रविवार, 28 मई 2017

प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : आलेख / भारत यायावर का साहित्यिक व्यक्तित्व / गणेश चंद्र राही

मकालीन हिंदी साहित्य का मूल्यांकन तब तक अधूरा माना जायेगा, जब तक सुप्रसिद्ध कवि एवं आलोचक भारत यायावर की कश्तियों को उसमें शामिल नहीं किया जायेगा. हिंदी साहित्य को लगभग चार दशकों से अधिक अपनी लेखनी से समृद्ध कर रहे हैं. बिना किसी शोरगुल के खामोशी के साथ अपने साहित्य-कर्म में रत हैं. उनकी निरंतर साधना ने कई महत्त्वपूर्ण रचनाओं को जन्म दिया है.

कविता के साथ-साथ इन्होंने आलोचना भी विपुल मात्रा में लिखी है. इनका पुस्तक एवं पत्र-पत्रिकाओं का संपादन कार्य उल्लेखनीय है. इनमें महान कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु एवं आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के समग्र-साहित्य को खोजबीन कर परिश्रमपूर्वक उसका रचनावलियों के रूप में संपादन शामिल है. हिंदी साहित्य के लिये यायावर ने कहीं अधिक लिखा है और गुणवत्तापूर्ण लिखा है. उनकी अब तक लगभग चालीस किताबें प्रकाशित हुई हैं. फिर भी ऐसे सशक्त एवं प्रतिभाशाली रचनाकार की ओर हिंदी के विद्वानों का ध्यान नहीं जा सका. यद्यपि इनकी कविताओं एवं आलोचना की ताकत का एहसास आलोचकों एवं साहित्यकारों को है. दूसरी ओर इन्होंने औरों की तरह अपनी प्रशंसा एवं लोकप्रियता के लिये कोई सरल एवं चालू नुस्खे का इस्तेमाल कभी नहीं किया है. इस मामले में इन्होंने बड़े ही धैर्य का परिचय दिया है.

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आजकल दो चार किताबें छपते ही लेखक अपने ऊपर लेख एवं सेमिनार आयोजित कर चर्चा कराने लगते हैं. विशेषांक निकलवाने लगते हैं और थोक के भाव में लिख कर हिंदी के परिदृश्य में पैसे और पहुंच के बल पर स्थापित रचनाकार बन जाते हैं. लेकिन इन्होंने इस प्रकार के किसी लोभ-लालच को अपने पास फटकने नहीं दिया. क्योंकि इनकी रचनाओं का सरोकार आम जीवन से है. ये न तो छद्म क्रांतिकारी हैं और न किसी क्रांति का दावा अपनी कविताओं में करते हैं. यही इनकी रचनाओं की ताकत है. लोगों के जीवन से सीधा संवाद और उनकी पीड़ा को दर्ज करते हैं. यही कारण है इनकी रचनाओं में दम है.

भारत जी ने अपने आप को किसी चालू मुहावरे से हमेशा दूर रखा और अपनी विकसित जीवन दृष्टि, अनुभव एवं विचार शक्ति से सज्जन के लिये महत्त्वपूर्ण माना. इन्हें किसी झूठी प्रशंसा के लिये किसी टोटके की जरूरत नहीं है. इन्हें अपनी रचनाओं पर पूरा भरोसा है. इनकी रचनाओं में फतवेबाजी नहीं है, बल्कि जीवन की कठोर धरती पर खड़े होकर लिखी गयी हैं. इनमें जीवन के संघर्ष एवं अनुभवों का ताप है. इन्होंने प्रचलित विचारधाराओं को कविता में प्रचारित करने की जगह अपने जीवन अनुभव एवं आम-आदमी की पीड़ा को स्वर देना ज्यादा मुनासिब समझा. यही कारण है कि उनकी कविताओं एवं आलोचना में किसी वाद का दर्शन नहीं होता है. यहां तो बस संपूर्ण मनुष्य की खोज है. यही खोज उनकी जिंदगी और रचना का मकसद भी है.

उन्होंने अपनी कविताओं के बारे में कहा है कि- ‘कविता मेरे जीवन की अनिवार्यता है- रोटी, हवा और जल की तरह.’ उनका मानना है कि- ‘कविता को व्याख्यायित करना जीवन की विषम परिस्थितियों से जूझना है.’ यहां हम भारत यायावर के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पक्ष पर विस्तार से विवेचना करेंगे. इनकी रचनात्मक दुनिया का भूगोल तीन आयामों में बंटा है. इनमें पहली कविता, दूसरी आलोचना एवं तीसरी पुस्तक पत्र एवं पत्रिकाओं का संपादन है. अध्ययनशीलता, सहनशीलता एवं निरंतर अनुसंधान की दिशा में सक्रिय रहना इनके व्यक्तित्व के गुण हैं. इनकी इस त्रिगुणात्मक शक्ति का प्रतिबिंब इनके समग्र लेखन में साफ-साफ झलकता है.

भारत यायावर मूलतः ग्रामीण संवेदना के सशक्त कवि हैं. इनके साहित्यिक जीवन की शुरूआत कविता से होती है. छात्र-जीवन से ही कविता लिख रहे हैं. एक छोटे से विकासशील शहर हजारीबाग में उनके साहित्य कर्म का उदय हुआ. शहर के उभरते हुए साहित्यकारों एवं रचनात्मक परिवेष में उनकी लेखनी सजग हुई. कुछ अलग हट कर लिखने के लिये बेचैन हुए. ग्रामीण जीवन में पल्लवित पुष्पित उनका सीधा सरल जीवन एवं व्यक्तित्व धरती से पेड़-पौधे की तरह आज भी जुड़ा हुआ है. यही कारण है कि उनकी कविताओं में जो संसार मिलता है उसमें शहर एवं महानगर बहुत कम होते हैं और गांव, टोले एवं मुहल्ले के लोग, उनकी पीड़ा, चिंता एवं अभाव की जिंदगी अधिक होती है। गांव में चलते- फिरते, हंसते- बोलते, हंसी -मजाक करने वाले सामान्य व्यक्ति उनके लिये प्रेरणा बन जाते हैं और एक दिन उनकी कविता में दाखिल हो जाते हैं.

पहले काव्य संग्रह ‘मैं हूं यहां हूं’ की भूमिका में सुप्रसिद्ध आलोचक डॉ चंद्रेश्वर कर्ण ने इनकी कविताओं के बारे में ठीक ही कहा है कि ‘ग्रामीण अनुभवों से समृद्ध इस कविता की कविताओं में ग्रामीण परिवेष, मामूली लोग रफ्ता-रफ्ता तोड़नेवाली स्थितियां और अमानवीय अनुभवों का कंटीला सिलसिला है. यह सारा कुछ कवि में आत्मसात है. यायावर की कविता एक ओर निचाट सन्नाटों से भर जाती है तो दूसरी ओर गहरे लगावों से जोड़ती है. ये कविताएं स्मृतियों के ऐसे संसार में ले जाती हैं, जो अपना हैः ग्रामीण संवेदना का संसार. यायावर की कविताओं में गांव के सामान्य और सहज मन के यादगार चरित्र भी हैं. ये चरित्र अपने छोटेपन में महान लगते हैं. ये कवि को अपने परिवेष से गहरे लगावों के कारण संभव हुआ है.’

भारत यायावर की लेखन यात्रा का विकास अभावों एवं आर्थिक संकटों से जूझते हुए हुआ है. भीषण कष्टदायक परिस्थितियों में भी इन्होंने अपने को टूटने एवं बिखरने नहीं दिया. घर-परिवार के बदतर हालात ने उन्हें सच कहने का साहस और आत्मबल दिया. उनकी कविताओं में यह साहस एवं संवेदना कूट-कूट कर भरे हैं. उन्होंने विपत्तियों से घबराने की जगह उनसे रचनात्मक ऊर्जा ग्रहण किया है. उन्हें दुत्कारा नहीं, बल्कि उसे जीवन का यथार्थ समझ कर उनके प्रति मानो आत्मीयता दिखायी है. यही कारण है कि उनकी रचनाओं का वैचारिक धरातल किसी वाद के दायरे में निर्मित नहीं हुआ है. जीवन के कठोर अनुभव से पैदा हुई सच्चाई उनकी कविताओं में दर्ज है. उन्होंने देश-दुनिया में जो भी प्रचलित विचार हैं उनको पढ़ा, समझा एवं जरूरत के हिसाब से अपना लिया. उसके प्रवाह में बहे नहीं बल्कि उस पर मनन चिंतन किया। खुद को समय के अनुसार तैयार किया. यह कार्य वहीं व्यक्ति कर सकता है जिसने जीवन को गहराई से समझ लिया है और जिसका आत्मविश्वास इतना सशक्त हो गया है कि उसे कोई विचारधारा की आंधी उड़ा नहीं सकती और न दिग्भ्रमित कर सकती है. ये गहन अध्ययन, चिंतन, साधना एवं निरंतर अपने रचना-कर्म के प्रति जागरूक रहने वाले कवि हैं.

इनकी पहली कविता 1974 में हजारीबाग से प्रकाशित होनेवाले अखबार ‘जय भारत’ में छपी थी. यह उनके कवि का शैशव काल था. जैसा कि मैंने इसके पूर्व कहा है कि साहित्य पढ़ने एवं कविता लिखने की उनकी रुचि एवं सक्रियता तो विद्यार्थी जीवन से रही है. हां, उस वक्त हजारीबाग में साहित्य का माहौल तैयार हो रहा था. सभा एवं काव्य-गोष्ठियों में उनका आना जाना होता था. बल्कि सच्चाई तो यही है कि गोष्ठियों के आयोजन में इनकी ही भूमिका अहम होती थी. 1978 तक इनकी कविताएं देश की प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी थीं. इनकी प्रतिभा अब कई दिशाओं में रचनात्मक कार्य के लिये आगे बढ़ने लगी. इन्होंने हजारीबाग से ‘नवतारा,’ ‘प्रगतिशील समाज’ एवं ‘विपक्ष’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का संपादन एवं प्रकाशन कर साहित्य जगत का न केवल अपनी तरफ ध्यान आकर्षित किया; बल्कि इनके उदार हृदय ने अपने समय में उभरने वाले युवा रचनाकारों से पहली बार ‘विपक्ष सीरीज’ के माध्यम से हिंदी साहित्य-जगत के पाठकों को अवगत कराया. इनमें ‘ईश्वर एक लाठी है’ (1982) स्वप्निल श्रीवास्तव, ‘कविता नहीं है यह’ (1982) अनिल जनविजय, ‘संवाद के सिलसिले’ (1983) ‘राजा खुगशाल’ एवं ‘गांव का संवाद’ (1985) उमेश्वर दयाल जैसे उदयमान कवि शामिल हैं.

हजारीबाग में आयोजित कोई भी साहित्यिक गोष्ठी इनके बिना अधूरी समझी जाती रही है. यह इनके कद्दावर व्यक्तित्व एवं लेखन की सार्थकता के कारण ही संभव हो पाया है. 1978 में हजारीबाग में आयोजित होनेवाली गोष्ठियों के कवियों की कविताओं का संकलन ‘एक ही परिवेष’ आया. इसका भी संपादन भारत यायावर ने ही किया है. संभवतः पहली बार उनकी कविताओं का एक पुस्तक का संग्रहित रूप पाठकों के समक्ष आया। विद्वानों ने उनकी कविताओं के तेवर, भाव विचार एवं संवेदना को जाना. उनके ये आरंभिक कविताओं के दिन कहे जा सकते हैं. यह आठवें दशक की कविताओं का भी दौर था. लेकिन भारत यायावर उस वक्त की कविताओं का गहरा अध्ययन कर रहे थे. एक ही परिवेष में इनकी कुल 13 कविताएं हैं. कवि परिचय में इनके बारे में कहा गया है कि ‘ये मूलतः वामपंथी है पर उनकी कुछ अपनी विशिष्ट मान्यताएं.’ इसमें चौंकने व रहस्यमय जैसी कोई बात नहीं है. यह दौर साहित्य में आंदोलनों का भी था। प्रगतिवादी, प्रयोगवादी, नयी कविता एवं समकालीन हर खेमे के कवि लिख रहे थे. कहीं वामपंथी विचारधारा से कवि लोग किनारा कर रहे थे तो कहीं उसे अपनी रचनाओं को मजबूती के साथ प्रस्तुत कर रहे थे. लेकिन एक बात जो उस दौर की कविताओं में दिख रही थी, वह था कविताओं में लाल झंडा, लाल सलाम, क्रांति, गोल दागो, रूस, चीन, हंसुआ एवं हथौड़ा जैसे प्रतीकों का कम होना. कविता जीवन को वर्गीय दृष्टिकोण की जगह उसे समग्र रूप से स्वीकार कर रही थी. किसान, मजदूर, पूंजीपति, सरमायेदार, जैसे शब्दों के फार्मूले में ढाल कर कविता लिखने की परिपाटी की जगह मां, बहन, परिवार, रिश्ते, चिड़िया, नदी, पर्वत, आम आदमी, मानवीय संवेदना अपना आकार ग्रहण कर रही थीं.

भारत यायावर समकालीन कविता में यथार्थ की वकालत तो करतेे हैं लेकिन उसमें जीवन की रागमयता की रसधार के हिमायती है. कोरा यथार्थ केवल शब्दों का खेल बन कर ही रह जाता है. कई कवि तो भाषा की सफाई और जुमलेबाजी से हिंदी में प्रख्यात हो गये हैं. कविताओं में भाव एवं संवेदना कम और तर्क ज्यादा हैं. उनमें जो जीवन बोलता है, उसका अवगाहन करने पर हाथ में कुछ विशेष लगता नहीं है. यही कारण है कि भारत यायावर की कविता अपने समकालीनों में हट कर है.  ‘एक ही परिवेष’ में एक कविता है ‘दरअसल मैं’. इसमें कवि कहता हैं कि- दरअसल मैं/कविता नहीं लिखता/आदमी होने की बात करता हूं.’ और आगे इसी कविता में कहते हैं- आदमी/स्वयं में कविता है/और कविता/आदमी होने का दस्तावेज है.’ मनुष्य की गरिमा, उसका विकास, उसका सम्मान एवं उसकी खुशी एवं उसके सपनों को उसकी कविता सदियों तक वहन करे, यह कवि की इच्छा है. उसके दुख एवं संघर्ष में कविता दूर तक यात्रा करे.

भारत यायावर की आरंभिक कविताओं का स्वर बदलाव का स्वर है. जो तत्कालीन राजनीतिक आंदोलनों का प्रभाव कहा जा सकता है. कवि सामान्य लोगों को जागरूक कर उन्हें समाज, देश एवं विश्व बदलने के लिये ललकारता हुआ दिखता है. उनका बदलाव का दृष्टिकोण पूरे व्यवस्था से जुड़ा है. उनकी सारी शक्तियों के खिलाफ कवि मनुष्य को खड़ा करना चाहता है जो उसकी जिंदगी को पिलपिला, कमजोर एवं रूढ़ियों में जकड़ कर रखा है- ‘खिलाफ’ कविता में कवि कहता है- सामंतों के द्वारा निर्मित/कल्पित ईश्वर के खिलाफ/बच्चों के मस्तिष्क में/ठूंसे जानेवाले संस्कारों के खिलाफ/सदियों से पिसती/काली व्यवस्था के खिलाफ/लोग हो रहे हैं एकत्रित/लोग बन रहे हैं जुलूस/ लोग लगा रहे हैं नारे.’ आज आभिजात्यपन के खिलाफ और वक्त के सीने में पेड़ बन कर सूख गयी इच्छाओं के खिलाफ लोग सामूहिक रूप से उठ खड़े हुए हैं. निश्चित रूप से भारत यायावर की इस संग्रह की कविताओं पर देश में चलनेवाले वामपंथी आंदोलन का प्रभाव है. यह उनका कवि रूप में साहित्य-जगत में कदम रखने का दौर था. युवा मन समय की रचनाशीलता से बिना प्रभावित भला रह भी कैसे सकता है. इतना ही नहीं, बल्कि भारत यायावर कुछ काल के लिये ही सही ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ से भी जुड़े रहे हैं. यह सीपीआइ पार्टी का साहित्यिक मंच रहा है. ऐसे में कोई उभरती हुई प्रतिभा अपने आपको को प्रचलित विचारधाराओं से बचा तो नहीं सकती. हां, यह बात बिलकुल सही है कि इन्होंने अपने ऊपर किसी ‘वाद’ का ठप्पा लगने नहीं दिया, क्योंकि इनकी अपने समय को पहचानने एवं वैचारिक द्वंद्व को समझने की दृष्टि परिपक्व हो गयी थी. विचारों में कितना सच है और कितना भूसा इसको अलग करनेवाला विवेक जागरूक हो गया था. इन्होंने रचना के क्षेत्र में अपना स्वतंत्र चिंतन एवं जीवन दृष्टि विकसित की है. यह दृष्टि उनकी आगे की कविताओं में साफ-साफ झलकती है. कवि कविता को बातचीत या कहें जीवन से सहज संवाद करने की स्थिति में देखना पसंद करता है. इससे पाठक के साथ वह आत्मीयता महसूस करता है.

एक ही परिवेष के बाद भारत यायावर की दूसरी संपादित पुस्तक ‘जिजीविषा के स्वर’ 1979 में ही प्रकाशित होकर आयी. इसमें देश के कई उभरते हुए कवियों की कविताएं संग्रहित हैं. इसमें कई कवि ऐसे हैं जिनकी पहली बार इसमें कविताएं छपी हैैं. उसके बाद इनकी लंबी कविता ‘झेलते हुए’ दिल्ली से प्रकाशित हुई. इसमें कवि ने स्वयं को वादों से मुक्त करते हुए लोकजीवन दृष्टि को अपनी रचना का पाथेय बनाया. यही लोक जीवन दृष्टि उनकी कविताओं में मिलती है, जो सहज एवं सरल है, हृदय को छूती है.

1983 में ‘मैं हूं यहां हूं’ 37 कविताओं का संकलन आया. यह उनकी स्वतंत्र कृति है. इस पुस्तक ने देश को आलोचकों को भारत यायावर की रचनाधर्मिता पर सोचने के लिये विवश किया. यह उनका पहला काव्य संग्रह होने के कारण इसमें 1974 से लेकर 1982 तक की कविताओं को शामिल किया है. इनकी कविताओं की देश स्तर पर चर्चा होने लगी. पाठकों ने हाथों हाथ इस बिलकुल नयी संवेदना एवं अनुभव से संपन्न कवि की कविताओं को ग्रहण कर लिया. इस संग्रह की कविताओं में संघर्ष, स्वप्न, प्रेम एवं आत्मीयता है. अपने आसपास के लोगों पर कविता लिखी है. कविता में ये चिर परिचित लोग अपना वास्तविक रूप खो देते हैं और जीवन एवं समाज को अनुभव एवं ज्ञान से जोड़नेवाली कड़ी बन जाते हैं. यहां तक आते आते कवि के अनुभव संसार का विस्तार हुआ है और विचारों में गहरायी आयी है. कविता जो कवि के लिये जीवन है. जीवन जिसके बिना इस संसार का एक पल काम नहीं चल सकता. इसमें मनुष्य, समाज एवं देश के लिये बहुत कुछ है. ज्ञान, संवेदना, विचार, भाव, प्रेम, करुणा, ममता, स्नेह, राजनीति एवं संस्कृति निर्माण की शक्ति. लेकिन कवि अब इस जीवन के प्रति इतना समझदार हो गया है कि बहुत सोच समझ कर ही इसे किसी लंबी लड़ाई के लिये सौंपना चाहता है, क्योंकि किसी भी तरह के परिवर्तन की लड़ाई जीवन की कुर्बानी मांगती है. इसके लिये इंसान पीछे नहीं हट सकता है. कवि भी पीछे नहीं हटता. लेकिन उसका मानना है कि यदि लड़ाई की दिशा सही न हो तो ऐसे में जीवन की गति एवं विकास को बिना समझे इसे किसी लड़ाई का हथियार बनने नहीं दिया जा सकता.

कवि कहता है- कितना कठिन है/एक लगातार चलनेवाली लड़ाई को/कविता सौंप देना.’ लेकिन सपने देखनेवाली आंखों से कवि अपनी आंख नहीं चुरा सकता. जीवन एवं सज्जन के लिये सपना जरूरी है. पूरी दुनिया के लोग सपने देख रहे हैं, आखिर क्यों? आगे कवि कहता है- सपने देखती आंखें/कितनी खुश हैं/कितनी भरी भरी सी!/कितने ही भरपूर प्रेम की/ज्वाला से जली हुई सी!’ संभवतः पंजाबी कवि ‘पाश’ ने इसीलिये कहा था कि सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना. भारत यायावर कवि का अस्तित्व-बोध विराट है. सूरज की तरह अपनी समस्त रोशनी के साथ तपना और नये जीवन के लिये आगे आगे बढ़ना चाहता है. इसका कारण है कि मनुष्य ही इस संसार में परिवर्तन ला सकता है. ज्ञान, विज्ञान, चिंतन, राजनीति, दर्शन, समाज एवं धर्म सब कुछ मनुष्य के व्यक्तित्व का विस्तार है. यही जीवन को सुखों एवं खुशियों से भरने के लिये युग का नेतृत्व भी करता है. कवि अपना होने का परिचय किसी
विचारधारा की अगुवाई के लिये नहीं बल्कि विचारवान मनुष्य होने के कारण देता है और सूरज की रोशनी की तरह चारों ओर फैलना चाहता है. क्योंकि इससे ही अंधेरा हटेगा- हमारे होने का अर्थ/सुबह है/सुबह का सूरज होना/लाल लाल/मद्धम आंच/में तपता हुआ.’ इसी तरह सहज जीवन बोध इनकी कविता की विशेषता है. स्वयं कवि का जीवन भी कृत्रिमता से दूर है. उनके खुले व्यक्तित्व एवं सहयोगी स्वभाव से हर कोई प्रभावित होता है. उन्होंने जैसा जीवन जीया है अपनी कविताओं में लिखा है. इस तरह उनके जीवन और रचना के बीच में कोई फांक नहीं मिलता है. और न ही हवा-हवाई क्रांति करने का जोश. कविता में आम आदमी का प्रयोग आजकल फैशन हो गया है. आम आदमी का दर्द वही समझ सकता है जिन्होंने अभावों एवं गरीबी को झेला है.

भारत यायावर देश के कई हिस्सों में घूमते रहे हैं. बाबा नागार्जुन की तरह ये भी खूब घूमते रहते हैं. यह घूमना इन्हें व्यक्ति, समाज एवं जीवन की विषमताओं को वृहद रूप से जानने का अवसर भी देेता है. आज हर जगह व्यक्ति भूख, गरीबी एवं आर्थिक तंगहाली से पीड़ित है. कवि ऐसे पीड़ित आम आदमी के दुख को अपनी कविता में प्रश्न करते हुए रखता है- यह बार बार, हर बार, हर बात/क्यों टिक जाती है/सिर्फ रोटी पर?/यह बार बार हर बार, हर रोटी/फैलकर क्यों हो जाती है/एक व्यवस्था?/यह बार बार, हर बार, हर व्यवस्था/क्यों हो जाती है एक राक्षस?/क्यों लील जाती है/लोगों की सुख सुविधाएं?/क्यों लगा दिया जाता है/किसी नये सूरज के उगने पर प्रतिबंध?’ और आगे कहता है- आदमी/कहां कहां पीड़ित नहीं है?/अपने होने से/नहीं होने के बीच/आदमी /कहां कहां पीड़ित नहीं है?’ यहां भारत यायावर एक रोटी से पूरी व्यवस्था को जोड़ कर उसे नंगा करते हैं. आम आदमी के दुख एवं सुख इसी व्यवस्था से जुड़ा है. रोटी की लड़ाई व्यवस्था के राक्षस को खत्म करने तक पहुंच जाती है. कवि का नजरिया क्रमशः व्यापक होता जाता है. उनकी काव्य-यात्रा निरंतर चलती ही जाती है. देश की पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशन होता ही रहता है.

1990 में भारत यायावर का दूसरा काव्य संग्रह ‘बेचैनी’ आता है. ठीक 14 साल के बाद 2004 में तीसरा काव्य संग्रह ‘हाल बेहाल’ और 12 साल के बाद युवा कवि गणेश चंद्र राही, द्वारा संपादित 2015 में  ‘तुम धरती का नमक हो’ चौथा काव्य संग्रह आता है. इन काव्य संग्रहों की कविताओं से गुजरने पर कवि केे व्यापक अनुभव संसार का पता लगता है. इनमें यथार्थ जीवन की विविध छवियों एवं अर्थ-संदर्भों को व्यक्त किया गया है. इन काव्य संग्रहों के प्रकाशन में यद्यपि समय का लंबा अंतराल है लेकिन कवि कहीं भी से भी लोक जीवन एवं आम सामान्य लोगों के जीवन एवं उनके दर्द से कटा नहीं है. उनके दर्द, आवाज, एवं संघर्ष दर्ज करता चलता है. ग्रामीण संवेदना के कवि अपने जीवन के संपर्क में आये लोगों के प्रति आत्मीयता दर्शाते हैं और कवि को उसे अपनी मिट्टी एवं हवा पानी से कभी जुदा होने नहीं देता है. वहीं देश स्तर मनुष्य के संबंधों को तोड़नेवाली घटनाएं घटती हैं/साम्प्रदायिक दंगे होते हैं. आठ साल के बाद कवि स्वयं को एक ऐसी व्यवस्था में पाता है जहां आदमी सुरक्षित नहीं है. सामान्य आदमी का जीवन इसमें बदहाल होता है. ईश्वर, धर्म और राजनीति का ऐसा फंडा देश के नेताओं ने रचा है कि सामान्य लोगों को इसकी सच्चाई का पता नहीं होता. वह अपनी आस्था से समझौता नहीं करता. राजनीति साजिश के तहत दंगे होते हैं और फिजूल में वही मारा जाता है. भारत यायावर की सतर्क दृष्टि ने मजहब, स्वर्ग एवं नरक पर पर्दा उठाया है- हर मजहब ने/उसी मरे ईश्वर को/कांधे पर बिठाया है/रोज चंदन का टीका लगाया है/क्रॉस लटकाया/दाढ़ी बढ़ायी/और क्रूरता को फैलाया है.’ अर्थात ईश्वर एवं धर्म की भूमिका मानव जीवन विरोधी हो गयी है. इसकी आग में इंसान जलता है. धर्म ग्रंथों से ज्ञान की वाणी, शांति, प्रेम, भाईचारा की जगह मनुष्य का रक्त टपकता है. नफरत एवं हिंसा का दैत्य बाहर निकलता है. मनुष्य रक्तपायी हो गया है. ‘एक दुखःस्पन’ की यह पंक्ति हमारे समय के कठोर यथार्थ का उजागर करती है.

‘मैं हूं यहां हूं’ कविता उनकी महत्त्वपूर्ण कविता है. यह कविता कवि की स्थिति को रेखांकित करती है. कवि इसी दुनिया में रहना चाहता है. लेकिन वह किसी सिंहासन की भूख नहीं है. और न सोने के हिरण की. वह तो केवल मीलों मील भटकना चाहता है एक साधारण आदमी की तरह. वह कहता है- मैं नहीं चाहता/एक सिंहासन/एक सोने का हिरण/मैं नहीं चाहता/ एक बांसुरी/एक वृंदावन. मेरे सहचर!/चाहता हूं भटकना मीलों मील/धूल में, रेत में/धूप में ठंड में/चाहता हूं जीना/संघर्ष में/प्यास में/आग में.’ यही कवि भारत यायावर की जिंदगी का यथार्थ है. एक सामान्य मनुष्य की तरह वह जीना चाहता है. सत्ता एवं भोग विलास इंसान को भ्रष्ट कर देता है. उसे जीवन के लक्ष्य से भटकाता है. जमीनी सच्चाई को समझने से वंचित करता है. संग्रह में कवि आदमी की पीड़ा, किस सदी में, हंसते हैं जो लोग,  जाते हुए जाड़े ने कहा, अभी अभी दोस्त गया है, सपनों का मर जाना, बता रहे हैं त्रिलोचन, जाड़े में बरसात, सोचना, प्रतीक्षा, नहीं छूटता घर, अस्पताल की डायरी, हम जो जीवन से प्यार करते हैं, बसंत राग, इदरीश मियां, चंदा केसरवानी के लिये, खिड़की, इतिहास जैसी सशक्त कविताएं लेकर आया है. इसमें मानव संबंधों की कई परत है. दोस्त हैं, घर परिवार है, माता पिता हैं, जीवन संगिनी है. एक ऐसा रिश्तों का संसार है जिसमें हम प्रतिदिन जीते हैं. ऐसे सहज पात्र हैं जिनसे हम रोज बातें करते हैं. यही लोक-राग कवि का समकालीन कवियों में विशिष्ट पहचान दिलाता है. कविता की ताकत बनता है. आज जब चारों ओर घर-परिवार का विघटन हो रहा है. परिवार के लोग घर से दूर किसी बड़े शहर में रह रहे हैं. पर्यटक की तरह कभी कभार गांव आते हैं. लेकिन घर का दर्द, सुख एवं प्यार अनुभव नहीं कर पाते. क्योंकि वह महानगरों एवं शहरों के बासिंदा बन गये होते हैं. भारत यायावर कदमा जैसे शहर से सटे गांव में पल कर भी शहरी जीवन के प्रति कोई विशेष मोह नहीं रखते हैं.

‘खिड़की’ कविता उनके मन की दुनिया को किस प्रकार खोलती है यहां देख सकते है- दूर दूर जाता हूं घर से/पर घर नहीं छूटता/पूरी यात्रा किये रहता है घर!/घर से बाहर मैं कहां हूं/जहां हूं घर में हूं/स्मृतियों से छूटता नहीं घर/’ फिर घर का अपना इतिहास भी है. कैसा है वह इतिहास- घर का एक इतिहास है/जर्जर और धूल खाया इतिहास/जिसके पन्नों पर/अब भी मेरे जीवन की/कितनी कठिनाइयों से भरी/कहानियां लिखी हैं.’ कवि की आत्मा उस वक्त फटती है जब वह कहता है- पांच सेर के/उस पीतल के लोटे की याद/अभी भी ताजा है/जिसे/लगातार दो रोज की भुखमरी के बाद आंसू बहाते हुए/छाती पर पत्थर रख कर पिता गमछे में बांध/मेरा बचपन/पिता के साथ/एक बनिये की दुकान गया था/और पांच रुपये में/बंधक रख दी गयी थी.’ यह समकालीन कविता का सबसे दर्दनाक पक्ष है. जीवन की ऐसी त्रासदी कवि भारत यायावर ही लिख सकते हैं. यह उनका भोगा हुआ यथार्थ है. यह हृदय विदारक पारिवारिक जीवन का करुण अध्याय है. यही करुणा कवि को सामान्य लोगों की जिंदगी से हमेशा जोड़े रखती है.

‘हाल बेहाल’ की कविताओं के जीवन की परिधि विस्तृत होती है. नया चिंतन एवं परिपक्व अनुभव उनकी कविता को दीर्घ-आयु प्रदान करते हैं. वैचारिक आग्रह से मुक्त हैं. यहां कई सवाल लेकर आये हैं. सबसे पहले तो उस सभ्यता को जानना चाहते हैं जिस में आज वह रह रहे हैं. वह मनुष्य को अपनी वर्तमान सभ्यता के यथार्थ को समझने के लिये प्रेरित करते हैं, क्योंकि जिस ग्रामीण सभ्यता से ऊपर उठकर एक नयी शहरी एवं महानगरीय सभ्यता में इंसान पहुंचा है, वहां उसे आगे की राह दिखायी नहीं दे रही है. उसे लगता है कि विकास एवं समृद्धि की यह मंजिल काफी धुंध से भरी है. दिशाएं लुप्त हो गयी हैं. विकास की इस अंधी दौड़ में स्वयं से सवाल करना जरूरी हो गया है.

सभ्यता कविता में कहते हैं- एक अंधी दौड़ में शामिल/तिलस्मी खोहों में भटकता हुआ/वह सवाल करता है/मैं कहां हूं?’ आगे कहता है-मेरी परछाई मुझसे भागती है/मैं उसके तिलस्म को तोड़ने में/अनवरत संघर्षरत /वह मुझे तोड़ने की कोशिश में.’ यह ऐतिहासिक द्वंद्व है. सभ्यता एवं जीवन का विकास इसी द्वंद्व के परिणाम हैं. विकास और विनाश, उत्थान और पतन, गरीबी एवं अमीरी का यह द्वंद्व है. यायावर के कवि ने व्यवस्था एवं विकास के रिश्ते को अच्छी तरह पहचाना है कि इस पूंजीवादी व्यवस्था में कितने अवरोधों को तोड़ना है. कितने प्रतिरोधों का सामना करना है. क्योंकि सामाजिक प्रगति एवं देश में बदलाव लाने के लिये अमानवीय शक्तियां पूरी तरह इसे रोकने के लिये जोर लगा रही हैं. यह सत्ता पक्ष है जो कभी धर्म को तो कभी जाति, संप्रदाय एवं क्षेत्रवाद को आगे कर लोगों को उलझाता है. इनकी कविताओं में ऐसे जुल्मी सत्ता का विरोध करने की ताकत है.

कवि ‘तुम कहां जा रहे हो?’ कविता में स्वयं से सवाल कर पूरे मानव समाज से सवाल करता है- तुम कहां जा रहे हो, भारत यायावर?/कहां पहुंचोगे, कभी सोच-विचारा?/कितना कुछ झेलोगे/प्रतिरोध से कब तक पाओगे ऊर्जा?’ क्योंकि स्थितियां न केवल भयानक है बल्कि प्रतिकूल भी है- नदियों में क्यों खून बह रहा है?/सांप्रदायिक हिंसा ने पहाड़ों का वेष धरा है!/पूंजी के राक्षस हो गये हैं जंगल?/इनसे कैसे गुजरोगे भारत यायावर?’ यह पूरे विश्व का सवाल है जिससे आदमी को जिंदा रखने के लिये बार बार टकराना होगा. कवि आने वाले समय के लिये भी यहां लोगों को आगाह कर रहा है.

भारत यायावर संपूर्णता में लोक जीवन के कवि हैं. किसी विचारधारा के प्रचारक नहीं. पार्टीवादी एवं गुटबंदी से मुक्त. यहीं कारण है कि उनकी कविताओं के विविध संसार जीवन को आकर्षित करता है. इनमें प्रेम है. करुणा है. सत्य कहने का साहस है. लोगों के साथ आत्मीय संबंध को जीने की कला है. परिवार को जोड़नेवाली शक्ति है प्रेम एवं अनुराग है. माता-पिता के बाद पत्नी इस प्रेम एवं अनुराग की मजबूत कड़ी है. उसके बाद संतानों के प्रति स्नेह, उनका हंसना, बोलना, खेलना जिंदगी को ताजा बनाते हैं. जीवन की आयु को प्रेम बढ़ाता है. इसके बिना जीवन का अर्थ ही नहीं रह जाता है. प्रेम की अनुभूति को व्यक्त करनेवाली कवि की कविता ‘पत्नी’ है. इसे लेकर तीन कविताएं हैं.

एक कविता में पत्नी को संबोधित करते कहते हैं- मैं तुम्हें रोटी सेंकते देखता हूं/और ललाट पर/छलछलाती पसीने की बूंदें/इन बूंदों को/तुम रोज परोसती हो/इसी से/प्यार से/बंधा है जीवन.’ पारिवारिक जीवन का यह उदात्त चित्र समकालीन कविता की विशेषता कहा जा सकता है. क्रांतिकारी महाकवि बाबा नागार्जुन ने प्रेम की इस संवेदना को ‘सिंदूर तिलक भाल’ कविता में व्यक्त किया हैं, क्योंकि व्यक्ति चाहे वैचारिक स्तर पर कितना ही बड़ा चिंतक, दार्शनिक हो जाय लेकिन प्रेम के बिना उसका व्यक्तित्व अधूरा रहेगा.

भारत यायावर का जीवन आर्थिक अभाव में जरूर गुजरा लेकिन प्रेम से कभी खाली नहीं हुए. एक चित्र और देखिए- दोनों प्यारे और भोले और निश्छल/बच्चों के बीच/सोयी है/गहरी नींद में /मेरे बेटों की मां/मध्यरात्रि में/मैं उसके पास नहीं जाता/उसे नहीं जगाता/बस देख भर लेता हूं/और एक मौन स्मिति/होठों पर खिल उठती है.’ यह भाव कवि को मांसल प्रेम से ऊपर उठाता है. उसके प्रेम करने का सलीका बताता है. पत्नी है तो क्या हुआ, यहां उसके व्यक्तित्व एवं संपूर्ण अस्तित्व के प्रति कवि का प्यार है.

कवि की ग्रामीण संवेदना उसे जन जीवन से जोड़ती है. वैचारिक आग्रहों से दूर लोक जीवन से अपनी कविताओं का रस ग्रहण करते हैं. लोकचेतना इनकी कविताओं की ताकत है. तभी तो मामूली आदमी और लोक जीवन में रचे बसे गीतों की आत्मा से खुद को अभिन्न रूप से जुड़े. कवि को मामूली आदमी के जीवन में व्याप्त सादगी एवं सरलता चौंकाती है. इसका कारण वर्तमान में बढ़ती जटिलता है. जीवन की चमक-दमक से दूर अत्यंत साधारण जीवन जीना भी आज के दौर में बड़े ही साहस एवं धैर्य की पहचान है- जो मामूली आदमी है/उसको रोक कर/पूछता हूं/सादगी से भरा जीवन/कहां से पाकर/जीते आ रहे हो?/जटिलता से भरे इस संसार में/सरलता का/मर्म कैसे सुरक्षित है?’

धन रोपनी, चंदर का, बीनू, इदरीश मियां ग्रामीण जीवन के ऐसे पात्र हैं जो अपना परिचय नहीं बल्कि हृदय से नये भाव चिंतन एवं परिवेष के प्रति हमारी जिम्मेदारी जगाते हैं. स्मृतियों में सुरक्षित हो गये हैं ये चरित्र. भारत यायावर की निगाह देश की राजनीतिक एवं प्रशासनिक गतिविधियों पर थी. इन्होंने राजनीतिक दोगलेपन, चाटुकारिता, जी हुजूरी नीचे से लेकर ऊपर तक देखी. इनकी राजनीतिक कविताओं में इस जी हुजूरी संस्कृति पर करारा व्यंग्य है- जी सर/हां सर/आप बहुत भले हैं सर/सच, आप बहुत भले हैं /आप जैसा अफसर/इससे पहले कभी भी क्षण भर/नहीं देखा, नहीं देखा/नहीं देखा सर!’ ‘श्रीमान’ कविता की एक बानगी देखें- श्रीमान् यह उबड़ खाबड़ दुनिया/आपकी नहीं है/इससे निकलिए/ऊपर आइए/ऊपर धूप है दिसंबर की/कितनी सुखद!/इस छत से नीचे की उबड़ खाबड़ दुनिया/भी कितनी हसीन लगती है/ऊपर से श्रीमान’ अफसरशाही में यही चमचागिरी है. अधिकारी कर्मचारी का अपने-अपने स्वार्थ साधने के लिये साहबों के पीछे चींटी की तरह लगे रहना ही चरित्र होता है.

भारत यायावर ने सॉनेट भी लिखा है. इस तरह उनके संपूर्ण काव्य जगत का अवगाहन करना जरूरी है. उनके काव्य जगत को समझे बगैर उनके ज्ञानात्मक संवेदना की ऊंचाई को नहीं समझा जा सकता है. कविता में कहीं कहीं काफी तल्खी भी है, जो समाज एवं व्यवस्था के विद्रूप चेहरे बेनकाब करती है. ‘वे कौन हैं’ कविता में कवि सवाल करता है- वे अंधेरे में हैं/रोशनी से डरते हैं/खुद को छुपा न सकें/देख न लें उनको/कि कितने विकृत हैं वे/कितने खूंखार हैं/कितने वहशी हैं वे/वे छुपे आम रहकर/करवाते हैं खुले आम दंगे/कत्लेआम.’

भारत यायावर का काव्य पक्ष बड़ा सशक्त है. इनका कद ऊंचा है. इन्होंने आलोचकों के कंधे पर चढ़ कर शोहरत पाने की कामना न कर कलम की ताकत को आगे किया है. यही ताकत उन्हें आज समकालीन कवियों में श्रेष्ठ स्थान दिलाती है. इन्होंने बातें कम की और काम ज्यादा किया है.

भारत यायावर के रचनात्मक पक्ष का दूसरा हिस्सा संपादन एवं आलोचना है. काव्य पक्ष की तरह इनका यह पक्ष भी काफी वजनी है. ये खूब लिखते हैं, खूब पढ़ते हैं. इनका लेखन गुणवत्तापूर्ण है. केवल पुस्तकों की संख्या नहीं बढ़ाते और न विचारों का दुहराव करते हैं. हर नयी किताब, नयी सोच, अनुसंधान एवं अलग हटकर होती है. विषय समान भले ही दिखें, लेकिन उसमें प्रवेश करने पर पूर्व की पुस्तकों से अंतर स्पष्ट हो जाता है. सबसे पहले भारत यायावर को देश दुनिया में जिस साहित्यिक कर्म ने प्रसिद्धि दिलायी है, वह महान कथाकार फणीश्वर रेणु के समस्त साहित्य की लगभग थका देने वाली निरंतर खोज एवं उनका प्रकाशन. हिंदी के साहित्य पटल पर रेणु के साहित्य में जिस तरह से भारत यायावर ने पुस्तक एवं रचनावली के संपादन से किया है वह ऐतिहासिक कर्म है. जीवन को जोखिम में डाल कर ऐसा कठोर परिश्रम बिरले लोग ही कर पाते हैं. यह कार्य इनकी कीर्ति का आधार स्तंभ भी है. आखिर लगभग बीस वर्षों तक रेणु के साहित्य में क्यों डूबा रहा. अपनी सेहत तक भूल गया. रेणु के रचना संसार का कोई भी पक्ष इनकी आंखों से ओझल नहीं हो सका.

इस संबंध में भारत यायावर ने अपनी मनःस्थिति का जिक्र किया है जो इस प्रकार है- ‘रेणु के देहावसान के बाद उनके साथ होने का अवसर मुझे मिला और धीरे धीरे मैं इस तरह रेणुमय होता चला गया कि बरसों मुझे यह होश नहीं रहा कि मैं रेणु से परे या अलग हूं. कोई ऐसा दिन नहीं जब रेणु की चर्चा न करता. भूत-प्रेतों पर अविश्वास करनेवाले जिनमें मैं भी हूं- विश्वास अवश्य करेंगे. रेणु का भूत जो मुझ पर सवार हुआ. अब तक जमा है. उतरने का नाम ही नहीं लेता. मैंने बार-बार कोशिश की पर यह असंभव लगा. मेरे मित्रों ने, शुभ चिंतकों ने बार-बार समझाया- रेणु के भूत से पीछा छुड़ाओ और अपना कोई मौलिक रचनात्मक लेखन करो!। रेणु के पीछे पागल मत बनो. मेरे निंदकों ने मुझ पर रेणु को लेकर तरह-तरह के इलजाम लगाए, परेशान किया. मैंने रेणु के प्रेत से बस इतना ही कहा कि, ज्यादा कहते नहीं बना- तुम्हारे लिये मैंने लाखों बोल सहे. यही बात मैंने रेणु के भूत से कही. वह ठठाकर हंसा और बोला- जिससे प्रेम करोगे और प्रेम ऐसा जिसमें तन मन धन सब अर्पित तो लाखों के बोल तो सुनने ही पड़ेंगे. और सच कहूं जो यह मेरी छवि बन गयी है- रेणु के खोजी भारत यायावर को उससे स्वयं को विलग करना अब इस जीवन में असंभव है.’

रेणु के रचना-संसार में गांव का सरस, मधुर, तिक्त एवं संघर्षमय जीवन है. लोक चेतना के अथाह धरोहर वाला साहित्य रेणु का है. यही लोक चेतना एवं जन सामान्य की पीड़ा भारत यायावर के लेखन में भी है. रेणु के बारे में उन्होंने रेणु की कहानियों, उपन्यासों, कविता एवं रिपोर्ताज के साथ ही विषयवस्तु, भाषा-शैली, विचार, एवं उनके देश-दुनिया संबंधी विचारों का गहन अध्ययन किया है. ‘रेणु का है अन्दाजे बयां और’ लेख में कहते हैं कि- रेणु हिंदी के ऐसे कथा शिल्पी हैं, जिन्होंने सत्तर-अस्सी प्रतिशत महत्त्वपूर्ण और श्रेष्ठ लिखा है. अपने दौर के अन्य कथाकारों की तुलना में रेणु की कृतियां ज्यादा चर्चित रही हैं. छठे दशक की सर्वश्रेष्ठ कहानी ‘तीसरी कसम- अर्थात ‘मारे गये गुलफाम’ है और ‘मैला आंचल’ तथा ‘परतीः परिकथा’ सर्वश्रेष्ठ उपन्यास. रेणु ने प्रायः हर विधा में कुछ न कुछ लिखा है. आगे लिखते है- ‘रेणु के रिपोर्ताज उनकी कहानियों से कम महत्त्वपूर्ण नहीं, कुछ ज्यादा ही हैं. अपनी संरचना में वे कहानियों के ही करीब हैं.’ इस तरह रेणु के कथा लेखन, शैली, उनके समकालीनों से तुलना, उसकी विशेषताओं को व्यापक परिप्रेक्ष्य में रख कर विवेचन किया है.

रेणु पर उनका कार्य हिंदी साहित्य के लिये मील का पत्थर है. लेकिन फिर भी रेणु पर चिंतन और विचार करने की आवश्यकता है. उनका जीवन-दर्शन किताबी नहीं, बल्कि आम लोगों का जीवन था. अभिजात्यवादी सोच की जगह गांव घर के सामान्य मजदूर, किसान, महिला, पुरुष और जो देश एवं समाज के परिवर्तन की बुनियाद होते हैं. भारत यायावर ने रेणु के समग्र-साहित्य को रचनावलियों के रूप में पाठकों के सामने लाकर शोधार्थी एवं विद्वानों के लिये ऐतिहासिक काम किया है. यह उनका हिंदी साहित्य के लिये महान योगदान है. रेणु के साहित्य ने भारत यायावर को हिंदी साहित्य में प्रतिष्ठा जरूर दिलायी, लेकिन इसने उनकी जिंदगी की बहुत बड़ी कीमत भी वसूली ली.

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के समग्र-साहित्य की खोजबीन कर उनको रचनावली के रूप में प्रकाशित करना भारत यायावर के दूसरे ऐतिहासिक कार्य हैं. द्विवेदी के विचार, साहित्यिक दृष्टि, आलोचना पद्धति, एवं उनका जीवन कर्म को समझने पाठकों के लिये यह अनमोल खजाना है. हिंदी खड़ी के शैशव काल में ऐसे महान व्यक्तित्व का संस्पर्श मिलना हिंदी जाति के साहित्यकारों के लिये गौरव की बात से कम नहीं समझते है. युगीन परिस्थतियों एवं विचारधाराओं से पूरे साहस एवं बेबाक लेखन करनेवाले द्विवेदी के साहित्य को एक जगह प्राप्त हुआ. भारत यायावर कई नये तथ्य लाये, जो शोधार्थियों के लिये एक बृहद् जानकारी का स्रोत है.

यायावर जी कहते हैं कि महावीर प्रसाद द्विवेदी हिंदी के पहले लेखक थे, जिन्होंने अपनी जातीय परंपरा का गहन
अध्ययन ही नहीं किया था, उसे आलोचनात्मक दृष्टि से भी देखा था. उन्होंने वेदों से लेकर पंडितराज जगन्नाथ तक के संस्कृत-साहित्य की निरंतर प्रवाहमान धारा का अवगाहन किया था. द्विवेदी जी के अनुसार- ‘वेद के विषय में हम हिंदुओं की श्रद्धा कुछ इतनी बढ़ गयी कि वेदों को भगवान की वाणी कहते कहते हमने उन्हें खुद भगवान बना डाला. हम बहुधा अखबारों में पढ़ते हैं- ‘अमुक शहर में वेद भगवान की सवारी निकली. अमुख तारीख को वेद-भगवान को शोडषोपचारपूजन हुआ’ ऐसे ही अंधविश्वास के खिलाफ महावीर प्रसाद द्विवेदी महान प्रतिभा एवं सशक्त लेखनी से सत्य के लिये लड़ते थे. भारत यायावर ने उनके लेखन एवं चिंतन के कई अज्ञात एवं अनछुए पहलुओं को पहली बार इस रचनावली में समाहित कर हिंदी साहित्य के धरोहर को बढ़ाया है.

भारत यायावर का कविता की तरह की आलोचना का पक्ष काफी मजबूत और उल्लेखनीय है. उन्होंने हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष समझे जानेवाले डॉ नामवर सिंह की जिंदगी पर पहली बार जीवनी लिखी. इसके पूर्व उनकी आलोचनाओं एवं पुस्तकों पर चर्चा होती रही हैै. लेकिन ये यायावर ही हैं जिन्होंने सर्वप्रथम डॉ. नामवर सिंह के आरंभिक निबंधों एवं उनकी कविताओं को एक जगह पुस्तक के रूप में ‘नामवर सिंह की प्रारंभिक रचनाएं’ नाम से हिंदी के पाठकों एवं साहित्यिकों के सामने प्रस्तुत किया. नयी एवं पुरानी दोनों पीढ़ी के रचनाकारों ने जाना कि डॉ. नामवर सिंह के साहित्य में आगमन कविता के माध्यम से हुआ. उनकी कविताओं के पढ़नेवालों में इस बात को लेकर कोई संशय भी नहीं रह जाता कि उनमें जबर्दस्त काव्य प्रतिभा है. उनके निबंध उनके छात्र जीवन में लिखे गये हैं. लेकिन आज का प्रौढ़ लेखक भी संभवतः उनके जैसे निबंध इतना विचारशील, सुचिंतित एवं गहरे विश्लेषण से युक्त लिख पायेंगे. उनके जीवन संघर्ष, शिक्षा-दीक्षा, पारिवारिक स्थिति, आर्थिक संकट या कहें उन्हें संपूर्ण व्यक्तित्व के निर्माण में भूमिका निभानेवाले, बंधु बांधव, सहयोग एवं परिवेष को पहली बार भारत यायावर ने पाठकों के सामने उपस्थित किया.

उसके बाद ‘आलोचना के रचना पुरुष : नामवर सिंह’ एवं ‘नामवर सिंह का आलोचना कर्म’ दो महत्त्वपूर्ण आलोचनात्मक कृतियां प्रकाश में आयी हैं. यह पुस्तकें नामवर सिंह की आलोचना कृति ‘कविता के नये प्रतिमान’, ‘वाद-विवाद संवाद,’ ‘छायावाद’, ‘दूसरी परंपरा की खोज’, ‘हिंदी में अपभ्रंश का योगदान’, ‘प्रगतिवाद’ आदि को आधार बन कर लिखी गयी हैं. इसमें उन्होंने नामवर सिंह के आलोचनात्मक व्यक्तित्व एवं परंपरा उनका स्थान निर्धारित किया है. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य नंददुलारे वाजपेयी, डॉ.रामविलास शर्मा के बाद अगर हिंदी आलोचना में वह गौरवशाली स्थान प्राप्त हुआ है तो डॉ. नामवर सिंह को. भारत यायावर की आलोचना मानवीय मूल्यों को आधार लेकर आगे बढ़ती है. किसी विचारधारा को आलोचनात्मक दृष्टि पर हावी होने नहीं देतेे. समय के बदलते सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक,राजनीतिक एवं साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में नामवर सिंह की आलोचना का मूल्यांकन एवं मूल स्थापन करते हैं.

भारत यायावर का मानना है कि ‘उनकी आलोचना आज के संदर्भ में प्रासंगिक हैं. पुरानी होकर भी उसमें ताजापन है. यह साहित्य की अनगिनत, अनसुलझी गुत्थियों को सुलझाती है और साहित्य पथ में रोशनी दिखाती है. साहित्य में हर प्रकार रचनाकार हैं. हर बड़े रचनाकार की कुछ निजी विशेषताएं होती हैं. क्या उन्हें एक ही प्रतिमान से मूल्यांकित किया जा सकता है. जिन प्रतिमानों से मुक्तिबोध को जांचा परखा जा सकता है, क्या उन्हीं से नागार्जुन और त्रिलोचन को मूल्यांकित किया जा सकता है. नामवर सिंह इस तरह हर कवि-कथाकार के लिये आलोचना-प्रणाली बदलते हैं.’

भारत यायावर की आलोचनात्मक दृष्टि बड़ी सूक्ष्म एवं पारदर्शी है. रचनाओं को मूल्यांकित करते एवं निष्कर्ष निकालते समय जल्दबाजी नहीं करते. उसके तथ्यों के आधार पर ही कोई विचार स्थापित करते हैं. इससे उनकी आलोचना में फतवेबाजी नहीं बल्कि विश्वसनीयता का मूल्य है. इन्होंने ‘नामवर होने का अर्थ एक पुनर्पाठ’ पुस्तक में नामवर जी की प्रकाशित सभी किताबों का मूल्यांकन किया है, जो अपने आप में एक बार फिर से डॉ. नामवर सिंह की आलोचना-यात्रा को समझने की नयी दृष्टि प्रदान करती है.

इनकी प्रतिभा को समय-समय पर देश-विदेश की संस्थाओं ने पुरस्कार देकर सम्मानित भी किया है. इन पुरस्कारों में नागार्जुन पुरस्कार, बेनीपुरी पुरस्कार, राधाकृष्ण पुरस्कार, पुश्किन पुरस्कार (मास्को) एवं आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी सम्मान (रायबरेली) जैसे पुरस्कार उल्लेखनीय हैं. ये पूरी तन्मयता एवं समर्पण के साथ अपने लेखन में रत हैं. यही इनका स्वभाव भी है. अपनी प्रसिद्धि के लिये कोई आयोजित प्रायोजित एवं गुटबंदी जैसे जुगाड़ू टोटका नहीं अपनाया. जबकि जो इनके साथ-साथ हिंदी साहित्य क्षेत्र में आये आज वो
मठाधीश जैसे बन गये हैं. क्योंकि जो छल छद्म उनके पास है यह कवि आलोचक भारत यायावर के पास नहीं है. यहां तो उभरते युवा नये रचनाकारों को किस प्रकार सहयोग दिया जाय इसकी चिंता है. प्यार, स्नेह एवं सहयोग इस रचनाकार के व्यक्तित्व के महान गुण है. दूसरे की रचनाओं को उभारने के लिये संपादन के क्षेत्र में आये. उनकी हिंदी में संपादन की सेवा अनुसंधान का विषय है. फिर भी साहित्य-जगत में भारत यायावर की रचनाओं एवं उल्लेखनीय कार्यों की ओर विद्वानों एवं आलोचकों का ध्यान अपेक्षाकृत बहुत कम गया. लेकिन आज वह प्रसिद्धि के शिखर पर हैं. कविता, आलोचना, निबंध, शब्द-चित्र, समीक्षा लेख लिख रहे हैं. एक साल के अंदर एक दो नहीं चार-चार किताबों का प्रकाशित होना उनकी अथक लेखन क्षमता एवं गहन तथा व्यापक अध्ययन से ही यह संभव हो सका है.

फिलहाल भारत यायावर जबलपुर, मध्य प्रदेश से निकलने वाली मासिक पत्रिका ‘प्राची’ के प्रधान संपादक हैं. उनके संपादन में पत्रिका और बेहतर निकल रही है. नयी-नयी प्रतिभाओं को साहित्य में उभारने एवं आगे बढ़ाने के उद्देश्य से ही संपादन के क्षेत्र में आये हैं. समय पर पत्रिका निकालना भी एक दायित्व है जो निभा रहे हैं. इसके अलावा छत्तीस गढ़ से निकलनी वाली साहित्य और समालोचना की पत्रिका ‘छत्तीसगढ़ मित्र से भी जुड़े हैं.

सम्पर्कः ग्राम- डुमर, पोस्ट ऑफिस- जगन्नाथ धाम, जिला- हजारीबाग-825317 (झारखंड)

मो : 9939707851

भारत यायावर का पता : सम्पर्कः न्यू एरिया,

पहली गली, हजारीबाग (झारखण्ड)

मोः 9431152619, 9835754519

E-mail: priyadarshivivek@yahoo.com

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