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कहानी / बांभन मामा / आलोक कुमार सातपुते

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मेरी कॉलोनी में एक बांभन महाराज रहते थे। वे एक क्लर्क थे, और चपरासी से पदोन्नति पाकर क्लर्क बने थे, पर वे इस बात को कभी स्वीकारते नहीं थे। वे अपने-आपको हमेशा एक अधिकारी ही बताते थे। वैसे भी हमारे देश में बांभन होना ही अपने आप में अधिकारी हो जाना होता है। ख़ै़र शुरू में मुझे उनके बारे में कुछ भी नहीं मालूम था, और मैं उन्हें एक बड़ा अधिकारी ही मानता रहा। एक दिन सामान्य बातचीत के दौरान मैंने उनसे अपने एक मित्र का जिक्र किया। मेरा वह मित्र उन्हीं के विभाग में अफ़़सर था। मेरे उस दोस्त का जिक्र छिड़ते ही उन्होंने कहा-अरे हां, मैं तो उन्हें अच्छी तरह से जानता हूँ। वह तो मेरे अण्डर में चपरासी था, और मुझे गर्मागर्म रोटियाँ बनाकर खिलाया करता था। महाराज-महाराज कहते हुए वह मेरे पैर छूता रहता था। आपका वह दोस्त जात का चमार जरूर है, पर है बड़ा़ ही सज्जन आदमी।

मुझे अपने उस मित्र के बारे में नई जानकारी मिली थी कि वह किसी समय चपरासी हुआ करता था। खै़र रहा होगा, मुझे क्या? मुझे तो प्रॉब्लम थी उसके पैर छूने वाली बात से क्योंकि मेरा वह मित्र बडा़ ही प्रोग्रेसिव बनता था। वह दलित आंदोलनों से जुड़ा हुआ था, और बड़ी ही क्रांतिकारी प्रगतिशील कविताएँ लिखा करता था। ऐसे में उसका महाराज-महाराज कहकर पैर छूने की बात उसके दोगलेपन को उजागर कर रही थी। मैंने अब ठान लिया कि मेरे उस मित्र के चेहरे से मुझे प्रगतिशीलता की नक़ाब उतारनी है। एक दिन मेरी उस मित्र से मुलाकात हो गई। मैंने उससे उन बांभन महाराज का जिक्र करते हुए कहा कि कैसे बे तू बडा़ प्रोग्रेसिव बनता है, और महाराज-महाराज करते हुए उसका पैर छूता रहता है। क्या यही तेरी प्रगतिशीलता है? इस पर उसने जोर से ठहाका लगाया और बताना शुरू किया-अबे मैं उसका नहीं, बल्कि वो मेरा चपरासी था और मुझे गर्मागर्म रोटियां वो बनाकर खिलाया करता था। जब चपरासी से क्लर्क में उसके प्रमोशन की फ़ाईल मेरे पास आई, तो एक दिन अकेले में उसने मेरा पैर छुते हुए कहा था कि महाराज आप मेरे माई-बाप हो। आपकी कृपा हुई तो, मैं चपरासी से क्लर्क बन जाऊंगा और मैं आपका जीवनभर अहसानमंद रहूँगा। मैं जीवन भर आपका चरण धोकर पियूंगा। अबे वो तो चपरासी से क्लर्क भी मेरी कृपा से ही बना है । वो साला तो अब नमस्ते तक नहीं करता है। उसके खुलासे के बाद ही मुझे पता चला था कि वो बांभन महाराज दोहरे चरित्र के स्वामी हैं।


      इसी कडी़ में मुझे अपने एक मामा याद आते हैं। मुझे अपने बचपन की बहुत सी बातें याद हैं। वे हमारी ही जाति के थे। हम बचपन से ही उनसे परिचित थे। मुझे यह भी याद है कि हमें प्रायः सभी रिश्तेदारों से प्यार मिलता था, बस वे ही हमसे दुत्कार कर बात करते थे। उन दिनों हम दाने-दाने को मोहताज़़ थे। उन्होंने दो बडे़-बडे़ कुत्ते पाल रखे थे। वे उन्हें बडे़ ही जतन से रखते थे। वे जानबूझकर हमारे सामने ही उन्हें खाने को देते। उन कुत्तों को खाता देख कर हमारे मुंह में पानी भर आता था। वे उन कुत्तों को अपने साथ सुलाते भी थे। वे बड़े ही दंभी कि़स्म के व्यक्ति थे। उनकी बडी-बडी़ मूंछें थी। उनका पहला इंपे्रशन पुरानी फिल्मों के ठाकुरों-जमींदारों का सा था। चँूकि दूर की रिश्तेदारी थी, सो माँ के कहने पर हमें उनके घर जाना ही पड़ता था। हम कोई भी भाई-बहन उनके घर नहीं जाना चाहते थे। हमारी नासमझी की उम्र होने पर भी हमें उनकी जली-कटी बातें पूरी तरह समझ में आती थीं।दुत्कार की भाषा तो जानवर भी समझ जाते हैं।


       बांभन मामा एक सरकारी कॉलेज़़ में प्रोफेसर थे। वे हर दृष्टि से एलिट क्लॉस के थे। यूँ तो आम-तौर पर वे हमें चाय के लिये पूछते नहीं थे, पर कभी-कभार जब चाय के वक़्त हम उनके घर पहुँच जाते तो हमें चाय मिल जाया करती। मैं अक्सर ध्यान देता था कि मामा के लिए चाय अलग कप में आती थी, और हमें टूटे-फूटे कप में चाय दी जाती थी। मामा के नौकर का लड़का मेरे ही साथ मेरी ही क्लॉस में पढ़ता था। उसने बताया था कि अबे तेरे मामा तो अपने-आपको ऊँची जात वाला समझते हंै। वे नौकरों और दूसरी नीची जात के लोगों को चाय देने के लिए टूटे-फूटे कप अलग ही रखते हैं। हमें जिस दिन से ये जानकारी मिली,उसी दिन से हमने उन्हें बांभन मामा कहना शुरू किया था। हम सभी भाई-बहन उन्हें बांभन मामा कहा करते थे। मामी तो उनसे भी एक कदम आगे थी। वह तो हमारे जाने पर बाहर भी नहीं निकलती थी।


          हमारे उस बांभन मामा के दो बच्चे थे। एक लड़का और एक लड़की। वे दोनों ही कान्वेण्ट स्कूल में पढ़ते थे, और टाई पहनकर रिक्शे में बैठकर किसी राजकुमार-राजकुमारी की तरह ही स्कूल जाया करते थे। हम नगर-निगम की प्रायमरी स्कूल में पढ़ते थे। उन्हें देखकर हमारे मन में एक अज़ीब तरह की हीन-भावना पनपने लगती थी। उनके दोनों बच्चे मेरी ही उम्र के आस-पास की उम्र के थे, पर वे दोनों बच्चे हमें देखकर मुंह बनाया करते थे। वे अपने दोस्तों के साथ हमारी ग़रीबी का मजाक उडा़या करते थे। वे मुझे बेहद अपमानित भी किया करते थे।


         हम धीरे-धीरे बडे़ होते जा रहे थे, और मामा के घर हमें अपनी उपेक्षा बड़ी शिद्दत से महसूस होने लगी थी। दलित जाति के व्यक्ति का इस तरह का ब्राहमणों सा व्यवहार बडा़ अजीब था। हमने उनके घर जाना लगभग बंद सा कर दिया था। अब हम माँ को स्पष्ट मना कर देते थे कि हमें उसे बांभन के घर नहीं जाना है। 


       बांभन मामा की लड़की प्रायवेट कॉलेज़ में पढ़कर डॉक्टर बन चुकी थी। और उनका लड़का भी प्राईवेट कॉलेज मे पढ़कर इंजीनियर बन गया था। उनके बच्चों में भी श्रेष्ठता की भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी। मामा ने एक अच्छा सा रिश्ता देखकर अपनी बेटी की शादी करा दी थी। लड़का ग़रीब घर से था, पर सरकारी डाक्टर था। वह एक गाँव से बिलांग करता था। लड़के की माँ अंगूठा छाप थी। मामा की लड़की ने अपनी श्रेष्ठता के अहंकार में आकर अपने पति और सास को अपमानित करना शुरू कर दिया था। उनके दाम्पत्य जीवन में बढ़ती खटास तलाक़ की सीमा तक पहुँच गई। और आखि़रकार उनका तलाक़ हो गया। बाद में मामा की सुपुत्री ने एक बेरोज़गार बांभन लड़के से शादी कर ली, जो बात-बात पर उसे उसकी नीच जात का उलाहना दिया करता था। वह उसे अपने चरणों की दासी बनाकर रखना चाहता था। ख़ै़र मामा की सुपुत्री का दूसरी बार भी तलाक़ हो गया।


     बांभन मामा का लड़का अमेरिका में सैटल हो गया था। ग्रीन कार्ड हासिल करने के चक्कर में उसने अपने से दस वर्ष बड़ी तीन बच्चों की अम्मा एक अमेरिकन महिला से शादी कर ली थी। अपने मां-बाप को वह भूल ही चुका था। मामा और मामी अब भी भ्रम पाले बैठे थे कि उनकी प्रतिष्ठा में तनिक भी आँच नहीं आई है। जात-समाज में तो वे कभी रहे नहीं थे। वे हमेशा ही श्रेष्ठि वर्ग के भ्रम में रहे, सो उन्हें लगता रहा कि चूँकि उनकी बेटी महानगर में रहती है, इसलिये उसके तलाक़ों के बारे में लोगों को कुछ भी पता नहीं होगा। पर ऐसी बातें छुपती कहां है? हम कभी-कभार उन्हें टटोलने के लिए पूछते कि आपकी सुपुत्री कहां है? इस पर वे कहते वो तो अपने ससुराल में मजे से है। लड़के के बारे में वे बताते कि वह तो श्रवण कुमार जैसा बेटा है। हमें रोज सुबह-शाम फ़ोन करता है। वहाँ पर तो वो बहुत बढि़या से रहता है। उसे तो महीने की दो लाख रू. सैलरी मिलती है। फिर वे हमें अपने बेटे द्वारा भेजी गई शुरूआती वीडियो फिल्म दिखाते। फिल्म में उसके फ्लैट के एक-एक कमरे की रिकार्डिंग और उसकी कार की विशेषताओं का बखान था। बेटा भी बाप जैसा ही डींगें मारने में उस्ताद था। ख़़ैर उनकी बेटी का दोबारा तलाक़ हो जाना या उनके बेटे का किसी तीन बच्चों की अम्मा से शादी कर लेने में कोई बुराई नही थी। ये तो व्यक्ति का नितांत ही व्यक्तिगत मामला होता है, पर इसके पीछे के सामाजिक और आर्थिक कारणों के अलावा नीयत की बात करें तो उनके पुत्र और पुत्री की ख़राब मानसिकता स्पष्ट होती थी। चूंकि उनकी लड़की के पहली ससुराल वाले हमारे परिचित में से थे, सो हमें तो उसके तलाक़ लेने की मंशा स्पष्ट ज्ञात थी।


       अब बाभंन मामा रिटायर हो चुके थे। हम सभी भाई-बहन अच्छी-अच्छी नौकरियों में आ चुके थे। हम सभी भाई-बहन पढा़ई में अच्छे थे, सो आरक्षित वर्ग के होने के बावजूद हमारा चयन सामान्य सीटों पर होता रहा, और हम दलित जाति के लिये सीटें बचाते रहे। सो दलित समाज में हमारी प्रतिष्ठा स्वतः ही निर्मित हो गई थी। समाज में हमें बेहद सम्मान की नज़रों से देखा जाता था। वैसे भी हम उगते हुए और मामा ढलते हुए सूरज थे। रिटायरमेण्ट के बाद मामा की समाज में पूछ-परख खत्म हो चुकी थी। पहले जो कुछ थोड़ी बहुत थी भी, तो वह उनके पद के कारण थी। रही-सही कसर उनके बच्चों ने पूरी कर दी थी। रिटायरमेण्ट के बाद मामा को धीरे-धीरे अपनी वास्तविक स्थिति का अहसास होने लगा था। पर उनके अन्दर के श्रेष्ठि वर्ग को को यह कतई स्वीकार नहीं था कि समाज में उनकी उपेक्षा हो। पैसों की तो उनके पास कभी कमी नहीं रही, सो उन्होंने अब समाज में अपने पैसों के दम पर जुड़ने का निश्चय किया। वैसे भी मामा-मामी अब अकेले से रह गये थे। बेटा-बेटी होने का कोई मतलब नहीं रह गया था।

बेटा अब तक पूरी तरह अमेरिकन हो चुका था, और बेटी इन दिनों किसी तीसरे व्यक्ति के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रह रही थी। उसे अपनी सामाजिक हैसियत का अहसास हो चुका था, सो वह हमारे शहर नहीं आती थी। हमारे बड़े भाई-बहन प्रतिष्ठित नौकरियों में आ चुके थे सिर्फ़ मैं और मेरी छोटी बहन ही शिक्षक थे, और बड़ी नौकरी के लिए तैयारियों में लगे हुए थे। हम दोनों भाई-बहन बडी़ लगन से तैयारी कर रहे थे। कुछ दिनों बाद हमारा चयन राज्य प्रशासनिक सेवा के सर्वोच्च पद डिप्टी कलेक्टर के लिए हो गया था। इस उपलक्ष्य में हमारे समाज ने हमारा सम्मान समारोह आयोजित किया था। बांभन मामा ने अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा हासिल करने के लिए समाज के नेताओं को चंदे के रूप में भरपूर पैसा देना शुरू कर दिया था। हमारे दलित समाज के लोग आज भी दारू और मुर्गे में बिक जाने वाले होते हंै, सो उन्होंने नियमित चंदा देने वाले बांभन मामा को अपने समाज में संरक्षक का पद दे दिया था। समाज का ‘स‘ नहीं जानने वाले हमारे बांभन मामा अब हमारे समाज के संरक्षक बन चुके थे और स्थापित तौर पर समाज सेवक घोषित हो चुके थे।


      हाँ तो हम दोनों भाई-बहन का सम्मान समारोह आयोजित था। चंदे के नियमित स्त्रोत हमारे बांभन मामा मुख्य अतिथि थे, सो उन्हें पहले बोलने का अवसर दिया गया। उन्होंने बोलना शुरू किया कि ये मेरे भानजे और भानजी आज इतने बडे़ पद पर पहुंच गये हैं। यह मेरे लिये गर्व की बात है। ये सारे दलित समाज के लिये गर्व की बात है। मैं इनके यहां तक पहुंचने का गवाह हूँ। मैंने इनकी गरीबी देखी है। ये लोग जब दाने-दाने के मोहताज थे, तब मैंने इन्हें अपने बच्चों के साथ बिठाकर खाना खिलाया था। ये दोनों तो दिनभर हमारे यहाँ ही रहते थे। मैंने तो एक तरह से इन्हें गोद ही ले रखा था। मेरी पत्नी ने भी इन्हें माँ का प्यार दिया। मेरे बच्चे तो इनके साथ इतने घुल-मिल गये थे कि वे कई सालों तक इन्हें अपने सगे भाई-बहन ही मानते रहे। वे अपने सारे खिलौने इन्हें दे देते रहे। आज ये भले ही इस बात को न स्वीकारें, पर ये अपने दिल से पूछे कि इनके यहाँ तक पहुँचने में मेरा कितना बड़ा योगदान रहा है। मेरा आशीर्वाद तो बचपन से इनके साथ ही रहा है.... इसके बाद वे और भी कुछ-कुछ कहते रहे, और लोग तालियाँ बजाते रहे, पर हम भाई-बहन के कानों में तो उनके अब तक कहे गये शब्द पिघले सीसे की तरह ही पड़ चुके थे, और हमारे कान बंद हो गये थे।


        हमारी बोलने की बारी आने पर हम सिर्फ़ इतना ही कह पाये कि हमारे बारे में तो सारी बातें हमारे मामा पहले ही कह चुके हैं, सो अब उन बातों को दुहराने का कोई मतलब नहीं रह जाता।

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                                                                                                                                आलोक कुमार सातपुते
                                                                         09827406575
                                                       832, हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी सड्डू, रायपुर (छ.ग.)
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लेखक परिचय - 1. हिन्दी, उर्दू एवं अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं में समान रूप सेलेखन
2.पाकिस्तान के अंग्रेजी अखबार डॉन के उर्दू संस्करण में लघुकथाओं का धारावाहिक प्रकाशन।
3. पुस्तकें प्रकाशन - अपने-अपने तालिबान (हिन्दी शिल्पायन एवं उर्दू आकि़फ़ बुक डिपो), बेताल फिर डाल पर (सामयिक प्रकाशन), मोहरा, बच्चा लोग ताली बजायेगा (डॉयमंड बुक्स)

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पिछड़े समाज के नवधानाद्य/उच्च पदस्थ अधिकारियों का बामन मामा जैसा ही हाल होता है .आनन्द

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