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विज्ञान-कथा / नया नौकर / कल्पना कुलश्रेष्ठ

श्रीमती जयराम दोनों हाथों में सिर थामे चिंतित-सी बैठी थीं। कल रात तक सब कुछ ठीक था, पर आज सुब जब वे उठीं तो देखा कि घर का नौकर रामू कुछ सामान के साथ गायब था। पिछले एक वर्ष में वे तीन नौकरों से हाथ धो बैठी थीं। पहला नौकर गिरीश उनके आदेशों की अवहेलना करता और उलटे-सीधे जवाब देता था। अतः दो-तीन माह में ही उसे हटाना पड़ा। दूसरे नौकर श्याम की चोरी से दूध पीने और चीनी खाने की आदत थी, इसलिए वह भी नहीं टिक सका और आज रामू.......।

सहसा कुछ सोचती हुई वे उछल पड़ीं।

‘मुझे यह पहले क्यों नहीं सूझा?’ वे बुदबुदाई और अपने पति प्रोफेसर जयराम की प्रयोगशाला की ओर चल दीं। प्रोफेसर जयराम सुविख्यात रोबोट वैज्ञानिक थे। रोबोट के विषय में वे नित नए अनुसंधान करते रहते थे। उस समय भी वे किसी रोबोट के सर्किट ठीक करने में लगे थे कि श्रीमती जयराम वहाँ पहुँच गईं।

‘‘सुनिए जी, मुझे घर के कामकाज के लिए एक रोबोट चाहिए जो चोरी न करे और मेरे आदेशों का पूरी तरह पालन करे’’ उन्होंने अपनी इच्छा जताई।

प्रोफैसर जयराम ने उनकी ओर देखा, वे अपनी जिद से हटने वाली स्त्री नहीं थीं।

‘‘तुम रोबोट के साथ निभा नहीं पाओगी। अच्छे से अच्छा रोबोट भी एक बच्चे के बराबर बुद्धि नहीं रखता। हमेशा बड़बड़ाने और ऊटपटाँग बोलने की तुम्हारी आदत कभी भी तुम्हें नुकसान पहुँचा देगी। बुद्धिरहित होने के कारण रोबोट तुम्हारे व्यर्थ वार्तालाप में से उचित व सार्थक बातों का चुनाव नहीं कर सकेगा’’ उन्होंने पत्नी को समझाने का प्रयत्न किया।

‘‘देखा जी, मुझे हर हाल में एक आज्ञाकारी रोबोट चाहिए’’ वे अपने निर्णय पर अडिग थीं।

‘‘ठीक है! यह तुम्हारे आदेशों का पूरी तरह पालन करेगा, पर इससे काम करवाने में सतर्कता बरतना, क्योंकि यह तुम्हारी हर बात अक्षरशः मानेगा।’’ प्रोफेसर जयराम ने एक रोबोट उनके हवाले कर दिया।

घरेलू नौकर के रूप में रोबोट लेकर, वे प्रफुल्लित मन से घर लौट आई। गुदगुदे बिस्तर पर लेकर उन्होंने चाय बनाकर लाने का आदेश दिया।

अगले दो-तीन दिनों में उन्हें लगा कि उनका निर्णय बिल्कुल सही था। रोबोट सचमुच बेहद आज्ञाकारी था और मनुष्य न होने के कारण उसमें मानव सुलभ खल प्रवृत्तियों के होने का तो कोई प्रश्न ही नहीं था।

लेकिन?

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उस दिन वे स्नानगृह में थीं कि दरवाजे की घंटी बजी। ‘‘देखना रॉबी! कौन है?’’ उन्होंने पुकारा।

रोबोट का घरेलू नाम उन्होंने रॉबी रख दिया था। रॉबी ने आकर श्रीमती चावला के आने की सूचना दी तो वे कुढ़ गई। नित्य ही उनके दो-ढ़ाई घंटे बरबाद करने श्रीमती चावला आ धमकती थीं।

‘‘उस खूसट औरत को बैठक में ले जाओ, मैं आती हूँ’’ गुस्से में बुरी तरह भिन्नाते हुए उन्होंने रॉबी से कहा।

रॉबी ने आकर श्रीमती चावला को बैठक में ले जाने का उपक्रम किया।

‘‘नहीं, मैं यहीं ठीक हूँ। मेमसाब से कहो जल्दी आएँ, बाजार जाना है’’ उन्होंने कहा।

‘‘मेमसाब न कहा है कि उस खूसट औरत को बैठक में ले जाओ, मैं आती हूँ।’’

रॉबी ने अपनी घरघराती मशीनी आवाज में श्रीमती जयराम का कथन अक्षरशः दोहरा दिया।

आश्चर्य से श्रीमती चावला का मुँह खुला का खुला रह गया.... और फिर वह तू-तू मैं-मैं हुई कि श्रीमती जयराम उन्हें समझाते-समझाते हाँफ गइर्ं। बड़ी कठिनाई से वे श्रीमती चावला के दिमाग में यह बात बिठा पाइर्ं कि उन्होंने दरअसल उन्हें ‘खूबसूरत औरत’ कहा था, ‘खूसट औरत’ नहीं। पानी चलने की आवाज में रॉबी से सुनने में भूल हुई होगी।

उस दिन के बाद वे रॉबी के विषय में सावधानी बरतने लगीं।

एक दिन शाम को रसोई में कार्य करते समय उन्होंने कूड़ादान रॉबी को थमाया।

‘‘कूड़ा पीछे वाली गली में फेंकना।’’ ‘‘जी!’’ रॉबी कूड़े लेकर चल दिया। सहसा उन्हें पति की चेतावनी याद आई तो उन्होंने फिर समझाया, ‘‘किसी आते-जाते को देखकर फेंकना, ऐसे ही मत फेंक देना।’’

थोड़ी देर बाद ही पिछली गली से चिल्लाने की आवाजें आने लगीं। वे दौड़कर गइर्ं तो देखा एक आदमी कूड़े से सना खड़ा है।

‘‘ये क्या रॉबी?’’ उन्होंने डाँटा।

‘‘आपने कहा था, किसी आते-जाते को देखकर फेंकना’’ रॉबी का प्रत्युत्तर था।

‘‘उफ!’’ उसकी बात सुनकर वे सिर पकड़कर बैठ गइर्ं। इस मूर्ख रॉबी से कैसे काम लें? उन्हें और भी सावधान रहना होगा। क्या सचमुच रोबोट मनुष्य का विकल्प नहीं है? उन्हें अपने निर्णय के औचित्य पर संदेह होने लगा। और उस शाम तो अति हो गई। उन्हें तेज बुखार हो गया था, ऊपर से जनवरी की कड़कड़ाती सर्दी। वे लिहाफ में लेटी आराम कर रही थी। रॉबी उनके आदेशानुसार घर का काम निबटा रहा था। ‘रॉबी! स्टैंड साफ कर देना’, ‘रसोई का फर्श अच्छी तरह धोना’ या ‘बर्तन धोकर गंदा पानी फेंक देना’ जैसे नपे-तुले आदेश देना भी कमजोरी के कारण उन्हें भारी पड़ रहा था। काश! रॉबी में मनुष्यों की तरह थोड़ी-सी भी बुद्धि होती तो इन्हें इतना सिर न खपाना पड़ता। वे सोच ही रही थीं कि रॉबी फिर आ खड़ा हुआ।

‘‘ये पानी कहाँ फेंकूँ मेमसाब? आपने नहीं बताया’’ उसी चिर-परिचित मशीनी आवाज में रॉबी ने पूछा तो उन्हें बुरी तरह गुस्सा आ गया और झुँझलाकर वे अपनी आदत के अनुसार बोल पड़ीं, ‘‘मेरे सिर पर।’’ कहते ही उन्हें तत्क्षण अपनी भूल का आभास हुआ। परंतु तब तक देर हो चुकी थी। भूल-सुधार का अवकाश ही कहाँ था? रॉबी ने तुरंत बाल्टी का ठंडा और गंदा पानी उनके सिर पर उड़ेल दिया। उनकी सहनशक्ति अब सीमा पार कर चुकी थी। उन्हें विश्वास हो गया था कि मनुष्य का स्थान कभी भी रोबोट नहीं ले सकता।

दस दिन बाद जब स्वस्थ होकर वे बिस्तर से उठीं तो सबसे पहला काम उन्होंने यही किया कि प्रोफेसर जयराम को रोबोट वापस कर दिया और......

‘‘इससे तो इन्सान ही भले’’ मन ही तौबा करती वे नया नौकर रखने की बात करने श्रीमती चावला के यहाँ चल दीं।

 

(विज्ञान कथा - जनवरी - मार्च 2017 से साभार)

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