बुधवार, 25 जनवरी 2017

अमरपाल सिंह ‘ आयुष्कर ’ की लघुकथाएँ

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स्टेटस

कार में बैठते हुए मिसेज शर्मा ने अदा के साथ अपने भावी समधी की तरफ आँखें फेरी। नो डाउट मिस्टर शुक्ल ! आपके बेटी की ब्यूटी माडलों जैसी है , गाती भी अच्छा है ,पेंटिंग ,सिलाई आई मीन ! सारे गुण हैं , एक अच्छी हाउस वाइफ के। आखिर मेरे बेटे की पसंद है ? पर अफ़सोस बहुत फर्क है हमारे और आपके बीच। शादी में इतना मैनेज कर पायेंगे आप ?......मेरा मतलब ......बुरा मत मानियेगा आप ! दरअसल .....बड़े बेटे की बारात फाइव स्टार होटल में ....अच्छी व्यवस्था की थी , बड़ी बहू के घरवालों ने। और आप तो जानते हैं मेरे रिश्तेदारों को ? आपसे क्या छुपा ....अच्छा चलती हूँ , सोचियेगा ,ये तो बच्चे हैं , वक्त के साथ –साथ सब समझ जायेंगे ,जिम्मेदारी तो हमारी और आपकी बनती है कि इन्हें समझाएं , क्या इनके भविष्य के लिए सही है......और ये स्टेटस का फर्क ....आई थिंक .....कहते हुए मिसेज शर्मा कार में बैठ गयीं।

भीतर आकर शुक्ल जी की नज़र अपने फटे जूते ,बिस्तर पर बिछी , सिली हुई चादर के अलावा शुक्लाइन की बुझी हुई आँखों पर भी पड़ी। अचानक शुक्ल जी ने तकिये को उठाकर चद्दर के सिले भाग पर रख दिया ,जूते को टांड पर टिका ,पत्नी की आँखों पर अपने सख्त हाथों को , गीले मन से रख दिया।

तभी पत्नी की भर्रायी आवाज़ ने उन्हें चौंका दिया –“ रहने भी दो शुक्ल जी ! क्या-क्या ढकोगे ? ढंकने से हम मिसेज शर्मा बन जायेंगे क्या ?

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हम

रिंगटोन बजते ही अनुराधा का हाथ तेज़ी से फ़ोन की तरफ़ बढ़ा। उसकी सहेली निशा का था। ओह नो ! निशा तुम , हम तो समझे कि मंत्री जी का फ़ोन है। तुमने अखबार में तो पढ़ा होगा न। हमें चुनाव .....अरे दुआ कर , जीत जाऊँ। नि शा ने रुआंसे स्वर में कहा –“ ज़रूर जीतोगी .....अनुराधा।” मैं बहुत परेशान हूँ। नरेश की वहशियाना हरकतें। माँ जी की किचकिच और ....बात को बीच में काटते हुए –“ अरे यार ! एक बात तो तुझे बताना भूल ही गयी। हम लोग शॉपिंग सेंटर खोलने जा रहे हैं , मेन मार्केट में। मौका पाकर निशा बोली –“ मैं तुमसे मिलना चाहती थी ,एक तुम्ही हो जो .......” और हाँ ! क्या कहा तुमने .....एक सेकण्ड न्यूज़ देखो ! स्लम एरिया में मेरा कार्यक्रम था , आज वही टेलीकास्ट हो रहा है .....

अच्छा ऐसा है कि तुम थोड़ी देर बाद फ़ोन करो …..वो मंत्री जी का फ़ोन आ रहा है न ...अरे हाँ ! मैं तो पूछना ही भूल गयी , तुम कैसी हो ?

फोन कट चुका था। उंह ...जल गयी होगी ....अनुराधा ने रिसीवर पटक दिया। बेमतलब .............न जाने क्या मिल जाता है लोगों को खुद फोन करके काटने में ?

बुके

चौराहे की लाल बत्ती पर रुकते ही , फूलों पर पड़ी मेरी नज़र को वो भांप गया और तेज क़दमों से चलते हुए मेरे पास तक आ गया –

“ ये लो सर जी बिलकुल ताज़े फूल हैं, कितने चाहिए ? कितने में दोगे ये वाला ? बोल पड़ा - पांच सौ , में दोनों बुके दे दूंगा ,ले लीजिये ना साब , ज्यादा नहीं बोला है। “ दो सौ में देना हो , तो दे दो दोनों , ग्रीन लाईट होने वाली है ..”!

मेरे इन शब्दों को सुन उसका मुँह लटक गया। फिर खुद को सहेजते हुए बोला - अच्छा ले लीजिये गुलाब और रजनीगंधा दोनों , आखिरी दाम , साढ़े चार सौ , दोनों दे दूंगा !

तभी मेरी नज़र उसकी पसीने से तरबतर सख्त हथेली पर बंधे, मैले कपडे की तरफ फिसल गयी ....उसने फिर निगाह भांप ली , कुछ नहीं सर जी, कल रात ढाबे पर बर्तन धोते समय कट गया था थोड़ा। ओह ! तो कुछ दवा ली .....? वो जोर से हँसा - कहाँ सर जी ! सुबह से लोग सिर्फ मोलभाव ही करके चले जाते हैं ,दोपहर होने को आई। सुबह जब ताजे थे तो इनके दाम ज्यादा थे ,यह कहकर किसी ने नहीं लिया। अब मुरझाने लगे तो लोग भाव पूछकर आगे बढ़ जाते हैं .....मैं तो समझ ही नहीं पाता साब ! “ फूल को धूप और गरमी सुखा रही है या आप जैसे बड़े लोग .......| ”

अच्छा जी आती हूँ अभी .....

कितना सब्र करूँ हद हो गयी , जबसे रिटायर हुए हैं बौरा गए हैं। न खुद चैन से बैठते हैं न बैठने देते हैं। अरे ! क्यों इतना प्रेमगीत गाये जा रही हो ? मैं तो बस बाज़ार चलने के लिए बोल रहा था। साथ चलती तो अच्छा लगता ,बीमार शरीर को शुद्ध हवा मिल जाती ,मन बहल जाता थोड़ा। वैसे भी पूरी उम्र नौकरी की भागमभाग ने तुम्हारे साथ बैठने का मौका कहाँ दिया ? पूरी उम्र मेरी तीमारदारी में लगी रही , हर बात पर –‘ बस अभी आती हूँ ...........अभी आई ...’ अपने बारे में कभी सोचा तक नहीं ......उम्र भी सरक कर कहाँ आ गयी ,पर तुम आज भी वहीँ की वहीँ रुकी हो। पति दीनानाथ की बात सुनकर कमला शरमा गयी। जाने भी दीजिये आप भी।....अरे अच्छा सुनो ! अगर बाज़ार नहीं चलना तो ना चलो , मेरा एक काम ही कर डालो बैठे –बैठे .....इतना सुनते ही कमला बोल उठी बोलिए न क्या काम है ?दीनानाथ बीमार पत्नी के कंधों पर हाथ रखते हुए बोले –“ तुम यहीं दालान में बैठो , आता हूँ।” थोड़ी देर बाद दो कांपते हुए हाथ ट्रे को मजबूती से पकड़े , अपनी ज़िन्दगी की तरफ़ चले आ रहे थे। कमला बोल पड़ी - अरे ! ये क्या आपने बनाया ? सच में सठिया गए आप ....बोलिए न क्या यही काम था ... ? दीनानाथ जी ने मुस्कुराते हुए हाँ ! अब तुम बैठो और मेरे हाथ के बनाये गरम –गरम पकौड़े और चाय का स्वाद लो और हाँ ! वो तुम्हारा वाला डायलॉग अबसे मैं बोला करूँगा – “अच्छा जी आता हूँ ,बस ....अभी आया।

पूरी दालान मुस्कुराने लगी थी , कमला के सकुचायेपन को देखकर।

कारीगर

घुरहू ने बड़े जतन से महराजिन अम्मा के घर की एक –एक ईंट जोड़ी थी।

दिल्ली से पूरे दस साल बाद काम सीखकर लौटा हूँ महराजिन अम्मा ! मिस्त्री के काम में पारंगत हो गया हूँ। बाप - दादा मजूरी करते - करते सिधार गए , कला ना आई। परदेश जाने से बचते रहे। कहते - कहते घुरहू ने महराजिन अम्मा का घर बनाने का ठेका ले लिया। रसोईघर घर बनाने में तो उसे महारत हासिल थी। दिल्ली में जो कुछ भी उस्ताद से सीखा था , आज महराजिन के घर उन सब को उतार देने पर आमादा था। गृहप्रवेश और समय ने रसोईघर को इज़ाजत दे दी - खुशबू और प्यार परोसने की। अरे वाह ! आज क्या पकाऊँ नयी रसोई में अम्मा जी ? बहू की आवाज़ सुन अम्मा भी रसोई तक आ गयीं। आंखें मटकाते हुए बोलीं - “बिलकुल सिनेमा माफिक रसोई बनायी है घुरहुआ ने। बाप का हाथ मिल गया विरासत में इसको !”

लोगों से अपने बनायी कला का गुणगान सुन , घुरहू फूला ना समा रहा था। बार –बार अपनी पत्नी रमिया के आगे अपनी हथेलियाँ चूमता , बोलता जाता –“ दादा से मिली ये कला ...भगवान भी ..अपरम्पार है लीला उसकी , बहुत बड़ा कारीगर है वो ! “ पत्नी ने तपाक से पूछ लिया – “ चलो दिखा के लाओ फिर अपनी कला ....बिना देखे कैसे जानूं अपने मरद की कारीगरी। वो तो टोले वालों की जलती मुस्कान से थोड़ा समझ जाती हूँ ..पर एक बार अपनी आँखों देख तो लूं दिल को ठंढक पहुंचेगी।” घुरहू महराजिन के द्वार पर खड़ा था , भीड़ के बीच सकुचाया -सा। लोग जब तारीफ करते तो हाथ जोड़ मुस्कुरा देता। तभी छोटी बहू नज़र आयीं। घुरहू ,रमिया को लेकर महराजिन के घर में दाखिल हुआ। एक –एक बारीकी दिखा कर , गौरवान्वित महसूस कर रहा था ..बोला-“ ई का अभिन रसोई देखना ......कहते हुए बोल पड़ा –

“ मालकिन ऊ हमार मेहरिया हमारा काम देखा चाहत है रसोई का ....”

सुनते ही छोटी बहू के कान गरम हो गए। तेजी से कुछ सोचते हुए रसोई की तरफ भागीं ...घुरहू चिल्लाया कुछ जल गया का मालकिन ....? तेज क़दमों से लौटी छोटी बहू बोल पड़ी – “ इ लो मोबाइल पर फोटो देख लो अपने मरद के कारीगरी की “

घुरहू की पत्नी रमिया नम आँखे नीचे किये हुए बोल पड़ी – “ मैं तो इनसे कबसे बोल रही थी मालकिन - भित्तर छुआ जायेगा तो महराजिन अम्मा परान ले लेंगी।” घुरहू बुदबुदाया - कहता था ना ......भगवान भी , ..अपरम्पार है लीला उसकी....बहुsssssते बड़ा कारीगर है वो !

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अमरपाल सिंह ‘ आयुष्कर ’

जन्म :    1  मार्च

ग्राम- खेमीपुर, अशोकपुर , नवाबगंज जिला गोंडा , उत्तर - प्रदेश

दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान ,कादम्बनी,वागर्थ ,बया ,इरावती ,प्रतिलिपि, सिताबदियारा ,पुरवाई ,हमरंग आदि में रचनाएँ प्रकाशित

2001   में बालकन जी बारी संस्था  द्वारा राष्ट्रीय  युवा कवि पुरस्कार  

2003   में बालकन जी बारी -युवा प्रतिभा सम्मान

आकाशवाणी इलाहाबाद  से कविता , कहानी प्रसारित

‘ परिनिर्णय ’  कविता शलभ संस्था इलाहाबाद  द्वारा चयनित

मोबाईल न. 8826957462 mail- singh.amarpal101@gmail.com

2 blogger-facebook:

  1. सभी लघुकथाएँ एक से बढ़कर एक है। बहुत बढ़िया।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत -बहुत धन्यवाद मैंम ....

    उत्तर देंहटाएं

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