सोमवार, 7 नवंबर 2016

शबनम शर्मा की कविताएँ

image

कचनार

दिखता मुझे

सामने वाले पहाड़ पर

हर रोज़ दूर से

कचनार का वो पेड़

निहारती, छूना चाहती,

ठीक वैसे ही

जैसे छुआ तुमने

शहर जाने से पहले

आज भी इसके खिलते ही

हो जाता, तुम्हारा इन्तज़ार

डगमगा उठती हूँ मैं

अनायास कदम इसकी

ओर बढ़ते हैं हर बरस

ये देखने की

कहीं तुम वादा निभाने

आ तो नहीं गए।

 

बूढ़ा आम

शहर के कोने में,

एक पहरेदार की तरह,

खड़ा बूढ़ा आम

शाम होते ही

सज जाती चौपाल

इसके नीचे,

बच्चे जी भर खेलते

इसके तन बदन से

कभी कच्ची-पक्की

अंबियाँ खाते,

कभी टहनियों में

छिप जाते,

कुछ टहनियाँ छूती

दूर तक झुककर ज़मीं,

कुछ छिपाती शरारती बच्चे

अपने आगोश में,

पिछले बरस चन्द सिक्कों में

बिक गया बूढ़ा आम

बिना कुछ पहचान के

काट दिया गया,

कि मैं पास से गुजरी

देखा उसका क्षत-विक्षत शरीर

आँसू टपक पड़े,

कराहते हुए उसने मुझे

पास बुलाया

कंपकंपाते हाथों से सहलाया

बोला, ‘‘बेटी तुमने मुझे नहीं

मैंने भी तुम्हें खोया है।’’

 

खिलौना

बीच बाज़ार

खिलौने वाले

के खिलौने

की आवाज़ से

आकर्षित हो

कदम उसकी

तरफ बढ़े,

मैंने छुआ,

सहलाया उन्हें

व एक खिलौने

को अंक में भरा

कि पीछे से कर्कष

आवाज़ ने मुझे

झंझोड़ा

‘‘तुम्हारी बच्चों की सी

हरकतें कब खत्म होंगी’’

सुनकर मेरा नन्हा बच्चा

सहम सा गया

मेरी प्रौढ़ देह के अन्दर।

 

पुराना घर

हिलती चौखट,

टूटा फर्श,

काँपती दीवारें लिये

उदास,

ताले को थमाकर

अपना अस्तित्व,,

खड़ा पुराना घर।

ठंडा हो चुका चुल्हा,

काई सूख गई मटके की

जार-जार हो गया बोहिया,

पटड़ियाँ तरस रही भोजन की परोस,

छाज टेड़ा हो झाँक रहा

दिखा रहा मुझे मंजे की हालत

जिसका बाण समय के

थपेड़ों में टूट गया,

जवाब दे रहा।

पर एक संदेश समेटे है पुराना घर

मैं तुम्हारा पुरखा हूँ,

तुम्हारी पहचान,

तुम्हारी धरोहर।

 

मेरा घर

जहाँ जुबाँ पर लगाम,

आंखों पर परदा,

भावनाओं पर अंकुश,

साँस लेने पर पाबंदियाँ,

हर समय हज़ारों पहरेदार,

हाथ जरूरतों की पूरा करते,

मशीनी मानव बनी मैं,

पराई सहर, पराई शाम,

हर दम काम का दाम,

निचोड़ ली जाती सारी कमाई,

हसरतों का नाश,

पत्थरीली आँख

जहाँ आहूति देने के सिवा

कुछ नहीं,

वही तो है मेरा अपना

सिर्फ मेरा अपना घर।

 

संस्कार

हर घर की रीत

बड़ों की सलाह

अपने से छोटे को

देखकर जिओ।

मान ली बात

सीख लिया जीना

सुख कम, घुटन ज्यादा

बच्चों को खुद से बेहतर

जीना सिखा दिया

वो ऊपर वालों को

मकसद बना बैठे,

हम घसीटते रहे वक्त को,

गाड़ी पटरी से उतर गई,

विचारों का घमासान युद्ध,

हमें बेवकूफ बना गया

समझ से बाहर हो गया सब कुछ

समय का पलटा

पलटी खा ही गए हम

कभी समझने में

कभी समझाने में।

 

संस्कार

खून में संस्कार

खौलते,

उतार-चढ़ाव में

अपना रंग दिखाते,

कभी उठाते,

कभी झुकाते,

अफ़सोस

ज़रूरी नहीं लग रहा

आजकल संस्कारों

का रिवाज़।

बदल गये हैं मायने

गर्भ से शुरु मशीनी जाँच,

सम्पूर्ण जीवन

मशीनों को

समर्पित,

बुझा दिया जाता

दीपक मानव रूपी

मशीन का,

मशीनों के अन्दर।

 

तस्वीर

बांधकर सामान,

बिखेर कर जज़्बात,

जाना, इतना आसान

नहीं होता

बकाया रहते कई

हिसाब,

रसीदें लेने के बाद भी,

लेकर सिर्फ़ कागज़ की

टिकट जाना आसान नहीं होता,

रोता है आँचल,

बुलाती हैं आँखें,

तोड़कर दिल किसी का

जाना इतना आसान नहीं होता,

तुम, तुम न रहकर हम हो गये,

अब ‘‘मैं’’ को ले जाना

इतना आसान नहीं होता

इक इलतिज़ा हमारी,

लौटा दो, वो चुराई तस्वीर,

खनकती हँसी,

इन चोरी चीज़ों संग

जाना इतना आसान नहीं होता।

 

सुघड़ औरत

टुकड़े-टुकड़े ज़िन्दगी में

निहारती रही मैं,

वक्त के लिबास,

कुछ लिपटे,

कुछ अर्धनग्न,

झांकते मेरी

अर्न्तात्मा में,

कहीं भी कुछ न मिला,

सिवाय स्वार्थ के टुकड़ों के,

ढाँप लिया ज़िन्दगी

को समझौते की चादर से

कहलाई मैं

समझदार, सुघड़

धैर्यवान औरत।

 

बच्चा

इक बच्चा

जो छिपा रहा

दिल के किसी कोने में,

माँगता चॉकलेट, आइसक्रीम,

छूता खिलौने,

दौड़ता रेत पर,

घरोंदे बनाता,

लुका छिप्पी खेलता

अफसोस

जला दिया जाता

वो भी

किसी झूरियों वाले

लिबास के साथ।

 

बंटवारा

कितने टुकड़ों में,

बंट सकती थी मैं,

मैंने खुद को

खुद की नज़र में

अनगिनत किरचों

में देखा।

डरने लगी अपने

अस्तित्व से,

खो बैठी अपना ही

विश्वास,

क्योंकि हर मैं

को जोड़कर बनता है ‘हम’

हम ही बनाते हैं विश्व,

व बाँटते हैं टुकड़ों-टुकड़ों में।

 

वो दो शब्द

चहुँ ओर गूंजते

लिये हाथ में मशाल

स्वार्थ की,

असंख्य चापलूस,

कड़वे, मीठे, खट्टे,

चमकते कुछ शब्द,

नहीं महसूस होते

कभी,

अपने से

अन्दर तक हिलाते,

सिर्फ मेरे लिये

मेरे ही

दिल की गहराई को

छूते, दो शब्द

जिसे सुनने हेतू

ज़िन्दगी गुज़र गई।

 

शबनम शर्मा - 

 माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र.

shabnamsharma2006@yahoo.co.in

1 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------