सोमवार, 6 मार्च 2017

शब्द संधान / बात की बात / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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बात की क्या बात है ! किसी भी जगह घुसपैठ कर सकती है। किसने ही अर्थों में कितनी ही जगह बिना रोक-टोक दाखिल हो जाती है। बात करने के लिए कोई भी बात छेड़ी जा सकती है।

सामान्यत: ‘बात’ का अर्थ कथन या उक्ति से है। मैं बात कहता हूँ (कथन); मैंने आपकी बात (उक्ति) सुन ली। लेकिन बात का अर्थ विस्तार इससे कहीं अधिक है। बात वचन देना है, कौल या करार है। अनुबंध है – ‘प्राण जाएं पर वचन न जाई।’ बात आज्ञा, भर्त्सना है। ‘तुमने मेरी बात नहीं मानी; लो, अब भुगतो।’ बात आग्रह है – मेरी बात मान लो अन्यथा पछताओगे ! बात उपदेश है – ‘उपदेशक सामान्यत: बहुत अच्छी अच्छी बातें बताते हैं, लेकिन अफसोस, हम उनका पालन नहीं कर पाते।’ बात घटना है – “ आज बाज़ार में एक ऐसी बात हो गई जो होना नहीं चाहिए थी।’’ बात चर्चा है – मैंने तो बात सहज भाव से कही थी लेकिन वो तो सार्वजनिक चर्चा ही बन गई ! बात परामर्श है, सुझाव है – मेरी बात मानो तो गाली-गलौज करना बंद कर दो। बात परिस्थिति है – मुझे अपने मित्र के यहाँ जाने में कोई आपत्ति नहीं है लेकिन आज कुछ बात ही ऐसी है की वहां जाना ठीक नहीं है। बात बहाना है – अगर मैं बात न बनाता तो छुट्टी मिलना मुश्किल था ! बात आन-बान है – कहते हैं न, कुछ लोगों की तो बात ही अलग होती है ! और तो और, ‘बात’ विवाह प्रस्ताव तक बन जाती है। शादी तो बेशक एक ही जगह होगी लेकिन बात तो कई जगह करने ही होती है। प्रस्ताव ही नहीं बात प्रसंग भी है। समझ में नहीं आता, तो पूछना तो पड़ता ही है, आप किसकी बात कर रहे हैं ? बात के हज़ार प्रसंग हैं, किस किस की बात करें!

हिन्दी भाषा में हम बात के साथ भला क्या क्या नहीं करते। हम बात उठाते हैं, बात उड़ा देते हैं। बात कहते हैं, कहकर काट देते हैं। हम बात बघारते हैं और बात का बतंगड़ बना देते हैं। हम बात कान में डाल दे ते हैं, और बात की तह में पहुँचने की कोशिश करते हैं। कभी बातें छांटते हैं कभी चबा जाते हैं। कभी बात दुहराते हैं, कभी बात टाल जाते हैं। बात पकड़ लेते हैं, बात छेड़ देते हैं। बात बनाते हैं; बात में बात मिलाते हैं। अपनी बात रखते हैं, दूसरे की बात पकड़ते हैं। बात पी जाते हैं, बात पचा लेते हैं। बात बढाते हैं, बात फैलाते हैं। बात बनाते हैं, बात बिगाड़ते हैं। बात गढ़ते हैं, बात खोलते हैं। बात करते हैं और बात से ‘फिर’ जाते हैं। हम बात के धनी हैं, बात के पक्के हैं। बात बात में बात बदल देते हैं। कुछ लोग चुप रहते हैं, कुछ बातून होते हैं। हर समय बतियाते रहते हैं। चुप रहने वाले या बतियाने वाले, सभी बात के मारे हैं

लोग बात करते रहते हैं, लेकिन बात पर नहीं आते। वे बात से कतराते रहते हैं। वे कूटनीतिज्ञ हैं। वे दूसरों को घुमा-फिरा कर बात पर ले आते हैं। खुद साफ़ बच निकलते हैं। बात बिगड़ने नहीं देते। बात बने न बने यह बात अलग है। बात जारी रखते हैं।

बात बात में बात उठती है। बात बात में बात खुलती है। अगर बात न उठे तो तो भला कौन करे बात। बात बात से ही जुड़ती है। रूठों हुओं को बात ही मनाती है। बातूनी लोग बातों का झाड लगा देते हैं, बातों की झड़ी बाँध देते हैं। बातों में फुसलाते हैं। बातों में बहलाते हैं। बातों में उलझाते हैं। लम्बी चौड़ी बातें चटकाते हैं। भोले भाले लोग उनकी बातों में आभी जाते हैं। बातफरोशी इसी को कहते हैं।

बात की क्या बात है ! उसकी व्याकरण कुछ अलग ही है। उसकी पद-व्याख्या संभव नहीं। वह संज्ञा भी है और क्रिया भी। वह क्रिया-विशेषण भी है और संज्ञा विशेषण भी है। विस्मयादिबोधक है बात ! वाह, क्या बात है !

हम वार्ता करते हैं, वार्तालाप करते हैं। आपस में तो करते ही हैं, नाटकों के संवाद बोलते समय, परिचर्चा करते समय, भेंटवार्ता में भी हम बातचीत ही करते है। बहुत कुछ पतंगबाजी की तरह है बातबाज़ी। हम बात उठाते हैं, काटते है। इसे बढाने का हुनर सीखना पड़ता है हरेक के बूते की बात नहीं है। बात है तो उसके विशेषज्ञ भी हैं। कूटनीतिज्ञ हैं, मसखरे हैं, साहित्यकार हैं, बुद्धिजीवी हैं, जोकर हैं, नेता हैं। ज़रूरी नहीं कि पैसेवाले ही धनी हों लोग बात के भी धनी होते हैं। कुछ बातें (घटनाएं) सामयिक होती हैं, कुछ भूतकालीन। इन दोनों को मिलाकर भविष्य की बात बन जाती है। इसमें इतिहासकार, समाजशास्त्री और दार्शनिक तीनों ही अपनी अपनी भूमिका अदा करते हैं।

उर्दू में एक शब्द है ‘बातिल’। पता नहीं, यह ‘बातिल ‘बात’ से निकला है या नहीं लेकिन बातिल का अर्थ असत्य, झूठ बात है। बेकार, व्यर्थ की बात है। कुछ लोग ‘बातिलपरस्त’ होते है – झूठ बात करने में अभ्यस्त और निपुण। लेकिन जो असत्य बात का खंडन करते हैं वे ‘बातिलशिकन’ कहलाते हैं भारत में पेशेवर गवाह अधिकतर बातिलपरस्त ही होते हैं।

डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड, इलाहाबाद – २११००१

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