भारत में नव-सामंतवाद और काला धन - श्रीमती विमल सिंह

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भारत कहने को तो प्रजातांत्रिक देश है, किन्तु यहाँ के लोगों की पसंद है सामंतवाद। यही कारण है कि जो नेता प्रजातांत्रिक पद्धति से चुनकर विभिन्...

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भारत कहने को तो प्रजातांत्रिक देश है, किन्तु यहाँ के लोगों की पसंद है सामंतवाद। यही कारण है कि जो नेता प्रजातांत्रिक पद्धति से चुनकर विभिन्न सदनों में पहुँचते हैं, उनका रहन-सहन और सोच बहुत जल्द ही सामंती ढर्रे पर चल निकलता है। चुनावों के पहले वे मतदाताओं के पाँव छूने में भी गुरेज नहीं करते, किन्तु सत्ता में आते ही उनकी आँखों का पानी मर जाता है और धीरे-धीरे आम आदमी से दूरी बनाने लगते हैं। यही हाल हमारे आला अफ़सरों का है। सुना है कि उन्हें शुरुआती प्रशिक्षण में ही सिखा दिया जाता है कि आपका काम शासन करने का है। इसलिए शासक और शासित के बीच की दूरी बनी रहे- तभी आप सफलतापूर्वक शासन कर सकते हैं। यह आभिजात्यवादी सोच ही आम आदमी को नेताओं और शासकों से दूर करता है। इसलिए प्रजातांत्रिक व्यवस्था के बावजूद शासन का अपने यहाँ एक ही अर्थ है- राजशाही, सामंतशाही। नेता और नौकरशाह, व्यवसाइयों, उद्योगपतियों आदि के साथ मिलकर सामंतशाही का एक ऐसा ताना-बाना बुनते हैं, जहाँ आम गरीब-गुरबा केवल शासित बनकर रह जाता है। इस सामंतशाही प्रवृत्ति को हम नव-सामंतवाद कहकर अभिहित करना चाहेंगे।

सामंतशाही की मूल विषयवस्तु है सत्ता यानी पावर। कुछ भी यानी मनमानी करने, किसी को भी धर दबोचने, और दूसरों को कुचलते हुए शान से जीने की पावर। बड़े पदों से जुड़ी रहती है पावर। लेकिन पावर अपने-आप में कोई एकांगी और निरपेक्ष अवधारणा नहीं है। पावर का रूपान्तरण पैसे में न हो तो वह किस काम की? पावर से आप अपने अधीनस्थों को डरा सकते हैं, किसी को भी अपराधी सिद्ध करके जेल भिजवा सकते हैं, थोड़ी देर के लिए किसी को भी अपने रुआब में ले सकते हैं। किन्तु पावर से आप बाज़ार में कुछ खरीद नहीं सकते। ऐसे विक्रेता से तो कतई नहीं खरीद सकते, जिसे आपकी पावर के होने या न होने से कोई फर्क न पड़ता हो। इसलिए जो लोग पावर में होते हैं वे जहाँ-जहाँ उनका वश चलता है, वहाँ से पैसा खींचते हैं। अपने अधिकार क्षेत्र का काम तो वे बिना पैसा दिए, केवल पावर के दम पर करा लेते हैं, किन्तु जहाँ उनके अधिकार की आभा नहीं पहुँच पाती, वहाँ वे पैसा फेंकते हैं। और ज़रूरत पड़े तो अनाप-शनाप पैसा, क्योंकि अपनी पावर के दम पर उनके पास अनाप-शनाप पैसा आया भी होता है। इसके समानांतर है पैसा और पैसे की पावर। जो धनी लोग पावर में नहीं हैं, उन्हें पता है कि पावरफुल लोगों को पैसे से खरीदा जा सकता है। वे पैसे की पावर को जानते हैं और ज़रूरत पड़ने पर उसका बखूबी इस्तेमाल करते हैं।

धीरे-धीरे कुछ थोड़े-से पावरफुल लोग देश का ज्यादातर पैसा अपने पास दबा लेते हैं या केवल वहाँ संचित होने के अवसर उपलब्ध कराते हैं, जहाँ से जब चाहें तब निकलवा सकें, वसूल सकें। ऐसे पैसे को बाहर निकालने के लिए या उसे कूड़ा बनाने के लिए अच्छी सरकारें कुछ वैसे उपाय कर डालती हैं, जैसे वर्तमान केन्द्र सरकार ने किए। एक दिन अचानक घोषणा होती है कि हजार और पाँच सौ रुपये के जो नोट बाज़ार में हैं, या सामंती सोच वाले पावरफुल लोगों के पास दबे हुए हैं, वे अब कागज के टुकड़े मात्र रह गए हैं। यदि कोई उन नोटों को बदलना चाहे तो बदल ले, जमा करना चाहे तो बैंक में जमा कर दे। लेकिन उसके लिए अमुक-अमुक शर्तें हैं। ये शर्तें कहीं न कहीं ईमानदारी की ओर ले जानेवाली हैं।

विभिन्न दलों के ऐसे राजनेता और धन के लिए ही बड़ी नौकरी में आनेवाले भ्रष्ट अभियंता, अधिकारी, व्यापारी, व्यवसायी बौखला गए हैं, जिनके पास बेहिसाब करेंसी है। वे सोच में है कि अब क्या करें? जो नहीं बोल सकते, वे चुपचाप खून का घूँट पी रहे हैं, किन्तु नेताओं की ज़बान पर कोई लगाम नहीं। वे अपनी बौखलाहट शब्दों में बयान कर रहे हैं। हवाला जनता की तकलीफों का दे रहे हैं, किन्तु तकलीफ दरअसल खुद उन्हीं की है। उनके पास अरबों रुपये की बेहिसाब करेंसी है। ऐसी करेंसी जो कभी वैध मुद्रा होती थी, किन्तु अब नहीं रहेगी। जैसे किसी विषधर नाग से उसकी मणि छीन ली जाए तो वह बौखला जाता है, वैसे ही इन धनपशुओं से उनके धन की गरमी निकाल ली गई है और वे धनहीन होकर बौरा गए हैं। हालांकि इनके पास अनाप-शनाप भू-संपत्ति है, बंगले हैं, कोठियाँ हैं, गाड़ियाँ हैं, सोना और हीरे-जवाहरात हैं, किन्तु वहाँ तक सरकार के हाथ नहीं पहुँच पाए। सरकार मुद्रा जारी करती है, उसे वापस ले सकती है, बदल सकती है। यह सरकार के लिए सहज ही शक्य है। और सरकार ने यह कर दिखाया। इससे सरकार की नेकनीयती का पता चलता है।

जो नेता अपने-आप को आम जनता का खैरख्वाह बतलाते हैं, चुनाव के दिनों में कोई भी विचार किए बिना, निस्संकोच भाव से गरीब-गुरबा के पाँव छूते हैं, उनकी टूटी तसली में साग रोटी खा आते हैं, उनकी टूटी मचिया पर बैठकर उनके दिल में सेंध लगा आते हैं और चुनाव जीतते ही सामंती तेवर दिखाने लगते हैं; उनकी असलियत 1000-500 के नोट वापस लेने पर उत्पन्न हुई उनकी बौखलाहट से उजागर हो रही है। आम आदमी की चिन्ता दर्शाना इनका स्वांग है। ये आँसू घड़ियाली हैं।

देश की कई पार्टियों के झंडे पर हँसिया-हथौड़ा छपता है, कहीं साइकिल है, तो कहीं और ऐसे प्रतीक जिनका संबंध आम निम्न-मध्यवर्गीय समाज से नहीं, बल्कि बिलकुल गरीब-गुरबा, मज़दूर और किसान से है। जो नेता इन प्रतीकों पर चुनाव जीतते हैं, सत्ता पर काबिज होते हैं, उनमें से बहुतों को शायद यह भी मालूम नहीं होगा कि हँसिया का हमारे लोक-जीवन में, हमारी कृषि-व्यवस्था में क्या उपयोग है, कि उसकी धार भीतरी हिस्से में होती है या बाहरी, कि हँसिया और खुरपे में क्या अन्तर है और हँसिया या खुरपे को इस्तेमाल में कैसे लाया जाता है? हथौड़े और घन में क्या अन्तर है? कुदाल और फावड़े में क्या अन्तर है? गैंती और फावड़े में क्या अन्तर है? बेलचे और सब्बल में क्या अन्तर है? और इन सब उपकरणों का इस्तेमाल किन-किन कार्यों के लिए होता है? अपना चुनावी उल्लू सीधा करने के लिए किसान और मज़दूर को उल्लू बनाना इन चतुर नेताओं को खूब आता है। बस, लोमड़ी जैसी चतुराई ही उनका परम पुरुषार्थ है। और परम प्राप्य है- पैसा। उक्त निर्णय के बाद इनका अरबों रुपया अब रद्दी में तबदील हो गया। इनकी सामंतशाही का सारा असबाब कचरा हो गया। इसलिए ये बौखला गए हैं।

नेता तो आते-जाते रहते हैं। आज ये आए हैं, तो कल दूसरे आएंगे। लेकिन अधिकारी और अभियंता, बाबू-वर्ग लम्बी पारी खेलता है। वह नेताओं की छोटी-छोटी पारियों के लिए मैदान बनाता है। ज़ाहिर है कि काले पैसे के गोरख-धंधे में इस वर्ग की भूमिका बहुत बड़ी होती है। देश में जगह-जगह से खबरें आ रही हैं कि अमुक-अमुक शहर में एक इंजीनियर करोड़ों रुपये लेकर स्वर्णकार के यहाँ गया, और जो सोना बत्तीस लाख का एक किलो आता है, उसके लिए पैंसठ लाख रुपये की दर से भुगतान कर आया। ऐसे तमाम अधिकारी और अभियंता हैं, जिनके घरों में करोड़ों रुपये की करेंसी भरी हुई है। ये लोग बीस-बीस लाख रुपये नकद देकर लग्ज़री गाड़ियाँ खरीदते हैं, इनकी बीवियाँ लाखों रुपये की नकद शॉपिंग एक बार में कर लाती हैं। इतनी नगदी इनके पास कहाँ से आती है?

इसी प्रकार हजारों व्यापारी एक पैसा भी कर नहीं चुकाते या अपने टर्नओवर के अनुपात में बहुत ही कम कर भरते हैं, जबकि महँगी गाड़ियाँ खरीदते हैं, विशाल कोठियों में रहते हैं, शादियों-समारोहों पर करोड़ों फूँक डालते हैं। उनके सी.ए. काली कमाई को छिपाने के गुर बताने में माहिर होते हैं। ऐसे धन-पशुओं के बर-अक्स वे नौकरी-पेशा लोग हैं, जिनके वेतन से पाँच-छह लाख रुपये सालाना टैक्स कट जाना आम बात है। पाँच-छह लाख रुपये टैक्स भरनेवाले नौकर मामूली कार रख ले तो भी गनीमत है। इन दोनों की आर्थिक स्थिति तो ठीक है, किन्तु देश में बहुत बड़ी संख्या (मैजॉरिटी) उन लोगों की है जो महीने में पाँच से दस हजार रुपये तक ही कमा पाते हैं। यह वर्ग किसी तरह पाँव घसीटते हुए पूरी ज़िन्दगी गुजार देता है। उसे न टैक्स भरना है, न काला धन जमा करना है। अलबत्ता उसके पास जो दो-चार नोट हजार और पाँच सौ रुपये की शक्ल में हैं, उन्हें बदलने की आफ़त ज़रूर उनके गले पड़ गई है। गेहूँ के साथ पिस जाने इन लाचार घुनों की नियति बन गई है।

देश के तंत्र का बहुत बड़ा हिस्सा घूसखोरी, कमीशनखोरी और बेईमानी के मकड़जाल में उलझा हुआ है। वर्तमान केन्द्र सरकार ने इस मकड़जाल को काटने की जो दिलेरी दिखाई है, वह काबिले-तारीफ है। काले धन के दम पर कुछ लोग समाज में अपने-आप को राजा समझ रहे थे, और आम नागरिकों को कीड़ा-मकौड़ा। काले धन के महज कागज का टुकड़ा बनकर रह जाने पर इन धन-पशुओं की औकात आम आदमी जैसी हो गई है। सामाजिक समरसता के लिए यह बेहद ज़रूरी है। सड़कों पर जबरदस्ती की धींगामुश्ती करती बड़ी-बड़ी एसयूवी अब कम नज़र आ रही हैं। आम आदमी, जो आदतन या विवशतावश ईमानदार है, शान से चल रहा है। उसकी आवश्यकताएं सीमित हैं, उसके खर्चे कम हैं, उसे शाहखर्ची की आदत नहीं रही। वह मज़े में है। कुढ़ रहे हैं वे जिनके पास अनाप-शनाप बेहिसाब पैसा था और जो अनाप-शनाप खर्च करने के अभ्यस्त हो चले थे, किन्तु उनके पैसे के कूड़ा बनते ही वह पहलेवाली शाहखर्ची सपना होकर रह गई।

अनाप-शनाप पैसा बनानेवालों का दिमाग खराब करने में विज्ञापनों और कार-निर्माताओं, फैशन-गुरुओं, कपड़े व प्रसाधन सामग्री बेचनेवालों का भी कम योगदान नहीं रहा है। मसलन मारुति की सियाज कार के एक विज्ञापन में एक मुम्बइया अभिनेता कहता है- सेलिब्रिटीज डोन्ट केयर। इसी तरह एक एसयूवी को चीते की तरह पेश किया जाता रहा, जिसके आने पर बाकी सभी गाड़ियाँ सहमकर एक तरफ हो जाती हैं और टैग लाइन सुनाई पड़ती है- द बीस्ट इज ऑन द रोड। सवाल यह है कि सेलिब्रिटी को यह अख्तियार किसने दिया कि वह दूसरों की परवाह न करे। आप अपने घर में जो मन आए, वह कीजिए। किन्तु सड़क पर निकले हैं तो समाज के कायदे-कानून को मानना पड़ेगा। आप होंगे सेलिब्रिटी अपने घर में, उससे हमें क्या? आप केयर नहीं करेंगे जो जेल जाएँगे। और बनैले जानवरों के लिए हमारी सड़कें नहीं हैं। आप चीते हैं तो जंगल में जाइए। शहर में चलना है तो सभ्यता से चलिए। सभ्य समाज की सड़कें खूंख्वार जानवरों की सैरगाह नहीं होतीं। ऐसे विज्ञापन या तो अमीरों को खूंख्वार और बेपरवाह बनने के लिए प्रेरित करते हैं, या उनकी इन बुराइयों को उजागर करते हैं। लेकिन इनके केन्द्र में हैं बिगड़ैल अमीर, पैसे की गरमी सिर में चढ़ जाने के कारण अपना आपा खो चुके अमीर।

प्रजातंत्र तभी सफल हो सकता है, जब उसमें हर व्यक्ति को बराबर के अवसर उपलब्ध हों। पाशविक प्रवृत्तियों अथवा आपराधिक गतिविधियों के कारण लूटने-खसूटने में अधिक सक्षम कुछ लोग जब समाज का सारा धन अपने कब्जे में कर लें तो न्याय-प्रिय और प्रजापालक सरकारें वही करेंगी, जो हमारी वर्तमान केन्द्र सरकार ने किया है। देश में बढ़ रही सामंतशाही और उसके फलस्वरूप उत्पन्न हो रहे काले धन को जड़ से दूर करके, नेस्तनाबूद करके प्रजातंत्र की पुनः प्रतिष्ठा के लिए किए गए ऐसे स्तुत्य प्रयास की जितनी भी प्रशंसा की जाए वह कम है।

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रचनाकार: भारत में नव-सामंतवाद और काला धन - श्रीमती विमल सिंह
भारत में नव-सामंतवाद और काला धन - श्रीमती विमल सिंह
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