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बालकथा / मनाओ ऐसे जन्म दिवस / शशांक मिश्र भारती

परसों मिलन का जन्म दिवस है। ऐसा जानकर उसके सभी मित्र प्रसन्न थे। उनको इन्तजार था कब जन्म दिन आए और हम सब बड़ी धूम-धाम से मनाएं। लेकिन चिन्ता की बात यह थी, कि इन दिनों स्कूल के बाद मिलन न जाने कहां गायब रहती थी।

आखिर वह दिन भी आ गया जिसका सभी को इन्तजार था। मिलन ने अपने सभी मित्रों को विशेष आग्रह कर बुलाया था।

सभी मिलन के जन्म दिन पर उसके घर पहुंच गए। सभी कुछ न कुछ उपहार अवश्य लाये थे। कोई खिलौना, कोई किताबें, तो कोई अन्य सुन्दर सा उपहार।

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मित्रों को अपने घर आया देखकर मिलन बहुत प्रसन्न थी, किन्तु अभी उसकी निगाहें अपने एक मित्र को तलाश रही थीं। शायद जो अभी तक नहीं आया था।

-देर होती देखकर मिलन की मम्मी ने कहा-‘बेटी आओ केक काटकर जन्म दिन की रस्म पूर्ण करो।’

-नहीं, मम्मी अभी मोनू नहीं आया। कुछ देर और इन्तजार कर लो मिलन ने कहा,

तभी सामने से मोनू आता दिखायी दिया; जिसके दोनों हाथों में पौधे थे। मिलन ने आगे बढ़कर उन पौधों को ले लिया और अपने माता-पिता व मित्रों से बोली - सब लोग मेरे पीछे आओ,

-मिलन की ऐसी बातें सुनकर उसके पिताजी बोले-‘ कहां बेटी, केक तो यहां रखा है।

-नहीं पिताजी, आज से मेरा जन्म दिन केक से नहीं ; बल्कि इन नन्हें पौधों के रोपने से मनेगा ( अपने हाथ में लिए पौधों की ओर संकेत करते हुए कहा) । मैं प्रत्येक वर्ष अपने जन्म दिन पर कुछ पौधे अवश्य रोपा करूंगी। फिर अपने घर के पीछे बहुत बड़ा सा मैदान खाली पड़ा है। जहां पर सभी लोग कुड़ा-करकट डालते हैं। उसी को हरा-भरा बनाऊँगी।

-मिलन की बातें सुनकर उसके पिताजी बोले- ’बेटी यह तो बहुत अच्छी बात है। तेरा जन्म दिन तो मनेगा ही, पिछवाड़े पेड़ों के लग जाने से हरियाली भी हो जायेगी। हो सकता है। और बच्चे भी तेरी ही भांति जन्म दिन मनाना प्रारम्भ कर दें ।

अच्छा! सब लोग वहीं चलते हैं । शुभ कार्य में देर किसलिए!!

माता-पिता और अपने मित्रों के साथ मिलन घर के पिछवाड़े गई। जहां उसने पिछले कई दिनों स्कूल से आकर सफाई की थी। वहां पहले से

ही मिट्टी खोदने के लिए फावड़ा और पानी डालने के लिए बाल्टी रखी हुई थी।

मिलन ने पूरे उत्साह से गड्ढे खोदे। उनमें पौधों को लगाया। फिर सभी को सम्बोधित करते हुए कहा-

-‘अब आप सभी लोग इनमें थोड़ा-थोड़ा पानी डाल दो।’

ऐसा सुनकर सभी ने उनमें पानी डाला और वापस मिलन के घर आ गए। मिठाई खायी और खुशी -खुशी अपने -अपने घर चले गये।

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