सोमवार, 6 मार्च 2017

प्राची - जनवरी 2017 / शोध लेख / सामाजिक परिवर्तन की विशेषताएँ - मौसमी सिंह

शोध लेख

सामाजिक परिवर्तन की विशेषताएँ

- मौसमी सिंह

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रिवर्तन प्रकृति का एक शाश्वत और अटल नियम हैं. मानव समाज भी इस प्रकृति का एक अंग होने के कारण गतिशील है, परिवर्तनशील है. समाज की इस परिवर्तनशील प्रकृति को स्वीकारते हुए प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैकाइवर ने लिखा है- ‘‘समाज परिवर्तनशील है एवं गत्यात्मक है.’’1 गिन्सबर्ग ने सामाजिक परिवर्तन का अर्थ और परिभाषा को समझाते हुए लिखा है- ‘‘सामाजिक परिवर्तन से मेरा तात्पर्य सामाजिक ढांचे में परिवर्तन से है. उदाहरण के रूप में समाज के आकार उसके विभिन्न अंगों की बनावट या सन्तुलन अथवा उसके संगठन के प्रकारों में होने वाले परिवर्तन से है।’’2 इस परिभाषा से स्पष्ट होता है कि परिवर्तन की प्रक्रिया समाज में सदैव विद्यमान रहती है. इस परिवर्तन के संबंध में यह प्रश्न बराबर उठता रहा है कि यह क्यों और कैसे होता है, पर इसका समाधान आजतक नहीं हो पाया हैं. इस प्रश्न के जवाब में सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि प्राचीन क्रम में नये को स्थान देने के लिए परिवर्तन होता है. फिचर के अनुसार- ‘‘पूर्व स्थिति अथवा रहन-सहन के तरीकों में भिन्नता को ही संक्षेप में परिवर्तन के रूप में परिभा-िात किया जाता है.’’3 सामाजिक संतुलन के लिए बदलाव आवश्यक हैं. हम स्थायित्व और सुरक्षा को प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहते हैं. अतः विश्व के अन्य तत्त्वों की तरह मानव जीवन और उसका समाज अपरिहार्य रूप से और बिना किसी छूट के हमेशा परिवर्तित होते रहता है.

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साहित्यशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों ने परिवर्तन की प्रकृति और उसके कारणों पर गंभीरता पूर्वक विचार किया है. उन्होंने इसकी प्रकृति को स्पष्ट करते हुए उसकी कुछ विशेषताओं की चर्चा की है जो निम्नलिखित हैं-

1. सार्वभौमिकता (Universality)- सामाजिक परिवर्तन एक शास्वत घटना है. यह हर समाज में किसी न किसी रूप में अवश्य पाया जाता है. विश्व में ऐसा कोई भी समाज नहीं है जहाँ परिवर्तन की घटना न घटती हो. यही कारण है कि हरबर्ट स्पेन्सर ने कहा है कि ‘‘परिवर्तन समाज का नियम है.’’ आदिम काल में जंगल में रहने और भटकनें वाला मानव असभ्य और बर्बर कहलाता था, पर मानसिक और सामाजिक बदलाव के कारण ही आज उसके वंशज नयी सभ्यता की चमक-दमक के बीच विचरण कर रहे हैं. उसे सभ्य और सुसंस्कृत मानव के नाम से सम्बोधित किया जा रहा है.

2. अनिवार्य घटना (Esential Phenomenon)- जैसा कि परिवर्तन प्रकृति का अनिवार्य नियम हैं. अतः प्रकृति का एक अंग होने के कारण समाज में भी उथल-पुथल होती है, बदलाव होता है. समाज में जनसंख्या बढ़ती है और इसके बढ़ने से लोगों की आवश्यकताएँ और इच्छाएँ भी बढ़ती हैं. इनकी पूर्ति के लिए समाज में अनिवार्य रूप से परिवर्तन होता है. यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि समाज की अनिक्षा और इच्छा पर परिवर्तन निर्भर नहीं करता हैं. अनेक बार इसका विरोध भी होता है. लोग इसके प्रति अनिक्षा प्रकट करते हैं, फिर भी वे बदलाव को रोक नहीं पाते हैं. उदाहरण के लिए प्राचीन काल में हमारे रहन-सहन, खान-पान, प्रेम विवाह आदि की कई ऐसी धारणाएँ थीं, तरीके थे जो आज बदल रहे हैं. इसे स्वीकारने में लोगों को कठिनाई हो रही है. वे कभी-कभी अंदर और बाहर से इसका विरोध भी करते हैं पर इसे रोक नहीं पा रहे हैं. अतः इस संबंध में यह कहा जा सकता है कि सामाजिक परिवर्तन एक अनिवार्य घटना है, इसे रोका नहीं जा सकता है.

3. असमान गति (Unequal speed)- सामाजिक परिवर्तन एक सार्वभौमिक और अनिवार्य घटना है, लेकिन इसकी गति में असमानता दिखलाई देती है. आदिम एवं पूर्वी देशों के समाजों की तुलना में आधुनिक एवं पश्चिमी समाजों में परिवर्तन तीव्रगति से होता है. यही नहीं, बल्कि एक ही समाज के विभिन्न अंगों में भी परिवर्तन की गति में असामनता पायी जाती है. कुछ ऐसे समाज हैं, जहाँ उसके परिवर्तन की गति तीव्र है, जैसे अमेरिका, यूरोप, रूस आदि के समाज तो कुछ ऐसे समाज भी हैं जहाँ इसकी गति मध्यम या मन्द है, जैसे भारत और अफ्रीकी देशों के समाज. यही नहीं, कभी-कभी एक समाज के अन्दर भी परिवर्तन की गति में भिन्नता देखी जाती है. इससे स्पष्ट होता है कि परिवर्तन एक शाश्वत प्रक्रिया है, पर इसकी गति असमान होती है.

4. विविध कारक- सामाजिक परिवर्तन का कोई एक कारक या परिणाम नहीं होता, अपितु यह विभिन्न प्रकार के कारकों का परिणाम है. इसकी वजह यह है कि यह एक जटिल प्रक्रिया है. अतः एक साथ कई कारकों के मेल से ही परिवर्तन की घटना घटित होती है. जैविकीय कारक, जनसंख्यात्मक कारक, आर्थिक कारक, औद्योगिकीय कारक, राजनीतिक कारक, सांस्कृतिक कारक, व्यक्तित्व कारक, प्राकृतिक कारक जैसे अनेक कारकों का यह परिणाम है.

5. विशद् अवधारणा (Broad concept)- सामाजिक परिवर्तन को एक विशद् अवधारणा कहा जा सकता है, क्योंकि इसका संबंध सम्पूर्ण समुदाय या समाज में होने वाली बदलाव से है. जब किसी समाज के अधिकांश व्यक्तियों के पारस्परिक संबंधों, विचार के तरीकों और कायरें में परिवर्तन होते हैं तब इसे सामाजिक परिवर्तन की संज्ञा दी जाती है. इस तरह सामाजिक परिवर्तन थोड़े व्यक्तियों तक सीमित न होकर

अधिकांश लोगों में देखा जाता है.

6. विभिन्न स्वरूप (Various form)- साहित्यशास्त्रियों, मानवशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों ने सामाजिक परिवर्तन के विभिन्न रूपों की चर्चा की है. कुछ विद्वानों का मत है कि समाज में परिवर्तन चक्रीय रूप में होता है अर्थात् हम जहाँ से प्रारम्भ करते हैं पुनः वही आ जाते हैं जैसे-एक फैशन का बदलना और कुछ वर्षो के बाद उसी का पुनः प्रचलित होना. दूसरी ओर कुछ ऐसे विद्वान हैं जो मानते हैं कि परिवर्तन एक ही दिशा में विकसित होता है जिसे रेखकीय परिवर्तन कहा जाता है. इसी तरह कुछ ऐसे मनीषी भी हैं जिनकी धारणा है कि सामाजिक परिवर्तन वक्र रेखा की तरह होता है, यानि कभी यह परिवर्तन तीव्र गति से होता है, कभी मध्यम गति से होता है और कभी मन्द गति से होता है. परिवर्तन कई प्रकार की विचत्रिताओं को समेटे हुए रहता है, क्योंकि कभी यह कल्याणकारी दिखता है तो कभी यह घातक और विनाशकारी होता है. लिहाजा कहा जा सकता है कि इसके अनेक स्वरूप हैं और स्परूप की अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं.

7. भविष्यवाणी सम्भव नहीं (Predictions not posible)- सामाजिक परिवर्तन की निश्चित भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है. यह कब और किस दिशा में होगा, इसका परिणाम अच्छा होगा या बुरा, इसका कौन सा रूप प्रभाव पूर्ण होगा और कौन सा घातक. इस संबंध में प्रमाणिक तौर पर कुछ बलताना कठिन है. परिर्तन की दिशाक्रम, रूप आदि हमेशा अनिश्चित रहते हैं.

8. जटिल तथ्य (Complex afct)- सामाजिक परिवर्तन एक जटिल तथ्य है. इसकी वजह यह है कि इसका अधिक सम्बन्ध गुणात्मक संबंध से होता है और गुणात्मक परिवर्तन की माप में कठिनता की वजह से इसकी जटिलता बढ़ जाती है.

इस तरह हम कह सकते हैं कि सामाजिक परिवर्तन एक अनिवार्य प्रक्रिया है. यह निरंतर चलते रहता है. जिस तरह मानव जीवन में समयानुसार बदलाव होता है, इसी तरह परिस्थिति के अनुसार समाज बदलता है उसकी भंगिमाएं बदलती हैं उसके मिजाज में परिवर्तन होता है. यह एक शास्वत घटना है. परिवर्तन के कारण ही मानव और समाज आज गहन अध्ययन का दिलचस्प और महत्त्वपूर्ण विषय बना हुआ है. संसार के विभिन्न समाजों के अध्ययन से स्पष्ट है कि अतीत की अपेक्षा वर्तमान युग में परिवर्तन अधिक तेजी से हो गयी है। इस आधार पर प्रसिद्ध सामाजशास्त्री ग्रीन (।ण्ॅण् ळतममद) ने कहा है कि ‘‘परिवर्तन का उत्साहपूर्ण स्वागत जीवन का प्रायः एक ढंग-सा बन चुका है.’’4 स्पष्ट है कि आज के युग में वही व्यक्ति सबसे अधिक सफल हो पाता है जो बदलती हुई परिस्थितियों में सबसे अधिक अनुकूलन कर लेता है.

संदर्भ संकेतः-

1. प्रो. एम. एल. गुप्ता एवं डॉ. डी. डी. शर्माः समाजशास्त्र, साहित्य भवन पब्लिकेशन, आगरा, 2016, पृ. 68

2. वही, पृ. 69

3. डॉ. गोपाल कृष्ण अग्रवालः समाजशास्त्र, साहित्य भवन पब्लिशर्स डिस्ट्रीब्यूटर्स प्रा. लि., आगरा, 2001, पृ. 205

4. वही, पृ. 207

सम्पर्कः शोध-छात्रा, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग

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