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तुगलक के नाम एक पत्र / व्‍यंग्‍य / शशिकांत सिंह ’शशि’

हुजूर की खिदमत में बंदे का आदाब

हुजूर ज़ान की मुआफी मिले तो कुछ अर्ज करूं। नहीं...नहीं ज़ान का डर आपसे नहीं है आपके बंदों से है। आपके बंदे तो, बाप रे,हर बात पर बेंत निकालते हैं। तो जनाब मैं अर्ज कर रहा था कि आपने अपने समय में जो मुद्रा बंद की थी, उसका मज़ाक आज तक लोग उड़ाते हैं। हमने कहीं पढ़ा है जनाब की आपने सोने की मुद्रा ’दीनार’ और चांदी की मुद्रा’ ’अदली’ चलाई थी लेकिन बिना किसी तैयारी के उसे अचानक बंद कर दिया। आपके दुश्‍मन बताते हैं कि आपने सुना कि चीन में कागज के और फारस में चमड़े के सिक्‍के चलाये गये हैं तो आपने तांबे का सिक्‍का चला दिया। तांबे का सिक्‍का चला दिया तो चला दिया आपने अपना आदेश वापस क्‍यों लिया ? हुज़ूर, यह एक अच्‍छे सुल्‍तान के लक्षण नहीं हैं। आपको चाहिए था कि सारे विरोध करने वालों का सिर कलम करा देते। उन्‍हें राजद्रोही, बेईमान, घुसपैठिये आदि घोषित करके जेल में डाल देते। बादशाह होने का अर्थ है कि आदमी अकेला अक्‍लमंद हो और बाकी के सारे बेअक्‍ल और बदजात। ताकत का अर्थ ही है हुजूर कि आदमी अपनी पूंछ में खुद आग लगा ले और सारी लंका जला दे यदि कम पड़े तो अयोध्‍या भी फूंक दे।

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हमने माना कि तांबे के सिक्‍के नकली बनने लगे। वह तो बनेंगे ही हुजूर आखिर नकली करेंसी बनाना भी हुनर है और हुनरमंद लोग कभी भूखों नहीं मरते। तांबे का सिक्‍का नकली इतना अधिक बाजार में आ गया कि आपने उसे बंद कर दिया। बस यहीं मात खा गये आप। आपको सारे राज में मुनादी करानी चाहिए थी कि अच्‍छे दिन आने वाले हैं लोग इंतजार करें। जो भी हो रहा है वह इंशा अल्‍लाह मुल्‍क की हिफाजत के लिए ही हो रहा है। उसके बाद किसी की नानी मरती जो आपकी शान में जुबान भी खोलता। आवाम पर आपने नशा नहीं चढ़ाया था हुजूर नहीं तो आपकी मात नहीं होती। गली-कूचे वालों के लिए महलों को दाव पर लगाना अक्‍लमंदी नहीं मानी जाती जहांपनाह। आपको चाहिए था कि तांबे के सिक्‍के चलने देते और दीनार तथा अदली केवल अपने अमीर मित्रों को चुपके से बंटवा देते। गरीब का क्‍या है हुजूर। आज मरा कि कल मरा। जी से जाये जंजाल छूटे। तांबे का सिक्‍का लेकर उन्‍हें भटकने देते मस्‍जिद से मजार तक और आप अपने अमीर दोस्‍तों के साथ शतरंज खेलते। जनाब आवाम को तो एक जोशीली तहरीर दे दीजिये, मुल्‍क के नाम पर कुर्बानी मांग लीजिये, आंखों में आंसू भरकर मुआफी मांग लीजिये, उनके खू़न में उबाल आ जाता है। उनका तो हर महीना ही रमजान है, उनके लिए चिंता का क्‍या करना उन्‍हें तो बस झोंके रहिये वतन की रहगुजर में और आप आसमानों की सैर कीजिये। कहना सुनना है तो बहुत है जहांपनाह पर आप हमारी सुनेंगे ही क्‍यों ? आपके बंदों ने सुन लिया तो गालियां और गोलियां दोनों मिलेंगी। मेरे लिए कहिये खुदा हाफिज।

शशिकांत सिंह ’शशि’

जवाहर नवोदय विद्यालय शंकरनगर नांदेड़ महाराष्‍ट्र, 431736

मोबाइल-7387311701

इमेल- skantsingh28@gmail.com

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