हिंदी में पद्यान्वित श्रीमद्भगवद्गीता - 2 / शेषनाथ प्रसाद

भाग एक (अध्याय 1 से 3 यहाँ पढ़ें)


 

चौथा अध्याय

[कृष्ण कहते हैं कि मैं यह कोई नया योग नहीं कह रहा हूं. इसे मैंने पहले सूर्य से कहा था. आज उसे तुझसे कहा. यह सुन अर्जुन आश्चर्य में पड़ गए. यह कैसे संभव है.
कृष्ण ने उन्हें पुनर्जन्म के होने की बात बताई. कहा-जब लोक में धर्म का क्षय और अधर्म की बढ़ती होती है तब मैं अपने को पुनः रचता हूँ.
मैं संसार का कर्ता हूं. पर तू मुझे अकर्ता जानो. कर्म, अकर्म और विकर्म क्या हैं तू इसे जान ले. विद्वानों को भी इसके निर्णय में भ्रम हो जाता है.
सच तो यह है कि कर्म एक स्वाभाविक किया है. पर न उसमें न उससे प्राप्य फल में कोई आसक्ति रहे तभी वह कर्म कहलाता है.
कर्म करें, न करें, इस संशय में रहने वाले व्यक्ति नष्ट हो जाते हैं. तू अपना संशय ज्ञानरूपी खड्ग से काटकर योग का आश्रय लो और उठो, युद्ध करो. कर्म और यज्ञ समत्वबुद्धि से करने पर कर्म किसी के लिए बंधन-कारक नहीं होता.]

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‘‘भगवान ने अर्जुन से कहा कि यह कर्मयोग पहले मैंने सूर्य से कहा था. अब इसे तू सुन.

श्री भगवान ने कहा
इस अक्षीण योग को मैंने कहा विवस्वान से था
विवस्वान ने मनु से मनु ने इक्ष्वाकु से कहा उसे ।1।
यों परंपराप्राप्त योग फिर राजर्षियों ने जाना
किंतु परंतप! दीर्घकाल से लुप्तप्राय वह आज यहाँ ।2।
वही पुरातन योग आज मैंने यह श्रेष्ठ रहस्य बड़ा
तुझे कहा इसलिए कि तू है भक्त सखा प्रिय मेरा ।3।

अर्जुन ने पूछा
जन्म तुम्हारा अभी हाल का विवस्वान का पूर्व बहुत
कैसे समझूँ सृष्टि-आदि में कहा इसे तू उनसे ।4।

20 : अ-4 : हिंदी में पद्यान्वित श्रीमद्भगवद्गीता
‘‘भगवान ने इस प्रश्न के उत्तर में उन्हें पुनर्जन्म के होने का स्मरण कराया. और समझायाः

श्री भगवान ने कहा
मेरे व तेरे अर्जुन! हो चुके हैं जन्म बहुत से
उन सबको मैं जान रहा पर पार्थ! नहीं तू जाने ।5।
सभी प्राणियों का ईश्वर अज अविनाशी होते भी
अपनी प्रकृति अधीन कर होता प्रकट योगमाया से ।6।
जब-जब होता क्षरण धर्म का लोक दुखी हो भारत!
बढ़ जाता अधर्म जग में तब मैं अपने को सृजता ।7।
साधु जनों की रक्षा को व नाश दुरात्माओं के
धर्म-स्थापना हेतु प्रकट मैं युग-युग होता रहता ।8।
मेरे जन्म कर्म दिव्य हैं यों जो तत्व से जाने
अर्जुन! देह त्यागने पर वह जन्म न ले मुझे मिलता ।9।
राग-क्रोध-भयरहित बहुत मेरे आश्रित पहले भी
ज्ञानरूप तप से पवित्र मेरे स्वरूप को प्राए ।10।
जो जैसे भजता मुझको मैं भजूं उसे वैसे ही
सब प्रकार से पार्थ! मनुज हैं अनुसरते पथ मेरा ।11।
लोग चाहते हुए कर्म-फल पूजें देव लोक में इस
मिलती उन्हें कर्म से उपजी सिद्धि तुरत यहीं है ।12।
गुण व कर्म विभाग से मैंने चारों वर्ण रचे हैं
उसके कर्ता मुझ अविनाशी को तू जान अकर्ता ।13।
मुझे नहीं स्पृहा कर्म में कर्म न मुझसे लिपटे
यों जो मुझे तत्वतः जाने कर्म न उसको बाँधे ।14।
इस प्रकार से जान मुमुक्षुगण कर्म किए हैं पहले
इससे कर तू कर्म सदा से किए पूर्व जनों के ।15।

अ-4 : हिंदी में पद्यान्वित श्रीमद्भगवद्गीता : 21
क्या है कर्म अकर्म क्या इसमें बुद्धिमान भी मोहित
अब मैं कहूंगा कर्म-तत्व वह जान छुटे बंधन से ।16।
तुझे चाहिए कर्म-रूप जानना अकर्म-रूप को भी
जानो और निषिद्ध कर्म क्या गहन कर्म की गति है ।17।
जिसको दिखे अकर्म कर्म में औ कर्म अकर्म में भी
बुद्धिमान है मनुजों में वह योगी भी सब कर्म करे ।18।
जिसके कर्मारंभ रहित संकल्प कामना से हैं
कर्म जले जिसके ज्ञानाग्नि में ज्ञानी कहें उसे पंडित ।19।
त्याग आसक्ति कर्मफल को जो सदा तृप्त निराश्रय
लगा हुआ भी कर्मों में वह किंचित कर्म न करता ।20।
वशीभूत जिसका अंतः तन तजा परिग्रह जिसने
ऐसे अकामी देह-कर्म कर भी न प्राप्त हों अघ को ।21।
तुष्ट जो अपने आप मिले में ईर्ष्या द्वन्द्व रहित जो
व असिद्धि सिद्धि में समरस बँधे नहीं कर्म कर भी ।22।
मुक्त हो चुका जो आसक्ति से बुद्धि ज्ञानस्थित हो
ऐसे यज्ञ-कर्म-कर्ता के सभी कर्म नष्ट होते ।23।
अर्पण ब्रह्म ब्रह्म हवि द्वारा ब्रह्म बह्म्राग्नि में हुत भी
जिसकी कर्म-समाधि बह्म्र में ब्रह्म प्राप्य फल उनका ।24।
दैव-यज्ञ का अनुष्ठान हैं करते अन्य कई योगी
कई अन्य यज्ञ से करते ब्रह्म-अग्नि में यज्ञ हवन ।25।
योगी कई श्रोत्रादि3 इंद्रियाँ संयमाग्नि4 में हवन करें
दूजे शब्द आदि विषयों को होमें5 इंद्नियाग्नियों में ।26।
कुछ योगी इंद्नियकर्मों को और प्राण-क्रियाओं को
करते हवन आत्मसंयम की योगअग्नि में ज्ञानोज्वल5।27।

22 : अ-4 : हिंदी में पद्यान्वित श्रीमद्भगवद्गीता
यत्नशील कुछ तीक्ष्णव्रती तपयज्ञ द्रव्ययज्ञ करते
कितने योग-यज्ञ कई स्वाध्यायरूप ज्ञान का यज्ञ ।28।
कितने प्राणायाम परायण कर अपान में प्राण हवन
फिर अपान प्राण में होमें रोक अपान-प्राण की गति ।29।
अन्य नियत आहारी करते हुत प्राणों का प्राणों में
नष्ट ये करते पाप यज्ञ से यज्ञ जानने वाले ये ।30।
भोगें अमृत बचे यज्ञ से पाते ब्रह्म सनातन वे
यज्ञशून्य को कुरुसत्तम! है लोक नहीं परलोक कहाँ ।31।
ऐसे बहुविध यज्ञ वेद-वाणी में विस्तृत कहे गए
उन्हें जान वे कर्मजन्य हैं जान मुक्त तू होगा ।32।
ज्ञानयज्ञ है श्रेष्ठ परंतप! यज्ञ द्नव्यमय से जानो
जो भी सभी कर्म पार्थ! हैं होते लीन ज्ञान में ही ।33।
जान उसे ज्ञानियों से परिप्रश्न दण्डवत सेवा कर
तुझे करेंगे उपदेशित वह ज्ञान तत्व-दर्शी ज्ञानी ।34।
पांडव! जिसे जान तुझको फिर मोह न ऐसा होगा
जिससे सभी प्राणि को देखे अपने में फिर मुझमें ।35।
यदि तू अधिक पापकर्ता हो सभी प्राणियों से तो भी
इसी ज्ञान की नौका से तू अघ-निधि पार करेगा ।36।
जैसे जलती हुई अग्नि है करे भस्म ईंधन को
जला डालती ज्ञान-अग्नि सब कर्मों को वैसे ही ।37।
निस्संदेह लोक में कुछ न ज्ञान सदृश पविकर्ता
स्वयं योगसिद्ध अनुभव लें किते काल से स्व में ।38।
तत्पर श्रद्धावान जितेंद्रिय प्राप्त ज्ञान को होते
प्राप्त ज्ञान को हो तत्क्षण वह परम शांति को पाते ।39।

अ-4 : हिंदी में पद्यान्वित श्रीमद्भगवद्गीता : 23

‘‘भगवान कहते हैं-जो करें या न करें के संशय में रहता है उसका विनाश हो जाता हैः

ज्ञानरहित जो संशयात्मा श्रद्धाहीन विनशते
मनुज संशयी के हित में न लोक सुख परलोक नहीं ।40।
जिसके छूटे कर्म योग से संशय ज्ञानछिन्न जिसका
कर्म नहीं बाँधते धनंजय! उसको आत्मपरायण जो ।41।
अतः हृदयस्थित अपने अज्ञानजनित संशय को
काट ज्ञानअसि से होकर योगस्थ युद्ध कर भारत! ।42।
ज्ञानकर्मसंन्यासयोग नाम का चौथा अध्याय समाप्त

 

 

अ-4 : हिंदी में पद्यान्वित श्रीमद्भगवद्गीता : 24

पाँचवां अध्याय

[कृष्ण के, पहले कर्मसंन्यास की फिर कर्मयोग की प्रशंसा करने पर अर्जुन असमंजस में पड़ गए. वह कृष्ण से उस एक निश्चित मार्ग को जानना चाहा जो उनके लिए कल्याणकर हो. कृष्ण ने कहा कि ‘कर्मयोग’ और ‘कर्मसंन्यास’ दोनों श्रेयस्कर हैं. किंतु कर्मयोग विशेषरूप से योग्य है. क्योंकि सब कर्म प्रकृति की ही क्रीड़ा है. ईश्वर (कोई निर्माता नहीं, एक रचनात्मक शक्ति) किसी से न कर्म करने को कहता है न कर्म छोड़ने को. कर्म के योग से युक्त हुए बिना मनुष्य को संन्यास प्राप्त करना कठिन है.]


‘‘भगवान के मुख से एकबार कर्मसंन्यास की प्रशंसा और फिर कर्मयोग की प्रशंसा सुन अर्जुन विभ्रम में पड़ गया. वह उनसे जानना चाहे कि इन दोनों में श्रेयस्कर कौन है.
अर्जुन ने पूछा
करे प्रशंसा कर्मसंन्यास की कर्मयोग की तदुपरि
एक सुनिश्चित कहो कृष्ण! जो श्रेयस्कर दोनों में ।1।

श्री भगवान ने कहा
कर्मयोग व कर्मसंन्यास है मार्ग श्रेयस्कर दोनों
किंतु अपेक्षा कर्मसंन्यास के योग गरीय सुगम है ।2।
समझ नित्य संन्यासी उसको जिसे न द्वेष इच्छा है
महाबाहु जो द्वंद्वरहित वह बंध-मुक्त हो सुख से ।3।
कर्मयोग व सांख्य पृथक हैं कहें मूढ़ न कि पंडित
मनुज एक में भी सम्यक थित पाए फल दोनों का ।4।
पाते तत्व सांख्ययोगी जो वही कर्मयोगी भी
फल में देखे योग सांख्य को एक, वही सच देखे ।5।


24 : अ-5 : हिंदी में पद्यान्वित श्रीमद्भगवद्गीता
महाबाहु! बिन योग सिद्ध संन्यास कठिन है होना
योगी मननशील ब्रह्म को प्राप्त शीघ्र होता है ।6।
जिसकी देह इंद्रियाँ वश में अंतःकरण विमल है
सबकी आत्मा आत्मा जिसकी बँधे न कर्म कर योगी ।7।
मानें यों तत्वज्ञ सांख्ययुत मैं कुछ करता नहीं, समझ
छूने खाने शयन सूंघने श्वसन देखने चलने में ।8।
आंखें खोल-बंद करने श्रुति वाणी ग्रहण विसर्जन3 में
बरत रहीं इंद्रियां स्वयं ही निज निज के विषयों में ।9।
कर्म बह्म्र में अर्पण कर जो अनासक्त हो कर्म करे
लिपायमान होता न पाप से पद्मपत्र से पानी ज्यों ।10।
योगी करें कर्म केवल काया मन बुद्धि इंद्रियों से
अपनी अंतःशुद्धि हेतु ही त्याग संग-आसक्ति सभी ।11।
योगी त्याग कर्मफल अपने ब्रह्मरूप शांति पाता
पुरुष सकामी कामहेतु से बँधता फलासक्त होकर ।12।
मन से त्याग सभी कर्मों को देही पुरुष जितेंद्रिय
न कर करा कुछ सुख से रहता नौ4 द्वारों के पुर में ।13।
प्रभु न प्राणियों के रचता है कर्म न कर्तापन को
न ही कर्मफल-संयोगों को प्रकृति बरतती इनको ।14।
प्रभु न लेता पाप किसी का और न शुभ ही लेता
ढँका हुआ है ज्ञान अज्ञान से मोहित जीव उसी से ।15।
जिनने आत्मज्ञान से जिस है उस अज्ञान को विनशा
सूर्य जैसा करे प्रकाशित उनका ज्ञान परम को ।16।
स्थिति जिनकी परम तत्व में तदाकार बुद्धि मन, वे
अघ से मुक्त ज्ञान द्वारा हो पुनरावृत्त न साधक ।17।
अ-5 : हिंदी में पद्यान्वित श्रीमद्भगवद्गीता : 25
विद्याविनययुक्त ब्राह्मण में श्वान हस्ति गौ सबमें
और श्वपच5 में ज्ञानी देखें एक परम तत्व को ही ।18।
समस्थित अंतः जिनका वे जीते जी लोक जीतें
क्योंकि बह्म्र निर्दोष और सम अतः ब्रह्म-स्थित वे। 19।
जो न मुग्ध प्राप्त हो प्रिय को न उद्विग्न पा अप्रिय
स्थिरबुद्धि मूढ़ताविरहित वह ब्रह्म्रज्ञ ब्रह्म्र में है ।20।
बाह्य विषय में असक्तात्मा6 पाता अंतःसुख को
मनुज बह्म से युक्त अभिन्न हो अक्षयसुख पाता है ।21।
इंद्रिय विषय योग से उपजे भोग आदि अंत वाले7
दुख के हैं कौंतेय! हेतु ये रमें न उनमें विवेकी ।22।
देहत्याग से पूर्व जो सहने में समर्थ इस तन में
काम-क्रोध से जगे वेग को योगी और सुखी वह।23।
रमण करे जो आत्मा में जो अन्तःसुखी आत्म-ज्ञानी
ब्रह्म्रभूत8 सांख्ययोगी वह पाता ब्रह्मरूप निर्वाण ।24।
जिनके संशय मिटे पाप विनष्ट ब्रह्म-ध्यानी जो
रत जो सर्व प्राणि-हित में ऋषि परमबह्म्र वे पाते ।25।
काम क्रोध से शून्य चित्तजित व स्वरूप के साक्षी
ज्ञानी पुरुषों को सुप्राप्त है ब्रह्म सभी दिशा से ।26।
छोड़ बाह्य भोग बाहर कर दृष्टि बीच भौंहों के
नथुनों में चलते अपान व प्राणवायु को सम कर ।27।
जिसकी हैं इंद्रियाँ बुद्धि मन वश में मोक्षप्रवृत8 जो
क्रोधरहित भय इच्छा से जो सदा मुक्त है, मुनि वह ।28।
जो जानता मुझे तप यज्ञों का भोक्ता सब प्राणिसुहृद
और बड़ा स्वामी लोकों का परम शांति वह पाता ।29।
कर्मसंन्यासयोग नाम का पाँचवाँ अध्याय समाप्त

26 : अ-5 : हिंदी में पद्यान्वित श्रीमद्भगवद्गीता

छठाँ अध्याय


[कृष्ण ने कर्मयोग की सिद्धि के लिए समबुद्धि (सबको समान रूप से देखने वाली बुद्धि) के उपयोग को महत्वपूर्ण बताया है. वह समबुद्धि प्राप्त करने के उपायों को भी बताते हैं. वह कहते हैं- सच्चा योगी व संन्यासी वही है जो कर्मफल की आशा रखे बिना स्थिर समबुद्धि से संसार के कर्मों को अपना कर्तव्य समझ कर करता रहे. बुद्धि स्थिर करने के लिए इंद्रियनिग्रहरुपी कर्म और योग का अभ्यास वह स्वयं करे. जिसकी आत्मा योग से युक्त व दृष्टि सम होती है वह सभी प्राणियों को अपने में और सभी प्राणियों में अपने को देखता है. योग कभी विनष्ट नहीं होता. समबुद्धिरुपी योग एक जन्म में सिद्ध न हो तो पूर्वजन्म के संस्कार ही पूर्वागत जन्म के अभ्यास को आगे बढ़ा देते हैं जिससे सिद्धि मिल जाती है.]

‘‘भगवान ने फिर अर्जुन को सबको समान देखने की बुद्धि के पाने के उपाय बताएः

श्री भगवान ने कहा
करता जो कर्तव्यकर्म रख मन में चाह न फल की
वही कर्मयोगी संन्यासी न यज्ञाग्नि क्रिय त्यागी ।1।
जिसे कहें संन्यास समझ तू पांडव! योग उसे ही
बिना किए संकल्प त्याग होता न कोई योगी है ।2।
योग-इच्छु मुनि हेतु कर्म को कारण कहा गया है
उसी योगसिद्ध मुनि का शम ब्रह्मप्राप्ति का कारण ।3।
इंद्रिय के भोगों कर्मों में जब वह हो आसक्त नहीं
अपने सब संकल्प छोड़ दे कहते उसे पूर्ण योगी ।4।
मनुज करे उद्धार स्वयं निज नहीं गिराए निज को
क्योंकि बंधु आप वह अपना शत्रु स्वयं वह अपना ।5।
जीता जिसने स्वयं स्वयं को बंधु स्वयं अपना वह
जो न आप अपने को चीन्हे शत्रु बने अपना ही ।6।

अ-6 : हिंदी में पद्यान्वित श्रीमद्भगवद्गीता : 27
जो अंतर्जित निर्विकार मानापमान सुख दुख में
और शीत उष्ण में भी वह पाता नित्य परम को ।7।
आत्मतृप्त विज्ञान-ज्ञान से निर्विकार विजितेंद्निय
मिट्टी स्वर्ण अश्म को जाने सम वह युक्त कहाता ।8।
मित्र सुहृद अरि उदासीन मध्यस्थ बंधु धर्मात्मा
दुष्ट द्वेष्य में बुद्धि रखे सम वह अति श्रेष्ठ कहा है ।9।
इच्छाविरत विमुख संग्रह से व अंतः मन वश में
योगी सदा लगा रखे मन परमात्मा में अपना ।10।
शुद्ध भूमि पर कुश मृगछाला और सुवस्त्र बिछे हों
आसन कर स्थिर स्थापन जो अति ऊँच न नीचा ।11।
उस आसन पर बैठ क्रियाएं चित्तेंद्रिय की वश कर
आत्मशुद्धि के हित एकाग्रमन नित्य योगाभ्यास करे ।12।
काया शीश ग्रीव सीधे कर धारण अचल सुदृढ़ हो
इधर उधर न देख बैठ जो नासिकाग्र देखते सुथिर ।13।
आत्मशांत योगी अभीत जो ब्रह्मचारिव्रत-स्थित
मन संयम्य चित्त मुझमें कर बैठे मेरे परायण हो ।14।
योगी मन को वश कर ऐसे नित्य लगा मन प्रभु में
मुझस्थित निर्वाण परम की शांति प्राप्त कर लेता ।15।
अर्जुन! जो खाते अतिशय या खाते नहीं तनिक भी
अति सोते हों या जगते हों सिद्ध न योग उन्हें हो ।16।
होता सिद्ध योग दुखनाशक यथायोग्य जो करते
सोना जगना कर्म-प्रचेष्टा व नियमित आहार विहार ।17।
स्ववश चित्त अपने स्वरूप में जब स्थित होता है
व निस्पृह सब काम-पदों से कहलाता तब योगी ।18।

28 : अ-6 : हिंदी में पद्यान्वित श्रीमद्भगवद्गीता
ज्यों दीए की लौ अकंप हो वायुरहित स्थल पर
योगअभ्यासरत वशी-चित्त योगी-मन की उपमा त्यों ।19।
जिस स्थिति में चित्त निरुद्ध उपरमता योगक्रिया से
जिस स्थिति में स्व से स्व को देख तुष्ट हो स्व में ।20।
इंद्रिय-इतर बुद्धिग्राह्य जो आत्यंतिक सुख, ध्यानी
जाने जिस स्थिति में जिसमें स्थित हुआ न विचले ।21।
ब्रह्मप्राप्तिरूप जिस सुख से बढ़ न अन्य योगी को
जिसमें होने पर स्थित उसे डिगा न सके दुख भारी ।22।
दुखसंयोगों का वियोग है जिसमें योग वही है
योग किया जाए निश्चय से बिना चित्त उकताए ।23।
त्याग सर्वथा सभी कामनाएँ संकल्प से जन्मीं
मन से स्व इंद्रिय-समूह को सभी ओर से वशकर ।24।
धैर्य-बुद्धि के द्वारा जग से शनैः शनैः उपरत हो
स्थिर कर मन परमात्मा में कुछ भी करे न चिंतन ।25।
जहाँ जहाँ अस्थिर चंचल मन विचरण करता है
वहाँ वहाँ से रोक उसे वह परमात्मा में लगाए ।26।
जिसका है मन शांत पाप भी नष्ट शांत रजगुण हो
ऐसे ब्रह्मरूप योगी को उत्तम सुख मिलता है ।27।
पापरहित योगी अपने को नित्य लगा यों परम में
ब्रह्म्रप्राप्तिरूप अतिसुख का सुख से अनुभव करता ।28।
योगी सबमें समदर्शी व योगयुक्त अंतः का
सब जीवों में देखे निज को सर्व प्राणि को निज में ।29।
जो मुझको सर्वत्र देखता और सभी को मुझमें
मेरे लिए अलोप न वह मैं उसके लिए अलोप नहीं ।30।

अ-6 : हिंदी में पद्यान्वित श्रीमद्भगवद्गीता : 29
सर्व प्राणि-स्थित मुझको जो एक भाव हो भजता
सब कुछ बरत रहा भी योगी मुझमें बरत रहा है ।31।
अर्जुन! जो अपनी उपमा से सभी जगह सम देखे
वैसा ही देखे सुख या दुख मान्य परम योगी वह ।32।

अर्जुन ने भगवान से पूछा- मन चंचल हठी और बली है इससे समत्व योग कैसे सधेगा?

अर्जुन ने पूछा
समतापूर्वक योग कहा यह मधुसूदन! जो तूने
मैं न देखता चंचल मन से योग की स्थिर स्थिति ।33।
क्योंकि कृष्ण! मन चंचल प्रमथी हठी और बली है
मैं निरोध को मानूं इसके कठिन वायु के जैसा ।34।

किंतु भगवान ने उन्हें आश्वस्त किया- अभ्यास और वैराग्य से मन का निग्रह हो जाता है.

श्री भगवान ने कहा
ठीक कहा तूने मन चंचल महाबाहु! निग्रह दुष्कर
पर कौंतेय! अभ्यास वैराग्य से निग्रह हो जाता है ।35।
योग उसे दुष्प्राप्य मेरे मत स्ववश नहीं मन जिसका
साधक वशीचित्त यत्न कर योग उपाय से पा लेता ।36।

अर्जुन ने भगवान से पूछा-श्रद्धा से भरे साधक को यदि योग सिद्ध न हो अर्थात वह योग से भ्रष्ट हो जाए तो वह किस गति को प्राप्त होता है?

अर्जुन ने पूछा
शिथिलयत्न श्रद्धासुयुक्त जो कृष्ण! योग से विचले
योगी योगसिद्धि को न पा किस गति को पाता है ।37।

30 : अ-6 : हिंदी में पद्यान्वित श्रीमद्भगवद्गीता
महाबाहु! निराश्रय जग से और ब्रह्म-पथ-विचलित
उभय ओर से भ्रष्ट हो होता छिन्न अभ्र-सा नष्ट तो न ।38।
कृष्ण! सर्वथा क्षम तू ही इस संशय को हरने में
मिटा सकेगा तुझे छोड़ कोई न मेरा यह संशय ।39।

भगवान ने कहा- वे योगी पूर्वजन्म के अभ्यास के प्रभाव से अगले जन्म में भी सिद्धि पाने का यत्न करते हैं. अर्जुन तू भी योगी हो जा.

श्री भगवान ने कहा
नाश न उनका पार्थ! लोक में या न लोक परे में
तात! नहीं दुर्गति पाते कल्याण कर्म जो करते ।40।
पुण्यकर्म-कर्ता के लोक को योगभ्रष्ट योगी पा
रहकर वर्षों वहाँ जन्मता घर में पूत श्रीमन के ।41।
या वह लेता जन्म बड़े मतिमान योगी के कुल में
इस प्रकार का जन्म लोक में यहाँ बहुत दुर्लभ है ।42।
पाता वहां अनायास वह पूर्व जन्म-बुद्धि-संयोग
तत्प्रभाव से सिद्धि प्राप्ति का यत्न करे कुरुनंदन! ।43।
पूर्वअभ्यास से खिंचे परम में हो भी भोगवशी, व
साम्ययोग- जिज्ञासु वेद के काम्य कर्म उल्लंघे ।44।
जो योगी सयत्न यत्नरत नष्ट हुए अघ जिसके
सिद्ध हुआ अनेक जन्मों से पुनः परमगति पाता ।45।
योगी श्रेष्ठ तापसों से है श्रेष्ठ ज्ञानियों से भी
बढ़ सकाम कर्मियों से भी अर्जुन! हो जा योगी ।46।
तदपि योगियों में भी सारे उत्तम सिद्ध समझता
उसे, मुझे जो अंतः में रख श्रद्धा से भजता है।47।
आत्मसंयम (ध्यान) योग नाम का छठाँ अध्याय समाप्त

अ-6 : हिंदी में पद्यान्वित श्रीमद्भगवद्गीता : 31

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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