मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

कमलेश्वर और पत्रकारिता / डॉ.अनंत वडघणे

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कमलेश्वर हिंदी के प्रसिद्ध कथाकार है। जिन्होंने अपने व्यक्तित्त्व की पहचान विभिन्न क्षेत्रों में बनाई। वे सफल साहित्यकार तो है ही साथ ही उन्होंने रेडिओ, दूरदर्शन, फिल्म के साथ-साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने दूरदर्शन के लिए धारावाहिक लेखन किया। इसके अलावा कुल ९९ फिल्म का लेखन कर फिल्मों को विशिष्ट दिशा दी। साथ ही सामाजिक आंदोलनों से भी वे सक्रिय रुप में जुड़े है। बोहरा समाज का आंदोलन हो या दलित आंदोलन उन सबसे उन्होंने अपने आपको जोड़कर रखा। वे जिस तरह साहित्य के क्षेत्र में सामाजिक कटिबध्दता का ध्यान रखते हैं उसी भाँति उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में सामाजिकता का बड़े सशक्तता से निर्वाह किया है। सारिका, गंगा, कथायात्रा जैसे साहित्यिक पत्रिकाओं के माध्यम से समाज जीवन को वाणी देने का कार्य किया और एक साहित्यिकारों की ऐसी पीढ़ी बनाई जो समाज हित के लिए समर्पित हो। उसी तरह वे टाइम्स ऑफ इंडिया, दैनिक जागरण जैसे दैनिकों के माध्यम से जनमानस के प्रश्नों को लेकर खड़े हुए। उसके लिए उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। उनके व्यक्तित्त्व की तत्त्वनिष्ठा के कारण उन्हें नौकरी छोड़ने की भी नौबत आ गई किन्तु वे पीछे नहीं हटे। पंजाब का आतंक हो, गुजरात कांड हो , बाबरी विध्वंस हो। ऐसे कई घटनाओं को समाज के सामने सही रुप में लाने का कार्य उन्होंने किया और एक कुशल पत्रकार की भूमिका निभाई।

सारिका पत्रिका के माध्यम से उन्होंने साहित्यिकों को समानान्तर आंदोलन से लोकाभिमुख बनाया। जनमानस के प्रश्नों से जोड़ने के लिए कटिबध्द किया। प्रेमचंद से लेकर चली आयी प्रगतिशील साहित्यधारा को जीवंतता प्रदान की। हिंदी की प्रसिध्द लेखिका हिमांशु जोशी उस संदर्भ में कहती है कि-"सारिका और नई कहानियों के दौर में कमलेश्वर ने नए कहानीकारों को ही प्रोत्साहित नहीं किया, बल्कि कथा के क्षेत्र में चिंतन की एक नई धारा को रेखांकित किया। समानान्तर आंदोलन मात्र आंदोलन न होकर एक विचार भी था और नव चिंतन का केंद्र बिंदु भी।"१ इस तरह कमलेश्वर सारिका पत्रिका के माध्यम से साहित्यकारों को नवचेतना देने का कार्य करते हैं।

कमलेश्वर ऐसे पत्रकार थे जिन्होंने जीवन से खेलकर पत्रकार का फर्ज निभाया। दैनिक जागरण में जब वे कार्य कर रहे थे तब पंजाब में खालिस्तान की मांग को लेकर आतंकवाद फैल गया था। कोई भी सरकारी यंत्रणा कारगर सिध्द नहीं हो रही थी तब वहां जाकर सच्चे पत्रकार की भूमिका निभाई। यथा-"यह वह समय था जब वहाँ भयंकर आतंकवाद फैला हुआ था, खालिस्तान की माँग को लेकर। तब वहाँ हर दिन दस बीस मासूमों की जानें जाती थीं। कहा जाता था कि पंजाब पुलिस गुपचुप खालिस्तानियों का साथ दे रही थी। भारत सरकार इस बारे में बहुत चिंतित थी। वह किसी भरोसेमंद पत्रकार से इस बारे में निष्पक्ष रिपोर्ट और जानकारी चाहती थी। कोई पत्रकार उन दिनों पंजाब जाकर खतरा नहीं उठाना चाहता था। खालिस्तानियों ने पंजाब के कई पत्रकारों-लेखकों की हत्या भी कर दी थी। उन्हीं गुरुदासपुर, अमृतसर और फिरोजपुर के इलाकों में इनसे जाने को कहा गया था। ये जाने को तैयार हो गये।"२ इस तरह कमलेश्वर ने जान पर खेलकर सच्चे पत्रकार होने का किरदार निभाया। जब-जब धार्मिकता के नाम पर कटुता बढ जाती थी तब-तब कमलेश्वर की कलम एक सच्चे पत्रकार की पहचान कराकर देती थी। जिसमें किसी भी तरह का व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं है। उन्होंने बाबरी विध्वंस के दौरान जो समाजभिमुख पत्रकार का कार्य किया उस संदर्भ में जीवनीकार गायत्री कमलेश्वर लिखती है कि, "जैसे-जैसे राम मंदिर आंदोलन ने जोर पकडा, बातें बदलने लगी। नरेन्द्र मोहन के कानपुर ऑफिस से खबरें आने लगीं और जिद की जाने लगी कि उन्हें दिल्ली में छापा जाए। और जब ध्वंस से पहले कार-सेवकों ने बाबरी मजिस्द पर हमला किया तो कानपुर से खबर आई कि नौ सौ कार सेवक मारे गये हैं। इस खबर को कमलेश्वर जी सही सूचना के आधार पर छापना चाहते थे। ये रात भर ऑफिस में रहे।...इन्होंने कानपुर से आई खबरों को एक तरफ रखकर सही खबर छापी कि नौ सौ कार-सेवक नहीं, सिर्फ उन्नीस मरे हैं, जिनमें से नौ के मौतों की पुष्टि की जा सकती है क्योंकि दस लोगों की लाशें नहीं मिली है, यह कवरेज नरेन्द्र मोहन जी को खल गया।...खबरों को लेकर नरेन्द्र मोहन जी से इनका -झगडा हुआ। नतीजा यह हुआ कि इन्हें सम्पादक के पद से इस्तीफा देना पडा।"३ इस तरह कमलेश्वर एक ऐसे पत्रकार थे जो पत्रकारिता को धर्मनिरपेक्ष, लोकाभिमुख, जनवादी, राष्ट्रवादी दृष्टि से देखते थे। पत्रकार का कार्य जनता के प्रश्नों को वाणी देना है। राष्ट्रीयता, धर्मनिरपेक्षता यह उनके विचारों के मूलतत्त्व थे। जिसका उन्होंने सदैव पालन किया।

कमलेश्वर पत्रकारिता का धर्म अच्छी तरह से पहचानते थे। इसलिए जहाँ कहीं भी उन्हें अन्याय दिखाई देता वे उसका कडा विरोध करते थे। उन्होंने अपने पत्रकारिता को राष्ट्रहित तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि वे लोकहित के पक्षधर थे। इसलिए उनके बीच का पत्रकार सभी लोगों की मदद के लिए सामने आता है। जाति-धर्म, देश-विदेश यह बंधन उसके लिए कोई मायने नहीं रखते हैं। जो जरुरतमंद है, उसकी खुले दिल से मदद करो। यह न देखों की वह किस जाति-धर्म का है या कहाँ वास्तव करता है। ऐसे ही पाकिस्तानी कैदी के रिहाई के बारे में उनके सच्चे पत्रकार के दर्शन इस रुप में होते हैं। यथा-"एक बार जयपुर जेल में बंद एक पाकिस्तानी कैदी साजिद बशीर का पत्र आया। उसमें लिखा था कि वह २० साल से वहाँ जेल में बंद है। उसकी अवधि पूरी हो चुकी है और उसके साथ के कैदियों को छोड़ दिया गया है। पर उसके कागजात समय से नहीं पहुँचे थे इसलिए उसे दुबारा जेल में डाल दिया गया है। उसने लिखा कि वह उनके लेख दैनिक भास्कर में पढ़ता है और उसे विश्वास है कि वे ही इस बारे में कुछ कर सकते हैं।... उनको दैनिक भास्कर कॉलम लिखना ही था। उस में साजिद बशीर को छोड़ने की अपील करते हुए कमलेश्वर जी ने कालम लिखा। कुछ दिन बाद पता चला कि साजिद बशीर को जेल से छोड़ दिया गया है।"४ इस तरह सच्चे पत्रकार के रुप में कमलेश्वर हमारे सामने आते हैं। जिनका व्यक्तित्व समाजनिष्ठ पत्रकार का दिखाई देता है। जो समाज के प्रश्नों के लिए सदैव कर्मरत है। आज के वैश्वीकरण के युग में जहाँ पत्रकारिता की दिशा पूँजीपतियों के हाथ में चली जा रही है। ऐसे समय में हमें कमलेश्वर जैसा पत्रकार याद आता है। जो किसी भी स्वार्थ से परे जनवादिता की भूमिका अंत तक निभाता है और आनेवाले पीढ़ियों को सच्चे पत्रकारिता की जनचेतना देता है।

संदर्भ ग्रंथ

१. चंद यादें ,चंद मुलाकातें - सं. आचार्य सारथी रुमी, पृ.६५

२. कमलेश्वर मेरे हमसफर - गायत्री कमलेश्वर पृ.१४२-१४३

३. वही पृ. १४४-१४५

४. कमलेश्वर : चंद यादे, चंद मुलाकातें - सं. आचार्य सारथी रुमी, पृ.२२

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डॉ.अनंत वडघणे

हिंदी विभाग,

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा

विश्वविद्यालय, औरंगाबाद

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