शनिवार, 8 अप्रैल 2017

दोस्ती का पैगाम लेकर उड़ चले हनुमान / सूर्यकांत मिश्रा

10 अप्रैल हनुमान जयंती पर विशेष...

दोस्ती का पैगाम लेकर उड़ चले हनुमान

तीनों लोगों में आज अजर और अमरत्व का वरदान प्राप्त पवनपुत्र हनुमान ने पूरे विश्व को मित्रता का महत्व भली भांति समझाया है। अपने राजा सुग्रीव से भगवान श्री रामचंद्र जी और लक्ष्मण जी की मित्रता कराने वाले हनुमान जी ने माता सीता की खोज में खुद को भक्त शिरोमणी और राजा का आज्ञापालक सिद्ध कर दिखाया। रामचरित्र मानस के किष्किन्धा काण्ड में इस बात का प्रमाण मिलता है कि बजरंगबलि ने ही राम और सुग्रीव को मिलाया। तुलसीदास जी लिखते है कि रिष्यमूक पर्वत पर दो वनवासियों को आता देख अपने भाई बलि से भयभीत सुग्रीव ने हनुमान जी से कहा-

अति सभीप कहू सुनु हनुमाना। पुरूष जुगल बल रूपनिधाना।

धरि बहुक रूप देख तै जाई। कहेसु जानि जिय सयन बुझाई।।

अपने राजा से इस प्रकार की आज्ञा पाकर हनुमान जी ने ब्रम्हचारी का रूप धरते हुए भगवान श्री राम और भाई लक्ष्मण के वन गमन के कारणों को जाना। जब प्रभु राम ने हनुमान जी को बताया कि वे अपने पिता के वचनों का पालन करने वन आए हैं और किसी ने उनकी धर्मपत्नी का अपहरण कर लिया है, तो हनुमान जी ने उन्हें ससम्मान अपने राजा सुग्रीव से मिलाकर दोस्ती करा दी। इस दोस्ती के बाद पहले प्रभु राम ने सुग्रीव को बालि से मुक्ति दिलायी और फिर भक्त शिरोमणि हनुमान जी ने सीता जी की खोज में मित्रता का वह प्रमाण सामने लाया, जो सभी के लिए प्रेरणास्रोत होना चाहिए।

वानरराज सुग्रीव को उसका राजपाठ दिलाने के बाद सीता जी की खोज खबर पर मंत्रणा होने लगी। सभी योद्धा वानर अपने राजा की आज्ञा से दक्षिण दिशा में सीता जी की खोज के लिए बढ़ चले। सबसे पीछे आये हनुमान जी ने श्रीरामचंद्र जी के चरणों पर अपना माथा रखकर उनसे आशीर्वाद मांगा। प्रभुराम ने उन्हें अपने हाथों में पहनी अंगूठी उतारकर दी। सारे वानर जब सीता जी की खोज की योजना बनाते समुद्र पर पहुंच गये तब गिद्धराज जटायु ने उन सभी को बताया कि मेरी अपार दृष्टि देख रही है कि त्रिकूट पर्वत पर लंका नगरी है, जहां अशोक वाटिका में सीता जी बैठी है। वह स्थान परम बलशाली रावण का महल है। मैं बूढ़ा होने के कारण चार सौ कोस के समुद्र को नहीं लांघ सकता। जो उक्त समुद्र को लांघकर लंका पहुंचेगा वही राम जी का कार्य कर सकेगा। इस पर जामवंत ने हनुमान जी को इंगित करते हुए कहा-

कहर रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप सधि रहेहु बलवाना।

पवन तनय बल पवन समाना। बुधि विवेक विग्यान निधाना।

जामवन्त के इतना कहते ही पवनसुत हनुमान अपने शरीर को पर्वताकार कर समुद्र पार जाने और सीता जी की खबर लाने का मन्तव्य स्पष्ट कर दिया। यह प्रभु राम के प्रति हनुमान जी कि मित्रता का दूसरा बड़ा कदम था। अशोक वाटिका में राक्षसों का वध करने के बाद मेघनाथ द्वारा छोड़े गये ब्रम्हास्त्र में कैद होकर रावण की सभा में पहुंचे हनुमान जी ने रावण के साथ जो संवाद किया, वह भी उनकी प्रभुराम से मित्रता और उनके प्रति श्रद्धा भक्ति का भाव प्रकट करती है। बजरंगबलि ने दशानन रावण को समझाईश देते हुए कहा कि प्रभु राम से बैर का त्याग कर माता सीता उन्हें लौटा दो, प्रभु राम तुम्हारी सारी गलती को माफ कर देंगे। इस प्रकार हनुमान जी ने रावण को प्रभुराम से क्षमा मांगने की हिदायत भी दे डाली, किंतु ईश्वर की रचना ही रावण वध के लिए की गयी थी और वह रावण वध के साथ पूरी हुई। रामचिरत्र मानस बताती है कि बिना राम के हनुमान अधूरे और बिना हनुमान के राम दरबार नहीं कहा जा सकता।

लंका में रावण वध करने के बाद जब प्रभु राम वापस अयोध्या नगरी आ रहे थे, तब एक बार फिर से हनुमान जी ने अपनी श्रद्धाभक्ति और मित्रता का परिचय भरत जी के समक्ष प्रस्तुत किया। जब भरत जी रामचंद जी का इंतजार करते थक गये तो उनके मन में उठ रहे ऐसे विचारों को पवनपुत्र हनुमान ने यह कहकर दूर किया कि प्रभु श्रीराम माता जानकी और भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या की ओर आ रहे हैं। तुलसीदास जी ने राम चरित्र मानस के उत्तरकाण्ड में लिखा है-

जासू बिरह सोचु दिन राती। रटघु निरंतर मुण गनपांती।

रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता। आयउ कुसल देव मुनि त्राता।

अर्थात जिनके विरह में आप दिन रात सोचते और विलाप करते हैं। वे रघुकूत के तिलक प्रभु श्रीराम अयोध्या आ रहे हैं। ऐसे वचन सुन भरत जी अपने सारे, दु:ख भूल गये, और हनुमान जी से पूछने लगे कि हे भाई तुम कौन हो और कहा से आये हो। हनुमान जी ने बड़े ही मधुर वचनों के साथ कहा कि मैं वानर जाति का हूं और मेरा नाम हनुमान है। मैं दीनों क दीन भगवान श्री रामचंद्र जी का दूत हूं। भरत जी के साथ स्नेह मिलन के बाद पवन पुत्र हनुमान ने भरत जी को प्रभु श्री राम के साथ बिताए दिनों की सारी कथा सुना दी। इतना ही नहीं भरत जी व्याकुलता से परिचित होकर हनुमान जी ने वापस अपने प्रभु श्री राम की ओर रूख किया और वहां पहुंचकर भरत जी की व्यग्रता से मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्रीराम को अवगत कराते हुए अपनी मित्रता का फर्ज निभाया।

 

प्रस्तुतकर्ता

(डा. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

मो. नंबर 94255-59291

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