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ललित साहू "जख्मी" छुरा की कविताएँ

मातृत्व का अहसास

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जब बड़ी हुई, घर में शहनाइयाँ बजीं,
छोड़ आई मैं, बाबुल के दामन को।
अरमानों की फूलों से सुंदर सेज सजी,
ईश्वर मान लिया मैंने अपने साजन को।


           सास, ननद, जेठानी ने भी खुब छेड़ा,
           कहा कब चहकाओगी घर आंगन को।
           शर्म से लाल हुई, पर मैंने कह ही दिया,
           बीत जाने तो दो जरा इस सावन को।


जाने कितने ही सावन हैं अब बीत गये,
फिर भी कुछ नहीं है खबर बताने को।
सब चिंतित हुए, मेरा मन व्यथित हुआ,
अब कोई होगा या नहीं मुझे सताने को।


          वैद्य हकीम सबने बड़ी पेशियाँ बांधी,
           मैं दर-दर भटकी नाड़ी दिखाने को।
           जाप किया, व्रत रखे, धागे भी बांधे,
           फिर भी तड़पी मातृत्व सुख पाने को।


मैं अब मुंह फेरने लगी महफिलों से,
सह ना पाती थी अपनों के तानो को।
कुरेदते हैं घाव लोग बड़ी नजाकत से,
कुछ चले आये यूं ही हमदर्दी जताने को।


           तभी एक रोज कोख से आवाज आई,
           माँ.! मैं बेताब हूं कोख से बाहर आने को,
           तूने मेरे लिए बहुत आंसू बहाये हैं, माँ.!
           अब मैं तैयार हूं तेरा गम बिसराने को।


सुबक मैं रोने लगी..सपनों में खोने लगी,
कोई लफ्ज़ ही नहीं, अहसास कह पाने को।
खुश चेहरा, आँखों में आंसू, हाथ कोख पर,
इतना ही काफी है सारी बातें समझाने को।


प्यारे भोले भंडारी
जग का जो उद्धार करे
सबकी नईया भवपार करे
टीके समक्ष ना कोई अहंकारी
ऐसे हैं प्यारे भोले भंडारी
जटा में गंगा विराज करे
अंग भस्म से श्रृंगार करे
तांडव उसकी प्रचंडकारी
ऐसे हैं प्यारे भोले भंडारी
त्रिनेत्र खोल के प्रहार करे
दुश्मन का संहार करे
नंदी पर करते हैं सवारी
ऐसे हैं प्यारे भोले भंडारी
कैलाश पर वास करे
सदीयों तक उपवास करे
उमा पति है त्रिशूलधारी
ऐसे हैं हमारे भोले भंडारी
कंठ विष धारण करे
मंत्रों का उच्चारण करे
डमरु उसकी मनोहारी
ऐसे हैं हमारे भोले भंडारी
तीन लोक दस दिशाएं सम्मान करे
राक्षस भी जिसका ध्यान करे
भक्तन के वो करते रखवारी
ऐसे हैं हमारे भोले भंडारी ।।


मेरे पिता को युद्ध ने मारा
           यहां  शीतयुद्ध सा  माहौल,
           बनाने वाला  भला कौन है।
           जिसने पेट्रोल में फेंकी तीली,
           वही शख्स ही  अब मौन है।
मृत्युशैय्या तक पहुंचाने वाला,
पाक, युद्ध या कोई और है।
शत्रु को निर्दोष बताने वाली,
ये नादान ही गुरमेहर कौर है।
           इस मुद्दे पर सबने रोटी सेंकी,
           इस पर भी किया मैंने गौर है।
           वही अर्थ और वही है अनर्थ,
           ये मीडिया का अनोखा दौर है।
नाम पाक पर नापाक इरादे,
गर्त ही उन गद्दारों का ठौर है।
कल भी था और सदैव रहेगा,
भारत ही जग का सिरमौर है।
           ना कल किसी ने युद्ध चाहा,
           ना आज किसी की चाहत है।
           गर जिंदा हैं मौत बांटने वाले,
           तब भी हमे ही तो लानत है।
बेशक पिता  तुमने है खोया,
पर दर्द से और भी आहत हैं।
लज्जित ना हो उनकी कुर्बानी,
अनमोल उनकी ये शहादत है।

बुला लेना मुझे
जब खामोशी मन को भाने लगे,
तुमसे दूर कोई अपना जाने लगे।
तब तुम बेझिझक बुला लेना मुझे,
जब परछाईयां दामन छुड़ाने लगे।
           मैं गैर सही पर अपनों से भला हूं,
           जिंदगी के तजुर्बे में रोज जला हूं।
           तब तुम बेझिझक बुला लेना मुझे,
           जब तुम्हारे कदम डगमगाने लगे।
जब नींद ख्वाबों से ही घबराने लगे,
बीते लम्हों की कसक तड़पाने लगे।
तब तुम  बेझिझक बुला लेना मुझे,
जब दर्द खुशियों पर मुस्कुराने लगे।
           जख्मों का रंग भी जब गहराने लगे,
           आँखें सूखी दिल आंसू बहाने लगे।
           तब तुम  बेझिझक बुला लेना मुझे,
           जब ठंडी हवा तन को जलाने लगे।
चाँदनी रात जब तुम्हें चिढाने लगे,
ज़ज्बातों की थाप तुम्हें ताने लगे।
तब तुम बेझिझक बुला लेना मुझे,
जब मेरी याद हर-पल सताने लगे।


अब कैसे मेरी होली हो
जब इस धरा पर खूनी रास हो,
विवश मानवता का उपहास हो।
इंसानियत भी बहुत निराश हो,
षडयंत्रों में घिरा वीर हताश हो। 
        जब बहनों के माथे से उजड़ी रोली हो,
        तुम्ही बताओ अब कैसे मेरी होली हो?
गुलाल नहीं लहू से मिट्टी लाल हो,
माँ के हाथों चिराग बुझी थाल हो।
जब भेड़ियों ने ओढी शेर खाल हो,
कायरता भरी उनकी हर चाल हो।
        जब किसी ने छुपकर चलाई गोली हो,
        तुम्ही बताओ अब कैसे मेरी होली हो?
जब शत्रु अपने बीच विद्यमान हो,
घात-अघात का कैसे अनुमान हो।
चहूं ओर अपराधों का जयगान हो,
अमन पथ भी दिखता सुनसान हो।
        जब संवाद-भाषा आतंक की बोली हो,
        तुम्ही बताओ अब कैसे मेरी होली हो?
जब कुछ घरों में मातम पसरा हो,
दर्द असहनीय और घाव गहरा हो।
जब तिरंगे से लिपट वीर निखरा हो,
मासूम उम्मीदें फर्श पर बिखरा हो।
        जब गमों से भरी किसी की झोली हो,
        तुम्ही बताओ अब कैसे मेरी होली हो।


मित्र संतोष को चंद लाइनें समर्पित..
रह-रह कर ठंडी बयार,
राग-रंगों की चलती रही।
पर किसी की कमी भी,
हर-पल हमें खलती रही।
        होली में लोगों के चेहरे,
        हरे, गुलाबी लाल दिखे।
        पर ना कालू(संतोष)दिखा,
        ना कालू के बवाल दिखे।
सच ये प्राण है क्षण भंगुर,
फिर भी मोह अनोखा है।
इस पर इच्छामृत्यु का खेल,
अपनों संग किया धोखा है।
        यादों में तो तुम अमिट हो,
        पर मिट गये इस धरा से।
        वो लम्हे हमें याद आते हैं,
        तुमने बिताये जो जरा से।
हो चाहे जितनी मुश्किलें,
दुनिया से कभी हारना नहीं।
जुड़ी होती है और जिन्दगी,
खुद को कभी मारना नहीं।


मेरे राम के इस देश में
गर माँ से बड़ी माया हो,
मन मैला उजली काया हो।
गर रिश्ते लगने लगे बौने,
फैला लालच का साया हो।
जब बच्चों की परवरिश,
दूर से हो रहा संदेश में।
दशरथ तो खुद बनते नहीं,
कौन दौड़े एक आदेश में।
जब सहमी हो मानवता,
अविश्वास हो महेश में।
धर्म कहां से फिर लौटे,
मेरे राम के इस देश में।
       गर मद श्वान चढ़ा सर हो,
      और गौमाता ही बेघर हो।
      लाज शरम को बेच कहीं,
      लादे तन कनक जेवर हो।
      गर कुल कुटिया खण्डित,
      और महल हो परदेश में।
      करते औरों की चाकरी,
      और अकड़ हो स्वदेश में।
      यूं पांचाली की शपथ भूल,
      हाथ फेरोगे नारी केश में।
      धर्म कहां से फिर लौटे,
      मेरे राम के इस देश में।
गर प्यासी हो शमसीर,
रक्तिम कण-कण हो।
लाज बचाने का भय,
रमा को क्षण-क्षण हो।
जब मजहब हो ठेके पर,
और ठेकेदार हो तैश में।
शांतिवार्ता भी मिथक,
लगती इस परिवेश में।
ग्रंथों का हो अल्प ज्ञान,
और बातें हो आवेश में।
धर्म कहां से फिर लौटे,
मेरे राम के इस देश में।


ललित साहू "जख्मी" छुरा
जिला-गरियाबंद (छ.ग.)
9993841525

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