रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

शब्द संधान / बाज़ार / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

image

एक बहुत लोकप्रिय गीत है –‘दुनिया का हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ / बाज़ार से निकला हूँ खरीदार नहीं हूँ’; लेकिन ऐसा होना बहुत मुश्किल है। दुनिया में रहकर दुनियादारी से विरक्त रहना और बाज़ार में जाकर भी खरीदारी न करना, ऐसा सामान्यत: होता नहीं। बाज़ार तो खरीद-फरोक्त की जगह है। आप कुछ न खरीदने के इरादे से भी यदि बाज़ार में घूम रहे हों तो भी, बाज़ार से आकर्षित होकर आप कुछ न कुछ खरीद ही बैठते हैं।

बाज़ार मंडी है, हाट है। यहाँ से आप खरीदारी करते हैं, यहाँ सामान बिकता है। यह वह स्थान है जहां हम साधारण आवश्यकता की अपनी वस्तुएं उनकी कीमत चुका कर प्राप्त कर सकते हैं। जहां चीजें बेंची और खरीदी जाती हैं। बाज़ार व्यापार की जगह है। व्यापार करने वाले व्यापारी कहलाते हैं। उर्दू/फारसी में वणिकों को और व्यापारियों को ‘बाज़ारगाँ’ कहते हैं। बाज़ार शब्द भी मूलत: फारसी भाषा का ही एक शब्द है लेकिन यह उर्दू और हिन्दी में ऐसा रच-बस गया है कि हिन्दी भाषियों को यह पराया लगता ही नहीं है। भारत में अब यह हिन्दी भाषा का ही शब्द है। हिन्दी शब्दकोष और हिन्दी बोलचाल से इसे खारिज नहीं किया जा सकता। वैसे हिन्दी में इसके लिए मंडी और हाट शब्द भी इस्तेमाल में आते हैं पर सर्वाधिक प्रचलित शब्द बाज़ार ही है।

हिन्दी में एक और शब्द है, महल्ला। महल्ला आमतौर पर शहर या कस्बे के एक भाग, टोले, के रूप में जाना जाता है। लेकिन कभी कभी इसे बाज़ार के अर्थ में भी प्रयोग किया जाता है। किसी ख़ास वस्तु के बेचने की जहां ढेरों दूकाने हों वह स्थान उस वस्तु के नाम से महल्ला या बाज़ार बन जाता है। जैसे चूड़ी बाज़ार या महल्ला, ठठेरी बाज़ार या महल्ला, आदि। वेश्याओं के महल्ले को वेश्या बाज़ार भी कहते हैं। उर्दू में इसे बाजारे हुस्न कहा गया है।

बाज़ार ने कई अन्य शब्दों को समेत रखा है। ‘बाज़ार-भाव’. या ’बाज़ार-मूल्य’ बाज़ार में किसी वस्तु की यदि प्रचलित दर है। बाज़ार भाव ‘चढ़ता’ ‘उतरता’ रहता है। कभी दाम ‘गिर’ जाते हैं तो बाज़ार गिर जाता है, कभी दाम ऊंचे ‘उठ’ जाते है तो बाज़ार भी उठ जाता है। जब दाम बहुत ऊंचे हो जाते हैं और सामान्य जन की पहुँच में नहीं रहते तो इसे ‘बाज़ार में आग लगना’ कहा गया है। पर बाज़ार में यह ‘तेज़ी’ और ‘मंदी’ लगी ही रहती है। भाव के हिसाब से ‘बाज़ार मांग’ भी चढती-उतरती रहती है। बाज़ार की भाषा ही अलग है। बाज़ार उतरता है, गिरता है; बाज़ार गरम होता है, बाज़ार तेज़ होता है, चमकता है, चलता है। बाज़ार खुलता है, बंद होता है। ‘खुला बाज़ार’ वह बाज़ार है जहां वस्तुओं पर कर नहीं लगाया जाता।

बाज़ार बेशक जगह तो खरीद और बिक्री की ही है, लेकिन लोग मटरगश्ती करने भी बाज़ार जाते हैं। वे बाज़ार ‘नापते’ हैं, ‘नापते-फिरते’ हैं बाजारी (खरीद-फरोक्त) नहीं करते। लेकिन मजेदार बात यह है कि बाज़ार में ऐसे बिलावजह घूमने फिरने वाले लोग ‘बाजारी लोग’ कहलाते हैं ! बाजारी लोग अशिष्ट जन हैं। इन्हें ‘बाज़ार का गज’ भी कहा गया है। वेश्या एक ‘बाजारी औरत’ है। ‘बाजारी भाषा’ अप-भाषा है, सज्जन लोग बाजारी भाषा नहीं बोलते। बाजारी कहें या बाजारू, बात एक ही है। ‘बाजारी खबर’ निरी गप होती है। ‘बाजारू बात’ पर कोई विश्वास भला क्यों करे? हिंदी भाषा में बाज़ार का लाक्षणिक रूप खूब इस्तेमाल हुआ है। बाज़ार लगाने का अर्थ दुकान खोलना ही नहीं है, किसी भी चीज़ का नाजायज़ प्रदर्शन भी बाज़ार लगाना है। आसानी से मिल जाने वाली कोई भी चीज़ ‘बाज़ार की मिठाई’ है।

आजकल हिन्दी साहित्य में बाज़ार के विरोध में एक सुविचारित मुहिम सी चल गई है। आज बाज़ार न सिर्फ हमारी भाषा-भूषा को प्रभावित कर रहा है बल्कि इसके प्रभुत्व से हमारी मानसिकता भी बदलती चली जा रही है। अब मूल्य का अर्थ हमारे लिए केवल वस्तुओं का दाम भर रह गया है। बाक़ी सारे नैतिक मूल्य तिरोहित होते जा रहे हैं। हमें अपनी ईमानदारी, अपनी सद्भावनाओं को भी ‘बेचने’ में कोई हिचक नहीं रही है| बाज़ार के इस ‘बाजारूपन’ ने हमें मानो जकड़ लिया है। इससे मुक्ति के लिए भौतिक वस्तुओं और बाज़ार से हमें अपना मोह कम करना ही पड़ेगा। कबीर ने बहुत पहले ही कह दिया था – “कबीरा खड़े बाज़ार में लिए लुकाटी हाथ / जो घर फूंके आपनो सो चले हमारे साथ।”

--डॉ. सुरेंद्र वर्मा (९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड, इलाहाबाद -२११०११

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

नैतिकतायाद त

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget