मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

अशोक गुजराती की कविताएँ व नज़्में

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॥कविता॥

औजे-तख़य्‍युल

(कल्‍पना की ऊचांई)

 

जब देखता हूं

तिमंज़िले मकान की

कांच की खिड़की से

तंग रास्‍ते पर

जा रहे कई इनसानों को

ख़ुदा की तरह-

अलग-अलग इनसानों को

रंग-बिरंगे कपड़ों में

अपने-अपने दिल में

जुदा-जुदा जज़्‍बात लिये

ख़ुशी का जाम

सीने में छिपाये

उम्‍मीद की किरन

दिल में जगाये

ग़म का बोझ

जिस्‍म पर उठाये

तो सोचता हूं

ये सारे चोर हैं

छिपाकर कुछ-न-कुछ

ले जा रहे हैं...

लगता है

नदी से

छोटे-छोटे बच्‍चों ने

खेलने के वास्‍ते

लायी सीपियां

पथरीले टुकड़े

इस-उस रंग के कई

बिखरा दिये हो

उजले फ़र्श पर

और दफ़अत्‍तन (एकाएक) सारे

दौड़ने लगे हो इधर-उधर...

या फिर

कोई बुढ़िया

अपनी भर ज़िन्‍दगी की दौलत

अपनी मता-ए-आख़िर (परलोक हेतु पूंजी)

अपने साथ ले जा रही हो

अर्श पर

और हवा के एक तेज़ झोंके से

उसकी गठरी

कमज़ोर हाथों से छूटकर

बिखर गयी हो धरती पर

और सिक्‍के चलने लगे हों सड़क पर...

मेरे हमसफ़र अदीबों के लफ़्‍ज़ों में

इनसान बेचारे

लग रहे थे ज्‍यों

आसमां पर चमक रहे सितारे

या गुलशन में फूल बहुत सारे

लेकिन

किसी नामालूम

मंज़िल की जुस्‍तज़ू (तलाश) में

कुछ जीते, कुछ हारे

सहारे, चन्‍द बेसहारे

चले जा रहे थे

और मुझे

फ़रावां-फ़रावां (हौले-हौले)

ये महसूस हुआ जा रहा था

कि

यह रहगुज़र

ये संकरी गुज़रगाहें (राहें)

मेरे रवां ख़यालों को,

मसर्रत (ख़ुशी) के, रंज के सवालों को

अपने में समेटे

मेरी रगें (शिराएं) हैं

और यह शहर

झुर्रियों से अटा ये शहर

और कुछ नहीं

मेरा दिमाग़ है...

0

 

॥नज़्‍म॥

हरजाई

 

हरजाई,

थोड़ा जोश आता है

ज्‍यों बरसात से पहले शांत

नदी में

पहली बरखा के बाद

और धीरे-धीरे

अगली बरसातों के साथ-साथ

उसका दामन

ज़्‍यादा-ज़्‍यादा

लहराने लगता है

वैसे ही

जब तरह-तरह की आवाज़ें

इनसानी और बेमानी आवाज़ें

ख़ामोशी की सतह पर

तैरती जाएं

बढ़ती जाएं

हौले-हौले

तब तुम समझ लेना कि

हर ज़र्रे का मुंह चूम चुकी है

सूरज की पहली किरन

हरजाई !

0

(हरजाई- हरेक को उपलब्‍ध, कुलटा)

------------------.

॥नज़्‍म॥

संगे-माहताब 1

 

हक़ीक़ी2 हुस्‍न पर

जो ख़ुद एक सेह्‌र3 है

एक तिलिस्‍म है

मुजस्‍सम4 आराइश5 न करो

संगे-माहताब की तरह

सारी काइनात में

अपने जल्‍वों की नुमाइश न करो

मेरी बेरब्‍त6 आरज़ुओं-सा

मत बिखर जाने दो

मुफ़लिस दामन के पैबन्‍दों की सूरत

अपने जमाल को

जो मैंने अपनी आंखों में

महफ़ूज़ कर रखा है

पलकों में दम तोड़ रहे अंधियारे-सा

यक़ीनन

हर सैलाब बहा ले जाता है

सहेज कर रखीं यादें उस साअत7 की

रफ़्‍ता-रफ़्‍ता मुबहम8 हुए जाते हैं

वह शबीह9, वह क़दे-राना10, वह सरापा शबाब का अक्‍स

बचपन के अनाम साथी जैसे

गोया

चौंधिया देने वाले उजाले के मुक़ाबिल

कम-कम खुलती उनींदी आंखों जैसी ही

वे आंखें

दिलो-दिमाग़ की

जिनमें वो मंज़र क़ैद है

नई फ़िज़ा, बदले आलम के रूबरू

धीरे-धीरे खुल रही हैं

और असीर11 ख़यालात

इक-इक पंछी की मानिन्‍द

पिंजरे से

आज़ाद हुए जा रहे हैं

बरौनियों के बीच से

मुसलसल12 बहे जा रहे हैं

हरचन्‍द13

आंसुओं की शक्‍ल में

मगर

मिट्‌टी से इश्‍क़ जताने की

इन अश्‍कों से फ़र्माइश न करो

मेरी जां,

अपने जल्‍वों की नुमाइश न करो !

0

(1.चांद से लाया हुआ पत्‍थर 2.सच्‍चा,असली 3.जादू 4.साकार 5.श्ाृंगार 6.बिखरी

7.क्षण 8.अस्‍पस्‍ट 9.चित्र 10.सुंदर क़द 11.बन्‍दी 12.एक-से 13.अग़रचे,यद्यपि)

-------------------------.

॥नज़्‍म॥

सितमगिर्वीदगी 1

 

अपनी कार के आईने में

तुम जब भी देखोगी

पीछे तुम से दूर दौड़ते रास्‍ते की तरफ़

तुम्‍हें समझ जायेगा

मेरे अब तक लिखे

तमाम शे’र-ओ-सुख़न2 का एक-एक हरफ़ !

किसी की बांहों की ज़द से3 निकलकर

तुम

तुम्‍हारी सिम्‍त4 बढ़ती सड़क से

निगाह न मिलाना कभी

वगर्ना होने वाले हवादिस5 टल जायेंगे

क्‍योंकि मेरे तश्‍ना-ओ-उरियां6 अरमान

शोरीदगी7 के आलम में

भटक रहे हैं जो उसी राह पर

मुदाम8 तुम्‍हारे बेनियाज़9 रफ़्‍तारी तरीक़े

यदि उन्‍हें न कुचल पायेंगे

तो अज़ीम10 लेकिन ख़ूं से शराबोर

मुस्‍तक़बिल11 की तमन्‍ना में

आज काटने वाले

परवाज़12 को बेताब

मेरे नौख्‍़ोज़13 परिन्‍दा-ए-अदब14

के पर जल जायेंगे

ग़र यूं ही

तुम्‍हारी बेपर्वाई के आसार

बदल जायेंगे !!

0

(1.यह चाहना कि अत्‍याचार होते रहें 2.साहित्‍य 3.घेरे से 4.तरफ़ 5.दुर्घटनाएं 6.प्‍यासे-नंगे 7.पागलपन

8.हमेशा 9.बेपर्वाह 10.महान 11.भविष्‍य 12.उड़ान 13.नवोदित 14.साहित्‍य रूपी पंछी.)

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प्रा. डॉ. अशोक गुजराती, बी-40, एफ़-1, दिलशाद कालोनी, दिल्‍ली- 110 095.

ईमेल - ashokgujarati07@gmail.com

1 blogger-facebook:

  1. भगवान वैद्य 'प्रखर'9:34 pm

    Bhai, apki kavitayen aur vah bhi ies prakar ki,pahali bar padhne ko mili.Badhai.

    उत्तर देंहटाएं

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