गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

सुरेन्द्र वर्मा के 15 लिमरिक

लिमरिक (२)

(१)

मित्र एक क्वांरा था कृष्णामाचारी

रियाज़ करता था राग दरबारी

आधी उम्र बीती

आईं मिस प्रीती

बेचारा मारा गया ब्रह्मचारी

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(२)

भूखों जो मरते थे सो काजू चबाते हैं

देख उन्हें हंसनेवाले आंसू बहाते हैं

समाज पर क्या बीती

कैसी यह राजनीति

कबूतर लड़ाते थे सो कबूतर उड़ाते है

(३)

लड़ने की आदत है सो अपने से लड़ते हैं

और कोई मिलता नहीं स्वयं से झगड़ते हैं

क्रोधादि शमन करते

इच्छाएं दमन करते

वादी, प्रतिवादी बारी बारी से बनते हैं

(४)

सांबर इडली दोसे की है धाक जम गई

भजिए और समोसों की तो नाक कट गई

श्रीखंड व पूरन पोडी

वृन्दावन की खाती छोरी

खुरचन, पेडे मावाबाटी ? साफ़ नट गई

(५)

हिन्दी बोलें, पढ़ें संस्कृत श्रीमान मिसराजी

पहल करें अंगरेजी की, लिखते है गुजराती

लड़का गया विलायत

लड़की ब्याही कायथ

पड़े लिखे खुद गुरुकुल के, कोंवेंट में नाती

(६)

आरोह, अवरोह, ताल, स्वर, गत

सब कुछ है शास्त्रीय, शत-प्रतिशत

गर्दभ संगीत ने मोहा

मानते सभी लोहा

खुसरो से लेकर भातखंडे तक

(७)

ठीक नीचे शर्माजी , नीचे श्रीवास्तव

ऊपर श्री वर्माजी, ओर ऊपर धारकर

बीचोंबीच हम हैं

चिमगादड सब हैं

दिन में सो जाते हैं, नाचते हैं रात भर

(८)

होटल में पीता हूँ ईंट रंग कहवा

चुप रहता कभी बोलता हूँ सहसा

आती कोई पंक्ति याद

गा देता बिना बात

आखिर तरल कवि हूँ ‘बहता’

(९)

हुलिया फटीचर, पर दिल के रईस हैं

बाज़ार में बच्चे को दिलाते टाफीज़ हैं

खाली पर्स देखकर

कहते हैं, मित्रवर

क्या पास आपके कुछ पैसे, प्लीज़, हैं?

(१०)

मथुरा के श्री पाण्डे जी श्रीखंड खाते हैं

पुणे के हलवाई खुरचन बनाते हैं

सांस्कृतिक एकता

भोजन या कविता

उर्दू में दोहे ग़ज़ल हिंदी में रचाते हैं

(११)

सोखता मिलाकर थी रबडी बनाई

पूछा जब हमने, यह क्या किया भाई?

बोला, करें क्या

भूखन मरें क्या

सात कन्याएं हैं और एक ठो लुगाई

(१२)

कबूतरों का जोड़ा एक करता था गुटुर गूं

निसार एक दूजे पर जैसे लैला मजनूं 

चोंचें लड़ाते थे

पर फड़फड़ाते थे

मुर्गा पड़ोस का कुढा तभी, कुकड़ू कुकुड कूं

(१३)

दूध के गिलास ने पहन रखा स्लीपर था

शायद अचेतन का एक बेहतरीन फीचर था

जाने थी क्या बला

आधुनिक चित्रकला

प्रदर्शनी में वह चित्र लेकिन प्रथम पुरस्कृत था

(१४)

भूल गए राग-रंग भूल गए छकड़ी

तीन चीजें याद रहीं, नोन तेल लकड़ी

कहावत याद कर

बोले श्री पारकर

लिमिरिक ने लीजिए एक और तुक पकड़ी

(१५)

हमारा यह नगर है बहुत बहुरंगी

सब्जी नहीं मिलती, बाज़ार सब्जी मंडी

देखा सराफा जब

सर खुजलाया तब

ज़ेबर की जगह यहाँ बिकती है कंघी

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