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व्यंग्य में सावधानियां / नरेंद्र कोहली

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मैं श्रीगंगानगर पहली बार आया हूं । ट्रेन में मेरे साथ वाली सीटों पर एक परिवार बैठा था जिसे बीच में कहीं उतरना था । जब भी कोई स्टेशन आता वो एक दूसरे को सूचना देते कि अमुक स्टेशन आ गया । जिन स्टेशनों के नाम वे ले रहे थे वे सारे पंजाब के थे- संगरूर धुरी बरनाला भटिंडा आदि । मैं राजस्थान के एक नगर में जा रहा हूं । मैं सावधान हो गया । व्यंग्य में सावधानियों पर तो अब कुछ बोल रहा हूं वस्तुतः मेरी सावधानी तो कल रात से चल रही है । एक सावधानी आशु के लिए और संभवत : आशु को पता नहीं कि मैं कितना बोल सकता हूं इसलिए जितना चाहे बोले जैसी स्वतंत्रता मत दें खैर अपना समय मैं स्वयं ही तय कर लेता हूं ।

हास्य व्यंग्य लेखन से पहले नए रचनाकार को यह जान लेना बहुत आवश्यक है कि वह अपने अंदर झांके कि उसके अपने भीतर कटाक्ष परिहास आदि है कि नहीं । उसकी समझ है कि नहीं । आप में उसे सहने की क्षमता नहीं है, समझ नहीं और आप उसे लिखने बैठ गए । आरंभ में मैंने कविता लिखा । लगभग हर रचनाकार अपना लेखन कविता से आरंभ करता है । पर मुझे बहुत जल्दी समझ आ गया कि मुझमें कविता लिखने की क्षमता नहीं है । ऐसे ही व्यंग्य पाठ की क्षमता को लेकर भी है । मंच पर व्यंग्य पाठ करना एक कला की मांग करता है । किसी भी चीज को रोचक ढंग से सुनाया जाए वह लोकप्रिय होता है । वास्तव में यह परफोर्मेंस है । शरद जोशी लिखते दूसरे ढंग से थे और सुनाते किसी और ढंग से थे । सुनाने के लिए वे रचनाओं का सम्पादन करते थे । मैं स्वयं से पूछता हूं मैं मंच पर क्यों नहीं गया? मैं समझता हूं कि सामने वाले.. .को प्रसन्न करने के लिए स्वयं नीचे गिरना पड़ता है । लोकप्रियता के लिए स्तर से गिरना मुझे पसंद नहीं है । यदि बात मंच के कवियों की हो उनकी आजीविका इसी से चलती है । '

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मेरे आलोचक मुझसे प्रश्न करते हैं कि आपने व्यंग्य लिखना क्यों बंद कर दिया आप पुराकथाओं में ही क्यों सीमित हो गए । व अज्ञानी हैं क्योंकि व मेरे व्यंग्य का नहीं पढ़ते । इस बीच मेरा एक व्यंग्य उपन्यास आया है और चार व्यंग्य संकलन पर वे उस ओर देखने ही नहीं है । दृष्टिकोण आपका सीमित है और दोषारोपण मुझपर कर रहे हैं । और फिर में जौ रामकथा में राक्षसों के कुल का वर्णन करना है क्या वह आज प्रासंगिक नहीं हैं । आजकल के समाचार पत्र पढ़ लें क्या उनमें चार से अधिक पृष्ठ राक्षसों के कृत्यों से नहीं भरे होते हैं ।

मैंने जब व्यंग्य लेखन आरंभ किया तो मर सबसे पहले लक्ष्य मर अपन आसपास के लोग थे । यह भी समझ लें कि जब भी आप पाप के विरुद्ध गांडीव उठाएंगे आपके समक्ष आपके अपने ही खड़े होंगे । व्यंग्य बाण जब चलते हैं तो उसका लक्ष्य उसके अपने ही होते हैं । सबको कृष्ण नहीं मिलते जौ पार्थ को गीता ज्ञान दें । ऐसे में आपको तय करना है कि आपको संबंधों का निर्वाह करना है या फिर कड़वा सच कहना है ।

व्यंग्य के बाण शब्दों के बाण के माध्यम से अपनों को आहत करते हैं। क्या आप अपनों को आहत करने के लिए तैयार हैं? वैसे स्पष्टवादी होने के खतरे भी हैं । मैंने यह खतरे बहुत उठाए हैं । इसके कारण .अनेक कार्यक्रमों मेँ मुझे बुलाया भी नहीं जाता ।

व्यंग्य मेरे लेखन का एक हिस्सा है । मैं बड़े उपन्यास भी लिखता हूं छोटी व्यंग्य रचनाएं भी । दोनों में कटु सत्य अभिव्यक्त करने से घबराता नहीं हूं । जैसे एक सज्जन ने शिकायत की कि आपने व्यंग्य लिखना क्यों छोड़ दिया, व्यंग्य में हैं ही कितने लोग इसमें तो आप जमे हुए थे । वे मुझे सीमित करना चाहते थे । ऐसे ही एक व्यंग्यकार मित्र मिले और बोले -हम बेकार ही व्यंग्य लेखन में छिद्रान्वेषण करते रहे कोई बड़ी रचना नहीं लिख पाए ।

लेखक के लिए लेखन कोई भी विधा सरल नहीं होती है । बशर्ते लेखक विषय की बारीकियां जानता हो । जो व्यंग्य रचना पढ़ने वाले को आक्रोशित न कर दे वह सफल व्यंग्य नहीं है । कोई व्यंग्य रचना अपनी कथ्य अपनी वस्तु के कारण महत्वपूर्ण हो जाती है । कई बार ऐसा होता है कि वस्तु को वैसा का वैसा उठाकर सीधी भाषा में कह दिया जाए तो भी बहुत अच्छा व्यंग्य बन जाता है और कई बार यह होता है कि वस्तु में उतनी जान हो या ना हो शिल्प भी उसका अच्छी और श्रेष्ठ रचना बना देती है । तो ये किसी एक रचना को देखकर बताया जा सकता है कि उसमें वस्तु महत्वपूर्ण है तो कहना ही क्या ।

यह मानकर चलें कि कमियां निरंतर रहती हैं। वो कौन-सा युग है जिसमें कमियां नहीं रहीं । यदि सारी कमियां हम ही सुधार कर चले जाएंगे तो आने वाली पीढ़ियां क्या करेंगी? सुधार एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है । एक महत्वपूर्ण बात और कि जितना लिखें कम से कम उतना पढ़ें भी । अधिकांश युवा रचनाकार लेखक बनते ही अपने अंदर के पाठक को मार देते हैं । पढ़ने में अपने को सीमित न करें । जितना व्यापक आप पढ़ेंगे उतना ही व्यापक आपका दृष्टिकोण भी होगा । वैसे तो हर लेखक को एक व्यापक फलक से जुड़ना चाहिए, व्यंग्यकार के लिए तो यह बहुत आवश्यक है । उसे अपने आपसपास की घटना-दुर्घटना के प्रति सजग होना चाहिए । इधर हिंदी व्यंग्य में बहस चल रही है कि रचना में गालियों का प्रयोग हो कि नहीं । वैसे यह बहुत पुरानी बहस है । इससे पूर्व भी हिंदी साहित्य में अनेक रचनाएं गालियों के प्रयोग के कारण विशेष चर्चित रहीं । कुछ ने तो इसी कारण अपनी रचना को विवादित किया । मेरा मानना है कि आज जो व्यंग्यकार अपने लेखन में गालियों का इस्तेमाल कर रहे हैं वह व्यंग्य रचना नहीं है । ऐसे लेखकों को अपना .आत्मचिंतन करना होगा कि वे अपनी भावी पीढ़ी को आखिर क्या परोसना चाहते है । क्या इनका प्रयोग वे अपने परिवार में कर सकते हैं?

व्यंग्यकार के रूप में जितना सजग अपने विषय के चुनाव में होना चाहिए, उतना ही इस बारे में भी कि किसपर व्यंग्य करना है और किसपर नहीं । मजबूर पर कभी व्यंग्य न करें । मारे हुए को मारना कोई बहादुरी नहीं है । किसको निशाना बना रहे हैं, जितना जानना यह आवश्यक है, उतना ही यह ज्ञान भी आवश्यक है किसलिए निशाना बना रहे हैं । आपमें वह क्षमता है आप किसी पर भी प्रहार कर सकते हैं, आपकी दृष्टि को पैना होना पड़ेगा, यह दृष्टि आपमें विकसित हो, ऐसे प्रयास जारी रखने की आज बेहद आवश्यकता है ।

लेखक के साथ विचार के साथ उसकी प्रतिबद्धता की बात की जाती है। मैं व्यंग्यकार के लिए ही नहीं किसी भी लेखक के लिए किसी भी मनुष्य के लिए वैचारिक प्रतिबद्धता को जरूरी मानता है व्यंग्यकार साहित्यकार से अलग कुछ नहीं वो साहित्य की एक विधा है इसलिए जो दायित्व साहित्यकार का है और सामाजिक दायित्व के बिना तो कोई प्रबुद्ध व्यक्ति हो ही नहीं सकता इसलिए यह कैसे कहा जाए कि उसका कोई सामाजिक बोध नहीं होता । सच्चा इंसान होगा तो भी उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता होगी सच्चा लेखक होगा तो भी उसकी प्रतिबद्धता होगी पर ये प्रतिबद्धता जो है किसी विचारधारा के प्रति ना होकर सत्य के प्रति होना चाहिए । इसलिए कई बार यह भी देखा जा सकता है कि अपनी आस्थाओं मान्यताओं को बदल करके लेखक किसी ओर दिशा में चल पड़ता है, उसका विकास हैँ और यदि वह लोभ और लालच के कारण किसी ओर झुकता है तो यह उसका हास है । यदि आपका अर्थ वैचारिक प्रतिबद्धता से किसी पार्टी किसी राजनीतिक दल किसी विशेष साम्प्रदायिक विचारधारा से है तो मैं यह मानता हूं कि लेखक उन सबसे ऊपर उठ करके सत्य और मानवता के प्रति होनी चाहिए । इसलिए छोटी-मोटी चीजों के प्रति प्रतिबद्धता नहीं होती वह एक प्रकार का मोह होता है जो हमारे अज्ञान के कारण होता है । लेखक को अपने मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध होना चाहिए । जो किसी पार्टी या दल की विचारधारा के लिए उपयोग करते हैं वे लेखक के रूप में अपनी स्वतंत्रता खो देते हैं । ऐसी रचना व्यंग्य रचना नहीं होती है घोषणापत्र होती है । मुझे याद है कि एक समय मेरी व्यंग्य रचनाएं मार्क्सवादी वाम विचारधारा से जुड़े ' जनयुग ' मैं छपा करती थीं तो तथाकथित दक्षिणपंथी विचारधारा के ' पांचजन्य ' में भी छपा करती थीं । एक दिन विष्णुकांत शास्त्री मिले और उन्होंने कहा- नरेंद्र तुम्हारी रचनाएं ' जनयुग ' और ' पांचजन्य ' में, दोनों जगह कैसे छपती है?' मैंने कहा- जो मैं लिख रहा हूं यदि वह दोनों को ही पसंद है तो यह मेरी शक्ति हुई । ' मेरा मानना है कि लेखक को निडर होकर अपनी बात कहनी चाहिए । रचना लिखना पहली बात है, छपना दूसरी बात । पत्रिका को लक्ष्य करके रचना लिखना उचित नहीं ।

साहित्यकार का लक्ष्य स्वयं और अपने माध्यम से मानव समाज को को सात्विक एवं निर्मल करना है । चाहे कोई विधा हो, मेरे लिए मेरे लेखन का उद्देश्य यही है और यही होना भी चाहिए ।

मैं आभारी हूं आयोजकों का कि उन्होंने मुझे निमंत्रित किया और आपका कि आपने मेरी बातों को धैर्य से सुना ।

( राष्ट्रीय कला मंदिर श्रीगंगानगर, सृजन सेवा संस्थान श्रीगंगानगर एवं ' व्यंग्य यात्रा ' दिल्ली द्वारा व्यंग्य पर आयोजित दो दिवसीय अनुष्ठान में दिया उद्घाटन भाषण । प्रस्तुति: प्रेम जनमेजय)

(व्यंग्य यात्रा अंक अक्तूबर दिसंबर 2016 से साभार)

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