सोमवार, 3 अप्रैल 2017

हास्य-व्यंग्य-संस्मरण : मेरे संपादक! मेरे प्रकाशक!! - यशवंत कोठारी - भाग 2

मेरे संपादक !

मेरे प्रकाशक!!

यशवंत कोठारी

भाग एक यहाँ पढ़ें

(2)

कभी किसी संपादक से मिलने दफ्तर जाना अच्छा समझा जाता था, संपादक भी बैठने को कहते, संस्था की चाय भी पिला देते, मगर अब ऐसा नहीं है. डेड लाइन का भूत हर संपादक के सर पर सवार रहता है.. सम्पादकीय दृष्टि का क्या फर्क पड़ता है इसका एक उदाहरण बताता चलूँ, सारिका में कमलेश्वर ने विश्व साहित्य में गणिका विशेषांक निकाले चर्चित रहे, साहित्य का भी मान बढ़ा. बाद में अवध नारायण मुद्गल ने देह व्यापार पर विशेषांक निकाले, प्रसारण  तो बढ़ा, मगर बड़ी बदनामी हुई, पाठकों ने मालिकों से कहा, सेठानी ने कहा –इस मुनीम को यहाँ क्यों बैठा रखा है? बाद में नया ज्ञानोदय में भी बेवफाई पर अंक छपे, पाठकों ने मालिकों को बताया, तीसरा अंक नहीं छपा. नया ज्ञानोदय मामले में विभूति नारायण राय को तो नौकरी बचा ने के लिए माफ़ी मंगनी पड़ी. धर्मयुग में भारती के जाने के बाद, कोई संपादक सफल नहीं हो सका. अन्य संस्थानों में संपादकों पर प्रबन्धन हावी हो गया है.

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जय सिंह एस राठौर की भी चर्चा करना चाहूँगा, उन्होंने मुझे तब छापा जब कोई नहीं छाप रहा था. प्रेम से घर बुलाते, पारिश्रमिक देते चाय पिलाते और नए काम देते. श्री गोपाल पुरोहित ने भी मुझे खूब अवसर दिए. सरकारी पत्रिकाओं के संपादकों ने मुझे कभी घास नहीं डाली मैंने भी ज्यादा परवाह नहीं की. मधुमती में छपे एक लेख के विरोध में लेखकों का एक गुट अकादमी अध्यक्ष के घर चला गया, लेकिन मेरे रचनाएँ बदस्तूर छपती रहीं. कुछ अन्य मेरी पसन्द के संपादकों में बिशन सिंह शेखावत, दीना नाथ  मिश्र, ओम थानवी, आनन्द जोशी, यशवंत व्यास, शिला झुनझुनवाला, विष्णु नागर, अनूप श्रीवास्तव, ब्रजेन्द्र राही, गिरिजा व्यास, योगेन्द्र लल्ला, महेश जोशी, असीम चेतन, अभिषेक सिंघल, राजेन्द्र कसेरा, हनुमान गलवा, चाँद मोहम्मद शेख  ज्ञान पाटनी के नाम गिनना चाहूँगा, इसका मतलब यह नहीं की बाकी के संपादक खराब है लेकिन ज्यादा काम नहीं पड़ा. दूर दर्शन के चन्द्र कुमार वेरठे, राधेश्याम तिवारी ममता चतुर्वेदी,, शैलेंद्र उपाध्याय, महेश दर्पण, अनिल दाधीच, मनमोहन सरल, आदि ने भी बहुत सहयोग दिया. आकाशवाणी वाले मुझे कम ही याद करते हैं, कई बार चक्कर लगाओ तो एकाध बार बुलाते हैं उनकी मर्जी.

राजस्थान साहित्य अकादमी ने व्यंग्य संकलनों के संपादन का भार मदन केवलिया, पूरण सरमा, अरविन्द तिवारी, अतुल चतुर्वेदी को दिया, मदन केवलिया व पूरण सरमा के संकलनों में मुझे अवसर नहीं मिला, शेष छपे ही नहीं. मंजू गुप्ता व दुर्गा प्रसाद अग्रवाल –यश गोयल के संपादन में छापे संकलनों में मैं  भी हूँ. राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, प्रकाशन विभाग व साहित्य अकादमी के संकलनों तक मेरी पहुँच नहीं, वहां दिल्ली–वाद हावी है.

व्यंग्य रचनाओं के साथ सबसे बड़ी समस्या लम्बाई की है, छोटी लिखो तो मज़ा नहीं आता, बड़ी लिखो तो सम्पादक स्पेस की कमी की बात करते हैं. कुछ संपादक एक निश्चित शब्द सीमा की ही रचना चाहते हैं, हर बार वे ऐसा ही करने को कहते हैं.

एक और संपादक की याद बड़ी शिद्दत से आ रही है, ये सज्जन एक दैनिक में थे, अक्सर डोसा, काफी सेवन के बाद रचना छापते, पारिश्रमिक की बात करने पर छापना बंद करने की घोषणा करते. एक संपादक ऐसे भी थे जो विषय आप से लेते फिर उसी विषय पर स्टाफ से लिखवाते, स्टाफ के बिल में लिखते –यदि यह रचना बाहर से लिखवाते तो दुगुना खर्च आता अतः: स्टाफ से लिखवाया, स्टाफ खुश.

स्टाफ के अंदर की राजनीति का एक मनोरंजक किस्सा यों है –एक बड़े अख़बार के सम्पादक ने रचना मंगवाई, छपी, एक स्टाफ मैंबर ने जाने ऊपर मैनेजमेंट से क्या कहा कि पेमेंट रुक गया, शिकायत हुई मगर तब तक जिस ने रचना मंगवाई थी उसने भुगतान करवा दिया, मगर कुछ दिनों के बाद ही संपादक ने वह संस्थान छोड़ दिया.

बालेन्दु शेखर तिवारी ने अभीक निकाला, मुझे भी अवसर दिया. नई  गुदगुदी, के मोदीजी इंजीनियर है, फिर भी अच्छे संपादक है. रंग चकल्लस के रामावतार त्यागी ने अवसर तो दिया मगर कार्यक्रम के लायक नहीं समझा, उन्होंने ब्राह्मणों का खूब पक्ष लिया, आगे जाकर कायस्थ संपादकों का बोल बाला हो गया, कमलेश्वर, भारती, भटनागर, अवस्थी, आ गये. के पि सक्सेना खूब छपे. शरद जोशी ने भी संपादक का भार लिया मगर ज्यादा चले नहीं. कई प्रकाशक भी संपादक रखने लगे हैं मगर ये बेचारे पीर बावर्ची भिश्ती खर याने प्रूफ रीडिंग से लगाकर बण्डल ट्रांसपोर्ट तक पहुंचाने तक का काम करते  हैं. कुछ ज्यादा होशियार होते हैं तो प्रकाशन सलाहकार का मुखौटा लगा लेते हैं, या फिर क्रय समिति का लायीजन करते हैं. जो लोग सेल्फ पब्लिशिंग कर रहे हैं वे इस से वाकिफ हैं.

बहुत सारे सम्पादकों ने मुझे नहीं छापा, बहुत सारों ने बार बार छापा. काफी प्रकाशन निःशुल्क हुए. कई बार फीचर एजेंसीज ने लगातार छापा मगर  पैसे नहीं दिए.

(अगले भाग में जारी...)

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