मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

समीक्षा / व्यंग्य संग्रह / सागर मंथन चालू है :समय की कसौटी पर / कमलेश ‘कमल’

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हिंदी साहित्य आज विविध विधाओं से समृद्ध है । कहानी, निबंध ,उपन्यास आदि अपने विकास के चरम पर है । साहित्य में व्यंग्य का अपना विशिष्ट स्थान है । वक्रता , उग्रता और अभिव्यंजनात्मकता के द्वारा इसने अपनी विशेष पहचान बनाई है । साहित्य, समाज की सत् असत् चितवृत्तियों ,गतिविधियों का संग्रह है । समाज की इन असत् वृत्तियों को कथा ,उपन्यास आदि के माध्यम से आइना दिखाता है : व्यंग्य । अपनी बात रखने का एक सशक्त माध्यम है : व्यंग्य ।

प्राचीन से आधुनिक काल तक चाहे कबीर हो या नागार्जुन या फिर शरद जोशी, हरिशंकर परसाई । इन सभी ने व्यंग्य के माध्यम से समाज की समस्याओं का पोस्टमार्टम किया है । आधुनिक युवा व्यंग्य जगत में श्री शशिकांत सिंह ‘शशि’ का नाम बड़े आदर से लिया जाता है । व्यंग्य जगत् में प्रसिद्धि का पैमाना संख्या या मात्रा पर नहीं लेखनी की मारक क्षमता पर निर्भर है । व्यंग्यकार शशि जी पर यह सिद्धांत अक्षरशः लागू होता है ।

समरथ को नहीं दोष (२००१ ), ऊधो ! दिन चुनाव के आए ( २००५ ) ,बटन दबाओ पार्थ (२०१३ ) सागर मंथन चालू है (२०१६ )एवं नवीनतम उपन्यास ‘प्रजातंत्र के प्रेत’ (२०१७) इनकी उल्लेखनीय रचनाएँ हैं । ‘बटन दबाओ पार्थ ‘व्यंग्य संग्रह काफी चर्चित रहा ।

हाल ही में प्रकाशित व्यंग्य संग्रह ‘सागर मंथन चालू है’ भाषा और भाव की दृष्टि से उत्कृष्ट और श्रेष्ठ रचना है । लेखक का समाज , राजनीति, प्रशासन के प्रति विस्तृत चिंतन का प्रतिफल है ।

इस संग्रह में धरती पर एक दिन, सागर मंथन चालू है, घटोत्कच, गूँगी प्रजा का वकील, एक और ईदगाह, मुर्गाबाडा ,प्लेटफॉर्म न.-४,शेखचिल्ली खड़े बाजार में आदि व्यंग्य रचनाएँ महत्त्वपूर्ण है ।

‘धरती पर एक दिन’ कहानी में सुख सुविधाभोगी देवतुल्य लोगों को आम आदमी की समस्याओं से साक्षात्कार करवाया गया है । चमत्कार रूपी भ्रष्टाचार के बिना कोई विलासितापूर्ण जीवन कैसे जी सकता है ? ईमानदारी से सरल जीवन जीना कितना कठिन और दुष्कर है । यही कहानी का कथ्य है ।

‘सागर मंथन चालू है ’ इनकी प्रतिनिधि रचना है । मिथकीयता को आधार बनाकर आधुनिक संदर्भ में सागर मंथन की कल्पना करना व्यंग्यकार की नवरचनाधर्मिता का प्रयोग नवीन दृष्टि को उजागर करता है । समाज और देश पर जिनका प्रभाव है, वे ही प्रभु है , देवता है । वे ही सारी सुख सुविधाओं के हकदार हैं । गरीब के हिस्से में केवल दुख और दुविधा है । लेखक ने तर्काधारित इस निबंध में इन सभी समस्याओं को अपने निशाने पर रखा है । आम आदमी के लिए साधन संपन्नता मृगमरीचिकावत् है ।

‘घटोत्कच’ कहानी में संवादों का सुंदर प्रयोग हुआ । घटोत्कच के माध्यम से लेखक का आक्रोश व्यक्त हुआ है । घटोत्कच वर्तमान संदर्भ में या लोकतंत्र में केवल वोट बैंक का प्रतीक बनकर उभरा है । जो राजनीति की स्वार्थपरता का मोहरा मात्र है । आज धर्म और राष्ट्रप्रेम के नाम पर न जाने कितने घटोत्कचों का जीवन दाँव पर है । यह एक विचारणीय प्रश्न है । कहानी के अंत में घटोत्कच का युद्ध के लिए तैयार होना आमजन का सत्ताधारियों के समक्ष अपनी विवशता को दर्शाता है । लोकतांत्रिक व्यवस्था की खामियों पर व्यंग्यकार की पैनी नजर अपने कथ्य में सफल होती है ।

फ्लेटफॉर्म न. ४ कहानी में शोषण, भुखमरी ,अशिक्षा ‘एक और ईदगाह’ में आर्थिक विषमता के साथ बालमन की संवेदना ‘मुर्गाबाडा’ में इंसान की स्वार्थपरता और’ शेखचिल्ली खडे बाजार में’ में बाजारवाद की प्रवृत्ति इत्यादि समस्याओं को उकेरा गया है ।

इस प्रकार ‘सागर मंथन चालू है’ व्यंग्य संग्रह में युवा व्यंग्यकार शशिकांत सिंह ‘शशि’ ने पौराणिक संदर्भों , ऐतिहासिक घटनाओं आदि को आधार बनाकर अपने बेबाक अंदाज में समाज ,प्रशासन और राजनीति की विसंगतियों , विद्रुपताओं और समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता, असमानता ,राजनैतिक अवसरवादिता का कच्चा चिट्ठा खोला है । गंभीर से गंभीर विषय को सरल और रोचक ढंग से अभिव्यक्त करना इनके लेखन का वैशिष्ट्य है । प्रशासन और राजनीति की जटिलताएँ निरंतर कलम के निशाने पर है ।

संग्रह विषय वस्तु की दृष्टि से जितना समृद्ध है,भाषा की दृष्टि से भी उतना ही प्रौढ । भाषा भावों की अनुगामिनी है । सर्वत्र सरल भाषा का परिमार्जित और प्रांजल रूप द्रष्टव्य है । प्रसंगानुकूल और पात्रानुकूल भाषा का प्रयोग प्रशस्य है । तत्सम , तद्भव और उर्दू शब्दों का आवश्यकतानुसार प्रयोग हुआ है । ‘हातिम की हाय हाय’ में उर्दू शब्दों की रोचकता की एक बानगी-

‘‘ ऐ खुदा के नेक बंदे! यहाँ का बादशाह आवाम की फ्रिक नहीं करता है।’’

‘‘ ऐ रहमत ऐ खुदाई ! मैंने खुदा के फजल से फतह हासिल की ।’’

कहीं कहीं आंग्ल भाषा के शब्दों ने कथ्य को प्रभावी बनाया है

जैसे - यू इडियट ! गेट आउट । ( धरती पर एक दिन से )

भाषा में एक ताजगी है, जीवंतता है, एक प्रवाह है । कथाएँ लंबी है लेकिन बोझिल नहीं । पाठकों को बाँधकर रखने की क्षमता है ।

जैसे - ‘‘फुटपाथिया बच्चे चूँकि संविधान नहीं पढ़ते ,इसलिए जल्दी बालिग हो जाते हैं।’’ (फ्लेटफार्म नं.४ से )

‘‘ ऑफर और ग्राहकों में वहीं संबंध है जो गुड़ और मक्खियों में ।’’(शेखचिल्ली खड़े बाजार में )

संक्षेपतः ‘सागर मंथन चालू है’ एक प्रौढ़ और गंभीर व्यंग्य संग्रह है । भावों की विविधता ,भाषा की सरलता और शैली की रोचकता का त्रिवेणी संगम दृष्टव्य है । स्वस्थ समाज और देश के निर्माण के लिए यह संग्रह रामबाण औषधि के माफिक है जिसका सेवन हर पाठक को करना चाहिए ।

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आलोच्य पुस्तक : सागर मंथन चालू है

लेखक : शशिकांत सिंह ‘शशि’

प्रकाशक : अनंग प्रकाशन नई दिल्ली

मूल्य : २९५

कमलेश ‘कमल’

(हिंदी शिक्षक)

मु.पो. भगवतगढ

जिलाःसवाईमाधोपुर राजस्थान

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