शनिवार, 8 अप्रैल 2017

समीक्षा - दहकते पलाश (हाइकु-संग्रह)

दहकते पलाश (हाइकु-संग्रह) : डा. सुरेन्द्र वर्मा / अयन प्रकाशन, नई दिल्ली / २०१६ / पृष्ठ १०४ / मूल्य, २२० रु. ||

एक उम्दा हाइकु-कृति
प्रदीप कुमार दाश “दीपक”

    हिन्दी हाइकु आन्दोलन को आगे बढाने में डा. सुरेन्द्र वर्मा जी का नाम हिंदी हाइकु साहित्य में अग्रगण्य है | <दहकते पलाश> डा. सुरेन्द्र वर्मा का तीसरा हाइकु संग्रह है | एक बेहद आकर्षक मुख-पृष्ठ के साथ अयन प्रकाशन, दिल्ली, से प्रकाशित १०४ पृष्ठ की इस उम्दा हाइकु कृति की साज-सज्जा बेहतरीन है | संग्रह दो खण्डों में विभाजित है | प्रथम खंड में उत्कृष्ट हाइकु तथा द्वितीय खंड में २२ उत्कृष्ट तांका व ११ उत्कृष्ट सेदोका संग्रहीत हैं | परिशिष्ट में हाइकु विद्वानों की टिप्पणियों ने हाइकुकार की विद्वत्ता को उजागर किया है |

    संग्रह में प्रथम खंड के हाइकु आठ भागों में विभाजित हैं | प्रत्येक पृष्ठ में पांच हाइकु हैं, जिनमें कई तो मन पर सहज ही अमिट प्रभाव छोड़ जाते हैं –
चिड़िया रानी / नल की सूखी टोंटी / चोंच मारती   (पृष्ठ, ११)
डाली पलाश / रक्ताभ हुई, आया / बसंत राज     (पृष्ठ, १५)
फूली सरसों / रंग लाई नारंगी / गेंदा बौराया      (पृष्ठ, १६)
जलाते नहीं / दहकते पलाश / भरते रंग         (पृष्ठ, २१)

    प्रथम खंड के दूसरे से आठवें भाग तक की रचनाओं में सामाजिक सन्दर्भ तथा विभिन्न सामाजिक विसंगतियों के विरुद्ध उठी आवाज़ मुखरित है, और साथ ही प्रकृति के उत्कृष्ट बिम्ब भी समाहित हैं, ---
ऊंचा गंभीर / अचल हिमालय / पिता सरीखा
फूटी किरणें / स्नेह भरे दीपों की / फूटे अनार
    मुहावरों के सुन्दर प्रयोग भी मन मोहते हैं –“नाच न जाने / बेचारी करे तो क्या / आँगन टेंढा”      (पृष्ठ ६६)
    संग्रह के कुछ हाइकुओं में वर्नानुशासन की कमी अवश्य खटक रही है, परन्तु इनके भाव गंभीर हैं, ---
कितनी पीर / पी गया पर्वत / धाराएं फूटीं       (१६ वर्ण – पृष्ठ १४)
नभ निर्मल /  झिलमिलाती चांदनी / शरदोत्सव   (१८ वर्ण – पृष्ठ २४)
आज सवेरे / एक पंक्ति कविता / दिन अच्छा    (१६ वर्ण – पृष्ठ ४३)
दीप ने कहा / लड़ो अन्धकार से / यही संकल्प   (१८ वर्ण – पृष्ठ ४९)
खारा जल / आँखों के सागर में / कौन पी पाया? (१६ वर्ण – पृष्ठ ६०)

    हाइकु विधा के प्रोढ़ हाइकुकार डा. सुरेन्द्र वर्मा जी के <दहकते पलाश> हाइकु संग्रह में उनके उत्कृष्ट मानसिक हाइकु-बिम्बों के साथ-साथ कई उत्कृष्ट प्राकृतिक हाइकु-बिम्ब भी संरक्षित हुए हैं | हाइकु जगत में <दहकते पलाश> का एक उत्कृष्ट हाइकु संग्रह के रूप में स्वागत होगा | मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि वरिष्ठ हाइकुकार आदरणीय डा. सुरेन्द्र वर्मा जी का नाम हाइकु इतिहास में बड़े आदर के साथ स्वर्णाक्षरों में लिपिबद्ध किया जाएगा |

प्रदीप कुमार दाश “दीपक” (मो. ७८२८१०४१११) 
साहित्य प्रसार केंद्र सांकरा, ज़िला, रायगढ़ (छ. ग.)

पुस्तक समीक्षा : दहकते पलाश (हाइकु-संग्रह)
   

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