सुनो ! आज तुम बहुत याद आ रहे हो - विवेक मणि त्रिपाठी

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सुनो ! आज तुम बहुत याद आ रहे हो...........
लेकिन सुना है कि,
याद आने के लिए भूलना जरुरी होता है ,
तो क्या मैं तुम्हें भुला भी था ?
सुनो ! आज तुम बहुत याद आ रहे हो...........


सुना है कि याद आने के लिए मिलना जरुरी होता है,
तो क्या हम मिले भी थे ?
हमारा मन मिला था या तन ......
या दोनों मिले थे ?
सुनो ! आज तुम बहुत याद आ रहे  हो...........


सुना है कि याद आने के लिए बिछड़ना भी जरुरी होता है,
तो क्या हम एक दुसरे से बिछड़े भी थे ?
हमारा शरीर हीं बिछड़ा था या दिल भी ?
सुनो ! आज तुम बहुत याद आ रहे  हो...........


सुनो ! ना मैं तुम्हें कभी भुला था,
ना हीं कभी भुला पाउँगा
मेरे जीवन में तुम उतना हीं महत्वपूर्ण हो
जितना जीवन के लिए साँस
जितना रोगी के लिए दवा
जितना भक्त के लिए भगवान्
सुनो ! आज तुम बहुत याद आ रहे  हो...........


सुनो ! हम मिले थे,
और फिर मिलेंगे,
वैसे हीं,
जैसे बादल से पानी,
जैसे सागर में नदी,
सुनो ! हम कभी नहीं बिछड़ सकते.......
हम साथ रहेंगे
एक दुसरे की
यादों में ...सासों में .....
हम सपनों में मिला करेंगे
वैसे हीं, जैसे सबसे नज़रें बचा के,
चोरी –चुपके मिला करते थे,
सुनो ! आज तुम बहुत याद आ रहे  हो...........


सुनो ! हम एक दुसरे की यादों में,
वैसे हीं साथ बने रहेंगे,
जैसे प्रकृति और मानव,
जैसे कमल और भंवरा,
जैसे गीत और संगीत,
जैसे शहद और मिठास,
सुनो ! आज तुम बहुत याद आ रहे  हो...........


सुनो ! प्रेम शाश्वत होता है,
और हमारा प्रेम भी शाश्वत है,
राधा और कृष्ण के प्रेम की तरह,
सुनो ! आज तुम बहुत याद आ रहे हो........

 

 

कवि परिचय – सम्प्रति चीन के कुआन्ग्तोंग विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, कुआन्ग्चौ  में हिंदी भाषा विशेषज्ञ के रूप में कार्यरत. पूर्व में भारत के गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय, गांधीनगर एवं मगध विश्वविद्यालय, बोधगया में चीनी भाषा एवं साहित्य के अध्यापन कार्य में कार्यरत.
संपर्क – 2294414833@qq.com 

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