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शब्द संधानचूँ चूँ करती आई चिड़िया / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

शैलेन्द्र सिंह की कलाकृति

काफी पहले मेरे आँगन में आया करती थी चिड़िया। दाने चुगती थी और दुबारा आने के लिए उड़ जाती थी। उसके दुबारा आने का हम इंतज़ार करते थे। हमने तब एक बाल-कविता में पढ़ा था – चिड़िया हैं चूँ चूँ बोल रहीं / कानों में अमृत घोल रहीं।” चिड़िया की चूँ चूँ की आवाज़ आज भी कानों में बसी हुई है। लेकिन अब आँगन नहीं हैं और चिड़िया भी गायब है। बांसों के झुरमुट भी तो अब मुश्किल से ही दिखाई देते हैं। किताबों में सिर्फ पंक्तियाँ भर रह गईं हैं। “बांसों का झुरमुट ...हैं चहक रहीं चिड़ियाँ टी वी टी टूट टूट”।

चिड़िया, या कहें गौरैया, एक घरेलू पक्षी है। ज्यादातर लोग पक्षियों को जंगल से जोड़कर देखते हैं, जब कि बहुत से पक्षी कृषियोग्य ज़मीनों और पोखरों के आस-पास बसर करते हैं। गौरैया तो घरों के आँगन में ही दाना चुगती है और घर के ही किसी कोने में या घर के पास के ही वृक्षों की किसी खोह में अपना घोंसला बना लेती है। ये गौरैयां एक डाल से दूसरी डाल पर आसानी से, बिना किसी अड़चन के, फुदकती रहतीं हैं। चिड़िया एक जंगली पक्षी नहीं हैं। घरेलू वातावरण ही चिड़िया को रास आता है। उसकी सारी ज़रूरतें किसी भी व्यक्ति का घर पूरी कर देता है। यूं घर तो आज भी हैं, लेकिन अफसोस अब ये चिड़ियों के काबिल नहीं रहे। छोटे छोटे दरबों में आज हम रहते हैं। घरों में आँगन गायब हो गए हैं और वृक्ष भी बस नाम मात्र के ही बचे हैं। जब हम खुद ही कांक्रीट के जंगलों में रह रहे हैं तो चिड़ियाँ हमारे पास भला कैसे फटकें। वे कहाँ जाएं ? जंगल तो उनका घर है ही नहीं। यही एक बड़ा कारण है की चिड़ियाँ दिन-ब-दिन कम होती जा रहीं हैं। लेकिन अभी भी वक्त है हम चिड़ियों के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। उन्हें बचाया जा सकता है। अपनी जीवन-शैली में यदि हम थोड़ा सा परिवर्तन ला सकें तो यह संभव है। अपने परिवेश को थोड़ा सा बदल दें तो यह संभव है। और यह काम व्यक्तिगत स्तर पर भी किया जा सकता है और शासकीय स्तर पर तो यह बहुत ज़रूरी है। शहरों में जगह-जगह पार्क बने, खेलने-कूदने के लिए मैदान हों और साथ ही चिड़ियों की रक्षा के लिए एक अभियान भी हो। हमारे मन में चिड़ियों के प्रति करुणा पैदा की जाए और उनके दाना-पानी के लिए हम अपने घरों के अन्दर, बाहर और छतों पर इंतज़ाम कर सकें तो चिड़ियों की वापसी नि:संदेह संभव है।

चिड़ियों की चहचहाहट और उनकी उपस्थिति हमें आनंद से भर देती है। आमतौर पर सभी प्रकार की चिड़ियों की उपस्थिति हमारे हक़ में ही है। सांस्कृतिक, साहित्यिक और दार्शनिक क्षेत्र तक में बहुत बड़ा उनका योगदान रहा है। बसेरों से बेदखल होते परिंदों के लिए हमारी कोशिश वस्तुत: मनुष्य की सभ्यता को बचाने का ही प्रयास है। भारत का दर्शन-शास्त्र मनुष्य के शरीर को एक पिंजड़े की तरह देखता है। कबीर कहते हैं, “दस द्वारे का पींजरा यामें पंछी पौन / रहिबे को है आचरज, जाए तो अचरज कौन !” इन्द्रियाँ रूपी हमारे शरीर में दस दरवाज़े हैं, उनमें आत्मा रूपी पंछी का फुदकना और पिंजड़े को ही घर समझना मायामोह के जाल में फंसना है। उपनिषदों ने भी आत्मा के लिए बार बार पक्षी की ही उपमाएं दीं हैं। उपनिषद् कहता है, जीव और ब्रह्म साख्य-भाव से एक ही डाल बैठी दो चिड़ियाँ हैं -- “द्वा सपर्णा सयुजा सखाया”। योग-शास्त्र में “विहंगम योग” का ज़िक्र है और उसे श्रेष्ठ योग बताया गया है क्योंकि इसके ज़रिए परमात्मा तक उसी सहजता से पहुंचा जा सकता है जिस प्रकार एक चिड़िया सरलता से एक से दूसरी डाल पर पहुँच जाती है। चिड़िया ‘ऊर्ध्व आरोहण’ का प्रतीक है। महाभारत में चिड़िया के साथ मनुष्य के दो सम्बन्ध स्पष्ट किए गए हैं। बंध-सम्बन्ध और वध-सम्बन्ध, या तो मनुष्य पक्षियों के प्रेम सम्बन्ध में बंध जाता है या वह पक्षियों को अपना भोज्य बना लेता है। पक्षी विलुप्त हो रहे हैं और अब समय आ गया है कि हम उन्हें भोज्य न बनाकर उनके साथ अपने प्रेम सम्बन्ध को जोड़ें और उन्हें बचाने की भरसक कोशिश करें।

डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड –

इलाहाबाद -२११००१

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chidiyaon per doctor surender verma ji ka bahut hi sunder aur arthpurn aalekh hai...
sach hai ki hum parkrti se bahut dur hote jaa rahe hai ...vo natural anand hame nahi mil paa raha hai ... ummid hai vermaji ka ye article achha prabhav chhodega

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