया भर के सुख सुविधा उसके चरणों की दासी होती है । उसके लिये कितने लोग संघर्ष करने आतुर रहते हैं । उसे स्वयं कभी संघर्ष नही करना पड़ता । वह जन्म लेते ही सिंहासन का अधिकारी हो जाता है । इतने वैभववान की माता बनना , आपको अच्छा नही लगता ? अपने पुत्र के कारण , सिर्फ आपको मान सम्मान मिले , यही सोंचकर अकेले में मैंने ये सारी बातें बतायी । सभा में कहता तो , अनेक मातायें राजी हो जाती , और मुझे दिक्कत हो जाती , किसे रावण की माता बनाऊं । मां ने सवाल किया - पर हरेक मनुष्य मुझे रावण की माता के नाम से जानेगा और गाली देगा , तब सोंचा है आपने कि , मेरा क्या होगा ? नही , ब्रम्हा जी , मुझसे नही होगा यह । इसका उपाय भी कर देता हूं । कोई जानेगा भी नही कि , आपका पुत्र ही रावण है । पर गलती से जान गया तब । हुंह ....... , आप भी बड़ी चिंता करती हैं माता । यदि जान गया कोई तो , क्या बिगाड़ लेगा । आपके पुत्र के डर से आपको कोई कुछ नही कह सकेगा ।

युक्ति काम कर गयी । ब्रम्हा की बातों में आ गयी वह महिला । तैयार हो गई रावण की माता बनने । रावण ने कहा – आज से पूजा छोड़ दो । बड़ों की इज्जत मत करो । दूसरों को तंग करो । व्यभिचार में लिप्त हो जाओ । मांस मदिरा का खूब भक्षण करो । जुआं घर , शराब खाना , वेश्यालय खुलवाओ । झूठ बोलो , बेईमानी करो , भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाओ । वैसे भी यही सब काम दुनिया मे , सबसे आसान काम है । वह महिला खुशी खुशी तैयार होकर अपने घर लौट आयी । ब्रम्हा जी जानते थे किसी एक महिला के गर्भ में वह शक्ति नही कि वह रावण को पैदा कर सके । उन्होने रावण के जीव को अनेक टुकड़ों में विभाजित कर दिया । अनेक महिलाओं को यही कथा अलग अलग बुलाकर सुनाया , एवं इस बात का जिक्र कहीं भी नही करने का निवेदन भी किया । झांसे में आती गई महिलायें । जिस घर में इन सारे अवैध कार्यों का निष्पादन और संचालन होने लगा , उन्ही घरों को वैभव विलासिता ने अपना स्थायी निवास बना लिया । रावण के पैदा होंने का उचित वातावरण निर्मित होते ही इन्ही घरों में , रावण का पुनर्जन्म शुरू हो गया । ऐसे घरों के बाहरी चकाचौंध ने , पड़ोसनों को परेशान करना शुरू कर दिया । भेद पता किया , तब उन्हे भी पता चला कि उनके पड़ोसी , अपने हुनर की वजह से शाही जीवन भोग रहे हैं । इस चकाचौध से प्रभावित कोई भी महिला अच्छे कामों से बचने लगी । और लंका का वातावरण अपने घर में ही बनाती गई । अब प्रत्येक माता , पुत्र रूप में रावण की कामना में लग गयी । सिर्फ कुछ ही दशक में पूरी धरती पटने लगी रावणों से ।

अब धरती पर कोई भी माता , राम पैदा करने से बचना चाहती थी । धरती मां पर बोझ बढ़ने लगा । ईश्वर को याद करने लगी वह । यह क्या हो गया ब्रम्हा जी । आपने क्या वरदान दे दिया । मेरे जमीन का एक एक इंच रावण की आत्मा से पटने लगा । मुझे बचाओ प्रभु । बेटी , मैं वचन बद्ध हूं । इन लोगों को मारने मै नही आ सकता , न किसी देवता को भेज सकता , क्योंकि देवता के हाथॉं मरेंगे ये , तो फिर स्वर्ग भेजना होगा इन्हे । त्रेतायुग का रावण तो फिर भी स्वर्ग के लायक था । पर रावण के ये अंशावतार कुछ अधिक ही पापी अधर्मी हैं । धरती बोली - हां प्रभु , उसने तो एक बार ही सीता चुराया था बाबा बनकर , ये ऐसे रावण है , जो बाबा बनकर रोज एक सीता को चोरी छुपे अपने आश्रम में ला रहे हैं । उस रावण ने माता सीता के साथ कोई दुराचार नही कि किया था और ये कितने बार............. । वह रावण दूसरे की सम्पत्ति हड़पता था , पर ये रावण अपने ही देश की सम्पत्ति हड़पता है । वह रावण कभी अपने देश को बेचने के बारे में सोंचता नही था । इन रावणों ने हरेक पल देश का सौदा करने की कसमें खायीं है । वह रावण कभी अपनों का हक नही छीनता था , ये अपनों के सिर्फ हक नही प्राण तक छीन रहे हैं । उस रावण को झूठ बोलते नही पाया गया था कभी , ये कभी सच नही बोलते । वह रावण , ईश्वर की पूजा करने के लिए अपना सिर दे देता था , पर ये रावण दूसरे का सिर देकर पूजा निपटा रहे हैं ।

ब्रम्हा जी सोंचने लगे - मैं कहां ले जाऊं इन लोगों को , मुझे भी समझ नही आ रहा है । इन्हे सलाखों में ठुंसवा देता हूं तो उन्ही को अपना भाई बना लेता है । मुझसे बड़ी गलती यह हो गयी कि , मेरी वरदान की ही वजह से साधारण आदमी इन्हे पहचान नही सकता , इसलिये यही लोग देश का नेतृत्व करने लगे । जो इन्हे पहचानते हैं , वे भी रावण के अंशावतार ही हैं । मैंने वह उपाय भी कर डाला जो प्रभु नही चाहते थे । इन्हे आपस में लड़वा दिया । वरदान के अनुसार जब ये ही , एक दूसरे को मारेंगे , तभी स्वयमेव इनका वंश समाप्त होगा । छूट दे दी गयी मरने मारने की । पर यह क्या ......... । यह रावण कहीं आतंकवाद , कहीं उग्रवाद , कहीं चरमपंथी , कहीं जेहादी , कहीं नक्सलवाद बनकर उभरने लगा । चारों ओर अराजकता का माहौल बनने लगा ।

तभी उन्हे याद आया कि , रावण के प्राण उसके पेट में था । उन्होने रावण के पेट में हाथ डालने की सोची , पर यह क्या , वह पेट भ्रष्टाचार का बना था । इतना विशाल कि ब्रम्हा क्या , पूरा ब्रम्हाण्ड भी छोटा पड़ जाता । अब इतने बड़े पेट में प्राण कैसे ढ़ूंढा जाय । यह पेट बढ़ता ही जा रहा था । ब्रम्हा को विभीषण की याद आयी , जिन्होने राम को बताया था कि रावण के प्राण उसकी नाभि में है । रावण की नाभि की तलाशने लगे वे । नाभि मिली उनको – पर उनके प्राण नही मिले । रावण भी कलयुग का था , वह त्रेतायुग के रावण से अधिक शक्तिशाली और चालाक भी था । विभीषणों को भी अपने ही दरबार में पालता था वह । पर ब्रम्हा तो ब्रम्हा थे , आखिरकार ब्रम्हा जी की लगातार कोशिशों ने रंग दिखा ही दिया । पकड़ में आ गया एक रावण , जिसने अपने प्राण को नोटों में छिपाकर रखा था , जैसे ही नोट उनकी पकड़ से छूटा , वह राम राम सत्य बोल गया । इस रावण ने भेद बताया अगले रावण का । वह बंदूकों में प्राण छिपाकर बैठा था , उसकी बंदूक छीन ली गयी , वह भी ब्रम्हा के पास पहुंच गया । अब इसने अपने बड़े रावण का भेद खोला – यह वही रावण था जिसका बड़ा पेट था , यह अपने प्राण को कुर्सी में छिपाकर रखता था । पर नोट और बंदूक की तरह , कुर्सी छीनने का भेद नही जानता थे ब्रम्हा जी । भगवान को याद किया और कहा – प्रभु मुझे घाव ठीक करने आता है , नासूर का इलाज नही है मेरे पास । मेरी बेटी धरती को , उनके कष्टों को हरने स्वयं आने का वचन दिया था आपने , मुझे लगता है समय आ गया है , अब आपको आना ही पड़ेगा धरती पर ।

राम पूछ रहे थे ब्रम्हा से - तुम्ही बताओ , किस माता की कोख में जाऊं , माताओं को उल्टे सीधे शिक्षा देकर तुम्ही ने धरती को रावणों से पाट दिया है । इतने रावणों को मारने , मेरे लिए इतनी मां कौशल्या कहां से लाओगे तुम । ब्रम्हा ने कहा - प्रभु गलती हो गयी । उपाय करो अन्यथा पृथ्वी पर हाहाकार मचने वाला है । राम जी कहने लगे - जिन रावणों के प्राण इकट्ठे किये हैं , उसे प्रतिवर्ष रावण का पुतला बनवाकर , पुतले के अंदर आरोपित करो और फिर इन पुतलों को इन्ही के भाइयों के हाथों जलवाओ । धीरे धीरे ये कम हो जायेंगे । पर उनका क्या प्रभु , जिनके प्राण कुर्सियों में छिपे हैं । उसका भी उपाय है , मै स्वयं जाऊंगा धरती पर , परंतु अब शरीर के साथ नही बल्कि , विचारों में व्याप्त होऊंगा मैं । राम पैदा नही होंगे , राम बनेंगे अब । ब्रम्हा जी समझे नही । रा का अर्थ राष्ट्र और म का अर्थ मंगल करने वाला । अर्थात राष्ट्र का मंगल करने वाला प्रत्येक नागरिक अब राम होगा । और राम को त्रेतायुग की तरह कैकेयी खड़ा करेगी । पर कैकेयी कहां से लायेंगे प्रभु ? फिर कैकेयी भी ऐन वक्त पर मंथरा के चंगुल में फंस जाती है – ब्रम्हा जी पूछ रहे थे । राम ने जवाब देते हुए कहा – कैकेयी कहीं से लाना नही पड़ेगा । वह तो यहीं रहती है । देश की जनता ही तो कैकेयी है , जो छली जा रही है मंथरा के हाथों आज भी ।
यह मंथरा ही राम को भटकने के लिए मजबूर करती है । वह चाहती है राम का विनाश । परंतु कैकेयी , राम को , जंगल में भी खड़ा कर सकती है । अनेक बाधाओं और बदनामियों के बीच राम के साथ पूरी तरह खड़े रहने वाली कैकेयी , आज जनता बनकर राम ढ़ूंढ रही है । रावण पग पग पर खड़े मिल जाते हैं , पर राम पहचानना मुश्किल हो रहा है । पहचानना है , रावणों के बीच छुपे राम को , उन्हे सामने लाना है । तब विचारों का यही राम बताएगा उपाय । पर उपाय क्या होगा प्रभु ? कुछ विशेष नही ब्रम्हा जी , जिनके प्राण कुर्सियों में बसते हैं , सिर्फ उनकी कुर्सी छीन लेना है फिर ये रावण अपने आप .......... की मौत मर जायेंगे । अन्यथा रावण का सिर्फ पुतला दहन होता रहेगा , रावण हंसता रहेगा और साल दर साल बढ़ता रहेगा और चिढ़ाता रहेगा – फिर मिलेंगे अगले वर्ष .................. ।

हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन , छुरा
जि. गरियाबंद ( छ. ग.)
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