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पुस्तक-समीक्षा / विश्वास की धमनियों से होकर बहता राग / डॉ. सुरेन्द्र चौधरी

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‘राहे राह अन्हरिया कटतौ’ श्री मथुरा प्रसाद नवीन का नया कविता संग्रह है। इसमें उनकी पच्चीस चुनी हुई कविताएँ संकलित हैं जिसकी भूमिका श्री मनोज कुमार झा ने बड़े परिश्रम से लिखी है। इस छोटे से संग्रह की विशेषता यह भी है कि इसमें भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण टिप्पणी को प्रस्तावना की शक्ल में छापा गया है। भारतेन्दु बाबू की यह प्रस्तावना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वे हिन्दी क्षेत्र की बोलियों में और खड़ी बोली साहित्य में कोई मूल अन्तर्विरोध नहीं देखते। जातीय कविता और संगीत के माध्यम से जिस सार्वदेशिकता की संभावना को भारतेन्दु बाबू ने लक्षित किया था, उसे व्यवहार के रूप में लाने का कार्य आज भी सम्पन्न नहीं हुआ। इसके विपरीत बोलियों और उपभाषाओं के मंच अलग-थलग जा पड़े हैं और भाषा क साधारण प्रचार में कठिनाइयाँ आ रही हैं। ऐसी स्थिति में ऐसे संकलनों का जो मूल्य है, उस पर अलग से कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। पंजाबी-मराठी में ऐसे गीतों का जो महत्व रहा है, उससे हमें कुछ सीखना चाहिए।

नवीन जी के पच्चीस गीतों का यह संग्रह कवि की एक लम्बी यात्रा का छोटा पड़ाव है। ‘राहे राह अन्हरिया कटतौ’ अपनी यात्रा की थकान को मिटाने का कवि का आत्मीय संलाप भी है और एक नाटकीय प्रगीत-नायक के निर्माण की चेष्टा भी है। इस संलाप में अगर रागदीप्ति है तो वह इसलिए है कि लय के आवर्तन में, जो अपने से बाहर आकर कविता के संसार में एक विरोधी संसार की छाया से टकरा कर ही अपना अर्थ प्राप्त करती है। मगर राग विश्वास की धमनियों से होकर बहता है। कविता के इस स्वर में कहीं कोई अतिरेक नहीं है। कोई कोशिश, कोई नाटकीयता भी नहीं है। ओज के स्वर में उन्माद नहीं भरा गया है। यह कवि का अपना अनुशासन है। कविता और कवि इस सहज जमीन से आगे देखने को हमें बाध्य करते हैं, और तब यह स्पष्ट हो जाता है कि लोकवाणी का ओज अनुभव से होकर सचेत आलोचना और परिवर्तन की दिशा में प्रवाहित है। यह प्रवाह साधारण नहीं है। इसमें आर्तजन और जीवन की व्यापक साझेदारी है। कवि को कातरता नहीं छूती। यह इन कविताओं का दूसरा आत्मविकसित गुण है। कवि ठीक कहता है कि ‘कविता हमें सुनैबो तों सब नाचै ले तैयार रहो।’ इस नाच में अगर थोड़ा तांडव है तो इसके लिए समय और व्यवस्था जिम्मेदार है जो बरबस हमें अपनी दुनिया से खींचकर पराई दुनिया में ला रही है। कवि के स्वर में आत्म-निर्वासन का कोई अनुवर्ती स्वर नहीं है। यह एकतानता व्यंग्य की जमीन पर खूब खुलती है। ‘कहिया तक सरकार चलत’ की परिस्थिति तो खास से आम हो गई है। अब तो मिसिर जी को पतरा देखने की भी जरूरत नहीं है। हाल यह है कि ‘महज एक कुर्सी के खातिर कहिया तक तकरार चलत।’

रामधनी का बेटा वोट में बहक गया। जो चूँ नहीं बोलता था, वह आँय-बाँय बक गया। रामधनी का बेटा वोट में नहीं बहका, वोट से जुड़ी वस्तविकता के दबाव में बहक गया है। ऐसे छोटे मुहावरेदार बोलचाल के गीतों के बन्ध नाटक को एक खास दृश्यता प्रदान करते हैं। अबर महफिल महक गई तो आगे भी महकनी चाहिए। गंगा न भी निकले तो पड़ोस की नद्दी तो निकलेगी। हमें इस आवाज से जुड़ कर जो आशय प्राप्त होता है, वही कविता का कथ्य बन जाता है।

राजनीतिक कविता के पहरुए श्री केदारनाथ अग्रवाल जी ने कभी लिखा था –

एक हथौड़े हाथों वाला और हुआ

एक जहाजी बेड़े वाला और हुआ

नवीन जी गाते हैं –

‘बढ़ के होतै जमान बुतरुआ...’ इस जवानी में असली हिन्दुस्तान पल रहा है। बच्चे संभावना हैं, यह कविता के मुहावरे में किस तरह ढली और रच-बस गई, इसका स्वाद तो पाठक को ही मिलेगा।

एक पीढ़ी के संघर्ष की छायाएँ कवि के साथ जुड़ी हैं। अपने चारों ओर के इस अंधेरे में आँख साधता हुआ हिन्दुस्तान अपने वर्तमान के साथ तमाम रिश्तों में उससे प्रतिकृत होता है। इस काव्य-स्वर का स्वागत जितने शब्दों में किया जाए, उतना कम होगा। कवि विश्वास के स्वर में कहता है –

बेटी रहल कुमार कुंडली देखल गेल उलट के नैं

राहे राह अन्हरिया कटतौ कान्हा अप्पन पटकैं नैं

पूर्वी मगही का रस और स्वाद इन कविताओं की अपनी सम्पदा है। कविता में अपने भीतर और बाहर की दुनिया का ऐसा सजीव, हलचलों भरा चित्र तो हिन्दी कविता में सिर्फ नागार्जुन दे सके हैं। हम कवि के लिए मंगलकामना कर सकते हैं और उससे भी अधिक उसके पाठक बन कर उसे उसकी लड़ाई में मदद कर सकते हैं।

 

पुस्तक – राहे राह अन्हरिया कटतौ (मगही कविता संग्रह)

कवि – मथुरा प्रसाद नवीन

प्रकाशक – कल्पना प्रकाशन, डेहरी ऑन-सोन, रोहतास, बिहार

मूल्य – 10 रुपए

प्रकाशन वर्ष - 1990

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