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नयी कहानी : दशा और दिशा - जुनैद अंसारी

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नयी कहानी ः दशा और दिशा

नयी कहानी के नयेपन को व्‍यक्त करने वाली विशेषतायें इस प्रकार है ः-
(1) अनुभव की प्रामाणिकता
(2) समकालीन जीवन की व्‍यापक पहचान
(3) मध्‍यवर्गीय मूल्‍यबोध
(4) यातनामय प्रतीक्षा और आशावाद के स्‍वर
(5) स्‍थापित नैतिक बोध को चुनौती
(6) आधुनिकता बोध की विशिष्‍ट भंगिमा
(7) सांकेतिकता
(8) भाषा की सचेत, सर्वजनात्‍मक और वैविध्‍यपूर्ण, बनावट
(9) नवीन और सामर्थ्‍यपूर्ण अभिव्‍यंजना

प्रत्‍येक युग की अपनी दृष्‍टि और सृष्‍टि होती है। बदलते संदर्भों में जिस दृष्‍टि का विकास होता है, उससे प्रेरित होकर ही साहित्‍य-सृष्‍टि के नये आयाम प्रस्‍तुत होते हैं। कोई भी साहित्‍य युग-निरपेक्ष नहीं रह पाता है। उसके मूल में इतिहास और जीवन, परिवेश और वातावरण तथा परम्‍परा व प्रगति की नयी भंगिमायें सदैव क्रियाशील रहती हैं। सृजन यदि अपने समकालीन परिवेश से आँखें चुरा लेता है तो वह न तो जीवन्‍त व यथार्थ बन पाता है और न उसका प्रभाव स्‍थाई होकर किन्‍हीं मूल्‍यों को उत्‍प्रेरित ही करता है। अपने चारों ओर फैले परिवेश के दबाव को प्रत्‍येक नये संवेदनशील रचनाकार ने सहा है, भोगा है कभी चाहे-कभी अनचाहे। वह विक्षुब्‍ध हो उठा है उसका मन प्रतिक्रियात्‍मक हो गया है। समकालीन रचनाकार मानव मूल्‍य; नैतिकता, अनैतिकता, वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति के बीच, भूख, नवीन परिस्‍थिति में यौन सम्‍बन्‍ध आदि प्रश्‍नों के विविध पक्षों के समाधान ढूंढ़ना चाहता है। स्‍वातंत्र्योत्‍तर काल में विकसित व्‍यक्‍तिगत स्‍वार्थ, अवसरवादिता, अनिश्‍चितता, आलसता, ग्‍लानि, असमंजस और रिक्‍तता बोध से घिरकर साहित्‍य की मनः शक्‍तियाँ काँप उठी हैं। उसकी चेतना भूमि में जो भी अंकुर पड़ता है, वह विकृत है, खण्‍डित है। उसकी संवेदना से सिक्‍त होकर जो चित्र उभर रहे हैं वे भी भयावह, दंशक बाधाओं को कंपा देने वाले, भूख, भोग, अनैतिकता और टूटते बिखरते सायों के ही प्रतिबिम्‍ब हैं।


वर्तमान में कहानी अपनी कहानीनुमा तस्‍वीर को लेकर नये विशेषण के साथ अवतरित हुई है। स्‍वातंत्र्योत्‍तर काल में लिखी जाने वाली कहानियों की नवीनता रूप शिल्‍प और मानवीयता दोनों की है। पत्र-पत्रिकाओं में नई पीढ़ी के कहानीकारों और तरुण आलोचकों ने वर्तमान कहानी को लेकर पर्याप्‍त विवाद उत्‍पन्‍न किये हैं। फलस्‍वरूप ‘कहानी' नयी कहानी की संज्ञा से अभिषिक्‍त होकर गद्य साहित्‍य की विधाओं में अग्रिम मोर्चे पर खड़ी है। आजादी ने जो नयी चेतना प्रदान की है, उसमें आस्‍था व आशा का स्‍वर प्रमुख रहा है। जैसे-जैसे सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्‍य बदला है वैसे-वैसे ही उसमें साँस लेने वाला व्‍यक्‍ति भी बदल गया है। आजादी के पहले जो प्रश्‍न-उप प्रश्‍न और समस्‍यायें थीं, वे आजादी के बाद एक नये रूप में सामने आई हैं। कारण मानव के अनुभवों की श्रृंखला में बेहिसाब नये अनुभव आकर जुड़ गये। उसकी समस्‍याओं की परिधि न केवल चौड़ी हुई है, वरन उसकी बाहरी सीमा कँटीले तारों से घिरी हुई है। ऐसी स्‍थिति में कहानी का नया हो जाना परिवेश की मांग है।

नयी कहानी से तात्‍पर्य उस कहानी से है जो सन्‌ 1950 ई. के आस-पास से नये युग-बोध के रंग में रंगी यथार्थ की रेखाओं से लिखी गयी है। ‘‘नयी कहानी की शुरूआत किसी एक व्‍यक्‍ति से नहीं हुई है। उसकी एक पीढ़ी है और उसी पीढ़ी की प्रगतिशील दृष्‍टि भी है। इस दृष्‍टि के वाहकों में कमलेश्‍वर, राजेन्‍द्र यादव, मोहन राकेश, अमरकांत, निर्मल वर्मा, मन्‍नू भण्‍डारी और मार्कण्‍डेय आदि का नाम शीर्ष पर स्‍थित है। इस पीढ़ी के कहानीकारों ने जीवन की विसंगतियों, विडम्‍बनाओं और त्रासदियों से सीधा साक्षात्‍कार करके अपनी प्रामाणिक अनुभूतियों को प्रस्‍तुत किया है। यही कारण है कि ये सभी नये कहानीकार परिवेश से प्रतिबद्ध हैं। इसका मानस सजग है, आँखें खुली हैं एवं प्रज्ञा और संवेदना के स्‍तर सजग हैं। तभी तो ये मानवीय स्‍थितियों और सम्‍बन्‍धों को यथार्थ की कलम से उकेर सके हैं।''1
भवदीय,
junaid ansari | junaidansari0107@gmail.com

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