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कहानी / न्याय अन्याय / मानोशी चटर्जी

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न्याय-अन्याय

१)

अपने घर के बगीचे में नई उगी नर्म घास पर लेट कर मधूलिका आसमान को देख रही थी। तारे गिनने की उसकी बचपन की आदत अभी भी छूट नहीं पाई थी। बचपन में पापा के पास छत पर चारपाई पर लेट कर वह पापा को बताया करती थी कि कितने तारे गिने उसने।

"रोज़-रोज़ तारे अपनी जगह क्यों बदल लेते हैं पापा?"

"तुमसे आँख-मिचौली खेलते हैं। तुम्हारे दोस्त हैं न..."

पापा की बहुत याद आती है उसे। शादी को तीन साल हो गये हैं। और मनोज का काम कुछ ऐसा है कि अक्सर ही वे ऑफ़िस के काम से टूअर पर रहते हैं। मनोज की नौकरी सेल्स की है। उनका देश विदेश में टूअर लगता ही रहता है। कभी-कभी दो महीने के लिये घर पर नहीं होते हैं मनोज। मधूलिका भी एक छोटी सी कंपनी में रिसेप्शनिस्ट का पार्ट टाइम काम करती है। वैंकूवर शहर बहुत खूबसूरत है। मगर सारे दिन टिप-टिप बारिश की वजह से जैसा उसका मन भी भीगा होता है हर व़क़्त, और ऐसे में ही बेवजह आँखें भी भीग जाया करती हैं उसकी अक्सर ही। दोपहर बाद उसकी छुट्टी होती है। बचपन से ही उसे चित्रकारी का शौक है जिसे वो अपने ख़ाली समय में पूरा करती है। चित्रकारी का शौक़ पापा से ही मिला था उसे। पापा ने कभी किसी से सीखा नहीं था, मगर उनके बनाये पोट्रेट बिल्कुल सजीव होते थे। माँ को कभी नहीं उतारा था कैनवस पर पापा ने। हाँ उसकी, दीदी और भैया के एक दो स्केच ज़रूर बनाये थे। कल ही एक पेंटिंग खत्म की थी उसने। एक चिड़िया का घोंसला। एक जोड़ा चिडियों का, अपने बच्चों की रखवाली करता हुआ। हर पेंटिंग में कहीं उसे अपना बचपन या अपने माता-पिता की छवि दिखती थी। उसने अपने माँ-पापा जैसा अच्छा जोड़ा नहीं देखा था। पापा, माँ को अपनी हथेली पर रखते थे। माँ को कभी कोई तकलीफ़ नहीं होने देते थे। ऐसा नहीं था कि पापा को माँ के आगे पीछे घूमते देखा हो उसने या कभी मम्मी-पापा को बहुत प्यार करते देखा हो। जब से वो बड़ी हुई थी, तब से तो उसने मम्मी पापा को एक कमरे में सोते भी नहीं देखा था। पर उनका एक दूसरे के लिये सम्मान और प्यार जैसे घर की हवा में बसी हुई होती थी। माँ को अक्सर ही माइग्रेन की शिकायत भी रहती थी। मगर पापा के चेहरे पर कभी कोई शिकन नहीं देखी थी उसने। माँ पापा पर पूरी तरह निर्भर थीं। जब वो मनोज को देखती है तो उन्हें अपने पापा से कितना अलग पाती है वह। मनोज उससे कहते हैं कि अपने पाँव पर खड़े हो। अब बड़ी हो जाओ। मैं तुम्हारा पापा नहीं हूँ। सच उसके पापा जैसा अच्छा दोस्त भी नहीं हुआ कभी उसका कोई। स्कूल-कालेज की बातें माँ को सुनाने जाती तो माँ पापा के पास भेज देती थीं। पापा बड़े ध्यान से उसकी बातें सुनते थे। शादी भी सिर्फ़ पापा के कहने पर ही की थी उसने वरना अभी उसे शादी की इच्छा नहीं थी। वह चित्रकारी में एक डिग्री लेना चाहती थी। मनोज का रिश्ता आने पर पापा ने ही उसे समझाया कि यह डिग्री वह शादी के बाद भी ले सकती है। और विदेश में तो और भी कई मौके मिलेंगे। उसकी शादी के वक़्त पापा बिल्कुल नहीं रोये थे। मगर बाद में माँ ने उसे बताया था कि पापा कितनी रातें सो नहीं पाये थे। अपनी प्रिय छोटी बेटी की शादी की खुशी और उसके चले जाने का ग़म, शायद दोनों का असर रहा हो। आज घास पर लेटे-लेटे फिर पापा की याद आ गई उसे।

"क्रीं क्रीं" की आवाज़ से मधूलिका की तंद्रा भंग हुई। इस वक्त सिर्फ़ मनोज का ही फ़ोन हो सकता है। जब मनोज बाहर होते थे तो वह कॉर्डलेस फ़ोन पास ही रखती थी। मनोज का फ़ोन कभी भी आ जाता है।

"हलो...हलो...आई कैन नॉट हीयर यू"..."हां, आप कौन? ...क्या?..... कैसे?....क्या...." उसके आगे वह कुछ कह नहीं पाई...एक क्षण को वह किंकर्तव्यविमूढ़ सी बैठी रही। पापा को हार्ट-अटैक आया था। कोई महिला थीं फ़ोन पर जिसे वो नहीं जानती थी। शायद पड़ोस में कोई नया आया है। खैर, उसे कल ही निकलना होगा। मनोज भी नहीं थे...वह क्या करे कुछ समझ नहीं आ रहा था। तभी आज पापा इतना याद आ रहे थे उसे। बाहर से अंदर आ गयी मधूलिका। आँखों से पानी बहना शुरु हो गया था। और अब रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। उसने मनोज को फ़ोन किया मगर मनोज अभी सिंगापुर में थे। मीटिंग में बिज़ी होंगे, तभी फ़ोन मेसेज पर गया। मेसेज छोड़ा उसने, “मनोज, इमर्जेंसी है, फ़ोन करो।"

२४ घंटे प्लेन में चौबीस साल जैसे लग रहे थे मधूलिका को। उसे वैसे भी प्लेन का अकेले का सफ़र अच्छा नहीं लगता था, और फिर ऐसी परिस्थिति में उसे सब कुछ जैसे व्यर्थ सा लग रहा था। प्लेन में किसी से कोई बात नहीं की उसने। उसका मन उसे अतीत में ले जा कर बार-बार फॆंक देता था। स्कूल में पापा का उसे पहुँचा आना, उसके कालेज पहुँचने पर उसे लेने आना, जाने कहाँ-कहाँ उसके साथ उसकी स्नातकोत्तर के भर्ती के लिये परीक्षायें दिलवाना, कभी बस उसकी ख्वाहिश को पूरा करने के लिये मम्मी को साथ ले कर आधुनिक सलमान खान की सिनेमा देखने जाना, उसकी कक्षा दसवीं की परीक्षा के बाद उसके साथ गणित का पूरा पर्चा हल करना...। परीक्षायें आते ही वह जाने क्यों बीमार हो जाया करती थी। और हर बार पापा ही उसके साथ होते थे...रात को कई बार पापा उसके साथ जागते भी थे। वैसे बचपन से पापा के साथ उसका रहना बहुत नहीं हुआ था। नौकरी के सिलसिले में पापा सालों बाहर रहते थे। बीच-बीच में आते थे पापा तो जैसे पापा को पाकर वह एक मिनट भी उन्हॆं आँखों से ओझल नहीं होने देना चाहती थी।

पापा अपनी माता जी से बहुत प्यार करते थे। एक दुखद हादसे में उनके माता जी का देहांत हो जाने के बाद पापा के कई सपने पूरे नहीं हो पाये थे। घर में आग लग जाने की वजह से अपनी माँ की अचानक मौत से पापा को उबरने में एक अरसा लगा था। पापा उस वक़्त कई परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे, मगर उस के बाद पापा उन परीक्षाओं को कभी दे नहीं पाए। एक टीचर की नौकरी से ही गुज़ारा होता था। पापा जो भी करते थे हमेशा दिल से। जो कह दिया होता था बस वो जैसे पत्थर की लकीर। बचपन से ही उसे पता था कि अगर पापा ने कहा है तो ज़रूर होगा। पापा को असत् की राह पर चलते नहीं देखा था कभी उसने। उसके आदर्श थे पापा।

२)

दिल्ली एयरर्पोर्ट पर भैया लेने आये थे उसे।  भैया अभी भी वैसे ही लगते हैं। एक साल पहले तलाक हो गया था भैया का। अंदर से टूट चुके थे भैया। अब जैसे एक थकान दिखने लगी थी भैया के चेहरे पर भी...पहले भैया हमेशा हँसते थे, सनग्लासेस, धूप हो न हो, और हमेशा ही जैसे चिल्ला कर बात करते थे। भैया से वह शादी के बाद पहली बार मिल रही थी।  उसकी शादी में भैया अपने ससुराल में थे। भैया ने कहा था कि भाभी की तबीयत खराब हो गई थी और वे आ नहीं पाये थे शादी में। फिर तो दो दिन बाद ही वह ख़ुद चली आई थी विदेश। भैया को देखते ही रो पड़ी वह।  भैया के कंधे के सहारे में कितना सुकूं था।  टैक्सी में भैया के पास बैठ कर फिर आँखों में आँसू आने लगे थे उसके। रुँधी हुई आवाज़ में उसने भैया से पूछा,

“पापा ठीक हो जायेंगे न?”

भैया ने कोई जवाब नहीं दिया।

वह सीधे अस्पताल जाना चाहती थी मगर भैया पहले उसे घर ले कर गये।

“मम्मी कहाँ हैं अभी?”

“घर”

“दीदी कब आईं?”

“वह नहीं आ पाईं हैं, शायद दो-तीन दिन में आयें।“

दीदी का भी मधूलिका को समझ नहीं आता। दीदी उससे ५ साल बड़ी थीं। उसकी शादी के कुछ साल पहले दीदी की शादी हुई थी दुबई में। दीदी की शादी के बाद जैसे पापा जल्दी-जल्दी उसकी भी शादी करना चाहते थे। दीदी अपनी शादी के बाद फिर कभी भी माइके नहीं आई थीं। उसकी शादी में भी नहीं। उसकी शादी में रिश्तेदारों, दोस्तों, सभी ने आश्चर्य प्रकट किया था कि शादी में उसके भाई या बहन कोई भी नहीं आये थे। उसे खुद को बहुत खराब लगा था। गाड़ी में सारा रास्ता जैसे एक मनहूस खामोशी में ही बीता। न भैया ने कोई बात की, न ही उसने। 

घर पहुँच कर उसने माँ के और बूढ़े हो आये चेहरे को देखा और रो पड़ी।  माँ को गले से लगा कर माँ को सांत्वना देने की कोशिश करने लगी वह। माँ की आँखों में आँसू नहीं थे। माँ ने उससे कहा, “खाना खा लो पहले फिर भैया अस्पताल ले जायेंगे तुम्हें, विज़िटिंग आवर्स शाम को ही हैं।“

“माँ ये क्या हो गया...”वो एक बार फिर रो पड़ी थी।

शाम को वह अस्पताल भैया के साथ गई।  माँ सुबह हो कर आईं थीं अस्पताल इसलिये नहीं आईं उसके साथ।  उसने कहा भी माँ से, मगर माँ नहीं आ पाईं उसके साथ। अस्पताल के आई. सी. यू में सिर्फ़ एक आदमी जा सकता था एक वक़्त में। जब उसने डाक्टर से अंदर जाने की इजाज़त माँगी तो पहले से ही कोई विज़िटर पापा के पास था, जिसके वापस आने के बाद ही वह अंदर जा सकती थी। कोई दस मिनट बाद अंदर से एक महिला बाहर निकली। उसे उसने कभी देखा नहीं था पहले। कोई ४५ साल की उम्र होगी उस औरत की, हल्की पीली साड़ी में, लंबे बाल, आकर्षक व्यक्तित्व...एक शब्द में जिसे सुंदर कहा जाये। अंदर पापा के शरीर से लगे कई मशीन, और ट्यूब लगे देख कर वह फिर रोने लगी। पापा ने उसकी तरफ़ देखा और धीरे से उसे और पास आने का इशारा कि या। उसकी बाँह पकड़ कर पापा ने महुत धीमी आवाज़ में कहा,

“बेटा, सफ़र ठीक था?”

“हूँ”

कोई पंद्रह मिनट पापा के हाथ पकड़ कर बैठी रही वह। बाहर आ कर भैया को अंदर भेजा उसने। कमरे से बाहर उसने उसी महिला को सफ़ेद जैकेट पहने डाक्टर से बात करते देखा। कोई डाक्टर होगी शायद वह भी। ऐसा सोच कर वह पापा की तबीयत पूछने आगे बढ़ी। मगर दोनों की बातचीत से उसे लगा कि वह डाक्टर तो नहीं। डाक्टर के साथ उस औरत की बात ख़त्म होने की प्रतीक्षा करती रही वह। बात ख़त्म होने पर उसने आगे बढ़ कर ख़ुद का परिचय डाक्टर से कराया और पापा की तबीयत के बारे में पूछने लगी। उसने ख़याल किया कि वह औरत पीछे मुड़ कर उसे ठहर कर देखने लगी थी। डाक्टर से उसकी बात पूरी होते ही वह औरत उसके पास आई और कहा, “मेरा नाम सुदर्शना है, तुम मधूलिका?”

“जी!, आप को मैंने पहचाना नहीं”

उस औरत ने उसकी ठुड्डी को प्यार से छुआ और कहा,

“बेटा, तुम पापा की जान हो, उनके पास रहो”।

उसने उस औरत की तरफ़ देखा और कहा,

“आप को मैंने पहले तो नहीं देखा है कभी...आप...”

मधूलिका असमंजस में थी।  भैया भी बाहर आ गये थे अब, विज़िटिंग आवर समाप्त हो रहा था। सुदर्शना नाम की वह औरत अब भैया से बात कर रही थी और भैया भी उसके साथ सिर हिला कर हामी भर रहे थे। फिर एक पर्चा दे कर उस औरत ने भैया को कहीं भेज दिया। उसे पापा को एक बार और देखना था। वह आई.सी.यू के अंदर चली गई और पापा के सर पर हाथ फेरने लगी। पापा सो रहे थे। “तुम पापा की जान हो, उनके पास रहो”....शब्द उसके कानों में गूँज रहे थे।

“पापा, आई लव यू”

धीरे से कह कर पापा के माथे को चूम कर वह बाहर आ गई।

बाहर अकेले बेंच पर बैठ कर वह भैया के आने का इंतज़ार करने लगी। अस्पताल उसकी आशा से ज़्यादा साफ़सुथरा था। मगर सभी नर्स बहुत ज़ोर-ज़ोर से बात कर रहीं थी। हँसना, गाना सब ही चल रहा था नर्सों के बीच। आई.सी.यू. के सामने कैसे इतना शोर हो सकता है...। सभी गंभीर मरीज़ होते हैं। भैया दवाइयाँ ले कर आ गये थे। आई.सी.यू. के अंदर जा कर डाक्टर को दवायें दे कर, भैया उसके पास आ कर बेंच पर बैठ गये। 

“पापा को देखा? पापा बहुत याद कर रहे थे तुझे। परसों सुबह बाथरूम में गिर गये। आवाज़ से मैं अंदर गया तो देखा कि पापा अचेत पड़े थे। मैसिव हार्टअटैक आया था। स्ट्रोक नहीं था। उसी वक़्त अस्पताल ले जाना पड़ा...तभी आई.सी.यू...”

“भैया ये सुदर्शना कौन हैं?”

“चल चलते हैं, घर...माँ इंतज़ार कर रही होगी...तू भी तो थकी है”

भैया के साथ गाड़ी में चुपचाप बैठ कर चली आई वह।

रात को माँ के पास सोई थी मधूलिका पर नींद नहीं आ रही थी। पापा की चिंता और ऊपर से जेट लैग। माँ से भी रात में काफ़ी देर तक बात होती रही थी उसकी। सुबह के तीन बज रहे थे अब, माँ सो चुकीं थीं। सुबह आठ बजे फिर होता है विज़िटिंग आवर...उसे उठना भी था जल्दी। घर से अस्पताल कोई आधे घंटे की दूरी पर था। कल अस्पताल से आ कर मनोज को फ़ोन करेगी वह। ऐसा सोच ही रही थी कि फ़ोन की घंटी बजी।  मधूलिका ने फ़ोन उठाया। अस्पताल से फ़ोन था...

“मिस्टर अगरवाल हैड अनदर हार्टअटैक टुनाइट। वी वान्ट सम्वन फ़्राम द फ़ैमिली हियर” ।

अस्पताल में उसी औरत को उसने बेंच पर बैठे देखा। सुबह वाली पीली साड़ी में ही सर झुकाये हुये उस औरत ने सर उठाया। भैया ने लगभग दौड़ कर जा कर उस औरत से पूछा,

“क्या हुआ है”

मधूलिका ने उस औरत को हताश सी खड़े होते देखा और फिर भैया के कंधे पर अपना सर रख कर रोते हुये। पास खड़ी माँ ने एक दीर्घ निश्वास छोड़ी और फिर भैया रोने लगे। सब जैसे एक कहानी सा क्रमबद्ध हो रहा था।  उसे समझ आ गया कि क्या हुआ है। उसे रोना नहीं आ रहा था...या नहीं... बहुत ज़ोर से रोना आ रहा था, नहीं...बहुत तेज़ हँसी आ रही थी, नहीं... शायद चीखने का मन हो रहा था...वह चीख उठी ज़ोर से...और फिर उसे याद नहीं क्या हुआ...सब कुछ धुँधला सा होने लगा था...

३)

दीदी पापा के चले जाने के दो दिन बाद पहुँची थीं। माँ से लिपट कर ख़ूब रोई थी दीदी। उससे भी गले लग कर दीदी ने प्यार किया था। मनोज खबर सुनते ही सिंगापुर से सीधे आ गये थे। मनोज का सहारा कितना सुकून देता है उसे। प्यार की अभिव्यक्ति नहीं रही है कभी मनोज की उस तरह से कभी, पर हमेशा ही ज़रूरत के समय वे रहे हैं पास।  मगर कंपनी का काम ऐसा है कि मनोज बहुत समय भी नहीं दे पाते हैं मधूलिका को। आज ही बस मनोज भी निकल जायेंगे वापस कनाडा। १३ वीं के बाद सभी मेहमान चले गये थे। मधूलिका अभी एक महीने माँ के साथ रहना चाहती है। माँ पापा के बिना कैसे रहेंगी उसे समझ नहीं आ रहा था। जीवन क्षणभंगुर है, कुछ दिन पहले तक ही तो सब कुछ ठीक था। आज अचानक जाने क्या हो गया। सब कुछ कितना व्यर्थ लगने लगा है। आज शाम को मनोज के निकल जाने के बाद वह एकांत में माँ के साथ समय बिताना चाहती है। माँ से ठीक से बात ही नहीं हुई है पापा के चले जाने के बाद। दीदी और जीजाजी आ कर दो दिन बाद ही चले गये थे। पापा के जाने के बाद से ही माँ गुमसुम सी रही हैं। किसी से भी ठीक से बात नहीं की है उन्होंने उसने ध्यान दिया है। आज वो खुल के बात करेगी माँ से। भैया से भी तो ठीक से बात नहीं हुई है उसकी। सभी इतने व्यस्त रहे हैं इन दिनों।

रात को आज पहली बार माँ और भैया के साथ खाना खाया उसने।  “माँ, एक और रोटी ले लो।“ का जवाब माँ ने न दे कर अपना प्लेट उठाया और उठ कर चली गईं। भैया चुपचाप खा रहे थे। मधूलिका पूछ बठी,” माँ को क्या हो गया है भैया? पापा के जाने का सदमा इस तरह बर्दाश्त न कर पाईं तो खुद भी कितने दिन जीयेंगी वो?

भैया ने पूछा, “तू कब जा रही है?”

“अभी एक महीने और रहने का सोच रही हूँ। मनोज भी बाहर बाहर ही रहते हैं। मैं भी जा कर क्या करूँगी वापस। क्यों?”

"नहीं, ठीक है...मैं कल ऑफ़िस ज्वाइन कर रहा हूँ।" भैया ने छोटा सा उत्तर दिया।

रात को मधूलिका माँ के पास सोने आई। उसने देखा माँ बिस्तर पर बैठी कोई किताब सा पढ़ रही थी। कमरे में कुछ अंधेरा सा था। मधूलिका को देखते ही माँ ने वह डायरी छुपा ली। मधूलिका ने आश्चर्य से पूछना चाहा, मगर कुछ सोच कर चुप रह गई। माँ को जा कर उसने प्यार से गले लगाया। माँ के शरीर की ख़ुशबू उसे अभी भी बहुत अच्छी लगती है। गुलाब की सी...बचपन से ही जैसे उसमें रची-बसी हुई है। पर पापा को कहते सुना था उसने एक बार माँ से कि वह साबुन लगा कर नहाया करें। और उसे लगा था कि माँ के शरीर से तो वैसे ही गुलाब जैसी ख़ुशबू आती है, पापा क्यों उन्हें साबुन लगाने कह रहे हैं। पापा हमेशा ही रोबदार रहे थे, बचपन में वह खूब डरती थी पापा से। पर धीरे धीरे उसका वह डर जाता रहा था। पापा कब धीरे-धीरे दोस्त बन गये थे उसके उसे मालूम नहीं चल पाया था। बचपन से माँ को उसने गुड़ाकू लगा कर मंजन करते हुए देखा था। मंजन के बाद माँ के मुँह से गुड़ाकू की ख़ुशबू भी उसे बहुत अच्छी लगती थी। उसने एक बार कहा था पापा से कि वह भी मंजन करना चाहती है गुड़ाकू से। पर पापा ने बहुत ज़ोर से डाँट दिया था उसे। घर में बस माँ ही ऐसे मंजन करती थीं।

वह माँ के गोद में लेट गई। माँ ने उसके सर पर धीरे से हाथ फेरा। थोड़ी देर चुपचाप लेटे रहने के बाद मधूलिका ने माँ से पूछा,

“माँ, मेरे साथ चलोगी? अच्छा लगेगा”

माँ ने उसके सर पर फिर से हाथ फेरा। कहा कुछ भी नहीं।

“कहो न माँ”

माँ ने उल्टा प्रश्न किया,

“तू कैसी है बेटा? मनोज अच्छा लड़का है न? तुझे प्यार तो करता है न?”

मधूलिका ने एक पल चुप रह कर कहा,

“माँ चलो न, खुद ही देख लेना मेरा संसार”। 

माँ ने जैसे एक बड़ी सी सांस ली। बुदबुदा कर कुछ कहा। शायद,

“क्या पता चलता है...”।

अपनी शादी से पहले वह माँ को कई बार ऐसे ही बुदबुदाते सुनती थी, पर उसे समझ नहीं आता था कुछ। फिर माँ ने ज़रा तेज़ आवाज़ में कहा,

“न रे, तेरे पापा यहीं रहे न, उन्हें छोड़ कर कैसे जाऊँ, बता।“ माँ और पापा का प्यार उसे हमेशा ही आदर्श लगा है। वह रो पड़ी। माँ ने फिर उसके सर पर फिर से हाथ फेरा। माँ को पापा के जाने के बाद उसने रोते नहीं देखा था। वह उठ कर माँ के पास बैठ गई। माँ, तुम रोती क्यों नहीं? पापा चले गये माँ। माँ ने उसकी ओर देखा और कहा,

“बेटा, तू अभी रहेगी न?”

“हाँ, माँ”।

अगले दिन सुबह उसने दीदी को फ़ोन किया। दीदी के साथ फ़ोन पर वह रोई और पूछा भी कि वह इतनी जल्दी क्यों चली गईं? दीदी ने कोई जवाब नहीं दिया। मधूलिका बहुत अकेला महसूस कर रही थी। भैया भी ऑफ़िस जा चुके थे और माँ पूजा घर में थीं। साईं बाबा की बड़ी सी मूर्ति के आगे कई सालों से उसने माँ को सर झुकाये जाने कितने-कितने घंटों देखा है। कोई दस साल पहले वह एक मेले से माँ के लिये एक छोटी सी बाबा की मूर्ति उठा लाई थी। वह छोटी मूर्ति अब बढ़ते-बढ़ते बड़ा आदम कद रूप ले चुकी थी। उसे भी साईं के सामने सर झुका कर बड़ी शांति मिलती थी। वह पूजा घर में जा कर माँ के पास बैठ गई। थोड़ी देर बैठ कर फिर माँ के कमरे में चली गई। माँ की अलमारी खोल कर माँ की पुरानी साड़ियाँ देखने लगी।  माँ की अलमारी की गंध उसे बचपन से ही पसंद है। वह बचपन से ही माँ की साडि़याँ टटोलती रही है। अब इन साड़ियों का क्या होगा। कुछ वह साथ ले जायेगी। दीदी ने कुछ भी ले जाने से मना कर दिया है। अलमारी अनमने ढंग से बंद कर वह माँ के बिस्तर पर बैठ गई। माँ का तकिया अपनी गोद में ले कर वह फिर से फूट-फूट कर रो पड़ी। पापा आप क्यों चले गये, पापा। उसके मुँह से बार-बार यही निकल रहा था।

४)

पापा बहुत अच्छे गीत लिखते थे। छोटी-मोटी कवि गोष्ठियों में आना-जाना लगा रहता था पापा का। लिख कर यहाँ-वहाँ छोड़ देते थे और मम्मी उन्हें उठा कर रख देती थीं। कई बार दीदी ने उनके लिखे कुछ गीत अपने स्कूल में गा कर पुरस्कार भी जीते थे। मधूलिका मगर कभी गा नहीं पाई। न ही उसे कभी कविता या गीतों में दिलचस्पी रही। वह कवियों को गाते सुन कर ज़ोर से हँस पड़ती थी। हर बात पर उसे अनायास ही हँसी आ जाया करती थी। किसी गंभीर चलचित्र के गंभीर दृश्य में हो रहे नाटकीयता को देख कर अचानक ही वह ठहाका लगा कर हँस उठती थी। पापा उसे डाँटते थे कि हर चीज़ का एक वक़्त होता है, हँसी और ठिठोली का भी। वह पापा की डाँट सुन कर चुप हो जाया करती थी।

आज देर तक रो कर जैसे उसे शांति मिली। माँ के बिस्तर पर माँ की गंध, पापा की याद....माँ का तकिया सीने में ले कर बैठी रही थी वह...बहुत देर तक। थोड़ी देर बाद तकिये को वापस अपनी जगह पर रखा उसने। हाथ में एक किताब की छुअन से उसकी तंद्रा भंग हुई। तकिये के नीचे से काली रंग की डायरी खींच निकाली उसने। ओह! माँ यही तो कल पढ़ रहीं थीं। क्या है उस डायरी में? उत्सुकता से उसने उस डायरी को उलट पलट कर देखा। पुरानी सी उस डायरी को उलट कर देखने में उसमें से एक छोटा सा पर्चा गिर गया। पर्चा मुड़ा हुआ था, चार हिस्सों में। उसने धीरे से उस पर्चे को खोला तो एक पेन्सिल स्केच था, किसी औरत का। उसे बहुत पहचाना सा मालूम हुआ। ’सुदर्शना’! यह तो सुदर्शना थीं। आज से १० साल पहले ऐसी ही लगती होंगी। सुदर्शना कौन है, वह तो उनके बारे में भूल ही चुकी थी। फिर से यह सवाल उसके मन पर दस्तक देने लगा। सुदर्शना कौन है? और यह पेन्सिल स्केच तो पापा की बनाई हुई लगती है। पापा की बनाई पेंटिंग या स्केच वह झट से पहचान सकती है। उन ही के साथ तो बड़ी हुई है वह। पापा ने क्यों बनाई होगी सुदर्शना की स्केच। कौन है सुदर्शना? डायरी के पहले पन्ने को खोल कर पढ़ा उसने, लिखा था- “कभी अगर हो सके तो तुम्हें ही अर्पित होगा यह, सुदर्शना- ’सुदर्शना को’।“ अगला पन्ना उसने डरते-डरते खोला। पापा का कोई नया रूप स्वीकारने को तैयार नहीं था मधूलिका का मन। कौन है सुदर्शना?

डायरी के अगले पन्ने पर एक गीत था- ’गीत मेरे तुम्हें ही अर्पित...’। पूरी डायरी में कोई सौ गीत थे। पापा इतना अच्छा लिखते हैं उसने कभी सोचा नहीं था। न ही उसने कभी पापा के गीतों को ध्यान से पढ़ा था। आज पहला गीत पढ़ कर उसे पापा पर गर्व हो आया। पापा की तो किताब आनी चाहिये थी। क्यों उसने कभी ध्यान नहीं दिया? या किसी ने भी ध्यान नहीं दिया घर में? डायरी में लिखे हर गीत को पढ़ना चाहती थी वह। उत्सुकतावश उसने डायरी के सारे पन्नों को एक साथ पलटा। डायरी के आखिरी पन्ने पर एक लिफ़ाफ़ा दबा मिला उसे। पापा के नाम था लिफ़ाफ़ा। लिफ़ाफ़े को उत्सुकतावश खोला मधूलिका ने। लिफ़ाफ़े के अंदर से दो चिट्ठियाँ मिलीं उसे। चिट्ठियों को खोल कर पढ़ना चाहती थी वह। किसने लिखी होंगी यह चिट्ठियाँ पापा को? एक चिट्ठी खोल कर पढ़ने लगी वह। चिट्ठी थी पापा के नाम। सुंदर मोती जैसे, थोड़े बड़े अक्षरों में लिखी हुई चिट्ठी। किसकी है? संबोधन था, ’प्रियतम’। उस चिट्ठी के अंत में हस्ताक्षर देख कर उसका दिल डूबने लगा। “आपकी सुदर्शना”। पापा को लिखी थी सुदर्शना ने चिट्ठी, प्रियतम के संबोधन से। एक अनजान क्रोध सा जैसे उसके दिमाग पर छाने लगा। उसने उन कुछ पंक्तियों को जल्दी से पढ़ डाला।

प्रियतम,

आपसे जाने अब मिल पाऊँ या नहीं। अरुणिमा और अरुण से हमें वह सम्मान नहीं मिल सकता जिस की हम अपेक्षा करते हैं। आपसे दूर जा रही हूँ...सच, क्या कभी जा भी सकती हूँ? मधूलिका अभी छोटी है। हमारा रिश्ता कोई भी तो नहीं समझ पाया। १६ साल की उम्र में मैं उससे यह उम्मीद नहीं करती कि वह समझे। उसे एक चिट्ठी लिखी है। जब भी उचित समझें उसे पढ़वा दें। छोटी मम्मी कहलवाने की इच्छा रह गई मेरी बच्चों से।

आपकी सुदर्शना

सुदर्शना की दूसरी चिट्ठी खोल कर जल्दी-जल्दी पढ़ने लगी मधूलिका। उसे सुदर्शना ने क्यों चिट्ठी लिखी थी? आज से १० साल पहले। उसके हाथ चिट्ठी को पढ़ते हुये अनजाने ही काँप रहे थे।

प्रिय मधूलिका,

अभी तुम छोटी हो इसलिये तुमसे कुछ कहना या तुमसे यह उम्मीद करना कि तुम इस चिट्ठी को समझ पाओगी बहुत ज़्यादा होगा। यह चिट्ठी पापा जाने कब तुम्हें पढ़वायें। हो सकता है तुम तब बड़ी हो चुकी हो।

तुम मुझे नहीं जानती हो। तुम्हारी दीदी और भैया को पता है मेरे बारे में और वे मुझे पसंद नहीं करते। मधूलिका, मैं तुम्हारी छोटी मम्मी हूँ। पापा ने मुझसे शादी की है। हाँ, तुम्हारे माँ के होते हुये भी, उन्होंने मुझसे शादी की। समाज एक ऐसी चीज़ है जो हमें मुखौटा ओढ़ने को बाध्य करती है। फिर परिवार, उनके सम्मान से ज़्यादा सबके सामने अपना सम्मान और "मेरी ज़िदंगी कितनी अच्छी है, सब पर्फ़ेक्ट है" यह दिखाने की कोशिश होती है मानव मन की सबसे पहले। मेरी ही ज़िंदगी की कमियाँ थीं कुछ, जिस वजह से शायद तुम्हारे पापा के साथ भावनात्मक संबंध हो गया। उनसे मिलने के बाद मुझे अहसास हुआ कि किस तरह एक ऊँचे उसूलों के पक्के आदमी हैं वे। जिस तरह तुमने अपने पापा का सम्मान किया है, मैं भी उतना ही सम्मान करती हूँ उन्हें, और यह कोई नई बात तो नहीं, उनका व्यक्तित्व ही ऐसा है। तुम्हारी माँ एक बहुत अच्छी महिला हैं, जिन्हें तुम्हारे पापा ने सम्मान किया। एक चाह रह जाती है मन की...और वही शायद पूरी हुई तुम्हारे पापा की मेरे साथ। बस इतना ही। तुम्हारे पापा के साथ मिलने के बाद कुछ स्थितियाँ ऐसी आईं कि तुम्हारे पापा ने मुझसे समाज से बाहर आकर शादी की। तुम्हारे पापा मुझे समाज में सम्मान देना चाहते थे। अगर संभव होता तो शायद मैं बाक़ी की ज़िंदगी उनके साथ गुज़ारती। आज यह पत्र क्यों लिख रही हूँ मैं, इसकी वजह है- तुम अपने पापा की ज़िंदगी में बहुत अहम् हो, और तुम्हारा इस सब को जानना मुझे ज़रूरी लगता है। रिश्ता कभी समाप्त नहीं होता, न ही भावनायें मरतीं हैं।

तुम पापा की जान हो। वे कहते हैं कि उन्होंने किसी से इतना प्यार नहीं किया जितना तुमसे किया है। कभी-कभी तुम्हारी शादी हो जायेगी तो कैसे रहेंगे वो, यह भी चिंता करते हैं। और फिर यही कहते हैं कि तुम एक अच्छे घर में जाओ और खुश रहो, यही उनकी ख्वाहिश है।  मैं कोई नहीं इसे कहने वाली मगर, तुम बहुत खुशनसीब हो जो तुम्हें ऐसे पापा मिले। बस एक बात अगर समझ सको... कि वे पापा हैं, और अपने बच्चों के आदर्श...मगर फिर भी इंसान हैं। थोड़ी छूट तो इस बात की मिलनी चाहिये न उन्हें भी?

मेरी बहुत इच्छा थी कि तुम मेरी दोस्त बन सको। पर हमारे रिश्ते की वजह से शायद यह संभव नहीं। तुम मुझसे बात करोगी तो शायद तुम्हारी माँ का असम्मान हो। मगर हाँ, तुम्हें कभी लगे कि तुम मेरे से बात करके शांति पा सकती हो तो झिझकना नहीं...तुम मेरी बहुत प्रिय हो।

तुम्हारी,

छोटी मम्मी

पापा का सम्मान जैसे अचानक ही कम होता नज़र आने लगा उसे अपनी आंखों में। आज भैया के घर आने पर वह उनसे बात करेगी।

५)

“भैया आपसे बात करनी है”। रात को सोने जाने से पहले उसने भैया से कहा। भैया बहुत थके लग रहे थे। मगर बात करना ज़रूरी था। वरना वह आज रात सो नहीं पायेगी। जीवन भर सो नहीं पायेगी। यह एक ऐसी गुत्थी है जो वह कभी खुद नहीं सुलझा पायेगी।

“हाँ बोल”। का छोटा सा उत्तर दिया भैया ने।

“बात कुछ गंभीर है भैया, समय लगेगा।“

“हम्म्म, क्या बात है?”

“भैया यह ...यह सुदर्शना क्या बला है? कौन है यह औरत?” उसके मुँह से बात जैसे छूट गई। असम्मान के साथ कही हुई अपनी बात पर उसे दु:ख नहीं था।

भैया ने एक पल को उसे देखा और कहा, “उनके लिये सम्मान से बात करो छोटी। वे तुमसे बड़ी हैं और माँ जैसी”। मधूलिका को भैया छोटी ही कहते थे।

मधूलिका चुप हो गई। फिर कहा, "मगर यह है कौन? पापा ने शादी की उससे और माँ का असम्मान किया। उसका कैसे सम्मान करूँ?”

भैया ने उसे डाँट कर कहा, “जिस बात को पूरा नहीं जानती हो, उसके बारे में कुछ कहो नहीं। बस इतना जान लो कि उस औरत की ही वजह से आज मैं ज़िंदा हूँ और माँ का समाज में सम्मान है। माँ कभी माफ़ न करें उन्हें मगर हम बच्चों को उनसे असम्मान से बात करने का कोई अधिकार नहीं। तुम जो थोड़ा जानती हो अब उनके बारे में, तो बस वहीं तक जानो। इससे आगे मुझसे और बात नहीं करना।“ यह कह कर भैया अपने कमरे में चले गये।

मधूलिका ने भैया को इतने गंभीर रूप में कभी नहीं देखा था। उसे जानना था उस औरत के बारे में। किसे मालूम है उसके बारे में। कब मिले पापा उस से? कैसे? क्यों शादी कर के भी शादी नहीं की होगी पापा ने उससे? और वह खु़द भी तो विवाहिता थी फिर क्या वजह थी कि वह अपने पति को छोड़ नहीं पाई। यह कौन सी पहेली है? उसे लग रहा था कि उसका दिमाग़ फट जायेगा। अचानक उसका सर ज़ोर से दर्द करने लगा। कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा था। माँ के साथ नहीं सोयेगी आज वह। सभी जैसे एक नाटक कर रहे हैं। उस से तो बरसों से छुपा कर रखा सबने इतना बड़ा राज़। सब जैसे पराये लगने लगे थे उसे। वैराग्य सा उत्पन्न होने लगा था उसके मन में। अपने कमरे में जा कर लेट गई मधूलिका।

सुबह दीदी के फ़ोन की घंटी से उसकी नींद खुली। अचानक उठ कर उसे पिछले दिन की सारी बातें याद आ गईं। पापा का चला जाना और फिर यह सब... मधूलिका को सब जैसे एक सपना जैसे लगने लगा। दीदी की आवाज़ सुनते ही जैसे सब टूट पड़ा। वह ज़ोर से रो पड़ी।  उधर से दीदी की आवाज़ आ रही थी, "क्या हुआ छोटी? सब ठीक है न? माँ कैसी हैं?" मधूलिका ने अपने को संभाला और रोते रोते ही कहा, सब ठीक है...यह सुदर्शना कौन है दीदी? पापा ने उससे शादी की थी? पापा ने माँ को छोड़ दिया था? यह कौन है?" दीदी की आवाज़ बंद हो गई। और फ़ोन कट गया। मधूलिका बिस्तर पर बैठ कर रोती रही। पाँच मिनट बाद दीदी का फ़ोन फिर आया। मधूलिका ने ही फ़ोन उठाया। दीदी धीमी आवाज़ में कह रहीं थीं, " छोटी, सोचती हूँ अगले हफ़्ते आ जाऊँ। माँ के लिये मन ख़राब हो रहा है। और तुझसे कई बातें भी करनी हैं।"

एयरपोर्ट पर भैया ही गये थे दीदी को लेने। मातम पर मातम छाया हुआ था। पापा ने माँ को धोखा दिया? मगर क्यों? और वह औरत? वह जब शादीशुदा थी तो फिर क्या वजह थी? सवालों की लंबी कतार जमा हो रही थी उसके दिमाग में। सब का हल मिल जाये उसे।

६)

दीदी से उसकी बहुत दोस्ती नहीं रही थी बचपन से ही। दीदी भले ही उस से सिर्फ़ ५ साल बड़ी थीं मगर व्यवहार कई साल बड़ों जैसा करती थीं। हर बात पर सलाह देना और उसके हर काम पर निगरानी रखना जैसे दीदी अपना कर्तव्य समझती थीं। दीदी पापा जैसी गंभीर प्रकृति की थीं। बचपन में भी दोनों साथ कम ही खेले थे। भैया के साथ उसकी ज़्यादा दोस्ती रही थी जब कि भैया उससे ७ साल बड़े थे। दीदी के शादी के एक दो साल पहले जैसे दीदी अचानक ही सबसे बेज़ार सी हो गईं थीं। बात करना और कम कर दिया था उन्होंने घर में किसी से भी और अक्सर ही अपने काम में व्यस्त रहने लगी थीं। उनकी शादी के एक ही साल बाद मधूलिका की भी शादी हो गई थी और फिर उसमें और दीदी में बहुत कम संपर्क रहा था। वह कनाडा आ गई थी और दीदी दुबई में थीं। फ़ोन पर भी कभी-कभार ही बातचीत होती थी दोनों में।

सारा दिन ऐसे ही बीता। एक अजीब सी ख़ामोशी में। वह दीदी से जो पूछना चाहती थी, पूछ नहीं पा रही थी। रात को माँ के अपने कमरे में चले जाने के बाद मधूलिका अपने दीदी के साथ कमरे में सोने गई। बचपन से ही दोनों इस कमरे में सोते थे, एक साथ। भैया का कमरा अलग था और काफ़ी सालों से पापा बाहर वाले कमरे में बिस्तर लगा कर सोते थे। मधूलिका कभी-कभी माँ के साथ सो जाया करती थी उनके कमरे में। मधूलिका ने ही बात शुरु की। "दीदी, सुदर्शना कौन है? पापा की डायरी से उनकी तस्वीर मिली, पापा की बनाई हुई, और उनका एक ख़त मेरे नाम। पापा ने उनसे शादी की थी? कब? और मुझे यह सब पता नहीं चला, कैसे? क्या आपको पता था?"

दीदी उसके पास आकर बिस्तर पर बैठ गई। प्यार से उसके पीठ पर हाथ रखा और कहा, "छोटी तू बहुत ख़ुशनसीब है जो तुझे इन बातों का पता नहीं चला। मेरे बचपन का ख़ून हो गया था पापा के इस रिश्ते की वजह से।"

"क्या बात थी दीदी? पापा का कोई ऐसा रिश्ता था यकीन नहीं होता। पापा जो मम्मी को इतना प्यार करते थे...फिर कैसे?"

दीदी बताने लगीं। "उस रात को मैं भूल नहीं सकती जब सुदर्शना का फ़ोन आया था माँ के पास। बहुत गुस्से में थी वह और माँ से अनाप-शनाप बोल रहीं थीं। उसका पापा से कोई झगड़ा हो गया था और वह गुस्से में माँ से बोल रही थी कुछ। मुझे ठीक से कुछ समझ नहीं आया था। माँ ने बाद में मुझे बताया था कि सुदर्शना पापा की दोस्त थीं। उस वक़्त सिर्फ़ चिट्ठी-पत्री का संपर्क था दोनों में। माँ को उनके पत्रों के बारे में पता था। किसी पत्रिका के ज़रिये दोनों की मुलाकात हुई थी। मगर बात बढ़ते-बढ़ते भावनात्मक संपर्क तक पहुँच चुकी थी और पापा ने एक दिन माँ से कह दिया था कि यह रिश्ता दोस्ती से बढ़ कर हो गया है।" मधूलिका हैरानी से यह सब सुन रही थी। माँ दीदी की हमेशा ही करीब रहीं थीं। माँ जब १७ साल की थीं, तभी दीदी हो गईं थीं। उम्र के कम फ़ासले की वजह से माँ और दीदी सहेली जैसी थीं।

"मगर चिट्ठी-पत्री का रिश्ता भला कितना मज़बूत हो सकता होगा, यही सोचा था माँ ने भी शायद।" दीदी बता रहीं थीं। "मुझे याद है माँ बहुत रोईं थीं और पागलपन की हद तक हरकतें की थीं उन्होंने। मैं उनके बीच में नहीं पड़ना चाहती थी। मेरा दिमाग जैसे काम ही नहीं कर रहा था। मगर फिर मैंने पापा को माँ को मनाते हुये भी सुना था अपने कमरे से। सब कुछ सामान्य हो गया था उस दिन और मुझे लगा था कोई आंधी आ कर चली गई मगर हमारा घर बच गया। पापा और मम्मी को लड़ते या माँ को इस तरह की हरकतें करते कभी नहीं देखा था मैंने पहले, वह भी मेरे सामने। यह उस गर्मी की बात है जब तू और भैया राजकोट बुआ के घर गये हुये थे।"

"फ़ोन के दिन की घटना के बाद फिर धीरे-धीरे बातें सामान्य हो गईं। माँ को और मुझे लगा कि सब ठीक हो गया। पता नहीं फिर कैसे पापा और उस औरत में फिर बात शुरु हुई होगी। दो-तीन महीने सब ठीक चला था। तब तो तुम सब भी घर में ही थे, किसी को कुछ पता नहीं चला। मुझे याद है, पापा एक दिन माँ को डाक्टर के पास भी ले कर गये थे। अल्ट्रासाउंड के लिये। मैं समझ रही थी कि माँ क्यों जा रही हैं अल्ट्रासाउंड के लिये। दिल में डर था कि कहीं फिर मुझे शर्मींदगी न उठानी पड़े, पर फिर एक हर्ष भी था मन में कि माँ और पापा का अगर इस तरह रिश्ता अच्छा होता है तो यह कोई गलत नहीं। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ था। एक दो महीने बाद मैंने माँ को फिर तनाव में देखा था। और उस दिन पापा के लिये लिखी एक चिट्ठी मेरे हाथ में पड़ गई थी। सुदर्शना की चिट्ठी। मुझे उस चिट्ठी को पढ़ कर यकीन हो गया था कि पापा और सुदर्शना में सिर्फ़ ’दोस्ती से बढ़ कर’ नहीं, उस से भी बढ़ कर रिश्ता है। सुदर्शना और पापा मिल चुके थे और उन्होंने मिल कर शादी भी की थी। मगर घिनौनी बात मुझे यह लगती थी कि सुदर्शना पहले से शादीशुदा थी और पापा भी हम सब के साथ थे। कैसे कोई औरत अपने एक पति के रहते दूसरे से शादी कर सकती है। क्या वह शादी हुई?"

कुछ असंजस की स्थिति थी, कुछ किंकर्तव्यविमूढ़ सी मधूलिका खुद को सम्हालने की सी कोशिश कर रही थी। पापा का किसी और औरत से भावनात्मक संपर्क या शारीरिक संपर्क, कुछ भी सहन नहीं हो पा रहा था उसे। पापा तो उसके आदर्श रहे थे। यह कैसे हुआ होगा। क्या आश्चर्य है कि दीदी पापा से नफ़रत करती हैं और उनकी मृत्यु के समय भी नहीं आईं थीं। दीदी के आंखों में आँसू थे और जैसे यह सब बताते हुये वह होश में नहीं थीं। जिस बात को वह कभी किसी से कह नहीं पाईं और जिस बात के लिये उन्हें हमेशा ही शर्मिंदगी का अहसास रहा, आज वह बाँध खुल रहा था। स्वाभाविक था कि प्रवा्ह बहुत तेज़ था।

"मैं आज भी उस औरत से घृणा करती हूँ और पापा से नफ़रत। कुछ साल बाद मेरी शादी हो गई और मैंने तय कर लिया कि मैं अब माइके नहीं आऊँगी। माँ की खबर मिल जाती थी कि वह ठीक हैं तो मैं भी संतुष्ट हो लेती थी। माँ ने बहुत सहा है। उन्होंने पूरी ज़िंदगी दे दी हमारे लिये, पापा के लिये, और क्या मिला उन्हें? कुछ नहीं।" दीदी रो रहीं थीं।

७)

भैया की शादी दीदी के शादी के एक साल पहले हुई थी। भैया ने खुद ही लड़की पसंद की थी और घर में उस बात को लेकर बहुत तनाव था। माँ इस शादी के खिलाफ़ थीं मगर पापा ने उनकी शादी के लिये हां कर दी थी। भाभी और भैया इलाहाबाद में रहते थे और कभी-कभी ही आना जाना होता था उनका। भाभी के तौर तरीके महंगे थे और उनके आने से माँ में और भाभी में तनाव हो जाता था। भैया-भाभी ने बाद में आना और कम कर दिया था। सभी भाभी को दोषी ठहराते थे। मधूलिका की शादी के वक़्त भाभी बहुत बीमार थीं। फिर बाद में सब ठीक हो गया था। अभी एक साल पहले भैया का तलाक भी हो गया था। उसे इस तलाक की वजह ख़ास नहीं पता थी...कितना कुछ था जो उसे मालूम नहीं था अपने ही परिवार के बारे में। वह भैया से कैसे पूछे कि सुदर्शना का वह क्यों और किस तरह सम्मान करते हैं। क्या बात है।

सुबह माँ से छुपा कर उस डायरी के कुछ और पन्नों को उलट पुलट कर कुछ ढूँढने की कोशिश करने लगी मधूलिका। सिर्फ़ पापा की कवितायें और गीत मिले उसे उस डायरी में। कई प्रेम गीत भी जो कि समर्पित थे सुदर्शना को। “जानता हूँ जगत मुझसे दूर होगा, पर तम्हारे संग कुछ पल चाहता हूँ।“ पापा के गीतों में प्रसाद जी की छाया देखने को मिलती थी। गीतों के ही बीच मिली पापा की लिखावट में मधूलिका को कुछ और पंक्तियाँ। "वही जो मैं नहीं कहता, और तुम हमेशा कहती हो मुझे कहने के लिये। कह नहीं पाया सुदर्शना कभी, पर सच में मैं तुमसे...अब वही बस जो मैं नहीं कहता।"

पापा का यह रूप असहनीय था मधूलिका के लिये। फूट-फूट कर रोने लगी मधूलिका। धुंधले हुये अक्षरों के बीच अचानक ही पीछे से कंधे पर किसी के हाथ के आश्वासन की छुअन से वह चौंकी। पीछे मुड़ कर देखा तो माँ थीं। माँ की आंखों में देख कर जैसे वह ख़ुद को रोक नही सकी, लिपट कर माँ से रो पड़ी। माँ ने उसके सर पर हाथ फेरा और कहा, "बेटा मुझे कोई ग़म नहीं, बहुत कुछ ले लिया था इस औरत ने पर बहुत कुछ त्यागा भी है इस औरत ने। आज तुम्हारी माँ जिस सम्मान के साथ हैं समाज में, यह भी उसके लिये और अपने संसार का सुख जो खो दिया मैंने वह भी इसके लिये। आज बच्चे मेरे हैं वह भी इसके लिये और बच्चों ने जो सहा वह भी इसके लिये। क्या दोष दूँ और किस बात का ऋण उतारूँ।“ माँ पत्थर सा बोल रहीं थीं। मैं बिस्तर पर तकिया ले कर बैठ गई। और माँ भी पास ही बैठ गईं।

"सुदर्शना शादीशुदा थी। तुम्हारे पापा से उम्र में काफ़ी छोटी। पहले दोनों में पत्राचार शुरु हुआ था। सब कुछ ठीक ही था, मैंने भी बहुत ध्यान नहीं दिया था, मगर बाद में तुम्हारे पापा ने कहा कि वह उससे प्रेम करते हैं। बाद में दोनों की शादियाँ रहते हुये भी शादी कर ली थी दोनों ने छुप कर कहीं मिल कर। एक औरत पर क्या बीतती है जब कोई दूसरी औरत उसका घर छीन ले और पति का प्यार उसके लिये उतर जाये, यह वही समझ सकती है जिस पर गुज़री हो। ऐसी पीड़ा, ऐसा दंश और ऐसा अपमान मौत भी सोचने को मजबूर करता है। मैंने भी कोशिश की थी। जीने का कोई उद्देश्य नज़र नहीं आता था। कई बार लगा ज़हर खा लूँ, कई बार पुल से छलांग लगाने की भी सोची, पर फिर तुम लोगों का चहरा याद कर के कुछ नहीं कर पाई। औरत बीवी बाद में, पहले माँ होती है। मेरे बिना तुम लोगों का क्या होगा, यही सोचती थी मैं। तुम्हारे पापा को भी वापस पाने की कोशिश बहुत की थी मैंने। तुम्हारी दीदी भी रोती थीं। उसकी तबीयत भी इसी वजह से ख़राब रहने लगी थी। सुदर्शना से बात कर के मैंने सोचा था कोई हल निकालूँगी। मगर उससे बात करते ही मेरा पारा चढ़ जाता था। मैं कभी भी उससे ठीक से बात नहीं कर पाई। मेरा भरापूरा संसार छीन लिया था उसने मुझसे, और कभी भी उसे इस बात की ग्लानि नहीं हुई। तुम्हारे पापा के जाने के वक़्त भी वह साथ रही उनके। उनके जाने से पहले तुम्हारे पापा ने ही दी थी मुझे यह डायरी। सुदर्शना के लिखे ख़त हैं इसमें और उनकी भी लिखी कुछ चीज़ें। तुम न जानो सब तो ही ठीक है छोटी। मुझे थोड़ी देर अकेला रहने दो अब...थक गई हूँ।"

मधूलिका उठ कर चुपचाप चली गई थी। मगर उसकी माँ को उसने एक लिफ़ाफ़े में से कुछ पर्चे निकालते हुये देखा। लगता था ख़ाली वक़्त में उसकी माँ उन चिट्ठियों को ही पढ़ा करती थीं। सुदर्शना की यह चिट्ठियाँ, डायरी के कुछ पन्ने, उस डायरी में मुड़े रखे थे। कब और क्यों भेजे होंगे उसने पापा को, कैसे आई होंगी पापा के पास ये चिट्ठियाँ उसे नहीं मालूम था।

८)

"यह तीसरा साल था हमारे रिश्ते का। समाज की नज़रों में नाजायज़, कलंकित। उनके मुझसे समाज में शादी कर स्थान देने के वादे के दो साल पूरे हो चुके थे। मगर वह शादी अभी भी दूर थी, दूर कि? ...जाने कैसी-कैसी शंकाओं से मन भर उठता था। उन पर विश्वास था मगर नियति पर तो नहीं। शुभस्य शीघ्रम कहते हैं मगर यह उन्हें नहीं समझ आता था। हाँ, शादी के बिना भी हम एक दूसरे के थे। आपस में तो शादी की ही थी हमने। गुरुदेव का दिया सिंदूर लगाया था उन्होंने मुझे, एक बार नहीं, बार-बार...मेरे ही कहने पर, जितनी बार मिलते उतनी बार। कहीं मन को यह तसल्ली रहती है कि दुल्हन हूँ उनकी, कोई अवैध संबंध नहीं, सच्चाई है मगर एक छुपी हुई सच्चाई जिसे बारे-बार सिंदूर लगवा कर मैं सिद्ध करना चाहती हूँ। सिर्फ़ शरीर नहीं, मन, आत्मा सब उनके लिये है, उन्हीं का है। समाज में नहीं है कुछ भी मान्य, जिस स्थति में हैं वे या मैं। हाँ, अवैध ही तो कहलायेगा हमारा संबंध। मेरे समाज के लिये बने-बनाये एक पति हैं जिनसे मेरा कोई संपर्क नहीं है, न शारीरिक, न मानसिक। मगर साथ हैं हम। उनकी शारीरिक असमर्थता की वजह से हम में कभी कोई संपर्क बन ही नहीं पाया। मगर समाज में सम्मानित औरत होने का जामा ओढ़े रखा मैंने। और दोष किसे दूँ। ख़ुद ही कभी हिम्मत नहीं हो पाई कि अलग हो जाऊँ, अलग हो कर अपना अस्तित्व खोज सकूँ। वहीं, उनका अपनी पत्नी के साथ अब कोई संपर्क नहीं, न शारीरिक, न मानसिक मगर फिर भी वे साथ हैं उनके, समाज में चाचा-चाची और बच्चों के माता-पिता. बन कर। किसे पता है कि हमने शादी की है। हाँ, उनकी पत्नी और मेरे समाज के पति को पता है। हम ने ही बताया है, छुपा कर नहीं रख सके, न छुपाना चाहते थे। मगर न उनकी पत्नी ने उन्हें छोड़ा है, न मेरे पति ने। अलग होने की प्रक्रिया हम दोनों साथ ही शुरू करेंगे, यही सोचा था। अच्छा नहीं लगता, कभी-कभी लगता है अलग ही हो जाऊँ, कैसे भी रह लूँगी, पर नहीं, मैं अकेले रह जाऊँगी...अकेले देखा है मैंने मीरा दीदी को। इस उम्र में अकेले रहती हैं, कितनी अकेली हैं। कम से कम समाज में तो हैं हम साथ जहाँ मैं अकेली नहीं हूँ। उनकी शादी-शुदा ज़िंदगी अच्छी थी। ऐसा कहते हैं वो। प्रेम नहीं हो पाया उन्हें उनकी पत्नी से मगर पत्नी के धर्म का पालन किया उनकी पत्नी ने पूरी तरह। और वासनासिक्त रातों में इनका भी पूरा योगदान रहा, दोनों के दो बच्चे हुये। भरा पूरा संसार हुआ मगर फिर भी मानसिक मिलन नहीं हो पाया उनका। कहाँ कमी रह गयी क्या मालूम। मेरी बात और थी। मेरे पति ने कभी भी पति की ज़िम्मेदारी या पति धर्म का पालन नहीं किया, नहीं कर पाये और फिर अपनी कमी को ठीक करने की कोशिश भी नहीं की। ’माँ’ कहे कोई, इस चाह में ही जीती रही। फिर धीरे-धीरे उम्र हो गई और उस चाह में दबा दर्द बीच-बीच में बाहर आने लगा, गले में जैसे एक गाँठ पड़ जाती और सब बंद हो जाता। सामने सिर्फ़ एक गहरा कुँआ...दूर तक फैला रेगिस्तान और फिर चिलचिलाती धूप में सिर्फ़ प्यास दिखती...जीवन भर की एक अनबुझी प्यास। और इसी बीच वे मिले थे, कहीं दूर से जैसे एक भीगी हवा ने छू लिया था। पहली बार मिल कर ही सिन्दूर और माला बदल कर शादी की थी हमने। कोई शहनाई नहीं, कोई बाराती नहीं, न ही घराती मगर उनके पूज्य गुरुदेव की तस्वीर और मेरे विश्वास के आगे हुई थी शादी। शादी के बाद मिलन भी। मिलन के बाद विरह और विरह में ब्रह्म्चर्य। फिर साल में कुछ दिनों का मिलन और फिर विरह....एक नियम सा हो गया था।"

सुदर्शना....सुदर्शना....यह नाम ....ज़हर बन कर उतर गया था आरती की ज़िंदगी में। अपने पति के मुँह से ही उनकी प्रेमिका की जीवनी सुनना...उसकी सफ़ाई के किस्से सुनना... पोर-पोर में जलन और घृणा भर देता था...मगर उत्सुकता और शरीर की जलन के बीच सुनतीं थी वह.. चुपचाप। "सुदर्शना गरीब घर की बेटी है... माँ-बाप ने शादी की उसकी और देखो उसका भाग्य कि फिर शादी के तुरंत बाद उसे पता चला कि उसके पति पतिधर्म का पालन नहीं कर सकते। पति को डाक्टर दिखाने में वो असक्षम रही। उसके पति अपने काम और बाहरी चीज़ों में डूबे रहते हैं।  समाज और माता-पिता की सम्मान के लिये वह फिर पति को छोड़ नहीं पाई है। समाज बहुत बड़ा बंधन होता है, और औरत चाहे कितनी ही स्वतंत्र हो, उसके लिये हिम्मत कर पाना बहुत आसान नहीं होता। बाहर निकल कर अकेले रह जाने का डर इंसान को समझौते करने पर मजबूर कर देता है। फिर उन्हीं स्थितियों में वह अपने आप को ढाल लेता है और खुश रह लेता है"। सिखाई-पढ़ाई बातों को एक हल्की तनी मुस्कान के साथ सुना करती थी वह...अपने पति से। सुदर्शना एक दिन के लिये भी शादीशुदा नहीं थी, इस बात पर कभी विश्वास नहीं किया था उसने। और जाने कितने झगड़ों और तनाव भरे थे वे साल। कोई ऐसा भी वादा कि बच्चों की शादी निपटा कर फिर अपने समाज में स्थान देंगे उस औरत को। दो साल का समय... । अरुणिमा के साथ भी क्या नहीं गुज़री। वह दिन जिस दिन उसने सुदर्शना का अपने पिता को लिखा एक पत्र पढ़ लिया था। अरुणिमा की आत्महत्या की कोशिश और उसकी पहली मुलाकात उस औरत के साथ...अस्पताल में। सुदर्शना का रोना और इनका उसे सबके सामने डाँटना...कितना सुकून दे गया था उसके दिल को... कुछ अपमानजनक शब्द भी कहे थे उस औरत को। बेटी को मौत के मुँह में देख कर उस औरत पर ही उबल पड़े थे वे। आह! जलन पर ठंडक पड़ गई थी जैसे... कैसे रह पाई थी फिर भी वह औरत वहाँ? उसने भी तो अपमानित किया था पति का सहारा पा कर उसे.... उसका हाथ पकड़ कर उसे बाहर निकालने की कोशिश भी की थी अस्पताल से, मगर वह औरत नहीं गई थी वहाँ से। वह पढ़ी-लिखी और अच्छे पद पर काम करती थी मगर इस सब अपमान को सह रही थी। अगली सुबह अरुणिमा के होश आने पर ढोंग के आँसू बहा कर कह गई थी वह, "मैं माँ नहीं बन पाई इस जनम में... यही बच्चे मेरे बच्चे हैं, इन्हें कैसे दुख दे सकती हूँ मैं। एक बार अगर बच्चे मुझे माँ के रूप में अपना लें और छोटी मम्मी कह दें तो मैं कभी फिर कुछ नहीं माँगूँगी।" और उस समय उसे गाली देने में कितना संतोष का अनुभव हुआ था आरती को कि वह इस जन्म तो क्या किसी भी जन्म में माँ नहीं बन पायेगी और छोटी मम्मी तो दूर की बात उसे कोई उसके नाम से भी नहीं पुकारेगा। मगर अचरज हुआ था उसे जब ये उस औरत का हाथ पकड़ कर निकल गये थे सबके सामने से, बाहर...। क्यों? इतनी फटकार के बाद फिर से? उफ़!...अपमान का घूँट पी कर रह गईं थी वह...एक आशा की किरण फिर से मिट गई थी, घुप्प अंधेरे में गुम....मगर किसी बात का ग़म नहीं था उसे, न उस औरत के अपमानित होने का, न अपने अपमानित होने का। उस औरत ने जो किया न उस का रंज रहा था अब और न ही अपने व्यवहार का।  जीवन के नाटक में सब अपना-अपना किरदार निभाते हैं, कोई सही नहीं होता, कोई गलत नहीं। किसे दोषी ठहराया जाये? उसके बाद उनके पति दो दिन घर नहीं आये थे। सुदर्शना से फिर मुलाक़ात नहीं हुई उसकी। मगर सुदर्शना और इनके संबंध टूटे नहीं थे इसका आभास तो था ही उसे। कभी-कभी अपने ही पति से यह भी सुनने को मिलता कि उन दोनों की निभ नहीं पायेगी...ये खुद ही बताते थे और उसकी उम्मीद जग जाती थी. और फिर दो दिन बाद यह सुनना कि सिर्फ़ प्रेम ही है कि मैं उसे छोड़ नहीं पाता... और यही प्रेम उसे रात भर काटता था।  इस तरह की बातें किस तरह किसी बीवी को आहत करती होंगी...बीवी भी कहाँ रह गईं थी वो अब...बच्चों के लिये वे इसी घर में रहे...पर कभी नहीं आये उसके पास..."पाप तो तब होता जब मैं उसके पास भी रहता और तुमसे भी संपर्क रखता....यह पाप कैसे हुआ?" अस्पताल जाने से पहले सुदर्शना की लिखी कुछ चिट्ठियाँ दी थीं उन्होंने पढ़ने को। पढ़ने की हिम्मत नहीं थी उसकी उस समय। पति के चले जाने के बाद उसने उन्हें पढ़ा। सुदर्शना को माफ़ नहीं कर सकतीं वह, कतई नहीं....मगर....

९)

"आज अरुण की फिर तबीयत खराब है। पेट में दर्द है फिर। डाक्टर समझ नहीं पा रहे हैं क्या हुआ है। उनके ऊपर खूब प्रेशर हो जाता है जब उनके बच्चे बीमार होते हैं। मधूलिका या अरुणिमा को भी ज़रा सा कुछ होता है तो बेचैन हो जाते हैं। कहीं मुझमें आसरा ढूँढते हैं। कह दूँ कि हाँ सब ठीक हो जायेगा तो जैसे आश्वस्त हो जाते हैं कि सब ठीक हो जायेगा। मैं समझती हूँ कि ये कभी मेरे पास सबको छोड़ कर नहीं आ पायेंगे। उनके बच्चे उनकी जान हैं, और होना भी तो चाहिये। अरुणिमा ने ऐसी हरकत की कि मुझे अब डर हो गया है। बच्चे ठीक रहें, मेरा क्या है, हम दोनों की तो उम्र हो चुकी है, पर यह अरुण क्यों बीमार रहने लगा है, उसके कभी पेट तो कभी पीठ में दर्द होता है, सब ठीक रहे बस यही चाहती हूँ। कल ये बहुत उदास थे।" अरुण ठीक तो हो जायेगा न?" मैंने उन्हें कहा था, "हाँ बाबा, कुछ नहीं हुआ है उसे। सब ठीक है। मुझ पर विश्वास है न? बस..." वो एक क्षण को आश्वस्त हो गये थे। पर फिर चिंता की रेखायें घिर आईं थी उनके चेहरे पर। मगर मैंने उनका सर प्यार से अपने सीने पर रख लिया था। फिर हमारी दुनिया एक हो गई थी, और हम एक दूसरे के।"

अरुण की बीमारी के दिन याद हैं आरती को। पेट दर्द की शिकायत से बात शुरु हुई थी। थकावट और पैर में सूजन की वजह जानने के लिये डाक्टर ने जब टेस्ट किये थे तो किडनी की खराबी की आशंका बताई थी उनहोंने। उसे भी तो मौका मिल जाता था बच्चों की बीमारी को लेकर अपने पति को ताने देने का कि वो बच्चों को खो देंगे एक दिन अपने अवैध रिश्ते के चक्कर में और इस तरह अपने पति के क़रीब भी आना चाहती थी वो। अरुण की बीमारी को लेकर जाने कितने अस्पताल के चक्कर काटने पड़े थे उन दोनों को। उसकी उम्मीद थी कि इस तरह शायद उनका संबध ठीक ही हो जाये। भगवान जो कुछ करता है अच्छे के लिये ही। बच्चे की बीमारी की वजह से अगर सब ठीक हो जाये तो क्यों नहीं। उसे याद है जब अरुण को डायलीसिस के लिये डाला गया था। और डाक्टर ने कहा था कि अब सिर्फ़ किडनी ट्रांसप्लांट ही अरुण को जीवन दे सकती है। कोई २ महीने बाद ट्रांसप्लांट हुआ था उसकी किडनी का और वह मौत के मुँह से बच कर आया था। अरुण की बीमारी ने उसके पापा की उम्र १० साल जैसे और बढा दी थी। वह खुद भी निढाल हो गई थी।

"किडनी का मैच मिल जाये भगवान, मैंने उन्हें आश्वस्त किया है कि अरुण ठीक हो जायेगा, मेरी लाज रख लेना भगवान। परिवार में किसी का मैच क्यों नहीं मिल पाया..."

"आज अस्पताल से आये मुझे एक महीना हो गया। सब ठीक लग रहा है। डाक्टर ने खाना भी सामान्य ही खाने को कहा है। मेरे पति मेरी तरफ़ अब देखते नहीं, उनकी मर्ज़ी के खिलाफ़ यह किया मैंने। पर फिर भी साथ हैं हम एक ही छत के नीचे। अरुण के पापा भी तो नहीं आ पाते हैं इस घर में। वरना मेरा खयाल रखते ज़रूर। मेरे किडनी देने की बात हमने छुपाई हुई है। मधूलिका की माँ को नहीं पता है। बस अरुण और वे ही जानते हैं कि किडनी की डोनर मैं हूँ। अरुण का शरीर मेरी किडनी को स्वीकार ले बस...। मैं आज काफ़ी अच्छा महसूस कर रही हूँ। थकावट भी कम है और आज उनसे डेढ़ घंटे फ़ोन पर बात हुई। अरुणिमा के लिये रिश्ता भी आया है कोई, बता रहे थे वो। अब अरुणिमा और मधूलिका की शादी हो जायेगी तो फिर हम भी शायद एक हो सकें..."

"आज मधूलिका की शादी को भी दो महीने हो गये हैं। अरुणिमा की शादी के बाद वो एक बार भी माइके नहीं आई है। अरुण की प्रेमिका शुरु से ही पसंद नहीं थी मुझे। आज भी शायद अरुण खुश नहीं उसके साथ। आज उन्होंने कहा, बच्चों की शादी ही तो बस ज़रूरी नहीं है न रानी। उनकी मम्मी को घर भी तो देना होगा। मैं जानता हूँ न, वो नहीं रह सकेंगी कहीं और... न माइके, न ससुराल...सबके बीच अपमान सह कर...तुम समझा करो...बताओ क्या तुम्हें ही अच्छा लगेगा ऐसे, मैं अगर ज़िम्मेदारी न निभाऊँ तो?

"मैंने सोच लिया है अब नहीं मिलूँगी उनसे कभी...प्रेम त्याग भी तो है...’साहित्यिक प्रेम’...मज़ाक उड़ाती रही मैं ’त्याग’ को यही कह कर हमेशा, पर अब यही करना है...आप खुश रहें...मैं तो हूँ ही एक ज़िंदगी में..." 

आरती कई बार पढ़ चुकी है सुदर्शना के लिखे हुये शब्द उफ़! यह अहसान तो नहीं लेना चाहेंगी वह कभी भी किसी से। बच्चे उसके हैं। माँ का गर्व उसका है...कोई और नहीं ले सकता यह हक़ कि जीवन दे उसके बच्चों को। और त्याग...किसका...उस औरत का...इसे समझें ठीक से कि उसके पति की बेवफ़ाई को...? और बेवफ़ाई किसके साथ? उसके साथ कि सुदर्शना के साथ?  मगर सुदर्शना आज भी अपने पति के साथ है...तो उसका चरित्र...? मगर जीवन दिया है उसने उसके अरुण को...बिना स्वार्थ ...क्या सच ही बिना स्वार्थ या फिर किसी आशा के साथ...? यह स्वार्थ कि एक सही मायनों में शादीशुदा जीवन जीये, शायद आगे चल कर माँ भी बन सके... आदमी को उसके बच्चों से प्यार दिखा कर उसे अपने बस में करने का ब्रह्मास्त्र...!

मगर...जीवन दिया है उस औरत ने अरुण को,  उसके अरुण को...ऋणी हैं उसकी वह...

"मधूलिका...एक बार एक चिट्ठी लिख देना उसे...तू और अरुण मिल आओ एक बार...छोटी मम्मी से...छोटी मम्मी ..."

उफ़! नहीं...! यह नहीं होने देगी वह....कभी नहीं...जीवन के बदले जीवन ठीक है...मगर...उसके पति की विवाहिता और उनके बच्चों की माँ होने का सम्मान बस उसका है...बस उसका...हमेशा...।

---मानोशी

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