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आलेख-रावण— हरदेव कृष्ण

पता—हरदेव कृष्ण, ग्राम/डाक- मल्लाह-134102

     जिला  पंचकूला (हरियाणा)
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मु.स्त्रोतः- 1The Tribune ( Oct.2007)

                2 The Tribune ( March. 2007)

                3 कादंबनी अक्तूबर 2006

        4 पुस्तक – भारत के आदिवासी क्षेत्रों की लोककथाएं(शरद सिंह)- नेशनल बुक ट्रस्ट , भारत

                                 रावण भी पूजा जाता है

कुछ साल पहले बिहार के एक चैनल में जरासंध  से संबंधित एक समाचार प्रसारित हुआ था।  मगध के चंद्रवंशी समुदाय के लोग  जरासंध की मूर्ति के समक्ष एकत्रित हुए और यह माँग उठाई कि जरासंध के ऊपर नए सिरे से शोध किया जाए।  उनके मुताबिक जरासंध महाबली, शूरवीर और साहसी राजा था, उसका सकारात्मक पक्ष भी सामने आना चाहिए।   इसी तरह  रावण का पक्ष  दमदार तरीके से  सामने  आया था।   कुरुक्षेत्र व इसके आसपास रहने वाले ब्रहामण समुदाय ने यह विचार किया था कि हर साल रावण जलाने की प्रथा अब बंद की जानी चाहिए।  भारत, नेपाल, श्रीलंका, थाईलैंड, कंबोडिया और इंडोनेशिया के रामायण लेखकों का कहना है कि सुन्दरता, पराक्रम , बल और ज्ञान में रावण की राम से तुलना की जा सकती है। उनका तर्क है कि रावण का वध करने के बाद राम ने शिव की आराधना इसलिए की  ताकि एक शिवभक्त को मारने का पाप उन्हें न लगे।  राजस्थान के स्थानीय लोगों का कहना है कि रावण की तो पूजा की जानी चाहिए।  क्योंकि वह परमशक्तिमान होने के साथ-साथ तीन लोकों का राजा भी बन चुका था।

रावण महर्षि पुलस्त्य का पौत्र और मुनि विश्रवा का पुत्र था. उसकी माता कैकसी दैत्यवंश से थी। राजस्थान में जोधपुर के हिन्दू  रावण को अपना पूर्वज मानते हैं। इसके अलावा रावण का ससुराल “मंदौर” भी यहीं है। मंदौर जोधपुर से 320 किलोमीटर की दूरी पर है, प्राचीन काल में यह जोधपुर की राजधानी हुआ करता था। स्थानीय लोगों का कहना है कि रावण का विवाह जोधपुर के राजा “मय” की पुत्री मंदोदरी के साथ ‘ मंडोर ’ में हुआ था। यहां किले की तलहटी में रावण के वंशज ‘मुदगल’ गोत्र के लोग रहते हैं।  ये लोग यहां आए कैसे? जब राम और रावण के बीच महायुद्ध हुआ तब रावण के वंशज दक्षिण होते हुए उत्तरी भारत आ गए थे। रावण के ससुराल में उन्होंने आश्रय लिया। तब से यह उनका निवास स्थल है। ये लोग वर्षों से रावण का श्राद्ध करते आ रहे हैं। यहीं पर किला रोड पर महादेव अमरनाथ और नवग्रह मंदिर में रावण की आराध्य देवी “खरानना” की मूर्ति स्थापित है।


“कोरकू” जनजाति के लोग भी स्वयं को रावण का वंशज मानते हैं। कोरकू सबसे प्राचीन जाति  ‘आस्ट्रिक जाति ’ के माने जाते हैं।  रावण की तरह ये भी महादेव को अपना इष्टदेव मानते हैं। यह जनजाति मध्यप्रदेश  सतपुड़ा के वनप्रांतों में छिंदवाड़ा, बैतूल जिले के भैंसदेही –चिचोली, होशंगाबाद जिले के हरदा, टिमरनी और खिड़किय, पूर्व निमाड़ में हरसूद व बुरहानपुर में बसी हुई है।  महाराष्ट्र के अकोला, मेलघाट तथा मोरशी क्षेत्र में भी कोरकू बसे हुए हैं।

कानपुर मे एक “कैलाश मंदिर” है जोकि रावण को समर्पित है. यह मंदिर 140 साल पुराना है और वर्ष में केवल एक बार दशहरे के दिन खोला जाता है।  प्रसिद्ध मीनाक्षी मंदिर में भी रावण की दस सिर और अनेकों भुजाओं वाली आकर्षक मूर्ति को देखा जा सकता है। आंध्रप्रदेश के काकीनाड़ा मे काफी बड़ा शिवलिंग है। कहा जाता है कि यह रावण द्वारा स्थापित किया गया था। यहीं पर रावण की मूर्ति भी है।  इन दोनों की पूजा यहां के मछुआरों द्वारा की जाती है। तमिलनाडु के “त्रिकोनेश्वर” मंदिर में रावण को शिव की पूजा करते हुए दिखाया गया है। ऐसा ही दृश्य मध्यप्रदेश में देवगढ़ के मंदिर मे देखा जा सकता है। इसी राज्य में नाटरेन नाम की तहसील है जहां “रावणग्राम” है। यह विदिशा के जिला मुख्यालय से चालीस किलोमीटर की दूरी पर है। यहां पर कन्याकुब्ज ब्रहामण रहते हैं, ये भी स्वयं को रावण से जोड़ते हैं। यहां“रावणबाबा” की दस फीट लंबी मूर्ति लेटी अवस्था में है। ग्रामीणों ने धन एकत्रित करके यहां रावण का मंदिर बना दिया है। इसमें प्रतिदिन पूजाअर्चना की जाती है और साथ ही खीर-पूड़ी का भोग लगाया जाता है। एलोरा तक में रावण की मूर्ति को उकेरा गया है, जिसमें उसने कैलाश पर्वत को उठा रखा है

हमारा पड़ोसी देश श्रीलंका , जहा कभी रावण का शासन था, वहां “एला घाटी” है। यहां रावण का एक गुफानुमा मंदिर है जो लगभग एक हजार वर्ष पुराना है। यह तब के राजा द्वारा बनवाया गया मंदिर है। इसके भीतर मानव ,कुछ हाथी और ड्रेगन आदि के चित्रों को बनाया गया है। इनमें चटख लाल, संगतरी और नीले रंगों का इस्तेमाल किया गया है।

रावण दैत्यसम्राट होने के बावजूद अंत्यत तेजस्वी, शूरवीर और विद्वान था।  साहसी होने के साथ-साथ वह शिवभक्त, तपस्वी और चारों वेदों का ज्ञाता था। यही नहीं उसे शास्त्रीय संगीत और आयुर्वेद की भी गहरी समझ थी। रावण ने अंक प्रकाश, कुमार तंत्र, उड्डीश तंत्र, शिव-तांडव स्त्रोत, नाड़ी परीक्षा, अर्क प्रकाश, काम चंडाली और रावण-भेंट आदि ग्रंथों की रचना की थी। शायद इसी कारण वाल्मीकि ने अपनी रामायण में रावण को महात्मा कहा है और उसके वीरोचित सौंदर्य का बखान किया है।

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हरदेव कृष्ण,  मल्लाह-134102

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