कहानी / बांभन मामा / आलोक कुमार सातपुते

SHARE:

मेरी कॉलोनी में एक बांभन महाराज रहते थे। वे एक क्लर्क थे, और चपरासी से पदोन्नति पाकर क्लर्क बने थे, पर वे इस बात को कभी स्वीकारते नहीं थे। व...

image
मेरी कॉलोनी में एक बांभन महाराज रहते थे। वे एक क्लर्क थे, और चपरासी से पदोन्नति पाकर क्लर्क बने थे, पर वे इस बात को कभी स्वीकारते नहीं थे। वे अपने-आपको हमेशा एक अधिकारी ही बताते थे। वैसे भी हमारे देश में बांभन होना ही अपने आप में अधिकारी हो जाना होता है। ख़ै़र शुरू में मुझे उनके बारे में कुछ भी नहीं मालूम था, और मैं उन्हें एक बड़ा अधिकारी ही मानता रहा। एक दिन सामान्य बातचीत के दौरान मैंने उनसे अपने एक मित्र का जिक्र किया। मेरा वह मित्र उन्हीं के विभाग में अफ़़सर था। मेरे उस दोस्त का जिक्र छिड़ते ही उन्होंने कहा-अरे हां, मैं तो उन्हें अच्छी तरह से जानता हूँ। वह तो मेरे अण्डर में चपरासी था, और मुझे गर्मागर्म रोटियाँ बनाकर खिलाया करता था। महाराज-महाराज कहते हुए वह मेरे पैर छूता रहता था। आपका वह दोस्त जात का चमार जरूर है, पर है बड़ा़ ही सज्जन आदमी।

मुझे अपने उस मित्र के बारे में नई जानकारी मिली थी कि वह किसी समय चपरासी हुआ करता था। खै़र रहा होगा, मुझे क्या? मुझे तो प्रॉब्लम थी उसके पैर छूने वाली बात से क्योंकि मेरा वह मित्र बडा़ ही प्रोग्रेसिव बनता था। वह दलित आंदोलनों से जुड़ा हुआ था, और बड़ी ही क्रांतिकारी प्रगतिशील कविताएँ लिखा करता था। ऐसे में उसका महाराज-महाराज कहकर पैर छूने की बात उसके दोगलेपन को उजागर कर रही थी। मैंने अब ठान लिया कि मेरे उस मित्र के चेहरे से मुझे प्रगतिशीलता की नक़ाब उतारनी है। एक दिन मेरी उस मित्र से मुलाकात हो गई। मैंने उससे उन बांभन महाराज का जिक्र करते हुए कहा कि कैसे बे तू बडा़ प्रोग्रेसिव बनता है, और महाराज-महाराज करते हुए उसका पैर छूता रहता है। क्या यही तेरी प्रगतिशीलता है? इस पर उसने जोर से ठहाका लगाया और बताना शुरू किया-अबे मैं उसका नहीं, बल्कि वो मेरा चपरासी था और मुझे गर्मागर्म रोटियां वो बनाकर खिलाया करता था। जब चपरासी से क्लर्क में उसके प्रमोशन की फ़ाईल मेरे पास आई, तो एक दिन अकेले में उसने मेरा पैर छुते हुए कहा था कि महाराज आप मेरे माई-बाप हो। आपकी कृपा हुई तो, मैं चपरासी से क्लर्क बन जाऊंगा और मैं आपका जीवनभर अहसानमंद रहूँगा। मैं जीवन भर आपका चरण धोकर पियूंगा। अबे वो तो चपरासी से क्लर्क भी मेरी कृपा से ही बना है । वो साला तो अब नमस्ते तक नहीं करता है। उसके खुलासे के बाद ही मुझे पता चला था कि वो बांभन महाराज दोहरे चरित्र के स्वामी हैं।


      इसी कडी़ में मुझे अपने एक मामा याद आते हैं। मुझे अपने बचपन की बहुत सी बातें याद हैं। वे हमारी ही जाति के थे। हम बचपन से ही उनसे परिचित थे। मुझे यह भी याद है कि हमें प्रायः सभी रिश्तेदारों से प्यार मिलता था, बस वे ही हमसे दुत्कार कर बात करते थे। उन दिनों हम दाने-दाने को मोहताज़़ थे। उन्होंने दो बडे़-बडे़ कुत्ते पाल रखे थे। वे उन्हें बडे़ ही जतन से रखते थे। वे जानबूझकर हमारे सामने ही उन्हें खाने को देते। उन कुत्तों को खाता देख कर हमारे मुंह में पानी भर आता था। वे उन कुत्तों को अपने साथ सुलाते भी थे। वे बड़े ही दंभी कि़स्म के व्यक्ति थे। उनकी बडी-बडी़ मूंछें थी। उनका पहला इंपे्रशन पुरानी फिल्मों के ठाकुरों-जमींदारों का सा था। चँूकि दूर की रिश्तेदारी थी, सो माँ के कहने पर हमें उनके घर जाना ही पड़ता था। हम कोई भी भाई-बहन उनके घर नहीं जाना चाहते थे। हमारी नासमझी की उम्र होने पर भी हमें उनकी जली-कटी बातें पूरी तरह समझ में आती थीं।दुत्कार की भाषा तो जानवर भी समझ जाते हैं।


       बांभन मामा एक सरकारी कॉलेज़़ में प्रोफेसर थे। वे हर दृष्टि से एलिट क्लॉस के थे। यूँ तो आम-तौर पर वे हमें चाय के लिये पूछते नहीं थे, पर कभी-कभार जब चाय के वक़्त हम उनके घर पहुँच जाते तो हमें चाय मिल जाया करती। मैं अक्सर ध्यान देता था कि मामा के लिए चाय अलग कप में आती थी, और हमें टूटे-फूटे कप में चाय दी जाती थी। मामा के नौकर का लड़का मेरे ही साथ मेरी ही क्लॉस में पढ़ता था। उसने बताया था कि अबे तेरे मामा तो अपने-आपको ऊँची जात वाला समझते हंै। वे नौकरों और दूसरी नीची जात के लोगों को चाय देने के लिए टूटे-फूटे कप अलग ही रखते हैं। हमें जिस दिन से ये जानकारी मिली,उसी दिन से हमने उन्हें बांभन मामा कहना शुरू किया था। हम सभी भाई-बहन उन्हें बांभन मामा कहा करते थे। मामी तो उनसे भी एक कदम आगे थी। वह तो हमारे जाने पर बाहर भी नहीं निकलती थी।


          हमारे उस बांभन मामा के दो बच्चे थे। एक लड़का और एक लड़की। वे दोनों ही कान्वेण्ट स्कूल में पढ़ते थे, और टाई पहनकर रिक्शे में बैठकर किसी राजकुमार-राजकुमारी की तरह ही स्कूल जाया करते थे। हम नगर-निगम की प्रायमरी स्कूल में पढ़ते थे। उन्हें देखकर हमारे मन में एक अज़ीब तरह की हीन-भावना पनपने लगती थी। उनके दोनों बच्चे मेरी ही उम्र के आस-पास की उम्र के थे, पर वे दोनों बच्चे हमें देखकर मुंह बनाया करते थे। वे अपने दोस्तों के साथ हमारी ग़रीबी का मजाक उडा़या करते थे। वे मुझे बेहद अपमानित भी किया करते थे।


         हम धीरे-धीरे बडे़ होते जा रहे थे, और मामा के घर हमें अपनी उपेक्षा बड़ी शिद्दत से महसूस होने लगी थी। दलित जाति के व्यक्ति का इस तरह का ब्राहमणों सा व्यवहार बडा़ अजीब था। हमने उनके घर जाना लगभग बंद सा कर दिया था। अब हम माँ को स्पष्ट मना कर देते थे कि हमें उसे बांभन के घर नहीं जाना है। 


       बांभन मामा की लड़की प्रायवेट कॉलेज़ में पढ़कर डॉक्टर बन चुकी थी। और उनका लड़का भी प्राईवेट कॉलेज मे पढ़कर इंजीनियर बन गया था। उनके बच्चों में भी श्रेष्ठता की भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी। मामा ने एक अच्छा सा रिश्ता देखकर अपनी बेटी की शादी करा दी थी। लड़का ग़रीब घर से था, पर सरकारी डाक्टर था। वह एक गाँव से बिलांग करता था। लड़के की माँ अंगूठा छाप थी। मामा की लड़की ने अपनी श्रेष्ठता के अहंकार में आकर अपने पति और सास को अपमानित करना शुरू कर दिया था। उनके दाम्पत्य जीवन में बढ़ती खटास तलाक़ की सीमा तक पहुँच गई। और आखि़रकार उनका तलाक़ हो गया। बाद में मामा की सुपुत्री ने एक बेरोज़गार बांभन लड़के से शादी कर ली, जो बात-बात पर उसे उसकी नीच जात का उलाहना दिया करता था। वह उसे अपने चरणों की दासी बनाकर रखना चाहता था। ख़ै़र मामा की सुपुत्री का दूसरी बार भी तलाक़ हो गया।


     बांभन मामा का लड़का अमेरिका में सैटल हो गया था। ग्रीन कार्ड हासिल करने के चक्कर में उसने अपने से दस वर्ष बड़ी तीन बच्चों की अम्मा एक अमेरिकन महिला से शादी कर ली थी। अपने मां-बाप को वह भूल ही चुका था। मामा और मामी अब भी भ्रम पाले बैठे थे कि उनकी प्रतिष्ठा में तनिक भी आँच नहीं आई है। जात-समाज में तो वे कभी रहे नहीं थे। वे हमेशा ही श्रेष्ठि वर्ग के भ्रम में रहे, सो उन्हें लगता रहा कि चूँकि उनकी बेटी महानगर में रहती है, इसलिये उसके तलाक़ों के बारे में लोगों को कुछ भी पता नहीं होगा। पर ऐसी बातें छुपती कहां है? हम कभी-कभार उन्हें टटोलने के लिए पूछते कि आपकी सुपुत्री कहां है? इस पर वे कहते वो तो अपने ससुराल में मजे से है। लड़के के बारे में वे बताते कि वह तो श्रवण कुमार जैसा बेटा है। हमें रोज सुबह-शाम फ़ोन करता है। वहाँ पर तो वो बहुत बढि़या से रहता है। उसे तो महीने की दो लाख रू. सैलरी मिलती है। फिर वे हमें अपने बेटे द्वारा भेजी गई शुरूआती वीडियो फिल्म दिखाते। फिल्म में उसके फ्लैट के एक-एक कमरे की रिकार्डिंग और उसकी कार की विशेषताओं का बखान था। बेटा भी बाप जैसा ही डींगें मारने में उस्ताद था। ख़़ैर उनकी बेटी का दोबारा तलाक़ हो जाना या उनके बेटे का किसी तीन बच्चों की अम्मा से शादी कर लेने में कोई बुराई नही थी। ये तो व्यक्ति का नितांत ही व्यक्तिगत मामला होता है, पर इसके पीछे के सामाजिक और आर्थिक कारणों के अलावा नीयत की बात करें तो उनके पुत्र और पुत्री की ख़राब मानसिकता स्पष्ट होती थी। चूंकि उनकी लड़की के पहली ससुराल वाले हमारे परिचित में से थे, सो हमें तो उसके तलाक़ लेने की मंशा स्पष्ट ज्ञात थी।


       अब बाभंन मामा रिटायर हो चुके थे। हम सभी भाई-बहन अच्छी-अच्छी नौकरियों में आ चुके थे। हम सभी भाई-बहन पढा़ई में अच्छे थे, सो आरक्षित वर्ग के होने के बावजूद हमारा चयन सामान्य सीटों पर होता रहा, और हम दलित जाति के लिये सीटें बचाते रहे। सो दलित समाज में हमारी प्रतिष्ठा स्वतः ही निर्मित हो गई थी। समाज में हमें बेहद सम्मान की नज़रों से देखा जाता था। वैसे भी हम उगते हुए और मामा ढलते हुए सूरज थे। रिटायरमेण्ट के बाद मामा की समाज में पूछ-परख खत्म हो चुकी थी। पहले जो कुछ थोड़ी बहुत थी भी, तो वह उनके पद के कारण थी। रही-सही कसर उनके बच्चों ने पूरी कर दी थी। रिटायरमेण्ट के बाद मामा को धीरे-धीरे अपनी वास्तविक स्थिति का अहसास होने लगा था। पर उनके अन्दर के श्रेष्ठि वर्ग को को यह कतई स्वीकार नहीं था कि समाज में उनकी उपेक्षा हो। पैसों की तो उनके पास कभी कमी नहीं रही, सो उन्होंने अब समाज में अपने पैसों के दम पर जुड़ने का निश्चय किया। वैसे भी मामा-मामी अब अकेले से रह गये थे। बेटा-बेटी होने का कोई मतलब नहीं रह गया था।

बेटा अब तक पूरी तरह अमेरिकन हो चुका था, और बेटी इन दिनों किसी तीसरे व्यक्ति के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रह रही थी। उसे अपनी सामाजिक हैसियत का अहसास हो चुका था, सो वह हमारे शहर नहीं आती थी। हमारे बड़े भाई-बहन प्रतिष्ठित नौकरियों में आ चुके थे सिर्फ़ मैं और मेरी छोटी बहन ही शिक्षक थे, और बड़ी नौकरी के लिए तैयारियों में लगे हुए थे। हम दोनों भाई-बहन बडी़ लगन से तैयारी कर रहे थे। कुछ दिनों बाद हमारा चयन राज्य प्रशासनिक सेवा के सर्वोच्च पद डिप्टी कलेक्टर के लिए हो गया था। इस उपलक्ष्य में हमारे समाज ने हमारा सम्मान समारोह आयोजित किया था। बांभन मामा ने अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा हासिल करने के लिए समाज के नेताओं को चंदे के रूप में भरपूर पैसा देना शुरू कर दिया था। हमारे दलित समाज के लोग आज भी दारू और मुर्गे में बिक जाने वाले होते हंै, सो उन्होंने नियमित चंदा देने वाले बांभन मामा को अपने समाज में संरक्षक का पद दे दिया था। समाज का ‘स‘ नहीं जानने वाले हमारे बांभन मामा अब हमारे समाज के संरक्षक बन चुके थे और स्थापित तौर पर समाज सेवक घोषित हो चुके थे।


      हाँ तो हम दोनों भाई-बहन का सम्मान समारोह आयोजित था। चंदे के नियमित स्त्रोत हमारे बांभन मामा मुख्य अतिथि थे, सो उन्हें पहले बोलने का अवसर दिया गया। उन्होंने बोलना शुरू किया कि ये मेरे भानजे और भानजी आज इतने बडे़ पद पर पहुंच गये हैं। यह मेरे लिये गर्व की बात है। ये सारे दलित समाज के लिये गर्व की बात है। मैं इनके यहां तक पहुंचने का गवाह हूँ। मैंने इनकी गरीबी देखी है। ये लोग जब दाने-दाने के मोहताज थे, तब मैंने इन्हें अपने बच्चों के साथ बिठाकर खाना खिलाया था। ये दोनों तो दिनभर हमारे यहाँ ही रहते थे। मैंने तो एक तरह से इन्हें गोद ही ले रखा था। मेरी पत्नी ने भी इन्हें माँ का प्यार दिया। मेरे बच्चे तो इनके साथ इतने घुल-मिल गये थे कि वे कई सालों तक इन्हें अपने सगे भाई-बहन ही मानते रहे। वे अपने सारे खिलौने इन्हें दे देते रहे। आज ये भले ही इस बात को न स्वीकारें, पर ये अपने दिल से पूछे कि इनके यहाँ तक पहुँचने में मेरा कितना बड़ा योगदान रहा है। मेरा आशीर्वाद तो बचपन से इनके साथ ही रहा है.... इसके बाद वे और भी कुछ-कुछ कहते रहे, और लोग तालियाँ बजाते रहे, पर हम भाई-बहन के कानों में तो उनके अब तक कहे गये शब्द पिघले सीसे की तरह ही पड़ चुके थे, और हमारे कान बंद हो गये थे।


        हमारी बोलने की बारी आने पर हम सिर्फ़ इतना ही कह पाये कि हमारे बारे में तो सारी बातें हमारे मामा पहले ही कह चुके हैं, सो अब उन बातों को दुहराने का कोई मतलब नहीं रह जाता।

----


                                                                                                                                आलोक कुमार सातपुते
                                                                         09827406575
                                                       832, हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी सड्डू, रायपुर (छ.ग.)
                                                                                              Blog - laghukathakranti.blogspot.com


लेखक परिचय - 1. हिन्दी, उर्दू एवं अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं में समान रूप सेलेखन
2.पाकिस्तान के अंग्रेजी अखबार डॉन के उर्दू संस्करण में लघुकथाओं का धारावाहिक प्रकाशन।
3. पुस्तकें प्रकाशन - अपने-अपने तालिबान (हिन्दी शिल्पायन एवं उर्दू आकि़फ़ बुक डिपो), बेताल फिर डाल पर (सामयिक प्रकाशन), मोहरा, बच्चा लोग ताली बजायेगा (डॉयमंड बुक्स)

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: कहानी / बांभन मामा / आलोक कुमार सातपुते
कहानी / बांभन मामा / आलोक कुमार सातपुते
https://lh3.googleusercontent.com/-CpdmoxTdMBE/WO30n4ArAzI/AAAAAAAA4G8/j3X8UIWuoHI/image_thumb.png?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-CpdmoxTdMBE/WO30n4ArAzI/AAAAAAAA4G8/j3X8UIWuoHI/s72-c/image_thumb.png?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2017/04/blog-post_42.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2017/04/blog-post_42.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content